Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
05-19-2019, 01:24 PM,
#91
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
अमन-“हाँ मेरी बच्ची, मेरी सोफिया, मेरी रज़िया की निशानी, आ जा अपने अब्बू से चिपक जा… तू मेरी है सोफिया गलप्प्प…” 

सोफिया-“हाँ अब्बू आपकी। मुझे अपने अब्बू से प्यार करने की इस गुनाह की सजा दो… मुझे सजा दो अब्बू … मुझे इतना प्यार करो कि मैं आज मर जाऊूँ। मेरा कुँवारा पन मेरे अब्बू आपके नाम। जवान कर दो मुझे… लड़की से औरत बना दो गलप्प्प गलप्प्प…” 

वो इस कदर गरम हो चुकी थी कि उससे कुछ भी होश नहीं था कि वो क्या बोल रही है। रात भर उसकी आँख एक पल के लिए भी नहीं लगी थी। कुँवारी चूत रह-रहकर पानी निकाल रह थी। वो अपने कुँवारेपन से परेशान हो चुकी थी। आज वो अमन को अपना सब कुछ देकर उसे अपना बनाना चाहती थी। 

अमन सोफिया की टीशर्ट नीचे कर देता है और निप्पल को अपने मुँह में लेकर चूसने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

सोफिया-“अह्ह… काटो ना अब्बू , काटो इसे जोर से अह्ह…” 

अमन सच में सोफिया के निप्पल को मुँह में लेकर काटने लगता है। सोफिया तिलमिला जाती है। निप्पल आज से पहले कभी इतने मोटे, इतने कड़क नहीं हुये थे। उसकी चूत पे रोंगटे खड़े हो चुके थे। जिस्म का हर एक हिस्सा अमन पे जान निछावर करने को बेताब था। 

इससे पहले कि अमन सोफिया के बाकी के कपड़े उतारता उसका सेल फोन बजता है। बौखलाहट में अमन बेड से खड़ा हो जाता है और जब वो सामने वाले को हेलो कहता है तो बौखलाहट खामोशी में बदल जाती है। कुछ देर बाद जब काल डिसकनेक्ट होती है तो अमन का सारा जोश, सारा जलजला रेत के तूफान की तरह गायब हो चुका था। 

सोफिया काँपते हुई आवाज़ में-क्या हुआ अब्बू ? 

अमन-हम कल घर वापस जा रहे हैं। 

सोफिया का चेहरा उतर जाता है-क्यूँ सब ख़ैरियत तो है? 

अमन-“हाँ सब ठीक है। फॅक्टरी में कुछ प्राब्लम है। हमें कल सुबह ही जाना होगा। मैं अभी आता हूँ …” और अमन कपड़े पहनकर बाहर चला जाता है। 

सोफिया अपनी किस्मत पे रोए या हँसे? उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वो उसी तरह आधी नंगी बेड पे बैठी रहती है। 

***** ***** 

इधर अमन विला में शीबा जीशान के रूम का दरवाजा खटखटाकर अंदर दाखिल होती है। जीशान बेड पे लेटा हुआ था। शीबा को देखकर वो उठकर बैठ जाता है। 

शीबा-क्या बात है जीशान कब से रूम में बैठे हो बाहर भी नहीं आए? 

जीशान सुबह जो उसके साथ हुआ वो शीबा को बताता है। 

शीबा-“क्या? अनुम ने तुमपे हाथ उठाया? उसकी इतनी हिम्मत? जलती है वो तुमसे जीशान हमेशा से तुमसे नफरत करती है। वो तो चाहती भी नहीं थी तुम्हें जनम देना। तुम जानते हो जब तुम उसके पेट में थे तो उसने ऐसी कई दवाइयाँ खाई थी जिससे अबोर्शन हो जाये और तुम दुनियाँ में ना आ सको। तुम्हारे बर्थ के बाद भी उसकी नफरत कम नहीं हुई। बेटा, वो तुम्हें कभी अपनी छाती का दूध नहीं पिलाती थी। वो तो मैं थी जिसने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया बेटा। तुम अनुम से बात भी मत करना। वो तुमसे जब इतनी नफरत करती है तो तुम उसे क्यों इतना रेस्पॉन्स देते हो? पड़े रहने दो उसे एक तरफ। तुम बस मेरे पास रहो बेटा अपनी अम्मी की बाहों में…” 

जीशान जब शीबा के मुँह से ये झूठी बातें सुनता है तो उसे ये सब सच लगता है और वो उन बातों पे यकीन भी कर लेता है-“जब ऐसी बात है तो आपकी कसम अम्मी, मैं उनसे कभी बात नहीं करूँगा… कभी नहीं …” 

शीबा-“शाबाश मेरा बच्चा, मुझसे तुझसे यही उम्मीद थी। अपनी अम्मी को प्यार कर जीशान बेटा अह्ह…” 

जीशान शीबा की गर्दन चूमने लगता है। शीबा की आँखों में मक्कारी साफ दिखाई दे रही थी। उसे यकीन हो चला था कि वो अपने मकसद में कामयाब ज़रूर होगी। 

वो अमन के कपड़े उतार देती है और खुद नीचे बैठकर अपनी नाइटी को नीचे सरका के अमन के लण्ड को पहले अपनी दोनों चुचियों के बीच में घिसती है और फिर गलप्प्प गलप्प्प। 

जीशान-“अह्ह… अम्मी जीईई…” 

शीबा को नंगे होने में वक्त नहीं लगता। वो जीशान को अपने जिस्म का आदी बना देना चाहती थी। वो चाहती थी कि जीशान बस उसकी चूत सूँघता हुआ कहीं से भी उसके पास चला आए। पर वो एक बात भूल गई थी कि जीशान के जिस्म में अमन का खून दौड़ रहा है। 

शीबा जीशान को अपने ऊपर आने को कहती है और जब जीशान उसके ऊपर चढ़ता है तो वो दोनों हाथों में लण्ड को पकड़कर पहले चूत पे घिसता है जिससे क्लटोरस और शोर मचाने लगती है और देखते ही देखते जीशान का लण्ड शीबा की चूत में आगे पीछे होने लगता है। 

शीबा-“अह्ह… जीशान बेटा, तू बस यहीं रहा कर मेरे ऊपर… ऐसे ही । तुझे किसी अनुम की बात सुनने की ज़रूरत नहीं अह्ह… मेरा बेटा अह्ह… माँ… तुझे जो चाहिए, जितना चाहिए मैं दूँगी … जब कहेगा तब दूँगी … बस तू वही कर जैसा मैं तुझसे कहती हूँ । करेगा ना बेटा? अह्ह…” 

जीशान-“हाँ अम्मी, जो आप कहेंगी मैं वही करूँगा अह्ह…” 

बाहर खड़ी रज़िया के कानों में ये बात पहुँच चुकी थी। रज़िया अपने रूम में जाकर बेड पे बैठ जाती है। आज बरसों बाद उसे अमन विला की मजबूत दीवारों में हल्की-हल्की दरारें पैदा होती हुई नजर आ रही थीं। वो घर की सबसे अहम और ज़िम्मेदार औरत थी। वो ये कभी नहीं होना देना चाहती थी कि एक छत के नीचे रहने वाले लोगों के दिलों के बीच नफरत और खुदगर्जी पैदा हो। 

शीबा नहाकर जब किचेन की तरफ जाने लगती है, तब रज़िया उसे देखकर उसे अपने रूम में बुला लेती है, और दरवाजा बंद कर देती है। 

शीबा-क्या बात है? 

रज़िया-तुम ये गलत कर रही हो शीबा? 

शीबा-“उफफ्फ़ हो… फिर से? नहीं अम्मी जान, ये एमोशनल अत्याचार दुबारा शुरू मत कर दो आप। मुझे पता है, मैं क्या कर रही हूँ । और वैसे भी बड़ों के नक्शे कदम पे चलने में कोई बुराई नहीं …” 

रज़िया-“सुनो शीबा, सबसे पहले तो तुम मुझसे ऊूँची आवाज़ में बात करना बंद कर दो, वरना ये जो तुम्हारे जीभ है ना… इसे मैं गले से खींच लूँगी। तुम मेरी भतीजी हो, इसका मतलब ये नहीं है कि मैं तुम्हारी हर बात सुन लूँ । और हाँ मैंने और अनुम ने जो किया वो अमन की मर्ज़ी से हुआ था। पर तुम जो जेशु के साथ कर रही हो वो शायद अमन को पसंद ना आए? सोचो अगर अमन को तुम्हारे और जीशान के नाजायज रिश्तों के बारे में भनक भी लग गई… तो हो सकता है वो तुम्हें तलाक दे दे, या जान से भी मार दे। आखिरकार उसके रगों में मेरा खून दौड़ रहा है। 

शीबा ये सुनकर सुन्न पड़ जाती है। हवस के नशे में वो ये बात सच में भूल ही गई थी। 

रज़िया-“मैं फिर भी तुम्हें एक आख़िरी मौका देती हूँ , सुधर जाओ और अपनी ये नापाक हरकतों से बाज आ जाओ। वरना मुझसे बुरा कोई नहीं होगा। इसे धमकी समझो, वॉर्निंग नहीं …” रज़िया बाहर अनुम के रूम में चली जाती है। 

शीबा दिल में सोचने लगती है-“सासूजी शायद आप ये बात भूल गई हैं कि तुरुप का पत्ता मेरे पास है, और मैं इसे जिस बात में इश्तेमाल करूँगी वो बात मेरी हो जाएगी…” 

फिर शीबा जीशान के रूम की तरफ चले जाती है। वो अपने रूम में बैग पैक कर रहा था, समर कैम्प जाने के लिए। शीबा रूम में आते ही दरवाजा बंद करके बेड पे बैठ जाती है और अपना सर दोनों हाथों से पकड़ लेती है। 

जीशान-“क्या बात है अम्मी आप परेशान लग रही हैं?” 

शीबा-“हाँ बेटा, तुम्हारी दादी ने मुझसे अभी-अभी ये कहा है कि वो हमारे रिश्ते के बारे में तुम्हारे अब्बू को बता देंगी। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा बेटा। तुम अपने अब्बू का गुस्सा तो जानते हो, वो हम दोनों को जान से मार देंगे…” 

जीशान-“अम्मी आप खामखाह फिकर कर रही हैं, मैं हूँ ना आपका बेटा…” 

शीबा-“हाँ जीशान, बस तुझपे ह भरोसा कर सकती हूँ । तेरी दादी का मुँह बंद करने का बस एक ही रास्ता है…” 

जीशान-वो क्या अम्मी? 

शीबा-“तेरे दादी का मुँह बस एक कीमत पे बंद हो सकता है। अगर तू अपना ये तेरी दादी के मुँह में डाल दे। फिर वो चाहकर भी किसी को हमारे रिश्ते के बारे में नहीं बता सकेंगी और अगर बताने की कोशिश भी करेगी तो हम इन्हें ब्लैकमेल कर सकते हैं…” 

जीशान-“पर अम्मी, दादी के साथ… नहीं नहीं ये मुझे ठीक नहीं लगता…” 

शीबा-“अरे बेटा, बड़ी कमीनी है तेरे दादी । जवानी में कई लण्ड खा चुकी है, तेरे दादा का, उनके दोस्तों का, तेरे अब्बू का और हाँ बेटा ये जो बिजनेस इतना बड़ा कर पाए हैं ना तेरे अब्बू , ये सब तेरी दादी के पैर खोलने से ही तो हुआ है…” 

जीशान-सच अम्मी, दादी ऐसी थीं? 

शीबा-“हाँ बेटा, मैं क्या तुझसे झूठ बोलूँगी भला? बोल करेगा ना मेरा ये काम? अरे जीशान तेरी दादी तो तेरे नीचे कुचलकर निहाल हो जाएगी। वो तो खुद उकता गई है तेरे अब्बू का ले लेके। एक बार वो मेरे गबरू जवान से चुद जाए… उसके बाद तुम देखना कि वो कैसे हमारी उंगलियों पे नाचती है…” 

जीशान-“अम्मी, मुझे समर कैम्प से आने दो आप। उसके बाद जो आप कहोगी वही होगा…” 

शीबा-“मेरा बच्चा, आ जा मेरे पास…” और दोनों के होंठ एक दूसरे में घुलते चले जाते हैं। शीबा की आँखों में चमक आ जाती है। उसे रज़िया और अनुम से अपना बदला पूरा होता हुआ दिखाई दे रहा था और अमन हमेशा हमेशा के लिए उसकी बाहो में महसूस होने लगता है। 

***** ***** 
उधर दिल्ली के होटेल के कमरे में सोफिया बेड पे बैठी अमन का कब से इंतजार कर रही थी। कुछ देर बाद अमन रूम में दाखिल होता है, उसकी पेशानी पे रुमाल बँधा हुआ था जो आम तौर पे सर दर्द होने पे लोग बाँधते हैं। 

सोफिया-अब्बू , आप ठीक तो हैं ना? 

अमन-“हाँ…” बस इतना कहकर वो बेड के दूसरी तरफ लेट जाता है। 

सोफिया की आग में अभी वो शिद्दत नहीं थी, पर वो अभी तक बुझी भी नहीं थी। वो अमन के ऊपर अपना एक हाथ रख देती है-“अब्बू , मैं आपका सर दबा दूँ?” 

अमन-“नहीं सोफिया, सो जाओ हमें कल सुबह जल्दी जाना है…” 

सोफिया की पलकें भीग जाती हैं और वो रुआंसी हो जाती है-“अब्बू , आप मुझसे ठीक से बात क्यों नहीं कर रहे हैं?” 

अमन सोफिया की तरफ करवट लेते हुये-“बेटा रात बहुत हो गई है और मुझे सच में बहुत नींद भी आ रही है…” 

सोफिया-“आप सो जाओ। मैं अब आपको परेशान नहीं करूँगी, कभी नहीं …” 

अमन-“बस बहुत हुआ सोफिया, वरना मेरा हाथ उठ जाएगा तुमपे… पता नहीं मुझे क्या हो गया था? मुझसे गलती हो गई। आगे से ऐसा कुछ नहीं होगा हमारे बीच। अब सो जाओ…” 

सोफिया रोने लगती है और रोते-रोते ही अमन से बात करने लगती है-“हाँ, आपसे गलती हुई होगी और शायद आपको उस बात का मलाल भी है। पर मैं आपसे प्यार करने लगी हूँ अब्बू और ये मेरे इख्तियार में नहीं है। अब मुझे हर जगह बस आप नजर आते हैं, खाना खाने में दिल नहीं लगता, किसी काम में दिल नहीं लगता मेरा, मुझे लगने लगा है मैं शायद पागल हो जाउन्गी, और ऐसे ही घुट-घुटकर एक दिन मर भी जाउन्गी। मैं ये भी जानती हूँ कि आप भी मुझसे प्यार करते हैं… एक बेटी की तरह नहीं , बल्की ये वो मोहब्बत है… जो आपकी आँखों में मैंने देखी थी अम्मी के लिए। पर आप कभी नहीं मानेंगे क्योंकी आप सिर्फ़ अम्मी से प्यार करते हैं। मैं तो आपके लिए कुछ भी नहीं हूँ ना?” 

अमन-“सोफ , इधर आ मेरे पास…” 
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05-19-2019, 01:24 PM,
#92
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
सोफिया-“नहीं नहीं , मैं नहीं आउन्गि। मुझे अकेला छोड़ दीजिए । इस दुनियाँ में मैं अकेली रह गई हूँ । अब्बू , मेरा गुनाह सिर्फ़ इतना है कि मुझे आपसे मोहब्बत हो गई, अपने अब्बू से। रहने दो, मुझे अकेला मरने दो घुट-घुटकर, दफना देना मुझे…” और वो सिसक-सिसक के रोने लगती है। आज उसने चन्द लफ़्ज़ों में अपना हाल-ए-दिल अमन के सामने रख दिया था। 

अमन तो सोफिया से मोहब्बत करता ही था। पर वो इस रिश्ते को कभी अमल -जामा पहनना नहीं चाहता था। 

सोफिया रोते-रोते अब हिचक़ियों पे आ गई थी और जब वो ऐसी हालत में होती है तो उसे साँस लेने में मुश्किल होने लगती है, इस बात से अमन भली भाँति वाकिफ़ था। वो सोफिया को अपनी तरफ खींचता है पर सोफिया भी अपने बाप की बेटी थी जिद्दी । वो अमन का हाथ झटक देती है। 

अमन-सोफिया, इधर देख मेरी तरफ। 

सोफिया भीगी पलकों से अमन की तरफ देखती है। 

अमन-“आइ लव यू …” 

सोफिया जोर से हँसती है और फिर हँसती ही चली जाती है। अमन उसे अपने पास खींचकर उसके गुलाबी-गुलाबी होंठों को अपने होंठों से लगाकर चूमने लगता है। और सोफिया अपनी मोहब्बत को पाकर जन्नत की दहलीज पे पहला कदम रख देती है। 

सोफिया-“अह्ह… अब्बू , मुझे बेपनाह प्यार करिए ना अह्ह… अब्बू …” 

अमन-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

सोफिया-“अब्बू , जैसे आप पहली बार अम्मी को प्यार किए थे मुझे भी प्यार करिए ना… आपकी बेटी आपसे अपने कुँवारेपन को हमेशा-हमेशा के लिए ख़तम करने की भीख माँगती है। मुझे सब कुछ दे दो, अब्बू मुझे अपना बना लो। अपनी सोफिया की इतनी सी बात मान लो अब्बू …” 

अमन-“हाँ मेरी जान, तू तो मेरी जान की और मेरे प्यार की निशानी है, तेरे लिए तो सब कुछ कुर्बान…” और अमन सोफिया के बचे हुई कपड़े भी निकाल देता है। आज पहली बार वो सोफिया को इस हालत में देख रहा था। आज वो खुद को वही 18 साल वाला अमन महसूस कर रहा था, जिसने अपनी बर्थडे पर रज़िया से ऐसा गिफ्ट लिया था, जिसने इस खानदान की तकदीर बदलकर रख दी थी। और आज उसी दिन का अमन का बर्थ-डे गिफ्ट, रज़िया और अमन के प्यार की निशानी सोफिया अपनी तमामतर खूब सुरतियों के साथ अमन को अपना सब कुछ देने के लिए बेताब थी। 

अमन सोफिया को लेटा देता है और उसकी जाँघ पे चूमते हुये पहली बार अपनी बेटी की कुँवारी चूत का दीदार करता है। लाल गुलाबी होंठों वाली सोफिया की चूत अमन को रज़िया और अनुम की याद दिला देती है। जब पहली बार अमन ने अनुम की चूत पे अपने होंठ रखे थे, उस वक्त भी उसका दिल इतने ही तेजी से धड़का था जितने तेजी से आज धड़क रहा था। 


सोफिया की आँखें बंद थीं। उसे अपने अब्बू पे पूरा भरोसा था। वो हर काम अमन की मर्ज़ी के मुताबिक करवाना चाहती थी। 

अमन अपनी जीभ से जैसे ही सोफिया की गुलाबी चूत के अन्द्रुनी हिस्से को चूमता है, दोनों के जिस्मों में बिजली दौड़ जाती है। अपनी बेटी की चूत को चाटना… ये ख्याल ही अमन के जिस्म में सनसनी फैलाने के लिए काफी था। 

और सोफिया जो जज़्बात में अमन को सब कुछ देने का कह तो चुकी थी। पर जब अमन ने उसे वहाँ छुआ, जहाँ किसी ने नहीं छुआ था तो एक अजीब सा डर, कुँवारापन टूटने का डर, लड़की से औरत बनने का डर, चूत के अंदर तक चिर जाने का डर, सोफिया के जिस्म को थर्रा के रख देता है। पर मोहब्बत ही इतनी गहरी थी सोफिया की कि वो आज हर दर्द बर्दाश्त करने को तैयार थी। 

अमन सोफिया की चूत को अंदर से बाहर से हर तरफ से चाटता चला जाता है। सोफिया का जिस्म पहला झटका खाता है और पानी के कुछ छीटे अमन के चेहरे को गीला कर देते हैं। सोफिया झट से उठकर बैठ जाती है और अमन को नीचे करके काँपते हाथों से पहली बार उस तलवार को थामती है, जिससे ना जाने कितने बेगुनाह कतल हो चुके थे। वो खूबसूरत अमन का लण्ड जब सोफिया की नरम -नरम मुट्ठी में आता है तो उसे सोफिया के मुँह में जाते देर नहीं लगती। 

अमन-“अह्ह… सोफिया बेटी … तू बिल्कुल अपनी अम्मी पे गई है अह्ह… वो भी ऐसे ही चूमते हुये चूसती है…” 

सोफिया-“अब्बू , मैं अम्मी की बेटी ज़रूर हूँ पर मैं हर काम ऐसे करूँगी कि आप अम्मी को भूल जाओगे…” और सोफिया अमन के लण्ड को गले के अंदर तक घुसाकर इतने जोर से खींचती है कि अमन बर्दाश्त नहीं कर पाता और उसकी कमर अपने आप ऊपर उठती चली जाती है। वो सोफिया के मुँह में लण्ड अंदर-बाहर करने लगता है। सोफिया गलप्प्प घ न्न गलप्प्प, ना साँस ले पा रही थी, ना ठीक से बोल पा रही थी। पर लण्ड को इस कदर चूस रही थी, जैसे उसने जिंदगी में कई लण्ड खाये हैं। 

अमन सोफिया के मुँह से लण्ड बाहर निकाल लेता है और उसे लेटा देता है-“बेटी थोड़ा दर्द होगा, तुम सह लोंगी ना?” 

सोफिया-“अब्बू , आप मेरी फिकर मत करो। बस जल्दी करो अब्बू , जल्दी से अह्ह…” 

अमन पहले थोड़ा रगड़ता है और फिर सोफिया की चूत के पर्दे तक लण्ड को घुसा देता है। अब तक सोफिया खुश थी। अमन सोफिया की आँखों में देखता है और अपने होंठ उसके होंठों से मिलाकर दोनों हाथों से उसकी चुचियों को दबाते हुये जोर से एक झटका अंदर देता है, और सोफिया अमन के मुँह के अंदर चीखती चली जाती है। 

खून से लथफथ चूत के अंदर अमन अपने लण्ड को नहीं रोकता, वो धीरे-धीरे लण्ड अंदर-बाहर करने लगता है और सोफिया तड़पती रहती है, मचलती रहती है। थोड़ी देर बाद जब अमन अपने होंठ सोफिया के होंठों से अलग करता है, तब सोफिया रो भी रही थी और हँस भी रही थी-“अह्ह… अम्मी, मैंने आपके शौहर को अपना बना लिया। अब उन्हें मुझसे कोई अलग नहीं कर सकता… अमन ख़ान आज से मेरे हैं। आप सुन रही हो ना अम्मी… अब्बू आराम से अन्न्नने्…” 

अमन कुँवारी चूत खोलने में महारत रखता था। पर आज सोफिया की चूत के पर्दे को हटाने में उसका दिल भी एक पल के लिए धड़कना बंद कर चुका था। वो सोफिया को ऐसे चोदने लगता है जैसे रज़िया और अनुम को चोदा करता था। वो ये भी भूल गया था कि सोफिया की चूत अब तक इतनी खुली नहीं है। पर अमन ख़ान तो अमन ख़ान था। 

सोफिया अपनी दोनों टाँगे खोलकर अमन का साथ देने लगती है। रात तो अभी जवान हुई थी। 

सुबह 7:00 बजे-दिल्ली होटल रूम 

अमन बाथरूम से नहाकर बाहर निकलता है। रात उसे सोफिया ने बहुत कम आराम करने दिया था। पर कहते हैं जवान चूत हो या लण्ड जितना चुदाई करे उतना और करने को दिल चाहता है और यही हाल सोफिया का था। वो बेड पे ब्रा और पैंटी में लेटी हुई अमन के बाहर निकलने का इंतजार कर रही थी। 

जैसे ही अमन बाहर निकलता है, उसकी नजर सोफिया पे पड़ती है। सोफिया की खूबसूरत जवानी का मजा तो वो रात में ले ही चुका था। अपने बेटी को इस तरह मचलता देखकर उसका दिल भी झूम उठता है। 

सोफिया-“अब्बू क्या बात है, बड़े थके-थके से लग रहे हैं?” 

अमन सोफिया की खुली हुई ब्रा को निकालकर फेंक देता है और नरम मुलायम चुचियों को मसलने लगता है। 

सोफिया-“अब्बू , एक रात में आपने मुझे क्या से क्या कर दिया। देखिये ना मेरा जिस्म कुछ और कह रहा है और रह कुछ और…” 

अमन-“मुआह्ह… मेरी जान, बहुत खूबसूरत जिस्म है तेरा। दिल तुझसे अलग होने को करता ही नहीं …” 

सोफिया-“तो मत होइये अलग, कौन आपको कह रहा है? बस इसी तरह अपनी बाहों में समेटे रखिए, अपनी बेटी को प्यार कीजिए ना अब्बू …” 

अमन सोफिया की चुचियों को मुँह में लेकर चूमते हुए, चूसने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

सोफिया का जिस्म फिर से ढीला होने लगता है। वो खुद को अमन के हवाले कर देती है-“अब्बू , मैं घर नहीं जाना चाहती। हम कुछ दिन और यहाँ नहीं रुक सकते?” 

अमन सोफिया की पैंटी निकालकर फेंक देता है और गुलाबी पंखुड़ियाँ अमन के मुँह के सामने आ जाती हैं। मैं भी कुछ दिन अपनी बेटी के साथ गुजारना चाहता हूँ । आखिरकार मुझपे तेरा भी तो हक उतना ही है जितना औरों का है। 

सोफिया-“अह्ह… अब्बू जी क्या करते है? उसे ऐसे मत सहलाइए ना अह्ह…” 

अमन सोफिया को उल्टा लेटा देता है और चूत के साथ-साथ सोफिया की साफ चिकनी गाण्ड को भी चाटने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

सोफिया बेडशीट को जोर से पकड़ लेती है-“अब्बू जी नहीं ना अह्ह… अब्बू जी मुझे क्या कर रहे हैं? मेरे अब्बू अह्ह…” 

अमन-“गलप्प्प तेरी चूत चाट रहा हूँ मेरे बच्ची…” अमन सोफिया को भी रज़िया, अनुम और शीबा की तरह गंदी -गंदी बातें करते हुये चोदना चाहता था। वो जानता था कि सोफिया भी रज़िया का खून है और जिस तरह रज़िया को पीछे से गाण्ड में लेना बहुत अच्छा लगता था, उसी तरह सोफिया भी कहीं ना कहीं ये ज़रूर चाहती होगी। पर गुलाब अभी पूरी तरह नहीं खिला था। थोड़ी पंखुड़ियाँ खुलना बाकी थीं और अमन के पास सबर बहुत था। वो सोफिया की चूत के अंदर तक जीभ घुसाकर सोफिया की चूत को तर-बतर कर देता है…” 

सोफिया की चूत से पानी का एक-एक कतरा बाहर निकलकर अमन के मुँह में गिरने लगता है। और जितना अमन चाटता है, उतना सोफिया की चूत पानी छोड़ती है। आखिरकार सोफिया से बर्दाश्त नहीं होता और वो अमन से बदला लेने के लिए उसका तौलिया निकाल देती है। चमकता हुआ खूबसूरत अमन का लण्ड सोफिया की आँखों की रोशनी और बढ़ा देता है। वो उसे अपनी नाजुक से मुट्ठी में लेकर सहलाने लगती है। 

अमन सोफिया को अपनी आँखों के इशारे से कुछ कहता है। 

और सोफिया अपने अब्बू की बात मानते हुये उसे अपने मुँह में ले लेती है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन-“अह्ह… सोफी बेटी … तेरी अम्मी भी ऐसे नहीं चूसती है अह्ह…” 

सोफिया-“गलप्प्प मैंने आपसे कल रात ही कह थी अब्बू , मैं आपको इतनी मुहब्बत करूँगी कि आप सबको भूल जाओगे गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन-“अह्ह… इधर आ जा, अपने अब्बू के पास मेरी जान अह्ह…” 

सोफिया-“अभी नहीं … अभी मुझे इसे प्यार करने दीजिए गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन-“अह्ह… बस कर गुड़िया अह्ह…” 

सोफिया-“नहीं अब्बू , ये मेरे अब्बू की सबसे खूबसूरत चीज है। इसे मैं इतनी आसानी से नहीं छोड़ने वाली । इसे मैं हमेशा ऐसे ही प्यार करती रहूंगी गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन का दिल सोफिया की इन बातों से इस कदर बदलने लगा था कि उसे अब ना रज़िया याद आ रही थी, और ना शीबा। वो अपनी नई दुल्हन, बेटी के प्यार में डूबा हुआ महसूस कर रहा था खुद को। जब सोफिया अमन की बात नहीं सुनती और अमन से एक-एक लम्हा इस तरह सोफिया के मुँह में गुजारना मुश्किल हो जाता है तो अमन सोफिया को अपने तरफ खींच लेता है और उसकी कमर को दोनों हाथों में लेकर पीछे से अपना लण्ड उसकी चूत में बिना सोफिया को कुछ कहे डाल देता है। 

सोफिया-“अब्बू उुउउ जीईई… मेरे अब्बू अह्ह…” 

अमन-“जो मेरी बात नहीं सुनते, मैं उसे ऐसी ही सजा देता हूँ सोफिया अह्ह…” 

सोफिया-“अगर ऐसी बात है तो मैं आपकी बात बिस्तर पे कभी नहीं सुनूँगी । ताकी आप इसी तरह… मुझे सजा देते रहें अह्ह… ये सजा मुझे हमेशा इसी तरह चाहिए… जीईई अब्बू अह्ह…” 

अमन के लण्ड के नीचे हर औरत और लड़की पनाह माँगती थी। सोफिया ही वो लड़की थी जो अमन के लण्ड से भी नहीं घबराई। सोफिया को चोदते हुये अमन को खुद पे बहुत नाज होने लगता है। आखिरकार एक ख़ूँख़ार शेर और मजबूत कलेजे वाली रज़िया के मिलाप से वजूद में आई थी सोफिया। उसमें दोनों के खून की झलक साफ-साफ नजर आती थी। 

जितने जोर से अमन सोफिया को चोद रहा था उतने ताकत से सोफिया अपनी कमर को पीछे अमन के लण्ड की तरफ धकेलने लगती है। 

***** ***** 

इधर अमन विला में जीशान शीबा के रूम में चला जाता है। 

आज दोपहर में वो और लुबना समर कैम्प जाने वाले थे। इसी लिए जीशान शीबा को चलते-चलते लण्ड की सलामी देने की नीयत से उसके बेड पे उसके पीछे जाकर शीबा से चिपक जाता है। शीबा गहरी नींद में सोई हुई थी। पर जैसे ही जीशान उसकी चूत को पैंट के ऊपर से छूता है, वो अपने आँखें खोल देती है। 

जीशान-गुड मॉर्निंग अम्मी। 

शीबा-“गुड मॉर्निंग मेरे सरताज। आज इतनी सुबह-सुबह अम्मी की याद… ख़ैरियत तो है ना?” 

जीशान शीबा के निप्पल को अपने मुँह में लेकर चूसने लगता है-“भूक लगी थी अम्मी। घर में दूध ठंडा है, सोचा सीधा ताजा ताजा, गरम दूध पिया जाए गलप्प्प गलप्प्प…” 

शीबा-“अह्ह… पी ले ना, तुझे रोका किसने है? अह्ह… तू आज समर कैम्प जाने वाला है ना? अह्ह…” 

जीशान-हाँ अम्मी दोपहर में। 

शीबा-“मुझे एक हफ्ते के लिए छोड़कर जा रहा है…” 

जीशान-“बस एक हफ्ते की तो बात है अम्मी…” 

शीबा-“मैं तुझे रोकूंगी नहीं , पर मुझे एक हफ्ते का कोटा अभी चाहिए…” 

जीशान शीबा के होंठों को चूमते हुये-“जो हुकुम मालकिन…” 

शीबा अपनी नाइटी के बटन खोल देती है और जीशान अपना अंडरवेअर निकाल देता है। उनके पास वक्त की कमी थी, और मोहब्बत और हवस की शिद्दत बहुत ज्यादा। बिना देर किए जीशान अपने लण्ड को शीबा की चूत की गहराईयों में उतार देता है। 

शीबा-“अह्ह… जीशान बेटा ऐसा कर अपनी अम्मी को कि मुझे तेरे अब्बू के पास ना सोना पड़े… भुला दे मुझे कि मैं अमन ख़ान की बीवी हूँ । बस मुझे याद रहे तो सिर्फ़ तू अह्ह…” 

जीशान-“अम्मी इस चूत पे अब सिर्फ़ जीशान ख़ान का हक है और आप पूरी की पूरी मेरी हो, मेरी अम्मी जान्नने्…” 

दोनों एक दूसरे को चूमने लगते हैं। देखते ही देखते दोपहर भी हो जाती है। जीशान और लुबना घर के सभी लोगों से मिलकर समर कैम्प के लिए निकल जाते हैं।
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05-19-2019, 01:24 PM,
#93
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
अनुम भीगी पलकों से जीशान को जाता देखती रह जाती है। रज़िया उसके कंधे पे हाथ रखती है और उसे अपनी ममता के आूँचल में छुपा लेती है-“मेरे बच्चे तू रो मत, करने दे जालिम को कितने भी सितम। पर मेरी बात याद रखना… वो अभी तुझसे नफरत करता है और जहाँ नफरत ज्यादा होती है, वहीं मोहब्बतू भी शिद्दत से होती है…” 

जीशान और लुबना समर कैम्प के लिए निकल जाते हैं। जब वो कालेज पहुँचते हैं तो सभी समर कैम्प जाने वाले स्टूडेंट्स वहाँ पहुँच चुके थे। 

रूबी बड़ी बेताबी से जीशान का इंतजार कर रही थी। जैसे ही उसकी नजर जीशान पे पड़ती है, वो खुशी के मारे उछल पड़ती है और भागते हुये जीशान और लुबना के पास पहुँच जाती है-“कितनी देर कर दी आपने? मैं कब से आपका इंतजार कर रही हूँ …” 

लुबना-“ना सलाम, ना कलाम बस आते ही मक्खी की तरह गुन-गुन शुरू कर दी तुमने रूबी…” 

रूबी-“सलाम बाजी, सलाम जीशान, कैसे हैं आप?” 

लुबना की बात रूबी के साथ-साथ जीशान को भी नागवार गुज़री थी पर जीशान बात को हँसी में टाल देता है। 

कालेज के सर जो समर कैम्प में स्टूडेंट्स के साथ जाने वाले थे, सभी स्टूडेंट्स को बस में बैठने के लिए कहते हैं। रूबी सबसे पहले बस में चढ़ती है, और अपने पास की सीट पे किसी को बैठने नहीं देती। लास्ट में जब जीशान चढ़ता है तो वो जीशान को अपने पास बैठने के लिए कहती है। 


जीशान तो बैठ जाता है पर लुबना के कलेजे पे साँप रेंगने लगता है। वो बुरा सा मुँह बनाकर जीशान और रूबी के पीछे वाली सीट पे बैठ जाती है। सफर शुरू हो जाता है और बस में हंगामा भी। फस्ट एअर के स्टूडेंट्स नाच गाना शोर मचाना शुरू कर देते हैं। 

रूबी जीशान से इतनी चिपक के बैठी थी कि लुबना को ऐसे दिखाई दे रहा था, जैसे रूबी जीशान के गोद में बैठी हो। 

लुबना के पास में एक लड़का बैठा हुआ था, जिसका नाम फ़राज़ था, देखने में अच्छा ख़ासा था। लुबना उसका कोई नोटिस नहीं लेती। उसकी नजर तो जीशान और रूबी की तरफ थी और कान गौर से उन दोनों की बातें सुनने में मसरूफ़। 

फ़राज़-“ एक्सक्यूज मी, क्या मैं खिड़की की तरफ बैठ सकता हूँ , मुझे थोड़ा सिर दर्द हो रहा है…” 

लुबना-“सर में दर्द हो रहा है तो मेरे सर पे बैठ जाओ। चुपचाप बैठे रहो वरना बाहर फेंक दूँगी …” वो इतने जोर से बोली थी कि आस-पास के स्टूडेंट्स ख़ौफ़ जदा से हो जाते हैं। 

और बेचारा फ़राज़ तो भीगी बिल्ली की तरह दुबक जाता है। 


जीशान एक नजर पीछे पलटकर लुबना की तरफ देखता है-“क्या बात है लुबु आर यू आल राइट?” 

लुबना-“जी भाई, मैं बिल्कुल ठीक हूँ , आप लगे रहो…” 

जीशान लुबना को घूर ता हुआ फिर से रूबी से बातें करने लग जाता है। 

लुबना का पारा इतना चढ़ा हुआ था की उसे कुछ अच्छा नहीं लगता और वो अपनी आँखें बंद करके सोने की कोशिश करने लगती है। रास्ता काटना लुबना के लिए दुश्वार था। वो बस दुआ कर सकती थी कि किसी तरह वो जल्दी से जल्दी कैम्प पहुँच जाए। 

3 घंटे बाद उनकी प्राइवेट बस समर कैम्प, जो एक छोटा सा मगर बहुत खूबसूरत टूरिस्ट स्पॉट भी था, वहाँ रुक जाती है। सभी स्टूडेंट्स नीचे उतर जाते हैं। उन लोगों के रुकने के लिए वहाँ एक होटेल में पहले से कमरे बुक्ड थे। लड़के एक तरफ और लड़कियाँ दूसरे तरफ के कमरे में रुकने वाले थे। पर होटेल में रुकने कौन आया था? सभी अपने-अपने दोस्तों के साथ कुदरत के नजारे देखने निकल जाते हैं। 

रूबी और जीशान वहीं खड़े थे। 

तभी वहाँ लुबना भी आ जाती है-“चलो ना भाई, घूमने चलते हैं…”

जीशान-“चलो, तुम चल रही हो रूबी?” 

रूबी मुश्कुराते हुये उन दोनों के साथ चल देती है। तीनो खामोशी से चल रहे थे। 
लुबना की वजह से रूबी और जीशान को प्राईवेसी नहीं मिल पा रह थी। 

जीशान-“लुबु, देखो सामने इतना खूबसूरत झरना है (वॉटरफाल)…” 

लुबना-“हाँ भाई, चलो जल्दी से मेरी एक अच्छी सी फोटो निकाल दो…” 

जीशान लुबना को थोड़ा आगे जाने के लिए कहता है और उसके दो-तीन फोटोस निकाल देता है। 

जीशान-“रूबी तुम भी निकाल लो ना…” 

रूबी-“नहीं अभी नहीं , बाद में…” 

लुबना को एहसास होता है कि वो कबाब में हड्डी बन रही है, क्योंकि जीशान और रूबी बातें तो लुबना से भी कर रहे थे पर उनकी नजरें एक दूसरे से हट नहीं रही थी । लुबना बहाना बनाकर वहाँ से निकल जाती है। 

रूबी और जीशान आगे चलने लगते हैं, और लुबना दबे पाँव उनका पीछा करने लगती है। 

रूबी-“जीशान, मैं तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ …” 

जीशान-हाँ बोलो ना। 

रूबी-“तुम एक लड़के हो, पता नहीं तुम्हें ये बात कैसी लगे? आम तौर पे ये बात लड़के लड़कियों से कहते हैं। पर मैं क्या करूँ जीशान मेरे जज़्बात अब मेरे बस में नहीं हैं…” 

जीशान रुक जाता है और रूबी की आँखों में देखने लगता है। वो धीरे से रूबी का हाथ अपने हाथ में ले लेता है-“बोलो भी, क्या कहना चाहती हो?” 

रूबी-“मुझे शर्म भी आ रही है और मैं नर्वस भी महसूस कर रही हूँ जीशान। मगर फिर भी मैं तुम्हें कहना चाहती हूँ कि ‘आइ लव यू …” और वो शरमाकर जीशान के सीने से चिपक जाती है। 

कुछ देर खामोशी रहने के बाद रूबी को जीशान के हँसने की आवाज़ सुनाइ देती है। 
जीशान रूबी के इस तरह अचानक प्रपोज करने पे हँस रहा था। 

रूबी की आँखें नम होने लगती हैं-“तुम्हें हँसी क्यों आ रही है ?” 

जीशान-“हेहेहेहे… कुको-रुको, मैं इस बात पे नहीं हँस रहा हूँ कि तुम मुझसे प्यार करती हो। बल्की मुझे इस बात पे हँसी आ रही है कि ये पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी लड़की ने लड़के को प्रपोज किया हो…” 

रूबी-“तुम मुझसे प्यार नहीं करते जीशान?” 

जीशान-“रूबी तुम बहुत प्यारी लड़की हो, मुझे बहुत अच्छी लगती हो। पर सच कहूँ तो मैं प्यार व्यार को नहीं मानता। मुझे इन सब बातों में बिल्कुल विश्वास नहीं है। मुझे आज तक प्यार हुआ भी नहीं । मगर मैं तुम्हारे जज़्बात की कदर करता हूँ । तुम मुझसे प्यार करती हो, बहुत अच्छी बात है। पर अभी मैं तुमसे प्यार नहीं करता, हो सकता है किसी दिन हमारे बीच प्यार हो जाए, उस दिन देखेंगे। तब तक तुम मेरी सबसे अच्छी फ्रेंड बनकर रह सकती हो…” 

रूबी-“एक दिन मेरी मोहब्बत तुम्हारे दिल में ज़रूर पैदा हो जाएगी जीशान… और मुझे उस दिन दुनियाँ की हर चीज मिल जाएगी। मुझे इंतजार रहेगा उस दिन का…” 

जीशान-मुझे भी, अब चलें। 

रूबी का प्यार जीशान ने ठुकराया भी नहीं था और ना स्वीकार ही किया था। वो खुद को संभाल लेती है और दोनों हँसते हुये आगे बढ़ने लगते हैं। कुछ दूर चलने के बाद रास्ता थोड़ा पथरीला हो जाता है, और रास्ते में जगह-जगह काँटे भी बिछे हुये थे। 

जीशान रूबी का हाथ पकड़ लेता है। 

रूबी-क्या हुआ? 

जीशान-तुम मुझसे प्यार करती हो ना? 

रूबी-हाँ। 

जीशान-“तो क्या तुम मेरे लिए नंगे पाँव इन काँटों पे चल सकती हो?” 

रूबी-“क्या जीशान, कुछ भी कहते हो? मैं क्या पागल हूँ जो मोहब्बत दिखाने के लिए ऐसे काँटों भरे रास्ते पे चलूंगी । ये सब बातें लैला मजनूं को सूट करती थीं…” 

जीशान रूबी को कुछ बोलने वाला था कि उसे पीछे से लुबना आती हुई दिखाई देती है उसने जीशान और रूबी की बातें सुन ली थी। 

लुबना चुपचाप जीशान और रूबी के पास तक आती है और उनके पास पहुँचकर अपने सैंडल उतार देती है। तीनों के सामने काँटों भरा रास्ता था। 

जीशान-क्या हुआ लुबु, तुमने सैंडल क्यों निकाल दी ? 

लुबना एक नजर जीशान की आँखों में झाँकती है और फिर दूसरे ही पल वो अपने कदम उन काँटों भरे रास्ते पे बढ़ा देती है 

जीशान देखता रह जाता है। साथ में खड़ी रूबी की आँखें फटी की फटी रह जाती है 

लुबना पैरो में चुभते हुये काँटों का दर्द सहती हुई आगे बढ़ती रहती है और आखिरकार उसके पैरो में से खून निकलने लगता है। वो हर कदम के साथ लड़खड़ा जाती है पर वो आगे बढ़ना जारी रखती है। 

जीशान-“पागल हो गई हो क्या लुबु? वहीं रुक जाओ…” 

लुबना रुक जाती है। 

जीशान भागता हुआ उसके पास पहुँचता है और उसे अपनी गोद में उठा लेता है। 
आँसू लुबना की आँखों से लगातार बह रहे थे। ये दर्द के आँसू नहीं थे, बल्की खुशी के थे। उसे खुद पे फख्र महसूस हो रहा था। जीशान उसे अपनी बाहों में उठाकर रूम में ले आता है और भागकर सिर के पास से फस्ट-एड किट ले आता है। लुबना के पैर में अभी भी काँटे धसे हुये थे। वो उन्हें निकाल भी नहीं रही थी । 

जीशान लुबना को डाँटता हुआ एक-एक काँटा उसके पाँव से निकालने लगता है। 
जीशान उससे क्या कह रहा था ये तो उसे जैसे सुनाई ही नहीं दे रहा था। वो एक टकटकी लगाए जीशान के हिलते होंठों को देख रह थी। 

जीशान-“पागल लड़की, क्यों किया तुमने ऐसा?” 

लुबना-“ये इश्क़ नहीं आसान, बस इतना समझ लीजिये एक आग का दरिया है और डूब के जाना है…” 

जीशान लुबना का चेहरा देखता रह जाता है। 

***** ***** 

उधर दिल्ली में अमन सोफिया के लिए एक खूबसूरत साड़ी लेकर रूम पे आता है। सोफिया अमन का ही इंतजार कर रह थी। वो उछलकर अमन की गोद में चढ़ जाती है। 

अमन सोफिया को चूमते हुये उसे साड़ी देता है-“जल्दी से इसे पहनकर मुझे दिखाओ …” 

सोफिया हाथ में साड़ी लेते हुये-“अब्बू बाकी के अंडरगामेंटस कहाँ हैं?” 

अमन सोफिया के कान में धीरे से कहता है-“मैं चाहता हूँ तुम सिर्फ़ इसे पहनो बिना पैंटी बिना ब्रा के, और हाँ साड़ी अपनी नाभि के एकदम नीचे और चूत के थोड़े ऊपर बाँधना…” 

अमन के मुँह से निकले ये शब्द सोफिया की चूत में हलचल मचा देते हैं, और वो शरमाते हुई बाथरूम में घुस जाती है।

अमन सोफिया की सारी शर्म-ओ-हया निकालकर फेंक देना चाहता था। 

कुछ देर बाद सोफिया साड़ी पहनकर बाहर आती है। अमन उसे देखता रह जाता है। जैसे उसने कहा था सोफिया ने बिल्कुल वैसे ही साड़ी पहनी थी। अमन अपनी बेटी को अपनी छाती से लगाकर चूमने लगता है। सोफिया भी अमन में पिघलते चली जाती है। 

सोफिया-“अह्ह… अब्बू मुझे बेपनाह प्यार कीजिए ना…” 

अमन सोफिया की चुचियाँ जो कि एकदम नंगी थीं, मसलने लगता है और सोफिया अमन की पैंट की जिप खोलने लगती है। कुछ देर बाद दोनों फिर से नंगे हो जाते हैं। आज सोफिया बिना अमन से पूछे नीचे बैठकर उसका मोटा लण्ड अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन सोफिया के बाल पकड़कर लण्ड को और अंदर डालने लगता है। बाप-बेटी का रिश्ता कब का ख़तम हो चुका था। अब इसमें कुछ और रंग भरने लगे थे। 

सोफिया अपनी चूत को सहलाते अमन के लण्ड को आंडो तक चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन सोफिया को गोद में उठाकर बिस्तर पे लेटा देता है और उसकी चुचियों को मुँह में लेकर चूसने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

सोफिया-“अह्ह… अब्बू इनमें दूध भर दो, मैं आपको दूध पिलाऊूँगी। अह्ह… और जोर से चूसो अब्बू काटो ना जीईई…” 

अमन निपल्स को काटता हुआ अपना लण्ड सोफिया की चूत में डाल देता है। 

एक पल के लिए सोफिया साँस लेना भूल जाती है और दूसरे ही पल कमर उछाल-उछाल के अमन को अपने अंदर जाने देती है-“हाँने्… अब्बू ऐसे ही … अपनी बेटी को माँ बना दो जीईई… मुझे भी बच्चा दे दो मेरे अब्बू । अपने अब्बू का बच्चा चाहिए मुझे अह्ह…” 

अमन दोनों चुचियों को मसलता हुआ सटासट अपना लण्ड सोफिया की चूत के अंदर तक उतारने लगता है। ऐसा लगता है जैसे मोहब्बत और हवस की ये रात कभी ख़तम नहीं होगी। दोनों एक दूसरे को चूमते चाटते नोंचते हुये एक दूसरे को मुकम्मल करने लगते हैं। 

सोफिया की चूत को ज्यादा से ज्यादा देर तक लण्ड चूत में चाहिए था। और अमन को ऐसी ह टाइट चूत जो उसे अपनी जवानी के दिन याद दिलाती रहे। दोनों हाँफने लगते हैं पर ना अमन अपनी स्पीड कम करता है और ना सोफिया कमर उछालना बंद करती है 

दोनों के होंठ एक दूसरे को चूमते -चूमते लाल हो चुके थे और चूत से कितनी बार पानी बाहर निकल चुका था ये सोफिया को भी याद नहीं था। रात कटती रही और सोफिया अपने अब्बू के पानी और प्यार से शराबोर होती रही । 
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05-19-2019, 01:24 PM,
#94
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
सुबह 8:00 बजे-दिल्ली होटेल रूम 


अमन की मोहब्बत सोफिया के सर चढ़कर बोलने लगी थी। रात भर सोफिया अमन को एक पल के लिए भी आराम करने नहीं दी थी। अमन रात में ही सोफिया को अपने अनुम और रज़िया के रिश्ते के बारे में सब कुछ बता देता है। 

सोफिया पहले हैरान होती है फिर परेशान। अमन को लगता था कि शायद सोफिया ये बात जानकर थोड़ी डिस्टर्ब हो जाएगी और उसे संभालना मुश्किल हो जाएगा। 
मगर अमन की सोच के बिल्कुल उल्टा सोफिया की चूत की नशें ऐसी जोश में आईं कि उसने अमन को साँस लेना मोहाल कर दिया। 

सोफिया जान चुकी थी कि वो क्यों अपने अब्बू की तरफ इतनी ज्यादा आकर्षित हुई? क्यों उसे दूसरा कोई मर्द पसंद नहीं आया? और क्यों इतने कम वक्त में उसने अपना सब कुछ अपने अब्बू के नाम कर दिया। बस उसे रह-रहकर एक बात सता रही थी कि अब घर जाने के बाद क्या होगा? वो अमन के ऊपर लेटे बस यही सोच रही थी। हालाँकि उसने अमन से इस बारे में अपने फ्यूचर के बारे में कोई सवाल, कोई जवाब नहीं माँगे थे। पर चेहरे के भाव साफ बयान कर रहे थे कि वो अंदर से बहुत परेशान है। 

अमन-“क्या बात है गुड़िया, इतना खूबसूरत चेहरा ऐसे मुरझाया हुआ क्यों है?” 

सोफिया-“नहीं अब्बू , कुछ भी तो नहीं …” 

अमन-“इधर आ ह्म्म्म्म… मैं जानता हूँ त क्या सोच रही है? तेरे अनकहे सवालों के सारे जवाब मेरे पास हैं। बस तुझे मुझपे भरोसा करना पड़ेगा और जैसे-जैसे मैं कहूँ तू वो ही करेगी, हमेशा…” 

सोफिया-“अब्बू आपने अम्मी की मोहब्बत देखी है, आपने अनुम अम्मी की मोहब्बत भी परखी होगी। पर आपने अपनी बेटी की मोहब्बत को अभी तक समझा नहीं । जब एक लड़की अपना सब कुछ अपने मर्द के नाम करती है ना तो वो उसकी हो जाती है। फिर वो शख्स उसे आलीशान महलों में रखे या टूटे मकान में वो हँसी खुशी उसके साथ रहती है… बस इस वादे के साथ कि जिस तरह मैं तुम्हें सब दे चुकी हूँ , तुम भी मेरे बनकर रहना। अब्बू भरोसे की बात करते हैं तो मैं किसी दिन वक्त आया तो मैं आपके लिए खुद की जान भी दे दूँगी …” 

अमन सोफिया के होंठों को चूमने लग जाता है-“मुझे तेरी मोहब्बत पे कोई शक नहीं है सोफी बेटा… बस मैं चाहता हूँ कि हमारे बीच का ये रिश्ता किसी को पता ना चले, किसी को भी नहीं …” 

सोफिया-“जी अब्बू , जैसा आप चाहते हैं, वैसा ही होगा। बस अपने प्यार में कमी ना होने देना…” 

अमन-“मुआह्ह… नहीं होगी मेरी जान… चल अब मुझे फ्रेश होने दे। दोपहर की फ्लाइट से घर वापस भी चलना है…” 

सोफिया-“ऐसे कैसे छोड़ दूं ? मुझे भी उठाकर बाथरूम में ले चलिए…” 

अमन सोफिया को गोद में उठाकर बाथरूम में ले जाता है और शावर ओन करके दोनों नहाने लगते हैं। वहाँ भी सोफिया अमन को अच्छे से नहाने नहीं देती। उसकी चूत की आग ही इस कदर भड़की हुई थी कि जितना अमन उसे अपने लण्ड के पानी से बुझाता उतना ही वो भड़कती जाती। 



***** *****इधर समर कैम्प में-

लुबना अपनी कुछ सहेलियों के साथ एक खूबसूरत गार्डननुमा जगह पे बैठी हुई थी। सामने कुछ लड़के बास्केट बाल खेल रहे थे। 

लुबना की नजरें जीशान को तलाश कर रह थीं। पर वो था कि एक तरफ चुपचाप सा बैठा हुआ था। कल के हादसे ने उसे हिलाकर रख दिया था। उसे पता चल चुका था कि लुबना उसे प्यार करती है और उसके प्यार की शिद्दत भी उसे पता चल गई थी। वो लुबना की उस हरकत से काफी ख़ौफजदा सा हो गया था। लुबना से वो भी मोहब्बत करता था। पर ये मोहब्बत भाई-बहन की थी। वो खुद से लड़ रहा था कि कैसे लुबना से बात की जाए? कैसे उसे समझाया जाए कि वो जो सोच रही है वो नहीं हो सकता। 

उसे रूबी अपनी तरफ आती दिखाई देती है। अचानक उसके दिमाग़ में एक आइडिया आता है। क्यों ना रूबी के साथ फ्लर्ट करके लुबना को ये एहसास दिलाया जाए कि हम दोनों एक दूसरे से प्यार करने लगे हैं। हो सकता है इससे लुबना का ख्याल बदल जाए। 

वो मुस्कुराता हुआ रूबी के पास चला जाता है और उसके हाय बोलने से पहले उसे अपनी बाहों में उठा लेता है। 

रूबी-“अह्ह… आराम से… मैं गिर जाउन्गी। आखिर हो क्या गया है तुम्हें?” 

जीशान-“प्यार हो गया है मुझे तुमसे…” 

रूबी-“सच… तुम सच कह रहे हो जीशान?” 

जीशान-“हाँ रूबी, रात भर मैं तुम्हारे बारे में सोचता रहा और दिल ने मुझे यही कहा कि तुझे रूबी जैसी अच्छी लड़की कहीं नहीं मिल सकती…” 

रूबी जीशान को चूम लेती है-“मैं जानती थी… मैं जानती थी कि एक दिन ये ज़रूर होगा। पर इतने जल्दी … मुझे तो यकीन नहीं हो रहा जीशान… मुझे अपनी बाहो में समेट लो, कहीं मैं बिखर ना जाऊूँ…” 

जीशान रूबी को अपने से एकदम चिपका लेता है। दूर बैठी लुबना ये सब देख रह थी। वो अपने पैरो पे बँधे ड्रेसिंग बैंडेज निकालकर फेंक देती है, जिससे खून फिर से उसके पैरो से बहने लगता है। वो जीशान की आँखों में इतनी दूर से झाँक सकती थी। बिना कुछ कहे वो नंगे पाँव अपने रूम में चली जाती है, और अपने पीछे खून के निशान छोड़ जाती है। जिसे देख जीशान का दिल भी खून के आँसू रोने लगता है। 
***** ***** 

अमन विला में अमन पहुँच चुका था। घर की सभी औरतें जिस चाँद का दीदार करने के लिए कई दिन से तरस गई थीं, आज वो उनकी आँखों के सामने था। अमन एक-एक करके सभी से मिलता है और जो वो कपड़े गहने उनके लिए वहाँ से लाया था वो उन्हें देता है। 

नग़मा सोफिया को नीचे से ऊपर तक देखने लगती है, और उसका हाथ पकड़कर अपने रूम में ले जाती है-“बाजी ये मैं क्या देख रही हूँ ?” 

सोफिया चौंकते हुये-क्या हुआ नग्गो? 

नग़मा-“बाजी, आप जब यहाँ से गई थीं तो कोई और थी और जो अब मैं देख रही हूँ ये तो आप हो ही नहीं सकती। क्या हुश्न खिला है आपका? कितनी खूबसूरत लग रह हैं आप? कहीं मेरे नजर ना लग जाए…” 

नग़मा तो अभी तक अंजान थी। उसे क्या पता था कि इस हुश्न के पीछे किसका हाथ है? शायद नग़मा पहचान ना पाई हो, मगर रज़िया की आँखें सोफिया को देखते ही पहचान गई थीं कि कली फूल बन गई है। 

रात के 12:00 बजे-

शीबा अपने रूम में लेटी हुई अमन का इंतजार कर रह थी। पर वो जानती थी कि अमन नहीं आने वाला। वैसे भी उसे अब जीशान के जवान लण्ड की आदत सी लग गई थी। वो तो बस जी शान के लौटने का इंतजार कर रह थी कि कब वो वापस आता है और कब वो अपनी चाल चलती है। 

अमन सोफिया के रूम में चला जाता है। 

सोफिया आईने के सामने बाल सँवार रही थी। वो अमन को देखते ही सब कुछ छोड़कर उसकी छाती से चिपक जाती है-“अब्बू , आप तो मुझे भूल ही गये है यहाँ आकर…” 

अमन-“कैसी बात कर रही हो जान मेरी … बस कुछ दिन और इंतजार कर ले, मैं कुछ सोचता हूँ …” 

सोफिया-“अब्बू , मैं कैसे आपके बिना रह पाउन्गि? इस कमरे में अकेली नहीं सो सकती मैं। मुझे आपके पास रहना है, आपके पास उसी तरह सोना है जैसे हम वहाँ रहते थे…” 

अमन सोफिया के जज़्बात से अच्छी तरह वाकिफ़ था। वो सोफिया के नाजुक होंठों को चूमने चाटने और उसकी जीभ को अपने मुँह में लेकर उसकी गर्मी कुछ हद तक कम करने लगता है। वो एक हाथ से सोफिया की चूत को भी शलवार के ऊपर से सहलाने लगता है। 

सोफिया-“अह्ह… अब्बू अह्ह… देखते ही देखते हवस का पानी जज़्बातों की आग को बुझाने लगता है और सोफिया की चूत पानी-पानी हो जाती है…” 

अमन कुछ देर उसे मजीद चूमता है और गुडनाइट कहकर रज़िया के रूम में चला जाता है। 

उस वक्त रज़िया और अमन के बेडरूम में अनुम भी मौजूद थी और दोनों माँ-बेटी बड़ी बेसब्री से अमन के रूम में आमद का इंतजार कर रह थीं। 

अमन सीधा उन दोनों के बीच जाकर लेट जाता है। पहले वो अपनी पहली मोहब्बत को चूमता है, उसके बाद उसे जिसने उसे मोहब्बत के सही मायने समझाए थे। 

रज़िया- टूर कैसा रहा? 

अमन-“बहुत अच्छा। जिस काम के सिलसिले में मैं गया था वो प्रॉजेक्ट मुझे मिल गया…” 

अनुम अपने शौहर के छाती पे सर रख देती है-“ये तो बहुत अच्छी बात है। आल्लाह आपको हर कदम पे कामयाबी अता करे…” 

रज़िया-सोफिया ने ज्यादा परेशान तो नहीं किया ना? 

अमन गौर से रज़िया के चेहरे को देखते हुये-“नहीं , वो अपनी अम्मी पे गई है, मेरा बहुत अच्छे से ख्याल रखा उसने…”

रज़िया-“हाँ, वो तो उसे और आपको देखते ही लगता है कि किसने किसका कितना ख्याल रखा है। खैर ये बताएँगे हमारी याद आई थी भी या नहीं ?” 

अनुम-“हाँ जान , सच बताना…” 

अमन-“याद उन्हें किया जाता है, जिन्हें भूले हों। तुम दोनों तो जिस्म से रूह तक बसी हुई हो, तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ ? ये होंठ तो बहुत याद आते थे मुझे…” और वो रज़िया के निच ले होंठ को लगभग चूस ही लेता है। 

अनुम अमन के होंठ रज़िया के होंठों से अलग करके अपने होंठ अमन से मिला लेती है-“और मुझे ये बहुत याद आ रहे थे गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन-कपड़े उतारो । 

अनुम रज़िया को देखती है और रज़िया अमन को। दोनों औरतें पहले खुद के उसके बाद अमन के सारे कपड़े जिस्म से अलग कर देती हैं। अमन के लण्ड पे सबसे ज्यादा इन दोनों का ही राज रहा था। वो अपने शौहर की छोटी से छोटी दिल की बात बिना कहे ही जान जाती थीं। 

अमन कभी दोनों से अपने लण्ड को मुँह में लेकर चूसने के लिए नहीं कहता था। 

दोनों अच्छी तरह जानती थी कि अमन को किस तरह तैयार करना है और वो इसमें जुट जाती हैं। कई दिनों के सूखे होंठ, कई दिनों की प्यासी जीभ से जब वो नाजुक गोश्त का टुकड़ा टकराता है तो रज़िया के साथ-साथ अनुम भी सिसक पड़ती है और दोनों औरतों की जीभ में जैसे जंग शुरू हो जाती है, अपने महबूब को ज्यादा से ज्यादा अपने मुँह में लेने की। 

अमन रज़िया को खींचकर अपने होंठों के पास ले आता है और अपनी जीभ उसके मुँह में डालकर रज़िया का सलाइवा पीने लगता है, और उसे भी तरोताजगी देने के लिए अपना सलाइवा पिलाने लगता है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 
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05-19-2019, 01:24 PM,
#95
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
अनुम अभी भी अपने अमन के लण्ड को मुँह में लिए दिल की गहराईयों से चूस रही थी-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन अनुम के मुँह से लण्ड निकालकर रज़िया को अपने ऊपर ले लेता है और हमेशा की तरह वो रज़िया की चूत में नहीं बल्की उसकी गाण्ड में अपना लण्ड डालने लगता है। 

रज़िया-“अह्ह… ओह्ह… अह्ह… थोड़ा आराम आराम से ज्ज्जी… सुराख छोटा हो गया होगा ना अह्ह… अमन अनुम चूत चाट…” 

अनुम रज़िया की चूत पे अपने होंठ रख देती है और अमन धीरे-धीरे रज़िया की गाण्ड में लण्ड घुसाता चला जाता है अह्ह… सुराख बंद भी हो जाये तो कोई बात नहीं … अपने अमन पे भरोसा नहीं है क्या?” 

रज़िया-“अह्ह… अनुम बेटी , इनसे कहना थोड़ा आराम से करें…” 

अमन ना अनुम की सुनने वाला था और ना रज़िया की। वो तो अपने काम से काम रखने वाला शख्स था। जवानी से अब तक उसने कभी किसी औरत की गुहार नहीं सुना था। रज़िया चीखती रही और अमन उसकी मारता गया। जब रज़िया की टाँगे हवा में लटकी-लटकी थक गईं तो अमन रज़िया को घोड़ी बनाकर उसकी चूत में लण्ड डाल देता है और लण्ड को बड़ी तेज़ी से अंदर-बाहर करने लगता है। 

15 मिनट बाद ही रज़िया हाँफते हुये पानी छोड़ देती है। अब ना उसकी चूत में वो रस रहा था और ना वो इतनी कसी हुई थी कि अमन के लण्ड का पानी भी साथ में निचोड़ सके। 

अमन अनुम की तरफ देखता है और अनुम मुश्कुराते हुये टाँगे खोलकर अपनी जान को जगह दे देती है। अमन के लण्ड को असल सकून अब यहीं मिलता था। वो अनुम को चूमते हुये अपना लण्ड उसकी चूत में उतार देता है। 

अनुम-“अह्ह… बड़ा सताने लगे हैं आप मुझे… जरा भी रहम नहीं आता ना अपनी बीवी पे?” 

अमन-“नहीं आता… क्यों आए मुझे… रहम तुझपे… प्यार करता हूँ तुझसे… और प्यार में रहम नहीं होता। बस प्यार होता है बेशुमार अह्ह…” 

अनुम-“करिये ना मुझे बेशुमार प्यार अह्ह… मैं भी तो आपसे रहम की उम्मीद नहीं रखती अह्ह…” 

अमन-“अनुम मेरी जान अह्ह…” 

अनुम-“अम्मी जीईई अह्ह… आपको पता है, एक-एक दिन कयामत की तरह गुजरा है मुझपे ओह्ह…” 

अमन-“जानता हूँ … सब जानता हूँ अनुम आह्ह… बहुत टाइट लग रही है तू आज्ज्ज…” 

अनुम-“सब आपकी वजह से उऊन्ह… जिस वक्त मुझे आपकी सबसे ज्यादा ज़रूरत महसूस होती है, आप मेरे पास नहीं रहते जीईई अह्ह… अम्मी उम्ह्ह…” 

अमन के धक्कों की रफ़्तार तेज हो जाती है। वो अपने आख़िरी मुकाम पर था और एक लावा अनुम की चूत में फूट पड़ता है तो अनुम की बंजर जमीन पे फिर से किसी बारिश की तरह बरसने लगता है और इस बारिश में अनुम भी सराबोर होकर अमन के साथ झड़ने लगती है। अनुम के होंठ अमन के होंठों से अलग नही होना चाहते थे और ना अमन अनुम को अपने से अलग करना चाहता था। दोनों एक दूसरे की बाहो में कितनी ह देर बातें करते रहते हैं और एक बार फिर मोहब्बत के तालाब में दुबारा डुबकी लगा देते हैं। 

रज़िया तो पहली चुदाई के बाद ही अमन और अनुम को देखते हुई सो गई थी। 

पर अनुम की मोहब्बत की शिद्दत अमन को सोने नहीं देती। 

सुबह के 6:00 बजे-

अमन रज़िया और अनुम के पास से उठकर अपने बेडरूम में जाने लगता है कि तभी उसे सोफिया का ख्याल आता है, और वो उसे देखने के ख्याल से उसके रूम का रुख़ कर लेता है। 

सोफिया बेड पे उल्ट लेटी हुई थी। अमन ने उसकी गाण्ड को काफी हद तक बाहर की तरफ कर दिया था। नाजुक सी खूबसूरत तितली अपने सारे रंगों के साथ चैन की नींद सोई हुई थी। अमन रूम में जाकर दरवाजा लाक कर देता है और सोफिया के पीछे जाकर उससे चिपक के लेट जाता है। 

सोफिया-“उम्ह्ह… सोने दो ना अम्मी…” 

अमन-“मेरे बिना नींद आ गई तुम्हें?” 

सोफिया हड़बड़ाकर उठकर बैठ जाती है और सामने अमन को देखकर उससे लिपट जाती है-“आपको ऐसा लगता है ना… रात गुजारना मुहाल कर दिया आपने मेरा। खुद तो चले गये आग लगाकर पर जानते भी हैं कितनी ही देर सुलगते रही मैं इन शोलों में…” 

अमन सोफिया से कुछ नहीं कहता बस उसे लेटाकर उसके निपल्स को अपने मुँह में भर भर लेता है-“गलप्प्प…” 

सोफिया-“अह्ह… अब्बू जी कुछ करिए ना मेरा… या तो आप मुझे जहर दे दो या मुझे अपने जिस्म में छुपा लो। नहीं रह सकती एक पल भी आपके बिना अह्ह…” 

अमन-“अह्ह… गलप्प्प… पागल हो गई है तू सोफिया…” 

सोफिया-“हाँ, मैं पागल हो गई हूँ और अगर अपने मेरा इलाज नहीं किया ना तो मैं सारी दुनियाँ को जला दूँगी …” 

अमन सोफिया के बाल पकड़कर उसे अपने लण्ड की तरफ झुका देता है। वो जानता था कि उसे एक यही चीज काबू में कर सकती है। और हुआ भी वही । 

सोफिया के हाथ में जब अमन का लण्ड आया तो वो चुप सी हो गई और बिना कुछ बोले अमन के लण्ड को चूमते हुये उसे अपने गले में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…" 

अमन जानता था के सोफिया के ये जज़्बात कुछ वक्त के लिए हैं। धीरे-धीरे वो नॉर्मल हो जाएगी और शायद ये जज़्बाती बातें करना भी बंद कर देगी। पर वो ये भूल गया था कि सोफिया की रगों में सिर्फ़ उसका नहीं , बल्की रज़िया का भी खून मौजूद है। 

सोफिया के जज़्बात और एहसास इतने ज्यादा थे कि रज़िया और अनुम दोनों उसके सामने कुछ भी नहीं थीं। 

अमन उसके जिस्म पे से नाइटी अलग कर देता है और बड़े वहशी अंदाज में अपने लण्ड को एक ही झटके में सोफिया की चूत में घुसा देता है। अमन को पता था कि औरत हो या बेलगाम घोड़ी उसे काबू में करने के लिए ज़्यादती करनी ही पड़ती है। 

पर सोफिया भी अमन की बेटी थी। वो चीखने चिल्लाने के बजाए मुश्कुराते हुई अमन के हर जुल्म को सहती चली जाती है, और अपनी कमर को ऊपर तक उठाकर अमन का साथ देने लगती है-“अह्ह… अब्बू … अगर मुझसे सच्चा प्यार करते हैं ना तो एक पल के लिए भी रुकियेगा मत… चाहे मैं बेहोश क्यों ना हो जाऊूँ…” 

अमन ने पहली बार किसी औरत के मुँह से ऐसे लफ़्ज सुने थे। 

या तो वो बूढ़ा हो गया था या सोफिया के जज़्बात अमन के लण्ड पे हावी हो गये थे। सोफिया अमन पे हर तरह से काबू पाती जा रह थी और यही वजह थी कि अब अमन का दिल रज़िया के लिए नहीं बल्की सोफिया को सोचकर तेज़ी से धड़कने लगा था। अमन सोफिया को 35 मिनट तक बिना रुके चोदता रहा। आखिरकार उसका लण्ड सोफिया की चूत के सामने झुक गया और अपने पानी से सोफिया की चूत को किनारे तक भरता चला गया। 

सोफिया-आइ लव यू अब्बू । 

अमन सोफिया को चूमते हुये-आइ लव यू टू सोफी। 

सोफिया अपने अब्बू के होंठों को चूमती रही । उसे अमन की बाहो में बहुत सकून मिल रहा था। अमन भी अपनी बेटी से बेपनाह मोहब्बत करने लगा था। वो सोफिया के होंठों को आजाद कर देता है-“मुझे फ्रेश होकर ऑफिस जाना है…”

सोफिया-“नहीं , अभी नहीं बाद में। मुझे आपके पास रहने दो…” सोफिया किसी बच्चे के तरह ज़िद करने लगती है। 

अमन-“सोफी बेटा, ऑफिस में बहुत ज़रूर काम है। मुझे लेट हो जाएगा, फ्रेश भी होना है…” 

सोफिया-“फ्रेश होना है ना आपको तो यहाँ मेरे रूम में भी बाथरूम है, यहाँ हो जाओ…” 

अमन-“ठीक है, अब ऊपर से उठो भी…” 

सोफिया-“जी नहीं , मुझे भी अपने साथ बाथरूम में लेकर चलिये मैं भी आपके साथ नहाऊूँगी…” 

अमन सोफिया की इन्ही बातों का दीवाना हो गया था। सोफिया उसे टूटकर चाहने लगी थी और उसकी मोहब्बत रज़िया और अनुम की मोहब्बत से कहीं ज्यादा गहरी थी। अमन सोफिया को गोद में उठाकर बाथरूम में ले जाता है। 

शावर के नीचे खड़े होकर दोनों नहाने लगते हैं। सोफिया के चेहरे के सामने अमन का लण्ड जो ढीला पड़ चुका था, लटक रहा था। जवान लड़की को दिन रात चोदो, तब भी वो चोदने के बाद यही कहेगी-“और चोदो…” यही हाल सोफिया का भी था। वो अमन के लण्ड पे साबुन लगे हाथ से उसकी मालिश करने लगती है। अमन एक नजर सोफिया की आँखों के तरफ डालता है और उन झील सी आँखों में फिर से उसे वही नजर आने लगता है, जो कुछ देर पहले नजर आ रहा था। 

मगर इस बार सोफिया से पहले अमन उसे अपनी चौड़ी छाती से लगा लेता है और सोफिया किसी नाजुक तितली की तरह सिमट ते चली जाती है। 

सोफिया-“अब्बू जी क्या नहाने भी नहीं देंगे मुझे?” 

अमन उसके नाजुक से होंठों को चूमते हुये-“नहीं …” 

सोफिया-“पहले मुझे नहाने दो उसके बाद जो दिल कहे कर लेना…” 

अमन सोफिया के दोनों हाथ पकड़कर अपने लण्ड पे रख देता है और नरम -नरम हाथों से सोफिया अपने अब्बू के लण्ड को सहलाने लगती है। देखते ही देखते अमन का लण्ड किसी तीर की तरह खड़ा हो जाता है और ठीक सोफिया की चूत से जा टकराता है। 

सोफिया-अब्बू एक बात पुछु? 

अमन-“हाँ पूछ…” 

सोफिया-“आप अम्मी के साथ कितनी बार नहा चुके हैं?” 

अमन-कई बार। 

सोफिया-“अम्मी क्या करती थी नहाते हुये?” 

अमन सोफिया को नीचे बैठा देता है-“पहले तेरी अम्मी इसे मुँह में लिया करती थी ऐसे अह्ह… उसके बाद मैं उसे बाथरूम में कितनी ही देर चोदा करता था। मगर कई सालों से तेरी अम्मी ने मेरे साथ नहाना ही छोड़ दिया है…” 

सोफिया-“गलप्प्प… मैं हूँ ना आपके बेटी । जो अम्मी ने नहीं किया, वो मैं करूँगी। आज से आप रोज मेरे कमरे में नहाने आ जाया करो। हम साथ मिलकर नहाएँगे गलप्प्प…” 

अमन-“पहले चूसठीक सेईई अह्ह…” 

सोफिया बातें बंद करके फिर से अमन के लण्ड में मगन हो जाती है और उसे चूस-चूसकर फौलाद की तरह बना देती है-“अब्बू मुझे अपने से कभी अलग मत होने देना गलप्प्प…” 

अमन सोफिया को उठकर बाथटब पे बैठा देता है और उसकी गुलाबी चूत को चाटने लगता है। 

सोफिया-“अम्मी जी, ऐसा मत किया करो आप… अम्मी अह्ह…” 

अमन-“तेरी चूत इतनी खूबसूरत है कि मुझसे रहा नहीं जाता सोफी…” 

सोफिया-“अह्ह… आपके लिए तो है… चूसो ना अब्बू जान अह्ह… अम्मी जी… अब्बू जी आपको लेट हो जाएगा, जल्दी से करिये ना जीईई…” 

अमन जानता था कि सोफी से रहा नहीं जा रहा है और वो अपनी बेटी के जज़्बात को समझता भी था। वो सोफिया को अपने ऊपर ले लेता है और अपने लण्ड को उसकी चूत पे रख देता है-“अह्ह… सोफी नीचे बैठती जा आराम-आराम से…” 

सोफिया-“अब्बू जी, अब्बू जी अम्म्म्मीईई अह्ह…” और वो अपने अब्बू के मोटे लण्ड को अपनी चूत में लेती हुई धीरे-धीरे चिल्लाने लगती है और मोटा लण्ड नरम चूत में घुसता चला जाता है। 

अमन दोनों हाथों से सोफिया की कमर पकड़कर सटासट अपने लण्ड को उसकी चूत के अंदर तक पहुँचाता चला जाता है। मुँह के सामने लटकते हुये सोफिया के वो गुलाबी निप्पल जैसे ही अमन अपने मुँह में भरकर चूसते हुये उसे चोदने लगता है, 
सोफिया की चूत धीरे-धीरे पानी छोड़ने लगती है। 

सोफिया भी अपने अम्मी रज़िया की तरह थी। वो पानी निकलने से थक नहीं जाती थी, बल्की उसकी चूत में और ज्यादा जोश पैदा होने लगता था और वो अपनी कमर उठा-उठाकर अमन का लण्ड लेने लगती है। अमन अपनी बेटी की चूत में बहुत खुश था और सोफिया अपने अब्बू के लण्ड को अपने चूत में लेकर। दोनों अपनी-अपनी मोहब्बत के कारवाँ को आगे बढ़ा रहे थे। 


और उधर समर कैम्प में जीशान और लुबना के रिश्ते में बदलाओ पैदा होने लगा था।
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05-19-2019, 01:25 PM,
#96
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
अमन फ्रेश होकर सोफिया के रूम से अपने रूम में चला जाता है और सोफिया बेड पे लेटी हुई अपने और अपने अब्बू के सुनहरे लम्हों को याद करते हुये मुश्कुराने लगती है कि तभी उसके रूम में रज़िया दाखिल होती है। रज़िया को देखकर सोफिया बेड से खड़ी हो जाती है। 

सोफिया- दादी , आप इस वक्त यहाँ? 

रज़िया-“क्यों, जब अमन तुम्हारे रूम में दिन रात आ सकता है तो मैं इस वक्त क्यों नहीं ?” 

सोफिया की पेशानी पे पसीने के कतरे आने लगते हैं। वो रज़िया के चेहरे के भाव से पता लगा सकती थी की रज़िया को कुछ-कुछ पता चल चुका है। 

रज़िया-“खामोश क्यों हो गई सोफिया? बोलो क्या कर रहा था अमन तुम्हारे रूम में?” 

सोफिया-“वो दादी … अब्बू के कमरे में पानी नहीं आ रहा था इसलिए वो मेरे बाथरूम में नहाने आए थे…” 

रज़िया-“तुम्हें देखकर ऐसा लग रहा है जैसे तुम भी…” 

सोफिया-“ये आप कैसी बातें कर रह हैं दादी ? मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा?” 
सोफिया अपनी दादी से नजरें चुरा लेती है और गर्दन मोड़कर चेहरा दूसरी तरफ कर लेती है। 

रज़िया सोफिया को घुमाकर उसका चेहरा अपनी तरफ कर देती है-“मुझसे नजरें मिलाकर बात करो सोफिया…” 

सोफिया का जिस्म अंदर ही अंदर लरज जाता है, गला सूखने की वजह से वो ठीक तरह से बोल भी नहीं पाती, और आवाज़ लड़खड़ाने लगती है। 

रज़िया-“देखो सोफिया, जो इस घर में हो रहा है वो मुझसे छुपा नहीं है। बेहतर होगा तुम मुझसे साफ-साफ बात करो। ये तुम्हारे लिए भी अच्छा होगा और अमन विला के लिए भी। क्या करके आए हो तुम दिल्ली से? तुम्हारे और अमन के बीच कौन सा नया रिश्ता पैदा हो गया है? बोलो मुझे। मेरी नजरें धोखा नहीं खा सकती। तुम्हें देखकर बता सकती हूँ कि तुम अपना सब कुछ अमन को सौंप चुकी हो। बोलो क्या मैं गलत हूँ ?” 

सोफिया बेड पे बैठ जाती है और एकटक रज़िया को देखने लगती है। 

रज़िया-“बेहतर होगा इस बात का जवाब तुम मुझे अमन के सामने रात में दो…” कहती हुई रज़िया अपने कमरे में चली जाती है। 

और सोफिया डर और घबराहट के मारे पसीने-पसीने हो जाती है। उसे कुछ समझ में नहीं आता कि आखिर ये सब रज़िया को कैसे पता चला? 

सुबह जब अमन रज़िया और अनुम के पास से सोफिया के कमरे में गया था, उसे रज़िया ने देख लिया था। और वो काफी देर उसके रूम के दरवाजे के पास खड़ी रहकर उन दोनों की सारे बातें भी सुन चुकी थी। वो सब बर्दाश्त कर सकती थी, मगर अमन को और किसी लड़की के साथ बर्दाश्त नहीं कर सकती थी… चाहे वो फिर उसकी अपनी सगी बेटी है क्यों ना हो। 

कुछ देर बाद अमन ऑफिस के लिए निकल जाता है। और रज़िया दुबारा सोफिया के रूम में आती है। सोफिया कपड़े पहनकर बेड पे बैठी हुई थी। 

रज़िया-चलो सोफिया मेरे साथ। 

सोफिया-कहाँ? 

रज़िया-अमन के ऑफिस? 

सोफिया फटी - फटी नजरों से रज़िया को देखने लगती है। 

रज़िया सोफिया का हाथ पकड़कर उसे अमन के ऑफिस ले जाती है। अमन उस वक्त अपने केबिन में बैठा कुछ काम देख रहा था। रज़िया और सोफिया को देखकर वो चौंक जाता है-“अरे अम्मी, आप इस वक्त यहाँ? ख़ैरियत तो है ना? और ये सोफिया को यहाँ क्यों ले आए?” 

रज़िया-“ख़ैरियत ही नहीं है अमन। मुझे सब पता चल गया है तुम्हारे और इस लड़की के बारे में। मैं सिर्फ़ ये जानने आई हूँ कि तुम आखिर चाहते क्या हो?” 

अमन केबिन का दरवाजा बंद कर देता है, जिससे उन दोनों की आवाज़ बाहर ना जा सके। 

सोफिया सिसकती हुई सोफे पे बैठ जाती है। 

रज़िया-“देखो ये बात मैंने अभी तक अनुम को नहीं बताई, वरना तुम जानते हो कि वो पागल क्या कर देगी? खुद का भी और इस लड़की का भी। बेहतर होगा कि तुम और ये अपने जज़्बातों को यहीं दफन कर दो। इसी में अमन विला की और हम सबकी भलाई है। 

सोफिया-“दफन कर दो? मेरे जज़्बात बेमानी नहीं हैं। अम्मी मैं भी जानती हूँ आपके और अब्बू के बारे में। एक बात आप भी सुन लीजिये कि मैं अब्बू से मोहब्बत करती हूँ और उनसे दूर नहीं रहूंगी । इसके लिए मैं कुछ भी कर सकती हूँ … कुछ भी…” 

सोफिया के मुँह से ये लफ़्ज सुनकर एक पल के लिए रज़िया के दिल में सकून उतर आता है पर अगले ही पल वो खुद को संभाल लेती है। रज़िया आगे बढ़कर दो जोरदार चपत सोफिया के गाल पे रसीद कर देती है-“जब तुम जान ह चुकी हो हमारे हकीकत तो ये भी सुन लो कि मैं तुम्हारी अम्मी हूँ और एक माँ होने के नाते मैं ये कभी नहीं होने दूँगी कि तुम अपनी सारे जिंदगी ऐसे इंसान के लिए ख़तम कर दो जिससे सिर्फ़ तुम नहीं बल्की तीन औरतें भी बेपनाह मोहब्बत करती हैं। अमन सिर्फ़ तुम्हारा नहीं है उसपे तुमसे पहले मेरा, अनुम का और शीबा का हक है…” 

अमन रज़िया का हाथ पकड़कर उसे सोफे पे बैठा देता है-“पहले आप सकून से बैठ जाओ और मेरी बात ध्यान से सुनो। मैं जानता हूँ कि मुझपे सबसे ज्यादा आपका हक है और मैंने सच्ची मोहब्बतू भी की थी तो सिर्फ़ आपसे और अनुम से। दिल्ली में मुझे आपकी बहुत याद आती थी। सोफिया के चेहरे में मुझे आपका अक्स नजर आता है। इसलिए मैं बहक गया था और वो सब हो गया जो नहीं होना चाहिए था…” 

अमन सोफिया से-“सोफिया बेटी मैं उमर के उस पड़ाओ पे पहुँच चुका हूँ , जहाँ मैं तुम्हारे ज़िम्मेदारी नहीं उठा सकता। मुझपे पहले से ही तीन औरतों की ज़िम्मेदारी है और जिनमें से तुम्हारे अम्मी और अनुम से मैं बेपनाह मोहब्बत करता हूँ …” 

अमन रज़िया का हाथ अपने हाथ में ले लेता है-“मुझसे गलती हो गई, बहुत बड़ी गलती और मैं जानता हूँ इस गलती को कैसे सुधारा जा सकता है…” 

रज़िया-कैसे? 

अमन-“मेरे ऑफिस में अकरम नाम का एक कर्मचारी काम करता है। खानदानी है, जवान भी है, उसके वालिद ने अकरम के लिए लड़की ढूँढने की ज़िम्मेदार मुझे सौंपी है और मुझे उसके लिए लड़की मिल गई है-“सोफिया…” 

सोफिया गुस्से में खड़ी हो जाती है और अमन का गिरेबान पकड़ लेती है-“आप मेरे साथ ऐसा नहीं कर सकते। मैंने आपसे सच्ची मोहब्बत की है। मैं किसी भी गैर के साथ कोई रिश्ता नहीं बनाऊूँगी। मैं शादी नहीं करूँगी, ये बात आप अच्छी तरह समझ लीजिये । रही बात आप बहक गये थे तो सुन लीजिये … मैंने आपको दिल से चाहा है और चाहती रहूंगी । अगर आपको अपनी गलती का मलाल है तो मैं आपकी गलती की सजा भुगतने को तैयार हूँ । मैं अपनी जान दे दूँगी …” 

अमन सोफिया को अपने सीने से लगा लेता है-“तुम कैसी बात कर रह हो सोफी? मेरी बात समझो बेटा…” 

सोफिया-“मुझे कुछ नहीं सुनना…” और वो रोती हुई वहाँ से चली जाती है। और रज़िया अमन एक दूसरे को देखते रह जाते है। 

रज़िया-“तुम जानते हो अनुम को अगर ये बात पता चली तो क्या होगा?” 

अमन-“अम्मी किसी को कुछ पता नहीं चलेगा और आप अनुम से कुछ नहीं कहेंगी। मुझसे वादा कीजिए। मैं सब संभाल लूँगा…” 

रज़िया-“मैं वादा नहीं करूँगी उस आदमी से जिसने मुझसे ये वादा किया था कि वो मेरे और अनुम के सिवाय किसी और के साथ कोई जायज़ या नाजायज़ रिश्ता नहीं बनाएगा। जब तुम अपना वादा तोड़ सकते हो तो मैं तुमपे क्यों भरोसा करूँ?” 
रज़िया भी अमन के केबिन से चली जाती है। 

और अमन अपने सर को पकड़कर बैठ जाता है। 

***** *****उधर समर कैम्प में। 

जीशान बेहद परेशान सा अपने कमरे में बैठा हुआ था। उसने सुबह से कुछ भी नहीं खाया था। लुबना हाथ में खाने की प्लेट लिए उसके रूम में आती है और उसके पास आकर प्लेट -टेबल पे रख देती है-“खाना खा लो…” 

जीशान-“मुझे नहीं खाना, चली जा यहाँ से…” 

लुबना-“खाना खा लो…” 

जीशान एक चपत लुबना के गाल पे जड़ देता है-“सुनाई नहीं देता तुझे? चली जा यहाँ से…” 

लुबना-“खाना खा लो वरना मैं भी भूखी रह जाउन्गी…” उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। ये आँसू जीशान के थप्पड़ के नहीं बल्की उसके ना खाने से होने वाले दर्द की वजह से थे। 

जीशान लुबना को घुरने लगता है-“ तू किस मिट्टी की बनी है लुबना?” 

लुबना-“उसी मिट्टी की जिससे आप बने हो। अब बातें बाद में करना पहले कुछ खा लो…” 

जीशान को लुबना पे गुस्सा भी आ रहा था और एक बहन के इस तरह टूटकर मोहब्बत करने पे प्यार भी। वो एक निवाला तोड़कर पहले लुबना को खिलाता है। 

लुबना-“पहले आप खाओ, मैं बाद में खा लूँगी …” 

जीशान चिल्लाते हुये-“मुँह खोल…” 

लुबना जीशान की आँखों में देखते हुये मुँह खोल देती है और जीशान निवाला उसके मुँह में डाल देता है। लुबना एक निवाला तोड़कर जीशान को खिलाने लगती है पर जीशान उसे मना कर देता है। 

लुबना-“मेरे हाथों में जहर नहीं लगा जो आप मना कर रहे हो? मुझे माफ कर दो, सुबह मैंने आपसे ऊूँची आवाज़ में बात की इसलिए…” 

जीशान-“देख लुबु, मेरी बात अच्छे से समझ… जो तू चाहती है, वो गलत है। क्यों अपने जिंदगी बर्बाद करने पे तुली हुई है?” 

लुबना-“जिसके साथ जिंदगी आबाद हो, आप उसे बर्बाद कह रहे हैं। मैंने आपसे कुछ नहीं माँगा, ना आपको किसी चीज के लिए फोर्स किया। आप मेरी तरफ से इतमीनान रखिये। मैं आपसे कभी कुछ नहीं माँगूंगी । बस जैसे आप सबसे हँसकर बात करते हैं, क्या उसी तरह मुझसे बात नहीं कर सकते? आप ही तो कहते थे कि आपको मुझसे बहुत प्यार है…” 

जीशान-“वो एक पाक रिश्ते की मोहब्बत है लुबु, तू समझती क्यों नहीं ?” 

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लुबना-“समझ तो आप नहीं रहे भाई, क्या मैंने आपसे कभी कोई नाजायज़ डिमांड की? क्या मैंने आपसे कहा कि आप भी मुझसे मोहब्बत करो? ये मेरे जज़्बात हैं, मुझे अपनी यादों में, अपने जज़्बातों के साथ जीने का हक है ना? जब कभी मैं आपसे कोई गलत बात के लिए कहूँ गी, उस वक्त आप मेरा गला घोंटकर मुझे मार देना। मगर इस तरह घुट-घुटकर मत रहो। प्लीज़्ज़…” वो रुकी नहीं , अपने आँसू पोंछते हुई बाहर भाग गई। 

और जीशान को सोचने पे मजबूर कर गई कि वो जो कह रही है कुछ गलत तो नहीं कह रही । 
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अमन रात में परेशान जब घर आता है तो अनुम उसे अपने रूम में लेजाकर उसपे टूट पड़ती है। रज़िया ने अपना बड़ा सा मुँह अनुम के सामने खोल दिया था। अनुम अमन का गिरेबान पकड़कर उससे सवाल करने लगती है जिसका जवाब अमन के पास नहीं था। 

अनुम-“आखिर हमारी मोहब्बत में आपको ऐसी कौन सी कमी नजर आई जो आपने सोफी की जिंदगी खराब कर दिया। आपको कोई हक नहीं बनता अमन कि उसके साथ ऐसा करो। अपने ऐसा करके ना सिर्फ़ मेरी बल्की अम्मी की मोहब्बत की भी तौहीन की है। मैं आपको कभी माफ नहीं करूँगी। 

अमन-“मुझसे भूल हो गई अनुम, प्लीज़्ज़… समझो। हालात ऐसे थे कि मैं खुद को काबू में नहीं रख पाया…” 

अनुम-“अगर ऐसे हालात मेरे साथ पेश आ जाएँ और मैं उस शख्स के साथ वही करूँ जो आपने सोफी के साथ किया तो आपको कैसा लगेगा? 

अमन आँखें निकालकर अनुम को देखने लगता है-“खामोश हो जाओ…” 

अनुम-“क्यों खुद पे आई तो खामोश हो जाओ और जो मेरे और अम्मी के दिल पे गुजर रही है वो कुछ नहीं ?” 

अमन-क्या चाहती हो तुम? 

अनुम-“सोफिया की जल्दी से जल्दी शादी और एक वादा मुझसे कि आप आइन्दा ऐसी कोई भी हरकत नहीं करेंगे और अगर करेंगे ना अमन तो मैं आपके सर की कसम खाकर कहती हूँ कि मैं आपके कदमो में अपनी जान दे दूँगी …” वो रो पड़ती है। 
और साथ में अमन की आँखों में भी आँसू आ जाते हैं। 

अनुम कुछ देर सिसक-सिसक के रोने के बाद अपने रूम में चली जाती है और पीछे छोड़ जाती है अमन के लिए तनहाईयाँ और खामोशियाँ, जिसका सामना अमन को खुद अकेले करना था। 

दूसरे दिन सुबह अमन बिना नाश्ता किए फॅक्टरी चला जाता है। 

ऐसा नहीं था कि शीबा अमन के इस रवैये से अंजान थी, मगर वो चुप थी। वो जानती थी कि ये खामोशी किसी बड़े तूफान के पहले की है और वो इस तूफान में खुद को शामिल नहीं करना चाहती थी। क्योंकी जो हो रहा था इसमें उसी का फायेदा था। 
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05-19-2019, 01:40 PM,
#97
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
अमन धीरे-धीरे अनुम और रज़िया से दूर होने लगा था। 

सोफिया ने रात से कुछ नहीं खाया थी। वो अपने कमरे में बंद रोए जा रही थी और उसके आँसू पोंछने वाला भी इस वक्त कोई नहीं था। उस वक्त एक माँ की ममता उछाल मारती है और रज़िया हाथ में नाश्ते की प्लेट लिए सोफिया के रूम में दाखिल होती है। 

रज़िया को देखकर सोफिया अपना मुँह मोड़ लेती है-“चले जाइए यहाँ से अम्मी, मुझे आपसे कोई बात नहीं करनी…” 

रज़िया मैं तुमसे बात करने नहीं आई हूँ , बल्की तुम्हें नाश्ता देने आई हूँ । 

सोफिया रोते भर्राति हुई आवाज़ में-“मुझे नहीं करना नाश्ता, चले जाइए यहाँ से…” 

रज़िया-“मैं जानती हूँ तुम इस वक्त किसी की बात नहीं सुनोगी। मगर सोफिया, क्या तुम उस औरत कौ एक बार बात नहीं सुनोगी जिसके कान तुम्हारे मुँह से अम्मी सुनने के लिए तरस गये थे…” 

रज़िया सोफिया का हाथ अपने हाथ में थाम लेती है-“मेरी बच्ची एक बार सिर्फ़ एक बार अपनी अम्मी की बात सुन ले। उसके बाद जो तुझे ठीक लगे, तू कर। कोई तुझे कुछ नहीं कहने वाला। 

सोफिया आँसू पोंछते हुये-“बोलिए, क्या कहना है आपको?” 

रज़िया-“सोफी बेटी , आज मेरी उमर 60 साल से ज्यादा हो चुकी है। मैंने तुझे जनम 40 साल की उमर में दिया। उस उमर में जिस उमर में औरतें नाती-पोत्ते के साथ खेलती हैं। जानती हो क्यों? क्योंकी मुझे तुम्हारे अब्बू से मोहब्बत हो गई थी। उतनी ही जितनी तुम्हें इस वक्त महसूस हो रही है। बेटी मोहब्बत करना गुनाह नहीं है, 
मगर उसकी भी एक सीमा होती है। जब वो इंसान क्रॉस करता है तो अंजाम काफी भयानक होते हैं। तुम्हारे अब्बू इस वक्त उमर के उस पड़ाव में है जहाँ वो तुम्हारा हाथ नहीं थाम सकते। तुम्हारे जिंदगी तो अभी शुरू हुई है मेरी बच्ची। तुम जज़्बात से काम लेने के बजाए एक बार अकल से काम लो। सोचो क्या होगा अगर तुम्हारे अब्बू तुम्हारा साथ दे दें। क्या वो तुमसे शादी करेंगे? और करेंगे भी तो क्या तुम अपनी आगे की जिंदगी उनके साथ इसी तरह हँसी-खुशी गुजार पाओगी। तुम अकेली नहीं हो, जीशान है, लुबना है, नग्गो है, क्या सोचेंगे वो और क्या-क्या जवाब दोगी तुम उन सबको? जो तुमसे ये सवाल पूछेंगे कि एक 19 साल की लड़की ने आखिरकार एक 42 साल के मर्द से शादी क्यों की जो उसके अब्बू हैं? सिर्फ़ जज़्बात में आकर? बेटी ये जज़्बात कुछ वक्त के लिए होते हैं। मैं आज हूँ कल नहीं रहूंगी । और अगर खुदा-ना-ख़ास्ता अमन कुछ सालों बाद नहीं रहे, तो ये जिंदगी किसके साथ गुजारोगी? जो हुआ सो हुआ। मैं तुम्हारी अम्मी होने के नाते, तुमसे बस इतना कहना चाहती हूँ कि बस एक बार तुम ठंडे दिमाग़ से सोचो…” रज़िया सोफिया के सर पे हाथ फेरते हुये वहाँ से चली जाती है। 

आसान नहीं होता उस माँ के लिए जो खुद गुनाह के दलदल में सर तक धँस चुकी हो और अपनी बेटी को सच्चाई का पाठ पढ़ाना चाहती हो। 

जहाँ सोफिया अपने उमड़ते जज़्बातों को एक तरफ रख कर रज़िया की बात पे गौर कर रही थी। 
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वहीं समर कैम्प में जीशान और लुबना के बीच एक समझौता सा हो गया था। वो दोनों अब अपने-अपने दोस्तों के साथ रहने लगे थे। दोनों के बीच बातचीत बंद हो गई थी। मगर आँखों की बातें भला कौन बंद कर सकता था। 

जीशान रूबी के साथ एक बेंच पे बैठा हुआ था और लुबना अपनी सहेली के साथ प्रकृति की बातें कर रही थी। मगर बार-बार वो उचटती निगाह से जीशान को देख ही लेती थी। 

ये बात जीशान भी अच्छी तरह जानता था। जीशान रूबी को अपनी गोद में बैठने के लिए कहता है। 

रूबी-“मुझे शर्म आती है, बेशर्म…” 

जीशान-“जब प्यार करती हो तो डरती क्यों हो। चलो बैठ जाओ…” 

रूबी जीशान की आँखों में देखते हुये जीशान की गोद में बैठ जाती है और जीशान लुबना की तरफ देखते हुये अपने दोनों हाथ रूबी के पेट पे कस लेता है। 

रूबी-“क्या बात है जी, आज बड़े रोमांटिक मूड में लग रहे हो?” 

जीशान-“वो तो मैं हमेशा से रहता हूँ । आज मौसम भी खुशगवार है और पास में जब जन्नत की हूर बैठी हो तो मूड कैसे रंगीन ना हो?” 

रूबी जीशान के गाल को काटती हुई-“अच्छा जी…” 

जीशान-हाँ जी। 

लुबना की सहेली नरगिस लुबना को इशारे से सामने का नजारा दिखाती है जिसपे लुबना की तो पहले से नजर थी। नरगिस बोल -“लुबु, वो रूबी है ना देख कैसे जीशान की गोद में बैठी है?” 

लुबना-“देख रही हूँ । जब सामने वाला बैठाने को तैयार है तो वो क्यों ना बैठेगी? चल यहाँ से कहीं और जाकर बैठते हैं…” 

वो दोनों जीशान और रूबी की नजरों से दूर चले जाते हैं। 

जीशान-“रूबी तुम यहीं बैठो, मैं तुम्हारे लिए कोल्ड-ड्रिंक्स लेकर आता हूँ …” 

रूबी-ठीक है जल्दी आना। 

जीशान-बस अभी गया और अभी आया। 


तभी वहाँ जीशान का दोस्त काशिफ आता है-“अरे जीशान तुम यहाँ हो? चल वहाँ सर ने अंताक्षरी शुरू कर दिया है। चल चल बहुत मजा आएगा…” 

जीशान रूबी की तरफ देखता है और जीशान रूबी का हाथ पकड़कर काशिफ के पीछे-पीछे चल देता है। 20 से 25 लड़के लड़कियाँ ग्रुप में बैठे हुये थे और एक तरह से बाल पासिंग गेम शुरू था। मोबाइल में एक लड़का म्यूजिक बजाता था और एक-एक करके बाल एक से दूसरे के पास, पास किया जाता था। जब म्यूजिक बंद हो जाती तो जिस किसी के पास वो बाल होती, उसे कोई हिन्दी फिल्म का गाना या कोई गजल या जो भी वो सुना सकता था। उसे ग्रुप में लुबना अपनी सहेली के साथ बैठी हुई थी। 

काशिफ रूबी और जीशान को भी वहीं बैठा देता है और खेल शुरू हो जाता है। 
एक-एक करके सभी के पास बाल आती जाती है। जब रूबी के पास बाल रुकती है तो वो घबरा जाती है। 

रूबी-“मुझे कुछ नहीं आता मैं क्या सुनाऊूँ?” 

जीशान उसका हाथ पकड़कर-“कोई अच्छा सा गाना सुना दो…” 

रूबी हँस पड़ती है, अपना गला ठीक करके वो गाने लगती है-

कितना प्यार तुम्हें करते हैं आज हमें मालूम हुआ, 
जीते नहीं तुमपे मरते हैं आज हमें मालूम हुआ। 

कुछ देर बाद जीशान के हाथ में बाल रुकती है। जीशान आह तो सुनिए दोस्तों। ये गाना डेडिकेटेड है मिस रूबी को-

तोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी, 
तोड़ा सा प्यार हुआ है थोड़ा है बाकी, 
हम तो दिल दे ही चुके बस तेरी हाँ है बाकी। 

जीशान के सभी दोस्त तालिया बजाने लगते हैं। 

उसके बाद बाल आकर रुकती है लुबना के हाथ में। 

वो कुछ भी सुनाना नहीं चाहती थी। मगर जब जीशान को रूबी के साथ हँसते खिलखिलाते देखती है तो उसके दिल पे साँप रेगने लगता है। लुबना बोली -“ये शेर मैं डेडिकेटेड करना चाहती हूँ उस इंसान को जिससे मैं बेपनाह मोहब्बत करती हूँ –

दर्द बनकर जिगर में छुपा कौन है? दर्द बनकर जिगर में छुपा कौन है? 

मुझमें रह-रहकर ये चीखता कौन है? मुझमें रह-रहकर ये चीखता कौन है? 
हम किनारे पे बैठे रहे उमर भर, हम किनारे पे बैठे रहे उमर भर 
ये भीतर में उतरता हुआ कौन है? 
दर्द बनाकर जिगर में छुपा कौन है? 
तू ना समझे कभी मेरी दिल की जुबान,
तू ना समझे कभी मेरी दिल की जुबान 
के तुझको मेरी तरह चाहता कौन है? 
दर्द बनाकर जिगर में छुपा कौन है। 

कहते हैं एक शहीद का खून जमीन पे गिरने से पहले उसे जन्नत मिल जाती है। उसी तरह एक सच्ची मोहब्बत करने वाले के आँसू जब जमीन पे गिरते हैं, तो सातों आसमानों तक उसके दिल की आवाज़ जाती है। 

वहाँ तक उस वक्त लुबना की आवाज़ गई थी या नहीं ? मगर उस वक्त वहाँ बैठे सभी लोगों के दिल लरज कर रह गये थे और ख़ासकर जीशान का। 

जीशान रूबी का हाथ पकड़कर उसे अपने रूम में ले जाता है। 

रूबी-“ऊऊचह जीशान ये लुबना की प्राब्लम क्या है? वो किससे प्यार करती है? और क्यों इस तरह बिहेवियर कर रही है? 

इससे पहले जीशान रूबी को कुछ कहता उसे लुबना उन्हीं की तरफ आती दिखाई देती है। 

जीशान-रूबी, मुझसे प्यार करती हो ना? 

रूबी-हाँ बहुत। 

जीशान- अपनी आँखें बंद करो। 

रूबी-पर क्यूँ ? 

जीशान-जैसा मैंने कहा वैसे करो? 

रूबी के आँखें बंद करते ही और लुबना के दरवाजे के पास पहुँचते ही जीशान अपने होंठ रूबी के होंठों पे रख देता है। जीशान रूबी को चूम लेता है। 
और लुबना के पैर वहीं रुक जाते है। 

जहाँ रूबी की आँखों में खुशी के मारे आँसू निकल आते हैं, वही लुबना की पलकों से दर्द के आँसू छलक जाते हैं। वो अपनें आँखें दुपट्टे से पोंछते हुये अपने कमरे में चली जाती है और जीशान उसी वक्त अपने होंठों की गिरफ़्त से रूबी के होंठों को आजाद कर देता है। 

रूबी की आँखों में सवाल उमड़ आता है-“क्या हुआ?” 

जीशान-मैं अभी आता हूँ रूबी।
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05-19-2019, 01:40 PM,
#98
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
जहाँ रूबी की आँखों में खुशी के मारे आँसू निकल आते हैं, वही लुबना की पलकों से दर्द के आँसू छलक जाते हैं। वो अपनें आँखें दुपट्टे से पोंछते हुये अपने कमरे में चली जाती है और जीशान उसी वक्त अपने होंठों की गिरफ़्त से रूबी के होंठों को आजाद कर देता है। 

रूबी की आँखों में सवाल उमड़ आता है-“क्या हुआ?” 

जीशान-मैं अभी आता हूँ रूबी।


रूबी-ठीक है जल्दी आना। 

जीशान ने लुबना की आँखों में आँसू देख लिए थे और उसका दिल अंदर तक लरज गया था। आखिरकार लुबना थी तो उसकी बहन ही । अपनी बहन को फूलों की तरह संभाल के रखने वाला, अपनी बहन की ख्वाहिश को उसकी जीभ से निकलने से पहले पूरा कर देने वाले जीशान को अपनी बहन लुबना से बेहद मोहब्बत थी। मगर ये मोहब्बत वो नहीं थी जो लुबना जीशान से कर बैठी थी। 

लुबना अपने रूम में बेड पे उल्टी लेटी जारों से रोए जा रही थी। वो जीशान की मार सह सकती थी, उसकी डाँट फटकार भी चुपचाप सह जाती मगर अपने जीशान को किसी और की बाहो में इस तरह से देखकर उसका दिल बेजान सा हो गया था। 
जीशान लुबना के पास आकर बैठ जाता है। बस एक पल के लिए भीगी पलकों से लुबना जीशान को देखती है और अगले ही पल तकिये में अपना चेहरा छुपा लेती है। 

जीशान लुबना के सर पे हाथ रख कर उसे कुछ कहने के लिए मुँह खोलता ह है कि लुबना चीख पड़ती है-“भाई आप यहाँ से चले जाए। अगर आप मुझे समझाने आए हैं तो प्लीज़्ज़… मैं इस वक्त आपसे बात नहीं करना चाहती। मुझे समझाने की कोशिश भी मत कीजिए आप। ये मत समझियेगा कि आप जो मेरे सामने रूबी के साथ कर रहे हैं, वो देखकर मैं अपना फैसला बदल दूँगी । नहीं इससे मेरा हौसला और बढ़ेगा। मेरे दिल में आपके लिए मोहब्बत और गहरी होती जाएगी। मेरे आँसुओं पे मत जाइएगा आप… ये मोहब्बत के आँसू हैं, जितना ये बाहर निकलेंगे उतना आप मेरे दिल के करीब होते जाएँगे…” 

जीशान-“हम कल सुबह घर जा रहे हैं, और वहाँ ये बात तुम अम्मी अब्बू के सामने कहना…” 

लुबना जीशान का गिरेबान पकड़ लेती है-मुझे धमका रहे हैं आप? अम्मी अब्बू क्या, आप कहो तो अभी बाहर जाकर सबके सामने कह दूँ कि मैं आपसे बेपनाह मोहब्बत करती हूँ …” 

जीशान लुबना के लाल होते गालों को एक जोरदार थप्पड़ से और लाल कर देता है। 

लुबना रोते-रोते हँस पड़ती है-शुक्रिया। 

जीशान-“देख लुबु, मैं तुझे आख़िरी बार विनती कर रहा हूँ अगर…” 

लुबना-“अगर मगर छोड़िए जीशान । अब मेरी बात सुनिए, दुबारा उसके आस-पास भी आप नजर आए ना तो। तीन लाशें गिरेन्गी यहाँ, पहले रूबी की, दूसरी आपकी और तीसरी मेरी । आप दोनों को जान से मारने के बाद खुद भी जान दे दूँगी मैं। समझे आप?” 

जीशान की तो जैसे हवा टाइट हो जाती है। वो लुबना को एक भोली - भाली मासूम सी लड़की समझ रहा था। मगर लुबना तो किसी गुंडे मवाली की तरह बात कर रही थी। सबसे ज्यादा डर जीशान को लुबना की आँखें देखकर उस वक्त महसूस हो रहा था। कुछ लोग सिर्फ़ धमकियाँ देते हैं और कुछ जो अपनी बात के पक्के होते हैं। 
उनकी आँखों में वो चमक, वो जोश वो, जलजला भी दिखाई देता है जो जीशान को उस वक्त लुबना की आँखों में नजर आ रहा था। 

जीशान लुबना के बाल पकड़कर उसकी गर्दन दबा देता है-“मुझे मारेगी तू ? मुझे…” 

लुबना-“मोहब्बत करती हूँ आपसे। या तो आपको पाकर रहूंगी या आपके साथ दुनियाँ से चली जाउन्गी…” 

जीशान उसे देखता रह जाता है। जीशान के हर सवाल जा मुँहतोड़ जवाब लुबना के पास था। अपना सामन पैक करके रखो, हम कल सुबह ही यहाँ से चले जाएँगे। बहुत सुन लिया मैंने तुम्हारी पागलपन की बातें। बस, अब और नहीं लुबु…” 

लुबना कुछ कहने ही वाली होती है कि जीशान उसे एक और थप्पड़ मारकर बिस्तर पे गिरा देता है और लुबना अपने आँसुओं से तकिया भिगोति चली जाती है। 

जीशान लुबना के रूम से बाहर निकल आता है। उसे उस वक्त लुबना पे बहुत गुस्सा भी आ रहा था और उसकी इस तरह की बातों पे हँसी भी। 

रूबी-क्या बात है बड़े उखड़े-उखड़े से नजर आ रहे हैं जनाब? 

जीशानरूबी के आवाज़ पे पीछे पलटकर देखता है। 

रूबी अपने दोनों हाथ जीशान के गले में डाल देती है-“कल हम यहाँ से जा रहे हैं…” 

जीशान-“हाँ, सुबह 8:00 बजे…” 

रूबी-“मेरे रूम में जो लड़की मेरे साथ रूम शेयर कर रही थी ना… वो अपने बायफ्रेंड के साथ रोज रात को पता नहीं कहाँ चली जाती है और सुबह-सुबह वापस रूम में आती है। मुझे अकेले में बहुत डर लगता है जीशान…” 

जीशान हँस देता है-तो आप क्या चाहती हैं? 

रूबी-“क्या तुम कुछ देर के लिए मुझे कंपनी देने रूम में आ सकते हो? सिर्फ़ बातें करेंगे…” 

जीशान-सिर्फ़ बातें करने? 

रूबी-हाँ, सिर्फ़ बातें करने। 

जीशान-“तो मैं नहीं आने वाला हाहाहाहा…” 

रूबी-“ओह्ह… तुम बहुत बदमाश हो, सच में…” 

***** ***** 

इधर अमन विला में हालत बहुत नाजुक बनी हुई थी। 

अमन सुबह फॅक्टरी चला जाता। रात में आकर अपने रूम में सोने के बजाए हाल में ही सो जाता। ना रज़िया उससे ठीक से बात कर रही थी और ना अनुम। 

शीबा इन सब में तमाशाई का रोल निभा रही थी। एक समझदार बीवी की तरह उसने कभी भी अमन से ये नहीं पूछा कि वो आखिर इतना परेशान सा क्यों दिखाई दे रहा है? उसके हाल में सोने से भी शीबा को कोई मतलब नहीं था, वो बस जीशान के घर आने के दिन गिन रही थी। 

रज़िया अपने रूम में अनुम के साथ बैठी हुई थी-“अम्मी आपको पता है ये ठीक से खाना भी नहीं खा रहे हैं और कल रात तो मुझे हाल में सोए नजर आए…” 

रज़िया-मेरी एक बात मानेगी? 

अनुम-जी अम्मी बोलिए ना। 

रज़िया-“अमन को बिखरने से पहले संभाल ले। वो अपनी गलती के लिए खुद को सजा दे रहा है वो बहुत जिद्दी है हमेशा से। मुझे तो डर है कि कहीं कुछ???” 

अनुम-“नहीं नहीं अम्मी ऐसा ना कहें…” 

रज़िया-“एक बीबी का फर्ज़ निभाओ। अनुम इस वक्त उसे सबसे ज्यादा तुम्हारी ज़रूरत है। उसे प्यार दो और उसके सारे गम समेट लो अपने दामन में। उसे ये महसूस मत होने दो कि तुम उसकी उस भूल से खफा हो। सच कहूँ तो हम सब गुनहगार हैं। मैं अमन को माफ कर चुकी हूँ , तुम भी कर दो। और जाओ उसके पास इससे पहले कि…” 

अनुम रज़िया के मुँह पे हाथ रख देती है और बिना कुछ कहे अमन के रूम में चली जाती है। उसे अमन रूम में नहीं दिखाई देता तो वो अपने कमरे में जाने लगती है। तभी उसे अमन बालकनी में खड़ा दिखाई देता है। अनुम उसके पास आकर खड़ी हो जाती है-“क्या आज यहीं सोने का इरादा है आपका? चलिये रूम में…” 

अमन अनुम की तरफ हैरत भर निगाह से देखने लगता है। अनुम ऐसे विहेब कर रही थी जैसे कुछ हुआ ही ना हो। आखिरकार अनुम अपने अमन को उस शिद्दत से प्यार करती थी, जितनी रज़िया और शीबा भी ना कर पाये थी उसे। 

अमन-“सोफिया ने खाना खाया?” 

अनुम-“हाँ अम्मी ने उसे खिलाकर सुला दिया…” 

अमन-“और तुमने?” 

अनुम-“लो, तो क्या मैं भूखी रहूँ? ऐसा कौन सा जलजला आ गया है जो मैं खाना पीना छोड़ दूँ ?” 

अमन अनुम का हाथ पकड़कर उसे अपने गले से लगा लेता है-“ बेशक तू खुद को कितना भी नॉर्मल दिखाने के कोशिश कर ले, मगर तू जब तक मुझसे आँखें मिलाकर बात नहीं करती ना… मैं समझ जाता हूँ तेरे दिल में क्या है और होंठों पे क्या?” 

अनुम-“मुझे माफ कर दीजिए अमन। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई। मैं अपने शौहर से बात करना कैसे बंद कर सकती हूँ । आज दो दिन हो गये, आपसे बात नहीं हुई तो ऐसा लग रहा था जैसे मुझमें जान ही नहीं रही …” 

अमन-“मुझे भी ऐसे ही महसूस हो रहा था अनुम…” 

अनुम-“जान , मुझे अपनी छाती से लगाकर अपने आगोश में ले लीजिये ना…” 

अमन अपनी सबसे प्यार बीवी को गाल पे चूम लेता है। 

अनुम-“चलिये अपनी बीवी को प्यार करिये ना…” 

अमन अनुम को चूमते हुये उसे उसके रूम में ले जाता है और रूम लाक कर देता है। 

अनुम अमन को बिस्तर पे धक्का देकर गिरा देती है और उसका पैंट नीचे खींच लेती है। 

अमन-“अरे बाबा, थोड़ा सबर…” 

अनुम-“नहीं होता मुझसे। दो दिन से भूखी हूँ । खाना मत दो मुझे तो चलेगा। मगर इससे दूर नहीं रह सकती मैं गलप्प्प गलप्प्प…” 

अमन अनुम कि नाइटी उसके जिस्म से अलग कर देता है। अनुम अमन की आँखों में देखते हुये उसके लण्ड को अपने मुँह में लेकर चूसती चली जाती है। अमन दोनों हाथों से अनुम का सर पकड़कर उसे अपने लण्ड पे आगे पीछे करने लगता है। अनुम कुछ देर और उसे चूसना चाहती थी मगर अमन अनुम को लेटा देता है और अपनी जीभ को उसकी मखमली चूत पे लगा देता है। 
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05-19-2019, 01:40 PM,
#99
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
अनुम-“अह्ह… जान अह्ह… अम्मी अम्मी अह्ह… काटो मत ना जीईई अह्ह…” 

अमन जब भी अनुम की चूत चाटता था वो उसके क्लोटॉरिस को अपने दाँत में पकड़ने की कोशिश करता था और इसी चक्कर में वो उसे काटता चला जाता, जिससे अनुम की चूत के दोनों होंठ जोर-जोर से दहलने लगते थे और वो झट से चुदाई के लिए तैयार हो जाती थी। 

अनुम-“अह्ह… मत चूसो ना…” 

अमन-“तो क्या करूँ? गलप्प्प…” 

अनुम-“चोदो ना… मुझसे रहा नहीं जा रहा है जान …” 

अमन मुस्कुराता हुआ अनुम के दोनों पैरोँ को खोल देता है और अपने लण्ड पे उसकी चूत का पानी लगाकर उसे अंदर पेल देता है। जब भी अमन का लण्ड अनुम की चूत में जाता, अनुम को अपनी पहले चुदाई याद दिला जाता था। वो अपने आँखें बंद कर लेती और उसी दिन को याद करती हुई अपने कमर को ऊपर-नीचे उछालने लगती। 

अमन उमर के इस पड़ाओ में भी अनुम को किसी चीज की कमी नहीं महसूस होने देता। वो अभी भी उसी जोश के साथ रज़िया और खास तौर पे अनुम को चोदता था। अनुम अपने दोनों पैरों को अमन के कंधे पे रख देती है और अमन खड़े-खड़े अपने लण्ड को अनुम की चूत की गहराईयों में उतारता चला जाता है। यहाँ अमन विला में एक शौहर अपने बीवी के साथ खुश था। 

***** *****और उधर समर कैम्प में। 

जीशान अपने रूम से चुपचाप निकलकर रूबी के रूम में चला जाता है। रूबी उस वक्त आईने के सामने खड़ी बाल सँवार रही थी। 

जीशान रूम में आकर दरवाजा बंद कर लेता है-“लो आ गया, मैं तुमसे बातें करने…” 

रूबी-“मैंने आपको बातें करने नहीं बुलाया?” 

जीशान-तो फिर किसलिए? 

रूबी जीशान के करीब आती है और अपने जिस्म पे से नाइटी को खोलकर नीचे गिरा देती है। साफ शफ्फाक जिस्म जो रात के अंधेरे में भी जुगुनू की तरह चमक रहा था। जीशान की आँखों के सामने आ जाता है। रूबी सिर्फ़ पैंटी में खड़ी थी। 

जीशान-ये सब क्या है रूबी? 

रूबी-“मेरा पूरा जिस्म अकड़ सा गया है। यहाँ ठीक से नींद भी नहीं हो पा रही है। क्या आप तेल से जरा मेरा मसाज कर देंगे?” 

जीशान दिल में सोचने लगता है-“नेकी और पूछ पूछ?” फिर कहता है-“मैं… पर मुझे तो मसाज नहीं आता…” वो बोल रूबी को रहा था मगर आँखें पैंटी के अंदर किसी और चीज को तलाश कर रही थीं…” 

रूबी-“हर काम इंसान पहली बार ही करता है और फिर धीरे-धीरे सीख जाता है…” 

जीशान रूबी का हाथ पकड़कर खुद से सटा लेता है-“आज तुम बहुत बदली - बदली सी लग रही हो जानेमन…” 

रूबी जीशान के होंठों को हल्के से चूम लेती है-अच्छा तो इरादा क्या है आपका? 

जीशान-“फिलहाल तो आपका मसाज किए देते हैं…” 

रूबी अपने कमर मटकाते हुई एक तौलिया बिछाकर उसपे लेट जाती है। चूत तो हर लड़की की बाली उमर से ही लण्ड के ख्वाब देखने लगती है। और अगर लड़की अपनी ही अम्मी को अपने बायफ्रेंड से गाण्ड उछाल-उछालकर चुदती हुई देख ले तो उसकी चूत में पानी नहीं रुकता, वो बहता रहता है। 

रूबी लेट जाती है। 

जीशान तेल की बोतल उठाकर तेल रूबी की पीठ पे डाल देता है। और पीठ से लेकर पैरों तक का मसाज करने लगता है। 

रूबी-“तुम तो कह रहे थे तुम्हें नहीं आता ये सब…” 

जीशान-“सीख रहा हूँ ना… वैसे तुम्हारी स्किन बहुत साफ्ट है…” 

रूबी-“बिल्कुल मेरी अम्मी की तरह…” 

जीशान-क्याआअ? 

रूबी-“उम्ह्ह… मेरी स्किन मेरी अम्मी की तरह है ये कह रही हूँ …” 

जीशान रूबी की पैंटी को निकालने लगता है। 

रूबी-“ईई क्या कर रहे हो जीशान ?” 

जीशान-“तेल लग जाएगा उसे…” 

रूबी-“हुन्नने्…” वो अपनी कमर को थोड़ा सा ऊपर उठाती है और जीशान पैंटी को खींच लेता है। 

इस बार जीशान ढेर सारा तेल रूबी के जिस्म पे डाल देता है जिससे उसकी पूरी पीठ तेल सी गील हो जाती है। और जीशान के हाथ फिसलने लगते हैं। 

रूबी-“मेरी कमर में भी बहुत दर्द है जीशान…” 

जीशान-यहाँ? 
रूबी-“हाँने् वहीं पे अह्ह…” 

जीशान दोनों हाथों से रूबी की कमर को मसलकर रख देता है। उसके तेल से भीगे हाथ रूबी की गाण्ड के सुराख को छूने लगते हैं। रूबी ने दोनों पैर एक दूसरे से चिपका के रखे थे, जिससे जीशान को उसकी चूत अब तक नहीं दिखी थी। 

जीशान-“तुम सीधी लेट जाओ…” 

रूबी सीधी लेट जाती है और जीशान पेट पे, छाती पे और जाँघ पे तेल डालकर मलने लगता है। जीशान अपने आपको बड़े मुश्किल से कंट्रोल कर रहा था। जब उसके सबर का बाँध टूटने लगता है तो वो मालिश बंद कर देता है। 

रूबी-क्या हुआ? 

जीशान-कुछ नहीं । 

रूबी-“तो रुक क्यों गये? करो ना… मालिश मुझे अच्छी लगने लगी थी और तुम रुक गये…” 

जीशान तेल सीधा रूबी की चुची पे डाल देता है और दोनों हाथों से उसकी चुची को मसलने लगता है। वो समझ चुका था कि रूबी क्या चाहती है। वो तो बस लुबना को लेकर परेशान था। मगर अब लुबना उसके दिमाग़ से निकल चुकी थी और उसे किसी भी तरह रूबी की चूत देखने थी और उसे लेना भी था। 

जीशान चुची इतने जोर से मसलने लगता है कि रूबी खुद को काबू में नहीं रख पाती और वो भी जीशान के हाथों के ऊपर अपने हाथ रख कर उसे दबाने लगती है। 

रूबी-“उम्ह्ह… ऐसे ही अह्ह… अम्मी जीईई…” 

जीशान रूबी की दोनों टाँगों को खोलकर एक दूसरे से अलग कर देता है और पहली बार उसे वो नाजुक सी चूत नजर आती है जो बंद थी। रूबी आँखें बंद कर लेती है। जीशान के हाथ अब रूबी की कुँवारी चूत को छूने लगते हैं और इससे पहले किसी ने उसे इस तरह नहीं छुआ था। जीशान का लण्ड खड़ा तो नहीं हुआ था मगर वो उसे पैंट में परेशान ज़रूर कर रहा था। वो अपने पैंट की जिप खोल देता है और उसे बाहर निकाल देता है। 

जैसे ही रूबी आँखें खोलती है उसकी आँखों के सामने वो लटका हुआ बड़ा सा औजार आ जाता है। रूबी चिल्लाती है-“अम्मीईई…” उसने कभी अपनी आँखों के इतने करीब इतना बड़ा लण्ड नहीं देखा था, उसकी चीख निकलना लाजमी था। 

जीशान रूबी की आँखों में देखने लगता है और रूबी की आँखों में उतरी हुई हवस उसे लण्ड पकड़ने पे मजबूर कर देती है। जीशान खुद को आगे सरकाता है, जिससे उसका लण्ड सीधा रूबी के मुँह के पास आ जाता है। रूबी जीशान का इशारा समझ जाती है। आँखों आँखों में कही गई ये बात हकीकत का रूप ले लेती है। जीशान अपना पैंट खोलकर जैसे ही नीचे गिराता है, रूबी जीशान के लण्ड को चूमती हुई उसे अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 
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05-19-2019, 01:40 PM,
RE: Antarvasna अमन विला-एक सेक्सी दुनियाँ
जीशान रूबी की आँखों में देखने लगता है और रूबी की आँखों में उतरी हुई हवस उसे लण्ड पकड़ने पे मजबूर कर देती है। जीशान खुद को आगे सरकाता है, जिससे उसका लण्ड सीधा रूबी के मुँह के पास आ जाता है। रूबी जीशान का इशारा समझ जाती है। आँखों आँखों में कही गई ये बात हकीकत का रूप ले लेती है। जीशान अपना पैंट खोलकर जैसे ही नीचे गिराता है, रूबी जीशान के लण्ड को चूमती हुई उसे अपने मुँह में लेकर चूसने लगती है-“गलप्प्प गलप्प्प…” 

जीशान झुक के रूबी की चूत पे अपने होंठ रख देता है और दोनों एक दूसरे को चाटने लगते हैं। 

रूबी-“अह्ह… जीशान उम्ह्हने्… गलप्प्प गलप्प्प…” 

जीशान अपनी पहले कुँवारी चूत को खोलने की बात से बहुत खुश था। अब तक उसे खुली हुई चूत ही नसीब हुई थी। आज पहली बार वो ‘वो’ करने वाला था जो उसके अब्बू अमन ख़ान करते आए थे। दोनों तेल में तर-बतर हो चुके थे। दोनों से एक पल भी अकेले गुजारना मुश्किल था। 

जीशान रूबी को लेटा देता है और अपने लण्ड को जैसे ही उसकी चूत के मुँह पे लगाता है, रूबी उसके लण्ड को अपनी चूत से हटा देती है-“नहीं जीशान वहाँ नहीं यहाँ…” वो जीशान के लण्ड को पकड़कर अपनी गाण्ड के सुराख पे लगा देती है। 

जीशान-क्यूँ ? 

रूबी-“अभी वो वक्त नहीं आया कि मैं लड़की से औरत बन जाऊूँ? यहाँ डालो मेरी गाण्ड में…” 

जीशान रूबी को उल्टा करके तेल उसकी गाण्ड के सुराख पे लगा देता है और कुछ तेल अपने लण्ड पे भी। वो जानता था कि इसने चूत में नहीं लिया तो गाण्ड में लेते वक्त बहुत चिल्लाएगी। 

रूबी-“अह्ह… डालो ना जीशान शुउउउ…” 

जीशान-“तुम्हें बहुत दर्द होगा रूबी…” 

रूबी-“मैं बर्दाश्त कर लूँगी। तुम बस डाल दो अंदर…” 

जीशान के लण्ड का सुपाड़ा पतला था और बाकी हिस्सा मोटा, बिल्कुल अमन के लण्ड की तरह। वो अपने लण्ड का सुपाड़ा रूबी की गाण्ड में फँसा देता है। उतने दर्द में ही रूबी की आँखों में आँसू निकल आते हैं। जीशान पूछता है-नहीं करूँ रूबी? 

रूबी-“अह्ह… करो ना डाल दो। मैं नहीं चीखूँगी, तुम रुको मत अब अह्ह… डाल दो अंदर तक्क…” 

जीशान दोनों चूत ड़ों को पकड़कर अपने लण्ड को रूबी की गाण्ड में डालते चला जाता है। रूबी अपने मुँह पर तौलिया डालकर अपनी चीख को दबाने लगती है। मगर आँसू उसकी आँखों से लगातार बहने लगते हैं। जीशान आख़िरी कील भी ताबूत में ठोंक देता है। 

उसके आख़िरी धक्के से उसका पूरा का पूरा लण्ड रूबी कि गाण्ड में चला जाता है और रूबी नीचे ननढाल सी गिर जाती है। वो ना कुछ बोल रही थी और ना चीख रही थी, बस जोर-जोर से साँसे लेने लगती है। जीशान जानता था कि उसे कैसे होश में लाना है। वो उसके ऊपर लेट जाता है और अपनी कमर को आगे पीछे करने लगता है। 

रूबी-“अह्ह… अम्मी जी अह्ह…” 

जीशान-“तूने ऐसा क्यों किया रूबी? उम्ह्ह… अह्ह…” 

रूबी-“अह्ह… मुझे करते जाओ जीशान , रुको मत अह्ह… जैसे अम्मी को करते हो वैसे ह करो मुझे भी अह्ह…” 

जीशान को हैरानी होती है कि रूबी सब जानती है उसके और उसकी अम्मी के बारे में। पूछा -“तो क्या… तुम्हें सब पता है?” 

रूबी-“हाँने् मुझे पता है कि मेरा बायफ्रेंड मेरी ह अम्मी को चोद चुका है अह्ह…” 

जीशान-“ओह्ह… साली , तू तो तेरी अम्मी से भी बड़ी कमीनी निकल अह्ह…” 

रूबी-“हाँने् मेरी चूत उसी दिन से तुम्हें अपने अंदर लेना चाहती थी… अम्मीईई जीईई आराम से ना… अम्मी की बात सुनकर मेरी गाण्ड मत फाड़ देना अह्ह…” 

जीशान-“तुझे तो तेरी अम्मी के सामने करूँगा मैं नंगा रुबी आह्ह…” 

रूबी-“मैं भी यही चाहती हूँ जीशान कि तुम… मुझे मेरी अम्मी के सामने नंगा करके चोदो… बोलो करोगे ना? अह्ह… इससे भी ज्यादा जोर से उनकी आँखों के सामने अह्ह…” 

जीशान-“हाँ रूबी। तेरी चूत अब तेरी अम्मी के सामने ही खुलेगी, चाहे इसके लिए वो मुझे जेल में है क्यों ना डाल दें अह्ह…” 

रूबी-“अह्ह… नहीं डालेंगी, बल्की तुम्हारा अपनी चूत में डालेंगी। मुझे पता है कि मेरी अम्मी कितनी बड़ी अह्ह… मेरी गाण्ड फट जाएगी ना जीशान…” 


वो रूबी के मुँह से ऐसी बातें सुनकर जीशान इतने जोश में आ चुका था कि वो ये भूल गया था कि वो जिसे मार रहा है वो चूत नहीं गाण्ड है… वो भी कुँवारी गाण्ड। जब वो नीचे देखता है तो हैरान रह जाता है। रूबी की गाण्ड सच में फट चुकी थी और उससे थोड़ा-थोड़ा खून भी बाहर निकलने लगा था। 

मगर जीशान और रूबी का जोश कम नहीं हुआ था। जहाँ रूबी अपनी अम्मी के सामने जीशान से चुदवाने के सपने भी देखने लगी थी, वहीं अब जीशान अपने पुराने अंदाज में वापस आ गया था। उसे भी घर जाकर सबसे पहले शीबा की चूत ठोंकने का दिल कर रहा था। 

तकरीबन 20 मिनट तक रूबी की लगातार गाण्ड मारने के बाद जब जीशान अपना लण्ड उसकी गाण्ड से बाहर निकालता है तो उसके लण्ड पे बहुत सारा खून लगा हुआ था और खून के साथ-साथ जीशान का गाढ़ा गाढ़ा पानी जो उसने अंदर ही छोड़ दिया था, रूबी की गाण्ड से बहता हुआ बाहर गिरने लगता है। उस रात जीशान रूबी को और कुछ नहीं करता, क्योंकी रूबी बात करने की हालत में भी नहीं रही थी । 

जीशान अपने कमरे में जाकर सो जाता है। 

सुबह सभी अपने-अपने बैग पैक करके बस के पास जमा हो जाते हैं। जीशान के पास लुबना खड़ी थी। कुछ देर बाद रूबी लगड़ाते हुये उनके पास आती है। जीशान आँखों ही आँखों में उससे ख़ैरियत पूछता है तो रूबी बुरी तरह शरमा जाती है। 

जीशान पानी की बोतल लेने चला जाता है और सभी बस में चढ़ जाते हैं। रूबी जीशान के लिए अपने पास एक सीट वाली रखती है। जैसे ही जीशान बस में चढ़ता है उसे लुबना आवाज़ देकर अपने पास बैठने के लिए बुला लेती है और उसे मजबूर न उसके पास जाकर बैठना पड़ता है। 

लुबना-“बड़ा उतरा-उतरा सा चेहरा नजर आ रहा है जनाब का। कहीं वहाँ बैठने का इरादा तो नहीं था आपका?” 

जीशान-“चुप कर… सर दर्द कर रहा है मेरा…” 

लुबना-“कहो तो दबा दूँ जनाब…” 

जीशान उसे घुरकर रह जाता है। वैसे भी बस में कोई सीन क्रियेट नहीं करना चाहता था। बस और मुसाफिर अपने-अपने आशियानों की तरफ बढ़ जाते हैं। 

जीशान और लुबना थका देने वाले सफर के बाद आखिरकार अमन विला पहुँच जाते हैं। जैसे ही जीशान और लुबना घर में दाखिल होते हैं। सबसे पहली नझर उन दोनों की अमन पे पड़ती है जो उस वक्त हाल में बैठा पेपर पढ़ रहा था। 

जीशान-अब्बू आप आ गये? 

लुबना भी अमन को देख खुश हो जाती है। अमन दोनों को अपने सीने से लगा लेता है-“अरे भई मैं तो कब का घर आ चुका हूँ । यहाँ आया तो पता चला घर की रौनक है घर से समर कैम्प चले गई है। कैसा रहा तुम्हारा समर कैम्प का ट्रिप? 

जीशान-“क्या अब्बू , अम्मी ने छिपकली साथ चिपका दिया था। कहाँ से अच्छा जाता?” 

लुबना-“अच्छा छिपकली … बताऊँ अब्बू को आपके कारनामे?” 

जीशान लुबना को आँखें दिखाता है। 

अमन-“अरे बस बस तुम दोनों आते ही शुरू हो गये…” 

रज़िया और अनुम दोनों हाल में से आती आवाज़ सुनकर बाहर चले आते हैं। 

रज़िया-“जीशान , लुबना मेरे बच्चों तुम आ गये?” 

दोनों अपनी दादी से मिलते हैं। 

लुबना अनुम को गले मिलकर वहाँ की बातें करने लगती है कि उसने वहाँ क्या किया, क्या-क्या देखा। मगर अनुम की निगाहें तो जीशान पे टिकी हुई थीं। जीशान अनुम से नहीं मिला था, ना उसने उसे सलाम किया था। जिससे अनुम का दिल रुआंसा सा हो गया था। आखिरकार जीशान उसका अपना खून था और उसे देखने के लिए तो वो उस दिन से बेचैन हो रही थी जिस दिन से वो समर कैम्प गया था।
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