Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
01-04-2019, 01:47 AM,
#61
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
आज मैं अपनी ही बेटी...अपने ही खून की नजरों में दोषी बन चुकी थी...दोषी! अब मुझे इस पाप का प्रायश्चित करना था....किसी भी हाल में! मैं अपने बच्चों के सर से उनके पापा का साया कभी नही उठने देना चाहती थी...और ऐसा कभी नही होगा, कम से कम मेरे जीते जी तो नही! वो सारी रात मैं ने जागते हुए काटी.... सुबह सात बजे माँ और पिताजी आये, आयुष को सीधा स्कूल छोड़ के.... कमरे में सन्नाटा छाया हुआ था… नेहा अब भी सो रही थी| पिताजी ने मझसे पूछा की क्या मैंने नेहा को समझा दिया तो मैंने कहा; "यहीं पिताजी...कल बात करने का समय नही मिला| थक गई थी इसलिए सो गई...आज बात करुँगी और कल से वो स्कूल भी जाएगी|" मेरी बात से पिताजी को आश्वासन मिला और वो निश्चिन्त हो गए| हम चाय पी रहे थे की नेहा जाग गई..और आँखें मलती हुई अपने पापा के पास गई और उनके गाल पे Kiss किया और फिर बाथरूम चली गई| ये नेहा का रोज का नियम था .... उसे देख-देख के आयुष ने भी ये आदत सीख ली पर वो मुझे और इन्हें (मेरे पति) को kiss करता था| जैसे ही वो बाथरूम से निकली तभी अनिल (मेरा भाई) आ गया| उसने माँ-पिताजी के पाँव छुए और अपने जीजू की तबियत के बारे में पूछने लगा|
"पिताजी...ये सब कैसे हुआ? जीजू तो एकदम भले-चंगे थे?"
पिताजी के जवाब देने से पहले ही नेहा बोल पड़ी; "मम्मी की वजह से...." सब की नजरें नेहा पर थीं और उसकी ऊँगली का इशारा मेरी तरफ था|
अब आगे.....
नेहा के कुछ बोलने से पहले पिताजी ने उसे झिड़क दिया; "नेहा...आप बहुत बद्तमीज हो गए हो! ऐसे बात करते हैं अपने से बड़ों से?" नेहा का सर झुक गया और उसे अपना सर झुकाये हुए ही माफ़ी मांगी; "sorry दादा जी!" मैं उसके पास गई और उसे अपने सीने से लगा लिया और पुचकारने लगी ... पर वो कुछ नहीं बोली और ना ही रोइ...जैसे उसके आँखों का पानी सूख गया हो! इधर अनिल के मन में उठ रहे सवाल फिर से बाहर उमड़ आये; "पर पिताजी...जीजू को आखिर हुआ क्या है? गाँव से पिताजी का फोन आया तो उन्होंने बस इतना कहा की तेरे जीजू हॉस्पिटल में admit हैं...तू जल्दी से दिल्ली पहुँच और मैं सीधा यहाँ पहुँच गया|"
मैं एक बार फिर से अपना इक़बाले जुर्म करने को तैयार थी..."वो मैं.........." पर मेरे कुछ कहने से माँ ने मेरी बात काट दी; "बेटा काम की वजह से टेंशन चल रही थी... और तुझे तो पता ही है की चन्दर की वजह से क्या हुआ था...इसलिए ये सब हुआ|” माँ ने मेरी तरफ देखा और ना में गर्दन हिला के मुझे कुछ भी कहने से रोक दिया और मैं ने उन्हें सहमति देते हुए अपनी गर्दन झुका ली| पिताजी न उसे घर हल के आराम करने को कहा पर अनिल ने मन कर दिया ये कह के; "पिताजी मैं यहाँ आराम करने नही आया| मैं यहाँ जीजू के पास रुकता हूँ, आप सब घर जाइए और आराम कर लीजिये| अगर कोई जर्रूरत पड़ी तो मैं आपको फ़ोन कर लूँगा|"
"नहीं...मैं यहाँ हूँ...तू जा और कपडे बदल के फ्रेश हो जा और फिर आ...." मैंने उसे हुक्म देते हुए कहा| चूँकि मैं उससे बड़ी थी तो वो बिना किसी बहस के मेरी बात मान लेता था| माँ ने जाते-जाते कहा की वो अनिल के हाथों मेरा और नेहा का नाश्ता भेज देंगी| जब सब चले गए तब मैंने सोचा की मुझे नेहा को प्यार से समझाना चाहिए ताकि वो कल से स्कूल join कर ले| नेहा स्टूल ले के अपने पापा के बाईं तरफ बैठी हुई थी और टकटकी बंधे उन्हें देख रही थी| शायद इस उम्मीद में की वो अब पलकें झपकाएं ...अब पलकें झपकाएं! मैंने उसे पीछे से आवाज दी; "नेहा...बेटा मेरे पास आओ|" वो बेमन से उठ के मेरे पास आई और चुप-चाप खड़ी हो गई| मैंने उसे अपने पास बैठने का इशारा किया और वो सर झुकाये सोफे पे बैठ गई|
"बेटा मुझे आपसे कुछ बात करनी है....|" मेरी बात शुरू होने से पहले ही वो बोल पड़ी; "Sorry .....!" उसका सॉरी सुन के मैं सोच में पड़ गई की भला ये मुझे क्यों सॉरी बोल रही है? पर मुझे उससे कारन पूछने की जर्रूरत नही पड़ी वो खुद ही बोलने लगी; "मैंने आपको सॉरी इसलिए नही बोला की कल मैं ने जो कहा वो गलत था या मैं उसके लिए शर्मिंदा हूँ...बल्कि आपको सॉरी इसलिए बोला की मेरा कल आपसे बात करने का लहज़ा ठीक नही था| आप मेरी माँ हो और मुझे इस तरह अकड़ के आपसे बात नही करनी चाहिए थी| इसलिए I'm really very sorry!"
नेहा की बात सुन के मुझे वो दिन याद आगया जब इन्होने (मेरे पति) ने मेरे लिए पहली बार अपने बड़के दादा से लड़ाई की थी| "बेटा आपको एक बात बताऊँ.... जिस दिन मुझे पता चला की मैं माँ बनने वाली हूँ उस दिन घर में सब खुश थे| क्योंकि उन्हें एक लड़के की आस थी और मुझे और आपके पापा को लड़की की वो भी बिलकुल आपके जैसी तब आपके पापा ने अपने बड़के दादा से इस बात पे लड़ाई की कि लड़का हो या लड़की क्या फर्क पड़ता है| उन्होंने ठीक आपकी तरह ही उनसे बात कि...और फिर बाद में नसे माफ़ी माँगी... इसलिए नही की उन्होंने सच बात बोली, बल्कि इसलिए की उनका लहज़ा गलत था|" ये सुन के नेहा के चेहरे पे मुस्कान आ गई|
"बेटा.... मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूँ?" नेहा ने हाँ में सर हिला के अपनी अनुमति दी|
"बेटा... I know आप अपने पापा से बहुत प्यार करते हो और उनके देख-रेख करने के लिए आप अपनी studies तक कुर्बान कर रहे हो पर जरा सोचो, जब आपके पापा पूरी तरह ठीक हो जायेंगे और उन्हें ये पता चलेगा की आपने उनके लिए अपनी स्टडीज sacrifice की है तो सोचो उन्हें कैसा लगेगा? उन्हें कितना hurt होगा? वो खुद को ही आपकी studies के नुकसान के लिए blame करेंगे और फिर से उनकी तबियत ख़राब हो सकती है! वहां घर पर आपके दादा-दादी अकेले हैं..उनकी देखभाल करने के लिए आपका वहाँ होना जर्रुरी है? और फिर आयुष...उसका स्कूल का होमोररक कौन करायेगा? और फिर मैं यहाँ हूँ ना आपके पापा की देखभाल करने के लिए|" ये सब सुन के भी नेहा के दिल को तसल्ली नही मिली थी इसलिए मैंने उसके दिल को तसल्ली देने के लिए उसे आश्वासन इया; "बेटा... मैं जानती हूँ की आपको डर है की पपा मुझे देखेंगे तो उनकी तबियत ख़राब हो जाएगी.... तो I promise मैं उनके होश में आते ही उनके सामने से चली जाऊँगी... और जबतक आप नही कहोगे मैं सामने नही आऊँगी|" इतना सुनने के बाद उसस्के इल को चैन मिला और उसने हाँ में सर हिलाया और उठ के बाथरूम चली गई| मुझे लगा की वो रोने के लिए बातरूम गई होगी पर भगवान का शुक्र है की ऐसा नही हुआ| मेरी बेटी अब बड़ी हो चुकी थी...इतनी बड़ी की अगर मुझे कुह हो जाए तो वो घर को संभाल सकती थी| नजाने क्यों ये ख़याल मेरे मन में आया ...खेर कुछ देर बाद अनिल नाश्ता ले कर आया और मैंने और नेहा ने नाश्ता किया| नाश्ता करने के बाद मैने अनिल से एक मदद माँगी; "अनिल...बीटा तुझसे एक मदद चाहिए! कल पिताजी ने बताया था की एक-दो जगह पेमेंट फांसी हुई है और दो दिन पहले इन्होने बताया था की कुछ contracts की deadline नजदीक है| मैं चाहती थी की अगर तू कुह दिन काम संभाल ले तो?"
"आप चिंता मत करो दीदी|" मुझे अनिल की बात सुन के थोड़ी शान्ति हुई की कम से कम पिताजी का बोझ कुछ कम हो जायेगा| दपहर के समय तक पिताजी और माँ आ गए| उनके आने पर अनिल ने काम की बात छेड़ी तो पिताजी बोले; "बेटा..तू यहाँ आया है....कुछ दिन आराम कर... काम-धंदा मैं देख लूँगा|"
"पिताजी...मैं यहाँ आपका हाथ बँटाने आया हूँ, आराम करने नही आया| अगर जीजू को पता लग गया की मैं यहाँ आराम कर रहा था तो वो तो मेरी क्लास ले लेंगे...ही..ही..ही..ही... वैसे जीजू ने कहा था की कुछ contracts deadline पर हैं| प्लीज पिताजी मुझे बताइये ...|"
पिताजी ने डेडलाइन की बात सुनी और मेरी तरफ देख के मुस्कुराये; "ये बात तुझे इसी शैतान ने बताई होगी? ठीक है तू इतनी जिद्द करता है तो चल मेरे साथ मैं तुझे पार्टियों से मिलवा देता हूँ और साइट भी दिखा देता हूँ| वैसे तुझे गाडी चलाना आता है ना?"
अनिल ने हाँ में सर हिलाया और पिताजी ने उसे चाभी दे दी और दोनों निकल गए| आयुष के स्कूल की छुट्टी होने वाली थी इसलिए मैंने सोचा की माँ को क्यों तकलीफ देनी तो मैं ही तैयार होक आई और नेहा को उनके पास बैठा के स्कूल चली गई और आयुष को लेके वापस हॉस्पिटल आ गई| कैंटीन से सैंडविच ला कर हम चारों ने खाए| शाम को सात बजे में पिताजी और अनिल लौटे; "बहु बेटा... तेरा भाई तो बहुत तेज है! आज तो इसने पाँच हजार का फायदा करा दिया| मुझे नहीं पता था की मानु contracts समय से पहले करने पर extra commission लेता था? वो तो अनिल था जिसने मानु की प्रोजेक्ट रिपोर्ट पढ़ी थी और उसे ये clause पता था! खेर मैंने इसे सारा काम समझा दिया है संतोष से मिलवा दिया है औरकल से ये उसके साथ coordinate करेगा|" अपने भाई की तारीफ सुन के मेरा मस्तक गर्व ऊँचा हो गया|
"चलो भाई..अब सब क्या यहीं डेरा डाले रहोगे? घर जाके खाना-वाना नही बनाना? और आयुष बेटा आपने होमवर्क किया या नहीं? यहाँ तो माँ-बेटी रहने वाले हैं!"
"दादा जी... मैंने आयुष का होमवर्क करा दिया है और मैं भी आपके साथ चलूँगी| मुझे कल स्कूल जाना है|" नेहा की बात सुनके पिताजी मुस्कुराये और उसके सर पे हाथ फिरके बोले; "बेटा अपने से बड़ों से हमेशा तमीज़ से बात करते हैं वरना लोगों को लगेगा का आपके मम्मी-पापा ने आपको अच्छे संस्कार नही दिए|"
"सॉरी दादा जी...आगे से ऐसी गलती कभी नही होगी|"
"बिलकुल अपने पापा की तरह...अपनी गलती हमेशा मान जाता था और दुबारा कभी वो गलती नही दोहराता था| खेर...चलो घर चलते हैं और हाँ बहु अनिल तुम्हारा खाना लेके आजायेगा| अपना ख़याल रखना ...|" इतना कह के सब चले गए और finally मैं और ये (मेरे पति) अकेले रह गए| मैं इनके पास स्टूल ले जा के बैठ गई..इनका हाथ अपने हाथों में लिए कुछ पुराने पलों को याद करने लगी और मेरी आँखें भीग गईं|
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01-04-2019, 01:47 AM,
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आयुष के स्कूल की छुट्टी होने वाली थी इसलिए मैंने सोचा की माँ को क्यों तकलीफ देनी तो मैं ही तैयार होक आई और नेहा को उनके पास बैठा के स्कूल चली गई और आयुष को लेके वापस हॉस्पिटल आ गई| कैंटीन से सैंडविच ला कर हम चारों ने खाए| शाम को सात बजे में पिताजी और अनिल लौटे; "बहु बेटा... तेरा भाई तो बहुत तेज है! आज तो इसने पाँच हजार का फायदा करा दिया| मुझे नहीं पता था की मानु contracts समय से पहले करने पर extra commission लेता था? वो तो अनिल था जिसने मानु की प्रोजेक्ट रिपोर्ट पढ़ी थी और उसे ये clause पता था! खेर मैंने इसे सारा काम समझा दिया है संतोष से मिलवा दिया है औरकल से ये उसके साथ coordinate करेगा|" अपने भाई की तारीफ सुन के मेरा मस्तक गर्व ऊँचा हो गया|
"चलो भाई..अब सब क्या यहीं डेरा डाले रहोगे? घर जाके खाना-वाना नही बनाना? और आयुष बेटा आपने होमवर्क किया या नहीं? यहाँ तो माँ-बेटी रहने वाले हैं!"
"दादा जी... मैंने आयुष का होमवर्क करा दिया है और मैं भी आपके साथ चलूँगी| मुझे कल स्कूल जाना है|" नेहा की बात सुनके पिताजी मुस्कुराये और उसके सर पे हाथ फिरके बोले; "बेटा अपने से बड़ों से हमेशा तमीज़ से बात करते हैं वरना लोगों को लगेगा का आपके मम्मी-पापा ने आपको अच्छे संस्कार नही दिए|"
"सॉरी दादा जी...आगे से ऐसी गलती कभी नही होगी|"
"बिलकुल अपने पापा की तरह...अपनी गलती हमेशा मान जाता था और दुबारा कभी वो गलती नही दोहराता था| खेर...चलो घर चलते हैं और हाँ बहु अनिल तुम्हारा खाना लेके आजायेगा| अपना ख़याल रखना ...|" इतना कह के सब चले गए और finally मैं और ये (मेरे पति) अकेले रह गए| मैं इनके पास स्टूल ले जा के बैठ गई..इनका हाथ अपने हाथों में लिए कुछ पुराने पलों को याद करने लगी और मेरी आँखें भीग गईं|
अब आगे............
मुझे एहसास होने लगा जैसे हम दोनों एक बहुत ही शांत से बगीचे में चल रहे हैं| इन्होने मेरा हाथ थामा हुआ है ...शाम का समय है...ठंडी-ठंडी हवा इनके मस्तक छू रही है .... हम दोनों के चेहरों पे मुस्कराहट है... चैन है...सुकून है.... पर तभी अनिल की आवाज कान में पड़ते ही सब उड़न-छू हो गया! दरअसल मेरी आँख लग गई थी! वो मेरे लिए खाना लाया था.... सच कहूँ तो मैं सिर्फ और सिर्फ इनके लिए खा रही थी| मैं ये नहीं चाहती थी की मेरा बेड भी इनकी बगल में लग जाए! अनिल ने बताया की कल सुबह छः बजे माँ-पिताजी आनंद विहार बस अड्डे पहुँच जायेंगे| "दीदी आप घर चले जाओ...मैं यहाँ रूकता हूँ| आप प्रेग्नेंट हो...थोड़ा अपना ख़याल भी रखो! मैं हूँ ना यहाँ...फिर चिंता क्यों करते हो?"
"बेटा.... मेरा यहाँ रहना बहुत जर्रुरी है... ये सब मेरी वजह से हुआ है ना...तो मुझे ही......." आगे कुह बोलने से पहले पिताजी का फ़ोन आ गया और उन्होंने अनिल को किसी पार्टी से मिलने को कहा जो अभी पेमेंट करने वाली थी| रात के दस बजे थे और उस पार्टी को बाहर जाना था| चूँकि वो लोग जानते थे की इनकी (मेरे पति) की तबियत ठीक नहीं है इसलिए वो जल्दी पेमेंट कर रहे थे| अनिल जल्दी-जल्दी निकल गया और एक बार हम दोनों हम उस कमरे में अकेले रह गए| इनका हाथ थामे हुए कब नींद आ गई पता ही नहीं चला| आँख तब खुली जब नर्से इन्हें चेक करने आई...घडी में बारह बजे थे| उस नर्स का नाम "राजी" था| पिछले दो दिन से वही इन्हें चेक करने आ रही थी| केरल की रहने वाली थी... ईसाई थी... और उसी ने इनके सर में स्वेल्लिंग देखि थी.... खेर आज दो दिन बाद उसने मुझसे बात की; "आप इनका wife है ना?"
मैंने हाँ में सर हिलाया| दरअसल उसकी हिंदी बहुत अच्छी नहीं थी|
“He’s a very luky man! मैं देख रहा है की आप दो दिन से यहीं हैं... इनका बहुत care कर रहा हैं|”
मैंने ना में सर हिलाया और मुसकुरते हुए कहा; "नहीं... मैं बहुत lucky हूँ की ये मेरे husband हैं|"
वो मुस्कुराई और बोली; "ओह! ऐसा है! डॉक्टर सरिता ने बोला की आप प्रेग्नेंट हो... इसलिए आपका B.P. भी चेक करने को बोला|” मैंने हाँ में सर हिला के अनुमति दी| मेरा B.P. चेक करते हुए वो फिर बोली; "आपको अपना care करना चाहिए...आपका husband की care के लिए आपके in-laws हैं|"
"हैं तो... पर सबसे ज्यादा मैं इन्हें प्यार करती हूँ| इसलिए मेरा यहाँ रहना बहुत जर्रुरी है| ऐसा नहीं है की मेरे in-laws को मेरी कोई फ़िक्र नहीं, उन्होंने ने तो मुझे आराम करने को बोला था पर मैं बहुत जिद्दी हूँ...इसलिए उन्होंने मुझे यहाँ 24 hrs रहने की परमिशन दी!"
राजी मुस्कुराई और चली गई| ये तक नहीं बोली की मेरा B.P. कैसा है??? उसके जाने के बाद मैंने दवाजा लॉक किया और वापस स्टूल पे बैठ गई और इनका हाथ थामे मुझे नींद आ गई| सुबह पांह बजे नींद खुली...एक बार इन्हें चेक किया ...वाशरूम गई और वापस आ कर दरवाजा अनलॉक किया और फिर से स्टूल पे बैठ गई| अगले 15 मिनट में आँख फिर से लग गई...और जब आँख खुली तो सामने मेरी माँ खड़ी थी| मैं उनकी कमर पे हाथ डाल के उनसे लिपट गई और मेरे आँसूं निकल पड़े| "बेटी ये सब कैसे हुआ?" पिताजी ने मुझसे सवाल पूछा...और मैंने रोते-रोते उन्हें सारी बात बताई|
"सब मेरी गलती है पिताजी, चन्दर वाले हादसे के बाद मैंने खुद को इनसे काट लिया था| मेरी वजह से घर पे इतनी सारी मुसीबतें आईं.... इतना बवाल हुआ...इसलिए मैं अपना दुःख इनसे छुपाने लगी| कुछ बोलने से डर्टी की कहीं इनको चोट न पहुँचा दूँ...इनका दिल न तोड़ दूँ! और दूसरी तरफ ये जी तोड़ कोशिश करते रहे की मैं पहले की तरह हो जाऊँ... हँसूँ.... बोलूं.... और मैं ना चाहते हुए भी इन्हें दुःख देती गई ...तकलीफ देती गई.... मुझे बार-बार ये डर सता रहा था की मैं आयुष को खो दूँगी... और मुझे इस डर से बाहर निकालने के लिए इन्होने दुबई जा के settle होने का plan बना लिया| इस बात से मुझे इतना गुस्सा आया की मैंने इन से बात करनी बंद कर दी.... इनको मेरी इस हरकत से इतना दुःख हुआ की इन्होने खाना-पीना छोड़ दिया...दिन-रात बस साइट पे रहते थे...जरा भी आराम नही किया...दवाइयाँ तक लेनी बंद कर दी...और नतीजन उस दिन इन्हें हक्कर आया और जब ये गिरे तो इनके सर में छोट आई...जिससे ये कोमा में चले गयी....मुझे माफ़ कर दीजिये पिताजी...प्लीज!" मैं रोती रही और पिताजी..माँ ..अनिल सब खड़े सुनते रहे|
पिताजी ने जोर से अपना सर पीट लिया और मुझ पर बरस पड़े; "पागल हो गई है क्या? तू उससे अपन दर्द छुपा रही थी? अपने पति से? ...... तुझे पता है ना वो तुझसे कितना प्यार करता है? तेरे लिए सबसे लड्ड चूका है? मैं पूछता हूँ उसने क्या गलत कर दिया? तेरी ख़ुशी ही तो चाही थी? हे भगवान!!! जिस इंसान से हमारा दर्द ना छुपा तू उससे अपना दर्द छुपा रही थी!" ये सुन के मैं थोड़ा हैरान हुई....और आगे की बात सुनके मेरे होश उड़ गए; "जब मानु बेटा पंचायत क काम से गांव आया था तब वापसी में हम से मिल के गया था| वो तो बस हुमा लोगों का हाल-छाल पूछने आया था और मेरी परेशानी देख उसने मुझसे बहुत जोर देके कारन पूछा तो मैंने उसे सब बता दिया| ”
दरअसल अनिल को MBA कराने के लिए पिताजी को अपनी ज़मीन और घर गिरवी रख के बैंक से लोन लेना पड़ा था| बैंक ने घर और ज़मीन की value बहुत कम लगाईं थी इस कारन हमें सिर्फ 3.5 लाख ही लोन मिला बाकी का 1.5 लाख कम पड़ रहा था| हमारी दूसरी ज़मीन से घर का गुजर-बसर हो जाय करता था बस! पिताजी की उम्मीद थी की MBA के बाद अनिल को अच्छी नौकरी मिल जायेगी और वो धीरे-धीरे कर के लोन की किश्त उतारता जायेगा| पर ऐसा ना हो सका..... financially हमारे घर की हालत बहुत कमजोर हो गई थी और बैंक को अपना पिसा डूबता नजर आया तो उसने पिताजी को नोटिस भेज दिया...... सच पूछो तो मैं अपनी इस नई जिंदगी में इस कदर डूब गई की मैं ये बात भूल ही गई थी...और मुझे ये तब याद आया जब आज पिताजी ने ये बात दोहराई!
" जब मानु को ये बात पता चली तो उसने बिना कुछ सोचे मुझे दस लाख का चेक फाड़ के दे दिया..... और बस इतना कहा की संगीता को कुछ मत बताना| " ये सुन के मेरे चेहरे पे हवाइयां उड़ने लगीं...क्योंकि मुझे इन्होने कुछ नहीं बताया था| "हाँ...तूने सही सुना...तेरे पति ने...जबकि तुझे तो शायद याद ही नहीं होगा की तेरा बाप कर्जे तले दबा हुआ है! पर मैंने आजतक तुझसे कुछ शिकायत नही की.... पर आज तूने एक देवता सामान इंसान को इस कदर दुखी किया की आज उसकी ये हालत हो गई! और तुझे अगर इतनी ही तकलीफ थी तो क्यों शादी की? ..क्यों मानु की और अपने सास-ससुर की जिंदगी में जहर घोल दिया?क्या तुझे पता नहीं था की जो कदम तू उठाने के लिए उसे मजबूर कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? उसने बिना पूछे बिना कहे हर मोड़ पे हमारे परिवार की मदद की...सिर्फ इसलिए की वो तुझे खुश देखना चाहता था और तू....तू उसका मन रखने के लिए खुश होने का दिखावा तक ना कर सकी? मैं पूछता हूँ उसने कौन सा तुझसे सोना-चांदी माँगा था जो तू दे ना पाई? ………. उसके बहुत एहसान हैं हम पर...जिन्हें मैं कभी नही उतार सकता| दिल को लगता था की कम से कम तुझे पा कर वो खुश है...पर तूने तो उससे वो ख़ुशी भी छीन ली! .मुझे शर्म आती है तुझे अपनी बेटी कहते हुए! " ये सब सुनने के बाद मेरे पाँव तले की जमीन खिसक चुकी थी...और मुझे खुद से घिन्न आने लगी थी....नफरत हो गई थी खुद से.... मन इस कदर कचोटने लगा की अगर मैं मर जाती तो अच्छा था!
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01-04-2019, 01:47 AM,
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दरअसल अनिल को MBA कराने के लिए पिताजी को अपनी ज़मीन और घर गिरवी रख के बैंक से लोन लेना पड़ा था| बैंक ने घर और ज़मीन की value बहुत कम लगाईं थी इस कारन हमें सिर्फ 3.5 लाख ही लोन मिला बाकी का 1.5 लाख कम पड़ रहा था| हमारी दूसरी ज़मीन से घर का गुजर-बसर हो जाय करता था बस! पिताजी की उम्मीद थी की MBA के बाद अनिल को अच्छी नौकरी मिल जायेगी और वो धीरे-धीरे कर के लोन की किश्त उतारता जायेगा| पर ऐसा ना हो सका..... financially हमारे घर की हालत बहुत कमजोर हो गई थी और बैंक को अपना पिसा डूबता नजर आया तो उसने पिताजी को नोटिस भेज दिया...... सच पूछो तो मैं अपनी इस नई जिंदगी में इस कदर डूब गई की मैं ये बात भूल ही गई थी...और मुझे ये तब याद आया जब आज पिताजी ने ये बात दोहराई!
"जब मानु को ये बात पता चली तो उसने बिना कुछ सोचे मुझे दस लाख का चेक फाड़ के दे दिया..... और बस इतना कहा की संगीता को कुछ मत बताना| " ये सुन के मेरे चेहरे पे हवाइयां उड़ने लगीं...क्योंकि मुझे इन्होने कुछ नहीं बताया था| "हाँ...तूने सही सुना...तेरे पति ने...जबकि तुझे तो शायद याद ही नहीं होगा की तेरा बाप कर्जे तले दबा हुआ है! पर मैंने आजतक तुझसे कुछ शिकायत नही की.... पर आज तूने एक देवता सामान इंसान को इस कदर दुखी किया की आज उसकी ये हालत हो गई! और तुझे अगर इतनी ही तकलीफ थी तो क्यों शादी की? ..क्यों मानु की और अपने सास-ससुर की जिंदगी में जहर घोल दिया?क्या तुझे पता नहीं था की जो कदम तू उठाने के लिए उसे मजबूर कर रही है उसका अंजाम क्या होगा? उसने बिना पूछे बिना कहे हर मोड़ पे हमारे परिवार की मदद की...सिर्फ इसलिए की वो तुझे खुश देखना चाहता था और तू....तू उसका मन रखने के लिए खुश होने का दिखावा तक ना कर सकी? मैं पूछता हूँ उसने कौन सा तुझसे सोना-चांदी माँगा था जो तू दे ना पाई? ………. उसके बहुत एहसान हैं हम पर...जिन्हें मैं कभी नही उतार सकता| दिल को लगता था की कम से कम तुझे पा कर वो खुश है...पर तूने तो उससे वो ख़ुशी भी छीन ली! .मुझे शर्म आती है तुझे अपनी बेटी कहते हुए!" ये सब सुनने के बाद मेरे पाँव तले की जमीन खिसक चुकी थी...और मुझे खुद से घिन्न आने लगी थी....नफरत हो गई थी खुद से.... मन इस कदर कचोटने लगा की अगर मैं मर जाती तो अच्छा था!
अब आगे ......
"समधी जी ये आप क्या कह रहे हो? ये बहु है हमारी!" ये कहते हुए मेरी माँ (सासु माँ) तेजी से चल के मेरे पास आईं और मेरे आँसूं पोंछने लगी| "बहुत प्यार करती है ये मानु से! हो गई गलती बच्ची से! ... उसने कुछ जानबुझ के तो नहीं किया? वो भी सिर्फ इसलिए की वो हम लोगों को अकेला छोड़ के नहीं जाना चाहती थी| इसीलिए वो नाराज हुई...मुझे नहीं लगता उसने कुछ गलत किया! आपको पता है मैं और मानु के पिताजी चाहते थे की शादी के बाद ये दोनों अलग settle हो जाएँ इसलिए शादी वाले दिन मैंने बहु को उसके नए घर की चाभी दी तो जानते हैं इसने क्या किया? चाभी मुझे लौटा दी...और बोली माँ मैं इन्हें आप से अलग करने नहीं आई हूँ| हम आपके साथ ही रहेंगे! और तो और अपने हनीमून पर जाने के लिए इसने शर्त राखी की हम सब एक साथ घूमने जाएँ! हर कदम पर इस्सने परिवार को तवज्जो दी है और आप इसकी एक छोटी सी गलती पर....."
"समधन जी...छोटी सी गलती? अगर आप इसे अपनी बेटी मानती हैं तो ये हमारा बेटा है...और आपकी बेटी की वजह से मेरा बेटा इस समय बी बेहोश पड़ा है... सिर्फ और सिर्फ इसकी वजह से!" पिताजी ने मुझ पर गरजते हुए कहा|
"एक बात बताइये समधी जी... अगर यही गलती आपके बेटे ने की होती तो?" माँ ने फिर से मेरा बचाव किया|
"बहनजी.... मानु के बहुत एहसान हैं हम पर...जिसे हम छह के भी नहीं उतार सकते|" पिताजी ने बात को संभालते हुए कहा|
"भाईसाहब.....कैसे एहसान? एहसान तो परायों पर किये जाते हैं और आप तो अपने हैं|" पिताजी (ससुर जी) ने मुस्कुराते हुए कहा| "देखिये जो हुआ सो हुआ...बहु ने कुछ भी जान कर नहीं किया| वो बस मानु को टेंशन नहीं देना चाहती थी| अब आप गुस्सा छोड़िये और अनिल बेटा तुम्हें गुडगाँव दस बजे पहुँचना है| तो मुझे और अपने माँ-पिताजी को घर छोड़ दो| और मानु की माँ..तुम यहीं बहु के पास रहो मैं थोड़ी देर बाद आऊँगा तब तक तुम बहु को नाश्ता करा देना|" बस इतना कह के पिताजी और सब चले गए|
सब के जाने के बाद माँ ने मुझे मुँह-हाथ धो के आने को कहा और फिर नाश्ता परोस दिया| "चल आजा बेटी नाश्ता कर ले! आयुष और नेहा सुबह अपने आप उठ गए और आज खुद तैयार भी हो गए| मैंने सोचा की आज इन्हें स्कूल छोड़ दिया जाए तो आयुष जिद्द करने लगा की पहले पापा से मिलूँगा...उफ्फ्फ्फ़ कितनी मुश्किल से माना वो! खेर तेरे पिताजी (ससुर जी) ने उसे वादा किया की दोनों आज रात यहीं रुकेंगे तब जाके माना वो| अरे! तू वहां कड़ी-कड़ी क्या सोच रही है? चल आजा जल्दी से|" मैं आके उनके सामने बैठ गई पर खाने को हाथ तक नही लगाया और बोली; "माँ...मन नहीं है ...!"
"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|
"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"
"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|
"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"
"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"
"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!
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01-04-2019, 01:47 AM,
#64
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
सब के जाने के बाद माँ ने मुझे मुँह-हाथ धो के आने को कहा और फिर नाश्ता परोस दिया| "चल आजा बेटी नाश्ता कर ले! आयुष और नेहा सुबह अपने आप उठ गए और आज खुद तैयार भी हो गए| मैंने सोचा की आज इन्हें स्कूल छोड़ दिया जाए तो आयुष जिद्द करने लगा की पहले पापा से मिलूँगा...उफ्फ्फ्फ़ कितनी मुश्किल से माना वो! खेर तेरे पिताजी (ससुर जी) ने उसे वादा किया की दोनों आज रात यहीं रुकेंगे तब जाके माना वो| अरे! तू वहां कड़ी-कड़ी क्या सोच रही है? चल आजा जल्दी से|" मैं आके उनके सामने बैठ गई पर खाने को हाथ तक नही लगाया और बोली; "माँ...मन नहीं है ...!"
"बेटी..माँ-बाप के कुछ कहने से रूठ थोड़े ही जाते हैं? क्या माँ-बाप को इतना भी हक़ नही की वो अपने बच्चों को डाँट सके?" माँ ने बड़ा सीधा सा सवाल पूछा|
"माँ मैं पिताजी के डाँटने से नही रूठी ... उन्होंने तो कुछ गलत कहा ही नहीं! गलती मेरी थी...सारी की सारी... मुझे तो खुद से घिन्न आ रही है की मैंने इनके साथ ऐसा व्यवहार किया| इन्होने बिना बोले मेरी हर बात समझी.... बिना मेरे कहे पिताजी की ज़मीन बचाई वरना आज वो सब सड़क पे आ जाते और...मैं इनको इस कदर परेशान करती रही!"
"बेटी अगर तेरे खाना ना खाने से मानु की तबियत ठीक हो जाती तो हम सब भूख हड़ताल कर देते और आब तक तो वो भला-चंगा हो जाता| देख तू अपने लिए ना सही उस नए मेहमान के लिए खाना खा ले... अगर उसे कुछ हो गया तो मानु भले ही तुझे माफ़ कर दे पर वो खुद तुझे कभी माफ़ नही करेगा!" इतना कह के माँ ने मुझे जबरदस्ती अपने हाथ से खाना खिलाया|
"बेटी मैं बड़ी किस्मत वाली हूँ.... पहले मानु को अपने हाथ से खिलाती थी.... फिर आयुष को खाना खिलने का मौका मिलाया और आज देख तो किस्मत ने मुझे तुझे भी खिलाने का मौका दिया|"
"इस हिसाब से तो मैं ज्यादा किस्मत वाली हूँ माँ.... बचपन के बाद इतने साल गुजर गए और आज मुझे फिर से अपनी माँ के हाथों खाना खाने का मौका मिल रहा है|"
"अच्छा जी...मानु ने तुझे कभी खाना नहीं खिलाया?" माँ ने जानबूझ के ये शरारती सवाल पूछा, और उनका सवाल सुन के मैं हँस पड़ी! "देखा ....मैं जानती थी!!!" मेरी हँसी छूट गई... और इस तरह हम माँ-बेटी हँस पड़े..... एक मुद्दत बाद!
अब आगे ....
मैं जानती तो थी की माँ मुझसे अपनी बेटी जैसा प्यार करती है...पर उसका एक अनोखा एहसास मुझे उस दिन हुआ!
दोपहर को अनिल बच्चों को स्कूल से सीधा हॉस्पिटल ले आया और वापसी में माँ को अपने साथ घर ले गया| आयुष तो आते ही अपने पापा के पास जा बैठा और उनसे बात करने लगा| नेहा सोफे पे बैठ के अपना होमवर्क निकाल के बैठ गई| आयुष कुछ खुसफुसाने लगा और उसकी इस खुसर-फुसर में हम माँ-बेटी दोनों की दिलचस्पी जाग गई| "आयुष...बेटा पापा से क्या बात कर रहे हो?" इतने में नेहा उठ के अपने पापा के पास स्टूल पर बैठ गई| उसे इतने नजदीक बैठा देख वो बोला; "दीदी....आप उधर सोफे पर बैठो...मुझे पापा से बात करनी है|"
"मैं नहीं जाती... तू बोल जो बोलना है|" नेहा ने अकड़ते हुए जवाब दिया|
"प्लीज दीदी ...प्लीज......" आयुष ने बड़ी भोली सी शकल बनाते हुए कहा| पर नेहा टस से मस नहीं हुई आखिर मुझे ही बात संभालनी पड़ी वरना दोनों लड़ाई शुरू कर देते|
"आयुष....जो सीक्रेट बात तुम करने वाले हो मुझे पहले से पता है!" मैंने थोड़ा सा नाटक किया| (Bluffing)
"आपको कैसे पता?.... ये तो पापा और मेरा सीक्रेट है!" उसने बड़ी हैरानी से पूछा|
"बेटा....मैं आपकी माँ हूँ| उस दिन जब आप पापा से बात कर रहे थे ना, तब मैंने सब सुन लिया था|" मैंने फिर से Bluff किया|
"ठीक है.... !" शर्म से उसके गाल लाल हो गए थे! "वो...... आज उसने मुझसे बात की!" बस इतना कह के आयुष रुक गया और अपने पापा की तरफ देखने लगा| 'उसने' सुन के मुझे थोड़ा शक हुआ की जर्रूर ये कोई लड़की है! दरअसल आयुष अपने पापा पर ही गया है| इन्होने भी स्कूल में कभी किसी लड़की से बात करने की कोशिश नही की...हाँ अगर कोई लड़की सामने से बात करे तभी ये उसका जवाब देते थे|
"अच्छा...wow! क्या बोला उसने?" मैंने पूछा तो आयुष शर्मा गया|
"वो....उसने....पूछा की .....क्या मैंने होमवर्क किया है?" आयुष ने अटकते-अटकते हुए कहा, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| पर नेहा के चेहरे पर कोई भाव नही थे| वो अब भी मुझसे नाराज थी और मेरी हँसी उसे रास नही आई थी इसलिए वो चिढ़ते हुए बोली; "तो? तू स्कूल पढ़ने जाता है या girlfriends बनाने? पढ़ाई में ध्यान लगा!" आयुष का मुँह लटक गया तो मैंने उसे अपने साथ चलने को बोला और उसे ले के मैं कैंटीन आ गई|
"बेटा ये लो आपका फेवरट मिल्क शेक.... happy!" उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने ही से बात शुरू की; "बेटा....आपकी दीदी पापा को लेके थोड़ा परेशान है| देखो मुझसे भी वो बात नही करती.... जब पापा ठीक हो जायेंगे तब सब ठीक हो जायेगा| तबतक कोशिश करो की आपकी दीदी को गुस्सा ना आये पर उसे अकेला मत छोड़ना, वो आपसे बहुत ज्यादा प्यार करती है...मुझसे भी ज्यादा!" वो प्यार से मुस्कुराया और स्लुर्प...स्लुर्प... कर अपना मिल्क शेक पीने लगा| आज रात को मैं और बच्चे यहीं सोने वाले थे तो खाना खाने के बाद हम सब लेट गए| मैं सोफे पर और बच्चे नीचे| रात के बारह बजे होंगे की मुझे किसी के बोलने की आवाज आई, ये कोई और नहीं नेहा की आवाज थी| वो अपने पापा से कुछ बात कर रही थी|
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01-04-2019, 01:47 AM,
#65
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
दोपहर को अनिल बच्चों को स्कूल से सीधा हॉस्पिटल ले आया और वापसी में माँ को अपने साथ घर ले गया| आयुष तो आते ही अपने पापा के पास जा बैठा और उनसे बात करने लगा| नेहा सोफे पे बैठ के अपना होमवर्क निकाल के बैठ गई| आयुष कुछ खुसफुसाने लगा और उसकी इस खुसर-फुसर में हम माँ-बेटी दोनों की दिलचस्पी जाग गई| "आयुष...बेटा पापा से क्या बात कर रहे हो?" इतने में नेहा उठ के अपने पापा के पास स्टूल पर बैठ गई| उसे इतने नजदीक बैठा देख वो बोला; "दीदी....आप उधर सोफे पर बैठो...मुझे पापा से बात करनी है|"
"मैं नहीं जाती... तू बोल जो बोलना है|" नेहा ने अकड़ते हुए जवाब दिया|
"प्लीज दीदी ...प्लीज......" आयुष ने बड़ी भोली सी शकल बनाते हुए कहा| पर नेहा टस से मस नहीं हुई आखिर मुझे ही बात संभालनी पड़ी वरना दोनों लड़ाई शुरू कर देते|
"आयुष....जो सीक्रेट बात तुम करने वाले हो मुझे पहले से पता है!" मैंने थोड़ा सा नाटक किया| (Bluffing)
"आपको कैसे पता?.... ये तो पापा और मेरा सीक्रेट है!" उसने बड़ी हैरानी से पूछा|
"बेटा....मैं आपकी माँ हूँ| उस दिन जब आप पापा से बात कर रहे थे ना, तब मैंने सब सुन लिया था|" मैंने फिर से Bluff किया|
"ठीक है.... !" शर्म से उसके गाल लाल हो गए थे! "वो...... आज उसने मुझसे बात की!" बस इतना कह के आयुष रुक गया और अपने पापा की तरफ देखने लगा| 'उसने' सुन के मुझे थोड़ा शक हुआ की जर्रूर ये कोई लड़की है! दरअसल आयुष अपने पापा पर ही गया है| इन्होने भी स्कूल में कभी किसी लड़की से बात करने की कोशिश नही की...हाँ अगर कोई लड़की सामने से बात करे तभी ये उसका जवाब देते थे|
"अच्छा...wow! क्या बोला उसने?" मैंने पूछा तो आयुष शर्मा गया|
"वो....उसने....पूछा की .....क्या मैंने होमवर्क किया है?" आयुष ने अटकते-अटकते हुए कहा, ये सुनते ही मेरी हँसी छूट गई| पर नेहा के चेहरे पर कोई भाव नही थे| वो अब भी मुझसे नाराज थी और मेरी हँसी उसे रास नही आई थी इसलिए वो चिढ़ते हुए बोली; "तो? तू स्कूल पढ़ने जाता है या girlfriends बनाने? पढ़ाई में ध्यान लगा!" आयुष का मुँह लटक गया तो मैंने उसे अपने साथ चलने को बोला और उसे ले के मैं कैंटीन आ गई|
"बेटा ये लो आपका फेवरट मिल्क शेक.... happy!" उसने कोई जवाब नहीं दिया तो मैंने ही से बात शुरू की; "बेटा....आपकी दीदी पापा को लेके थोड़ा परेशान है| देखो मुझसे भी वो बात नही करती.... जब पापा ठीक हो जायेंगे तब सब ठीक हो जायेगा| तबतक कोशिश करो की आपकी दीदी को गुस्सा ना आये पर उसे अकेला मत छोड़ना, वो आपसे बहुत ज्यादा प्यार करती है...मुझसे भी ज्यादा!" वो प्यार से मुस्कुराया और स्लुर्प...स्लुर्प... कर अपना मिल्क शेक पीने लगा| आज रात को मैं और बच्चे यहीं सोने वाले थे तो खाना खाने के बाद हम सब लेट गए| मैं सोफे पर और बच्चे नीचे| रात के बारह बजे होंगे की मुझे किसी के बोलने की आवाज आई, ये कोई और नहीं नेहा की आवाज थी| वो अपने पापा से कुछ बात कर रही थी|
अब आगे......
"पापा ..... मुझे आपको सॉरी बोलना था!" इतना कह के वो चुप हो गई.....लगा जैसे आगे बोलने के लिए हिम्मत बटोर रही हो| कुछ देर बाद फिर से बोली; "i'm sorry पापा! मैंने आपको गलत समझा..... इतने साल मम्मी के साथ रही ना इसलिए उनका रंग मुझ पर भी चढ़ गया..... जब आप हमें गाँव में छोड़के शहर आ गए थे ये तब की बात है| आप कभी-कभी फोन किया करते थे ....पर मुझसे आपकी कभी बात नहीं हुई! मुझे बहुत बुरा लगता था.... जबकि मैं जानती थी की आप मुझे सबसे ज्यादा प्यार करते हो फिर भी आप हमेशा मम्मी से ही बात करते थे| रात को मम्मी मुझे बताती थी की तेरे पापा का फोन आया था और तेरे बारे में पूछ रहे थे| तब मैं उनसे पूछा करती की पापा मुझसे बात क्यों नहीं करते तो मम्मी कहती की बेटा तू घर पर नहीं थी इसलिए तुझसे बात नही हो पाई| ये सुन के मुझे यही लगता की मम्मी आपका बचाव कर रही हैं और मैं चुप हो जाती| पर फिर कुछ दिन बाद आपका फोन आना भी बंद हो गया! मम्मी उदास रहने लगी थी .... अब चूँकि आपने मुझे मम्मी को खुश रखने की जिम्मेदारी दी थी तो मैं मम्मी को हँसाने की कोशिश किया करती| एक दिन रात को मैंने मम्मी से पुछ्ह् की अब पापा का फोन क्यों नहीं आता? तो माँ ने कहा की बेटा पापा पढ़ाई कर रहे हैं...उन्हें बहुत बड़ा आदमी बनना है ....इसलिए अभी उनसे बात नहीं हो रही| इस बार फिर मैंने उनकी बातों पर भरोसा कर लिया| पर मन में कहीं न कहीं ये लगता था की आप को हमारी परवाह नहीं है! आयुष के आने के बाद मुझे लगा था की आप जर्रूर आओगे ....पर आप नहीं आये! मैं बहुत रोई.... पर मम्मी ने मुझे चुप करा दिया, ये कह के की बेटा पापा बिजी हैं ...जल्दी ही आएंगे|
आयुष दो महीने का हो गया था....गर्मी की छुट्टियाँ मजदीक आ गई थीं, तो मैंने मम्मी से फिर पूछा की मम्मी इस बार गर्मियों की छुटियों में पापा आएंगे ना? तो माँ ने झुंझलाते हुए जवाब दिया, जब देखो पापा..पापा...पापा... करती रहती है! उन्हें पढ़ने दे .... उन्हें जिंदगी में कुछ बनना है..... कुछ हासिल करना है... यहाँ के लोगों की तरह खेतों में हल नहीं चलाना! ये सुन के मैं चुप हो गई..... आपके दुबारा आने की जो उम्मीद थी उसे भी बुझा दिया! मेरे मन ने मुझसे मम्मी की बातों का ये अर्थ निकालने पर मजबूर किया की आप हमें भूल चुके हो ..... आप पढ़ाई में इस कदर मशगूल हो गए की आपने हमें भुला दिया है| आपके मन में मम्मी के लिए जो प्यार था वो खत्म हो गया तभी तो आपने फोन करना बंद कर दिया और यही कारन है की मम्मी इतना दुखी और परेशान है और इसीलिए वो मुझ पर बरस पड़ीं| मैंने आगे बढ़ के माँ को अपने हाथों से जकड लिया और हम दोनों रोने लगीं| मैंने उस दिन ठान लिया की मैं माँ को कभी आपकी याद नहीं आने दूँगी और उस दिन से मैंने उनका ख़याल रखना शुरू कर दिया|
मैंने माँ को कभी भनक तक नहीं लगने दी की मैं आपको कितना miss करती हूँ! पूरे घर में सिर्फ एक आप ही तो थे जो मुझसे प्यार करते थे| बाकी तो कभी किसी को मेरी फ़िक्र थी ही नहीं| साल दर साल बीतते गए और फिरर वो दिन आया जब मैं आपसे मिली और आपने मुझे वो ड्रेस गिफ्ट की| उस गिफ्ट पैक में सबसे ऊपर मेरे फेवरट चिप्स का पैकेट था| तब मुझे एहसास हुआ की आप मुझे जरा भी नहीं भूले... आपको मेरी पसंद आज भी याद थी| मेरे मन में इच्छा जाएगी की आखिर ऐसी क्या वजह थी की आप को मुझसे इतने सालों तक दूर रहना पड़ा और तब मजबूरन मैंने छुप के आप दोनों की बात सुनी| सब सुनने के बाद पापा मैंने खुद को बहुत कोसा ...इतने साल मैं आपको कितना गलत समझती रही! मम्मी के साथ रह-रह के मैं भी उन्हीं की तरह हो गई थी...उन्ही की तरह सोचने लगी थी| मैं उस दिन से आपसे माफ़ी माँगना चाहती थी पर कभी हिम्मत नहीं हुई| फिर आप को और मम्मी को इस तरह खुश देख के मैं ये बात कहना ही भूल गई ...पर अब मम्मी ने सारी हद्द पार कर दी| उनकी वजह से आपकी तबियत ख़राब हुई....और अगर इस बार मैंने आपको खो दिया तो i swear पापा मैं उन्हें कभी माफ़ नहीं करुँगी और कभी उनसे बात नहीं करुँगी| प्लीज पापा आप जल्दी से ठीक हो जाओ.....प्लीज ....प्लीज!!!" ये कहते-कहते नेहा रो पड़ी!
ये सब सुनने के बाद मैं रो पड़ी.... मेरी वजह से मेरी बेटी इतने साल अपने पापा के प्यार से महरूम रही! ये बात मुझे अंदर ही अंदर खाने लगी और ये दर लगने लगा की अगर मैंने इनको (अपने पति) को खो दिया तो ये परिवार जिसे आपने इतने प्यार से बाँधा है वो बिखर जाएगा| मुझसे नेहा के आँसूं बर्दाश्त नहीं हुए तो मैं उठ के उसके पास गई और उसके कंधे पे हाथ रख के उसे उठाया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया| ना तो मैं उस समय कुछ कहने की हालत में थी और ना ही नेहा! मैंने उसका सर थप-थापा के सुलाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ झटक दिया और आयुष की तरफ मुँह कर के लेट गई| मैं अपना मन मसोस कर लेट गई....पर एक पल के लिए भी सो न सकी, सारी रात नेहा की कही बातें दिमाग में गूँजती रही| सुबह हुई तो अपने सामने "बड़की अम्मा और अजय " को देख मैं हैरान रह गई! मैंने तुरंत उनके पाँव छुए और उन्होंने बड़े प्यार से मुझे अपने गले लगा लिया और इनका हाल चाल पूछा| इतने में आयुष बाथरूम से निकला तो बाथरूम से भागा-भागा अपनी दादी जी के गले लग गया| नेहा भी उस समय कमरे में थी पर न जाने क्यों झिझक रही थी| वो बहुत छोटे-छोटे क़दमों से आगे बढ़ी और अपनी दादी के पाँव छुए पर उस समय अम्मा का ध्यान आयुष पर था तो उन्होंने उसे देखा नहीं| नेहा अपना सर झुकाये वापस सोफे पर बैठ गई| मैंने तुरंत माँ (सासु माँ) को फोन कर दिया|
अमा जा के इनके पास बैठ गईं और सर पर हाथ फेरने लगीं| आँखों में आंसूं लिए मेरी तरफ देख के बोलीं; "बेटी ...तूने भी मुझे मानु की इस हालत के बारे में नहीं बताया?" मेरा सर झुक गया क्योंकि इस हफदडफडी में मुझे याद ही नहीं रहा| मैंने तो अपने माँ-पिताजी तक को नहीं बताया था| शायद उन्हें मेरी हालत समझ आ गई.... तभी अजय ने सवाल पूछा; "भाभी... मानु भैया को हुआ क्या?"
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01-04-2019, 01:48 AM,
#66
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
ये सब सुनने के बाद मैं रो पड़ी.... मेरी वजह से मेरी बेटी इतने साल अपने पापा के प्यार से महरूम रही! ये बात मुझे अंदर ही अंदर खाने लगी और ये दर लगने लगा की अगर मैंने इनको (अपने पति) को खो दिया तो ये परिवार जिसे आपने इतने प्यार से बाँधा है वो बिखर जाएगा| मुझसे नेहा के आँसूं बर्दाश्त नहीं हुए तो मैं उठ के उसके पास गई और उसके कंधे पे हाथ रख के उसे उठाया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया| ना तो मैं उस समय कुछ कहने की हालत में थी और ना ही नेहा! मैंने उसका सर थप-थापा के सुलाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ झटक दिया और आयुष की तरफ मुँह कर के लेट गई| मैं अपना मन मसोस कर लेट गई....पर एक पल के लिए भी सो न सकी, सारी रात नेहा की कही बातें दिमाग में गूँजती रही| सुबह हुई तो अपने सामने "बड़की अम्मा और अजय " को देख मैं हैरान रह गई! मैंने तुरंत उनके पाँव छुए और उन्होंने बड़े प्यार से मुझे अपने गले लगा लिया और इनका हाल चाल पूछा| इतने में आयुष बाथरूम से निकला तो बाथरूम से भागा-भागा अपनी दादी जी के गले लग गया| नेहा भी उस समय कमरे में थी पर न जाने क्यों झिझक रही थी| वो बहुत छोटे-छोटे क़दमों से आगे बढ़ी और अपनी दादी के पाँव छुए पर उस समय अम्मा का ध्यान आयुष पर था तो उन्होंने उसे देखा नहीं| नेहा अपना सर झुकाये वापस सोफे पर बैठ गई| मैंने तुरंत माँ (सासु माँ) को फोन कर दिया|
अम्मा जा के इनके पास बैठ गईं और सर पर हाथ फेरने लगीं| आँखों में आंसूं लिए मेरी तरफ देख के बोलीं; "बेटी ...तूने भी मुझे मानु की इस हालत के बारे में नहीं बताया?" मेरा सर झुक गया क्योंकि इस हफदडफडी में मुझे याद ही नहीं रहा| मैंने तो अपने माँ-पिताजी तक को नहीं बताया था| शायद उन्हें मेरी हालत समझ आ गई.... तभी अजय ने सवाल पूछा; "भाभी... मानु भैया को हुआ क्या?"
अब आगे.......
मैंने रोते हुए उन्हें सारा सच बता दिया...ये सुन के बड़की अम्मा और अजय दोनों स्तब्ध रह गए| कोई कुछ बोल नहीं रहा था.... बड़की अम्मा इनके (मेरे पति के) सर पर हाथ फेर रही थीं| आधा घंटा बीत गया था....तभी दरवाजा खोल कर सब एक-एक कर अंदर आये| पिताजी (मेरे ससुर जी) ने अम्मा के पाँव हाथ लगाए पर अम्मा अब भी कुछ नहीं बोलीं| फिर माँ (मेरी सासु माँ) ने पाँव हाथ लगाये पर अम्मा फिर भी कुछ नहीं बोलीं| आखिर कर पिताजी (ससुर जी) ने ही उनकी चुप्पी का कारन पूछा| मुझे तो लगा की अम्मा मेरा गुस्सा उन सब पर उतार देंगी पर बात कुछ और ही नकली|
"मेरा बेटा यहाँ इस हालत में है और तुमने (ससुर जी) मुझे कुछ बताया ही नहीं? मुझे ये बात समधी जी से पता चली! इतनी जल्दी तूने पराया कर दिया?" अम्मा ने भीगी आँखों से कहा|
"नहीं भाभी ऐसा मत बोलो! मैंने भाईसाहब के फ़ोन पर कॉल किया था....फिर उन्हें सारी बात बताई पर उन्होंने बिना कुछ कहे फोन काट दिया| फिर मैंने अजय बेटा के फ़ोन पर कॉल किया था पर किसी ने फ़ोन नहीं उठाया| हारकर मैंने समधी जी को फ़ोन किया और आप तक खबर पहुँचाने को कहा|" पिताजी (ससुर जी) ने मिन्नत करते हुए कहा|
ये सब सुन कर अम्मा को तसल्ली हुई पर उन्हें गुस्सा भी बहुत आया की बड़के दादा ने ऐसा किया और उन्हें कुछ भी नहीं बताया| वो दिन सिर्फ और सिर्फ चिंता में बीत गया.... ऊपर से नेहा भी अकेला महसूस कर रही थी| मैंने अनिल से उसे कहीं बाहर ले जाने को कहा पर वो नहीं गई| अगले दिन उसका स्कूल था और उसे देख के मुझे बहुत दुःख हो रहा था| मैंने इशारे से नेहा को अपने पास बुलाया, चूँकि कमरे में सारे लोग मौजूद थे तो मैंने उसे अपने साथ चलने को कहा| माँ (सासु माँ) को जाते हुए ये कहा की मैं और नेहा थोड़ा walk लेके आ रहे हैं| "बेटा मैं.... आपसे कुछ कहूँ?" नेहा ने कुछ भी नहीं कहा पर मुझे तो उससे अपनी बात कहनी ही थी|
"बेटा.... अम्मा ने आपको देखा नहीं...वो आयुष से बात कर रही थीं ना|" पर नेहा कुछ बुदबुदाने लगी और जब मैंने उससे पूछा की आप क्या बोल रहे हो तो वो बोली; "अगर देखा भी होता तो वो मुझे उतना लाड़ तो नहीं करती जितना वो आयुष को करती हैं! उझे आयुष से जलन नहीं होती....बुरा लगता है जब कोई उसे प्यार करे और मुझे ignore करे! एक बस पापा ......." इतना कहते हुए वो रूक गई| मेरा गाला भर आया और मैंने किसी तरह खुद को संभालते हुए कहा; "बेटा....आपके पापा को कुछ नहीं होगा! भगवान कभी हमारे साथ ऐसा नहीं करेंगे... कम से कम आपके साथ तो कतई नहीं करेंगे| अच्छा आप चिप्स खाओगे?" उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया और एक कोने में कड़ी हो के डूबते हुए सूरज को देखने लगी| मैं भी उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी तो उसके साथ कड़ी हो गई और उसे कंपनी देने लगी|
"बेटा आपको याद है वो दिन जब हम तीनों पहली बार मूवी देखने गए थे?" नेहा ने हाँ में सर हिलाते हुए कहा| "उस दिन हमने कितना enjoy किया था ना..... पहले मूवी .... फिर lunch .... उस दिन आपने पहली बार 'पापा' बोला था| आपके पापा ने आपको कभी बताया नहीं पर उन्हें सबसे ज्यादा ख़ुशी उस दिन मिली थी.... वो उस दिन बहुत-बहुत खुश थे! इतना खुश की उस दिन उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें अपना जीवन साथी माना था!" ये सब सुनके नेहा के चेहरे पर भीनी सी मुस्कान फ़ैल गई थी!
"और आपको आपका स्कूल का पहला दिन याद है? कितना रोये थे आप..... और कैसे पापा ने आपको समझा-बुझा क स्कूल छोड़ा था|" नेहा मुस्कुराने लगी थी|
"बेटा सच.... पापा आपको मुझसे भी ज्यादा प्यार करते हैं!" ये सुन के उसे खुद पर गर्व महसूस होने लगा और मुझे लगा की उसका मन अभी कुछ हल्का हुआ है| इतने में अंदर से पिताजी (ससुर जी) ने हमें अंदर बुलाया| अगले दिन बच्चों का स्कूल था तो पिताजी और सबब के सब घर जा रहे थे| चूँकि मैं पिताजी से वचन ले चुकी थी की जब तक इन्हें (मेरे पति) को होश नहीं आता मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी इसलिए उन्होंने मुझे साथ चलने को नहीं कहा| जबकि बड़की अम्मा और मेरी माँ ने मुझे साथ चलने को कहा परन्तु माँ (सासु माँ) ने सब को समझा दिया| अगले दो दिन मैं बस दुआ करती यही... इन्तेजार करती रही की इन्हें जल्द ही होश आ जायेगा| तीसरे दिन मैं इनके (अपने पति के) पास स्टूल पर बैठी इनके हाथ को अपने हाथ में लिए उन सुनहरे पलों को याद कर रही थी की तभी अनिल आ गया|
"दी.... खाना|" बस इतना बोल कर उसने खाना टेबल पे रख दिया और जाके सोफे पर बैठ गया ओस अपने मोबाइल पर कुछ देखने लगा| मैंने ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया; "क्यों रे.....'दीदी' शब्द में से अब सिर्फ 'दी...' ही बोलेगा तू?" पर उसने कोई जवाब नहीं दिया| वो मुझसे नजरें तक नहीं मिला रहा था.... उसका ये रवैया तब से है जब से मैंने माँ-पिताजी को अपने द्वारा किये पाप के बारे में बताया था| घर में मेरे सास-ससुर के आलावा कोई नहीं था जो मुझसे ठीक से बात कर रहा हो| मेरे माँ-पिताजी ने तो मुझसे जैसे कन्नी ही काट ली थी! नजाने मुझे क्या सूझी मैंने बेशर्म बनते हुए बात आगे शुरू करने के लिए उससे सवाल पूछा; "अच्छा ये बता तेरा हाथ का दर्द कैसा है?" मेरा सवाल सुन कर वो मेरी तरफ अचरज भरी आँखों से देखने लगा और मुझे ताना मारते हुए बोला; "मेरा हाथ के दर्द के बारे में पूछने में आप कुछ लेट नहीं हो गए?" "हम्म्म्म..... जानती हूँ बहत लेट हो गई......" मेरी ये बात सुन कर वो जिंदगी में पहली बार मुझ पर गरज पड़ा!
"आपको किसी की भी जरा सी परवाह नहीं है! ना अपने भाई की...ना माँ-पिताजी की और ना ही जीजू की!" ये सुन कर मेरा सर शर्म से झुक गया पर अब्भी उसकी भड़ास पूरी तरह से नहीं निकली थी|
"ये देखो ....." ये कह कर उसने अपनी शर्ट कमर पर से उठाई और मुझे उसकी कमर पर सर्जरी का निशान दिखाई दिया! "ये....ये क्या?" ये देख के मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे!
"मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था.... और मुझे बताने की जर्रूरत तो नहीं की ये जीजू ने ही करवाया था... और इसे अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए..... जब जीजू मुंबई आये थे ये तब की बात है| पता नहीं उन्हें उस दिन क्या सुझा की वापस जाते हुए मुझे मिलने आ गए| मैं और माँ हॉस्पिटल में था तो उन्होंने सुमन से पूछा और वो उन्हें मेरे पास ले आई| मुझे इस तरह देख उन्होंने तुरंत डॉक्टर सरेंडर को फोन मिलाया और XXXX हॉस्पिटल में ले गए और अगले दिन ऑपरेशन के लिए पैसे भी जमा करा दिए| मैंने जो पैसे अपने ऑपरेशन के लिए सुमन से उधार लिए थे वो भी उन्होंने चुकता किये! वो तो ऑपरेशन तक रुकना चाहते थे पर माँ ने उन्हें जबरदस्ती वापस भेज दिया क्योंकि यहाँ आपको उनकी ज्यादा जर्रूरत थी!" मैं ये सब आँखें फ़ाड़े सुन रही थी.......|
"इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता .... यहाँ तक की पिताजी को भी इस बारे में कुछ नहीं पता...मैंने माँ को मना किया था| एक तो पहले ही मेरी पढ़ाई के बोझ तले वो इतना दबे हुए हैं की उन्हें heart problem है और अब मेरा हर्निया के बारे में सुन कर वो परेशान हो जाते| माँ और मैं तो आपको और जीजू को भी नहीं बताने वाले थे ....पर नाजाने कैसे उन्हें सब पता चल जाता था| कुछ दिन पहले मैं और सुमन ड्रिंक कर रहे थे.... नशे की हालत में उसके मुँह से निकल गया, 'यार तेरे जीजू इतने बुरे भी नहीं दीखते.... फिर उन्होंने अपने से दस साल बड़ी औरत से जिसके दो बच्चे हैं और एक अभी पेट में है उससे शादी क्यों की?' ये सुन के मेरे तन-बदन में इस कदर आग लग गई की मैंने उसे एक तमाचा जड़ दिया और रात के दो बजे उसके घर से अपना सामान ले कर निकल पड़ा| रात अपने दोस्त के घर बिताई और अगले दिन सुबह जीजू को फ़ोन किया| उन्होंने फ़ौरन २०,०००/- रूपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर किये और बोला की दूसरी जगह rent पर कमरा ले और मुझे आज ही तेरे Lease Agreement की copy mail कर!
बोलो पता था आपको इस बारे में? ओह्ह! पता कैसे होगा? आपने तो आमरण मौन व्रत जो धारण कर रखा था!"
मेरे पास उसकी कही किसी बात का जवाब नहीं था| मैं बस पछता रही थी ...इसके अलावा कर भी क्या सकती थी| फिर वो दुबारा मुझे याद करते हुए बोला; "खाना ठंडा हो रहा है! खा लो!" और उठ कर चला गया| मैं बस वहीँ बैठी इन्हें मन ही मन "sorry" बोलती रही! शाम को जब अनिल और सब लोग दुबारा आये तो मुझे कुछ याद आया|
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01-04-2019, 01:48 AM,
#67
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
ये सब सुनने के बाद मैं रो पड़ी.... मेरी वजह से मेरी बेटी इतने साल अपने पापा के प्यार से महरूम रही! ये बात मुझे अंदर ही अंदर खाने लगी और ये दर लगने लगा की अगर मैंने इनको (अपने पति) को खो दिया तो ये परिवार जिसे आपने इतने प्यार से बाँधा है वो बिखर जाएगा| मुझसे नेहा के आँसूं बर्दाश्त नहीं हुए तो मैं उठ के उसके पास गई और उसके कंधे पे हाथ रख के उसे उठाया और बिस्तर पर ला कर लिटा दिया| ना तो मैं उस समय कुछ कहने की हालत में थी और ना ही नेहा! मैंने उसका सर थप-थापा के सुलाने की कोशिश की तो उसने मेरा हाथ झटक दिया और आयुष की तरफ मुँह कर के लेट गई| मैं अपना मन मसोस कर लेट गई....पर एक पल के लिए भी सो न सकी, सारी रात नेहा की कही बातें दिमाग में गूँजती रही| सुबह हुई तो अपने सामने "बड़की अम्मा और अजय " को देख मैं हैरान रह गई! मैंने तुरंत उनके पाँव छुए और उन्होंने बड़े प्यार से मुझे अपने गले लगा लिया और इनका हाल चाल पूछा| इतने में आयुष बाथरूम से निकला तो बाथरूम से भागा-भागा अपनी दादी जी के गले लग गया| नेहा भी उस समय कमरे में थी पर न जाने क्यों झिझक रही थी| वो बहुत छोटे-छोटे क़दमों से आगे बढ़ी और अपनी दादी के पाँव छुए पर उस समय अम्मा का ध्यान आयुष पर था तो उन्होंने उसे देखा नहीं| नेहा अपना सर झुकाये वापस सोफे पर बैठ गई| मैंने तुरंत माँ (सासु माँ) को फोन कर दिया|
अम्मा जा के इनके पास बैठ गईं और सर पर हाथ फेरने लगीं| आँखों में आंसूं लिए मेरी तरफ देख के बोलीं; "बेटी ...तूने भी मुझे मानु की इस हालत के बारे में नहीं बताया?" मेरा सर झुक गया क्योंकि इस हफदडफडी में मुझे याद ही नहीं रहा| मैंने तो अपने माँ-पिताजी तक को नहीं बताया था| शायद उन्हें मेरी हालत समझ आ गई.... तभी अजय ने सवाल पूछा; "भाभी... मानु भैया को हुआ क्या?"
अब आगे.......
मैंने रोते हुए उन्हें सारा सच बता दिया...ये सुन के बड़की अम्मा और अजय दोनों स्तब्ध रह गए| कोई कुछ बोल नहीं रहा था.... बड़की अम्मा इनके (मेरे पति के) सर पर हाथ फेर रही थीं| आधा घंटा बीत गया था....तभी दरवाजा खोल कर सब एक-एक कर अंदर आये| पिताजी (मेरे ससुर जी) ने अम्मा के पाँव हाथ लगाए पर अम्मा अब भी कुछ नहीं बोलीं| फिर माँ (मेरी सासु माँ) ने पाँव हाथ लगाये पर अम्मा फिर भी कुछ नहीं बोलीं| आखिर कर पिताजी (ससुर जी) ने ही उनकी चुप्पी का कारन पूछा| मुझे तो लगा की अम्मा मेरा गुस्सा उन सब पर उतार देंगी पर बात कुछ और ही नकली|
"मेरा बेटा यहाँ इस हालत में है और तुमने (ससुर जी) मुझे कुछ बताया ही नहीं? मुझे ये बात समधी जी से पता चली! इतनी जल्दी तूने पराया कर दिया?" अम्मा ने भीगी आँखों से कहा|
"नहीं भाभी ऐसा मत बोलो! मैंने भाईसाहब के फ़ोन पर कॉल किया था....फिर उन्हें सारी बात बताई पर उन्होंने बिना कुछ कहे फोन काट दिया| फिर मैंने अजय बेटा के फ़ोन पर कॉल किया था पर किसी ने फ़ोन नहीं उठाया| हारकर मैंने समधी जी को फ़ोन किया और आप तक खबर पहुँचाने को कहा|" पिताजी (ससुर जी) ने मिन्नत करते हुए कहा|
ये सब सुन कर अम्मा को तसल्ली हुई पर उन्हें गुस्सा भी बहुत आया की बड़के दादा ने ऐसा किया और उन्हें कुछ भी नहीं बताया| वो दिन सिर्फ और सिर्फ चिंता में बीत गया.... ऊपर से नेहा भी अकेला महसूस कर रही थी| मैंने अनिल से उसे कहीं बाहर ले जाने को कहा पर वो नहीं गई| अगले दिन उसका स्कूल था और उसे देख के मुझे बहुत दुःख हो रहा था| मैंने इशारे से नेहा को अपने पास बुलाया, चूँकि कमरे में सारे लोग मौजूद थे तो मैंने उसे अपने साथ चलने को कहा| माँ (सासु माँ) को जाते हुए ये कहा की मैं और नेहा थोड़ा walk लेके आ रहे हैं| "बेटा मैं.... आपसे कुछ कहूँ?" नेहा ने कुछ भी नहीं कहा पर मुझे तो उससे अपनी बात कहनी ही थी|
"बेटा.... अम्मा ने आपको देखा नहीं...वो आयुष से बात कर रही थीं ना|" पर नेहा कुछ बुदबुदाने लगी और जब मैंने उससे पूछा की आप क्या बोल रहे हो तो वो बोली; "अगर देखा भी होता तो वो मुझे उतना लाड़ तो नहीं करती जितना वो आयुष को करती हैं! उझे आयुष से जलन नहीं होती....बुरा लगता है जब कोई उसे प्यार करे और मुझे ignore करे! एक बस पापा ......." इतना कहते हुए वो रूक गई| मेरा गाला भर आया और मैंने किसी तरह खुद को संभालते हुए कहा; "बेटा....आपके पापा को कुछ नहीं होगा! भगवान कभी हमारे साथ ऐसा नहीं करेंगे... कम से कम आपके साथ तो कतई नहीं करेंगे| अच्छा आप चिप्स खाओगे?" उसने फिर कोई जवाब नहीं दिया और एक कोने में कड़ी हो के डूबते हुए सूरज को देखने लगी| मैं भी उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहती थी तो उसके साथ कड़ी हो गई और उसे कंपनी देने लगी|
"बेटा आपको याद है वो दिन जब हम तीनों पहली बार मूवी देखने गए थे?" नेहा ने हाँ में सर हिलाते हुए कहा| "उस दिन हमने कितना enjoy किया था ना..... पहले मूवी .... फिर lunch .... उस दिन आपने पहली बार 'पापा' बोला था| आपके पापा ने आपको कभी बताया नहीं पर उन्हें सबसे ज्यादा ख़ुशी उस दिन मिली थी.... वो उस दिन बहुत-बहुत खुश थे! इतना खुश की उस दिन उन्होंने मुझे और मैंने उन्हें अपना जीवन साथी माना था!" ये सब सुनके नेहा के चेहरे पर भीनी सी मुस्कान फ़ैल गई थी!
"और आपको आपका स्कूल का पहला दिन याद है? कितना रोये थे आप..... और कैसे पापा ने आपको समझा-बुझा क स्कूल छोड़ा था|" नेहा मुस्कुराने लगी थी|
"बेटा सच.... पापा आपको मुझसे भी ज्यादा प्यार करते हैं!" ये सुन के उसे खुद पर गर्व महसूस होने लगा और मुझे लगा की उसका मन अभी कुछ हल्का हुआ है| इतने में अंदर से पिताजी (ससुर जी) ने हमें अंदर बुलाया| अगले दिन बच्चों का स्कूल था तो पिताजी और सबब के सब घर जा रहे थे| चूँकि मैं पिताजी से वचन ले चुकी थी की जब तक इन्हें (मेरे पति) को होश नहीं आता मैं यहाँ से नहीं जाऊँगी इसलिए उन्होंने मुझे साथ चलने को नहीं कहा| जबकि बड़की अम्मा और मेरी माँ ने मुझे साथ चलने को कहा परन्तु माँ (सासु माँ) ने सब को समझा दिया| अगले दो दिन मैं बस दुआ करती यही... इन्तेजार करती रही की इन्हें जल्द ही होश आ जायेगा| तीसरे दिन मैं इनके (अपने पति के) पास स्टूल पर बैठी इनके हाथ को अपने हाथ में लिए उन सुनहरे पलों को याद कर रही थी की तभी अनिल आ गया|
"दी.... खाना|" बस इतना बोल कर उसने खाना टेबल पे रख दिया और जाके सोफे पर बैठ गया ओस अपने मोबाइल पर कुछ देखने लगा| मैंने ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया; "क्यों रे.....'दीदी' शब्द में से अब सिर्फ 'दी...' ही बोलेगा तू?" पर उसने कोई जवाब नहीं दिया| वो मुझसे नजरें तक नहीं मिला रहा था.... उसका ये रवैया तब से है जब से मैंने माँ-पिताजी को अपने द्वारा किये पाप के बारे में बताया था| घर में मेरे सास-ससुर के आलावा कोई नहीं था जो मुझसे ठीक से बात कर रहा हो| मेरे माँ-पिताजी ने तो मुझसे जैसे कन्नी ही काट ली थी! नजाने मुझे क्या सूझी मैंने बेशर्म बनते हुए बात आगे शुरू करने के लिए उससे सवाल पूछा; "अच्छा ये बता तेरा हाथ का दर्द कैसा है?" मेरा सवाल सुन कर वो मेरी तरफ अचरज भरी आँखों से देखने लगा और मुझे ताना मारते हुए बोला; "मेरा हाथ के दर्द के बारे में पूछने में आप कुछ लेट नहीं हो गए?" "हम्म्म्म..... जानती हूँ बहत लेट हो गई......" मेरी ये बात सुन कर वो जिंदगी में पहली बार मुझ पर गरज पड़ा!
"आपको किसी की भी जरा सी परवाह नहीं है! ना अपने भाई की...ना माँ-पिताजी की और ना ही जीजू की!" ये सुन कर मेरा सर शर्म से झुक गया पर अब्भी उसकी भड़ास पूरी तरह से नहीं निकली थी|
"ये देखो ....." ये कह कर उसने अपनी शर्ट कमर पर से उठाई और मुझे उसकी कमर पर सर्जरी का निशान दिखाई दिया! "ये....ये क्या?" ये देख के मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे!
"मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था.... और मुझे बताने की जर्रूरत तो नहीं की ये जीजू ने ही करवाया था... और इसे अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए..... जब जीजू मुंबई आये थे ये तब की बात है| पता नहीं उन्हें उस दिन क्या सुझा की वापस जाते हुए मुझे मिलने आ गए| मैं और माँ हॉस्पिटल में था तो उन्होंने सुमन से पूछा और वो उन्हें मेरे पास ले आई| मुझे इस तरह देख उन्होंने तुरंत डॉक्टर सरेंडर को फोन मिलाया और XXXX हॉस्पिटल में ले गए और अगले दिन ऑपरेशन के लिए पैसे भी जमा करा दिए| मैंने जो पैसे अपने ऑपरेशन के लिए सुमन से उधार लिए थे वो भी उन्होंने चुकता किये! वो तो ऑपरेशन तक रुकना चाहते थे पर माँ ने उन्हें जबरदस्ती वापस भेज दिया क्योंकि यहाँ आपको उनकी ज्यादा जर्रूरत थी!" मैं ये सब आँखें फ़ाड़े सुन रही थी.......|
"इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता .... यहाँ तक की पिताजी को भी इस बारे में कुछ नहीं पता...मैंने माँ को मना किया था| एक तो पहले ही मेरी पढ़ाई के बोझ तले वो इतना दबे हुए हैं की उन्हें heart problem है और अब मेरा हर्निया के बारे में सुन कर वो परेशान हो जाते| माँ और मैं तो आपको और जीजू को भी नहीं बताने वाले थे ....पर नाजाने कैसे उन्हें सब पता चल जाता था| कुछ दिन पहले मैं और सुमन ड्रिंक कर रहे थे.... नशे की हालत में उसके मुँह से निकल गया, 'यार तेरे जीजू इतने बुरे भी नहीं दीखते.... फिर उन्होंने अपने से दस साल बड़ी औरत से जिसके दो बच्चे हैं और एक अभी पेट में है उससे शादी क्यों की?' ये सुन के मेरे तन-बदन में इस कदर आग लग गई की मैंने उसे एक तमाचा जड़ दिया और रात के दो बजे उसके घर से अपना सामान ले कर निकल पड़ा| रात अपने दोस्त के घर बिताई और अगले दिन सुबह जीजू को फ़ोन किया| उन्होंने फ़ौरन २०,०००/- रूपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर किये और बोला की दूसरी जगह rent पर कमरा ले और मुझे आज ही तेरे Lease Agreement की copy mail कर!
बोलो पता था आपको इस बारे में? ओह्ह! पता कैसे होगा? आपने तो आमरण मौन व्रत जो धारण कर रखा था!"
मेरे पास उसकी कही किसी बात का जवाब नहीं था| मैं बस पछता रही थी ...इसके अलावा कर भी क्या सकती थी| फिर वो दुबारा मुझे याद करते हुए बोला; "खाना ठंडा हो रहा है! खा लो!" और उठ कर चला गया| मैं बस वहीँ बैठी इन्हें मन ही मन "sorry" बोलती रही! शाम को जब अनिल और सब लोग दुबारा आये तो मुझे कुछ याद आया|
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01-04-2019, 01:48 AM,
#68
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
तीसरे दिन मैं इनके (अपने पति के) पास स्टूल पर बैठी इनके हाथ को अपने हाथ में लिए उन सुनहरे पलों को याद कर रही थी की तभी अनिल आ गया|
"दी.... खाना|" बस इतना बोल कर उसने खाना टेबल पे रख दिया और जाके सोफे पर बैठ गया ओस अपने मोबाइल पर कुछ देखने लगा| मैंने ही कौतुहलवश उससे पूछ लिया; "क्यों रे.....'दीदी' शब्द में से अब सिर्फ 'दी...' ही बोलेगा तू?" पर उसने कोई जवाब नहीं दिया| वो मुझसे नजरें तक नहीं मिला रहा था.... उसका ये रवैया तब से है जब से मैंने माँ-पिताजी को अपने द्वारा किये पाप के बारे में बताया था| घर में मेरे सास-ससुर के आलावा कोई नहीं था जो मुझसे ठीक से बात कर रहा हो| मेरे माँ-पिताजी ने तो मुझसे जैसे कन्नी ही काट ली थी! नजाने मुझे क्या सूझी मैंने बेशर्म बनते हुए बात आगे शुरू करने के लिए उससे सवाल पूछा; "अच्छा ये बता तेरा हाथ का दर्द कैसा है?" मेरा सवाल सुन कर वो मेरी तरफ अचरज भरी आँखों से देखने लगा और मुझे ताना मारते हुए बोला; "मेरा हाथ के दर्द के बारे में पूछने में आप कुछ लेट नहीं हो गए?" "हम्म्म्म..... जानती हूँ बहत लेट हो गई......" मेरी ये बात सुन कर वो जिंदगी में पहली बार मुझ पर गरज पड़ा!
"आपको किसी की भी जरा सी परवाह नहीं है! ना अपने भाई की...ना माँ-पिताजी की और ना ही जीजू की!" ये सुन कर मेरा सर शर्म से झुक गया पर अब्भी उसकी भड़ास पूरी तरह से नहीं निकली थी|
"ये देखो ....." ये कह कर उसने अपनी शर्ट कमर पर से उठाई और मुझे उसकी कमर पर सर्जरी का निशान दिखाई दिया! "ये....ये क्या?" ये देख के मैं हक्की-बक्की रह गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं निकल रहे थे!
"मेरा हर्निया का ऑपरेशन हुआ था.... और मुझे बताने की जर्रूरत तो नहीं की ये जीजू ने ही करवाया था... और इसे अभी ज्यादा दिन भी नहीं हुए..... जब जीजू मुंबई आये थे ये तब की बात है| पता नहीं उन्हें उस दिन क्या सुझा की वापस जाते हुए मुझे मिलने आ गए| मैं और माँ हॉस्पिटल में था तो उन्होंने सुमन से पूछा और वो उन्हें मेरे पास ले आई| मुझे इस तरह देख उन्होंने तुरंत डॉक्टर सरेंडर को फोन मिलाया और XXXX हॉस्पिटल में ले गए और अगले दिन ऑपरेशन के लिए पैसे भी जमा करा दिए| मैंने जो पैसे अपने ऑपरेशन के लिए सुमन से उधार लिए थे वो भी उन्होंने चुकता किये! वो तो ऑपरेशन तक रुकना चाहते थे पर माँ ने उन्हें जबरदस्ती वापस भेज दिया क्योंकि यहाँ आपको उनकी ज्यादा जर्रूरत थी!" मैं ये सब आँखें फ़ाड़े सुन रही थी.......|
"इस बारे में किसी को कुछ नहीं पता .... यहाँ तक की पिताजी को भी इस बारे में कुछ नहीं पता...मैंने माँ को मना किया था| एक तो पहले ही मेरी पढ़ाई के बोझ तले वो इतना दबे हुए हैं की उन्हें heart problem है और अब मेरा हर्निया के बारे में सुन कर वो परेशान हो जाते| माँ और मैं तो आपको और जीजू को भी नहीं बताने वाले थे ....पर नाजाने कैसे उन्हें सब पता चल जाता था| कुछ दिन पहले मैं और सुमन ड्रिंक कर रहे थे.... नशे की हालत में उसके मुँह से निकल गया, 'यार तेरे जीजू इतने बुरे भी नहीं दीखते.... फिर उन्होंने अपने से दस साल बड़ी औरत से जिसके दो बच्चे हैं और एक अभी पेट में है उससे शादी क्यों की?' ये सुन के मेरे तन-बदन में इस कदर आग लग गई की मैंने उसे एक तमाचा जड़ दिया और रात के दो बजे उसके घर से अपना सामान ले कर निकल पड़ा| रात अपने दोस्त के घर बिताई और अगले दिन सुबह जीजू को फ़ोन किया| उन्होंने फ़ौरन २०,०००/- रूपए मेरे अकाउंट में ट्रांसफर किये और बोला की दूसरी जगह rent पर कमरा ले और मुझे आज ही तेरे Lease Agreement की copy mail कर!
बोलो पता था आपको इस बारे में? ओह्ह! पता कैसे होगा? आपने तो आमरण मौन व्रत जो धारण कर रखा था!"
मेरे पास उसकी कही किसी बात का जवाब नहीं था| मैं बस पछता रही थी ...इसके अलावा कर भी क्या सकती थी| फिर वो दुबारा मुझे याद करते हुए बोला; "खाना ठंडा हो रहा है! खा लो!" और उठ कर चला गया| मैं बस वहीँ बैठी इन्हें मन ही मन "sorry" बोलती रही! शाम को जब अनिल और सब लोग दुबारा आये तो मुझे कुछ याद आया|
अब आगे.........
दरअसल आज डॉक्टर सरिता बता के गई थीं की वो दो दिन के लिए बाहर जा रही हैं| जब सब लोग आ गए तो मैंने ये बात सब को बताई तो किसी ने कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं दी| मैं इन्तेजार कर-कर के थक गई थी और इनके (अपने पति के) लिए कुछ करना चाहती थी| इस तरह हाथ पर हाथ रखे बैठ कर कुछ नहीं होने वाला था! मैं बड़े ताव में आ कर उठी और बोली; "माँ (सासु माँ) हम कब तक ऐसे बैठे रहेंगे?"
"पर बेटी हम सिर्फ दुआ ही कर सकते हैं| डॉक्टर साहिबा ने कहा था न की मानु को होश अपने आप आएगा| सिवाय इन्तेजार करने के हम क्या कर सकते हैं?" माँ ने उत्तर दिया|
"मुझसे इन्हें ...इस कदर नहीं देखा जाता| मैं.......मैं|" मेरे आगे कुछ बोलने से पहले ही माँ को मेरी दशा समझ आ गई और वो बलों; "बेटी...मैं समझ सकती हूँ तुझ पर क्या बीत रही है पर बेटा हम डॉक्टर नहीं हैं! तू सब्र रख और भगवान पर भरोसा रख|"
"माँ.... मैं एक बात कहना चाहती हूँ| जैसे Eye Specialist होता है, आँखों के इलाज के लिए और Heart Specialist होता है हृदय के रोगों के लिए तो क्या इन (मेरे पति) के इलाज के लिए कोई specialist डॉक्टर नहीं है? कोई clinic .... कोई हॉस्पिटल.... कोई वैध... कोई हकीम ... कोई तो होगा?" ये कहते-कहते में आँखें भर आईं| माँ दौड़ी-दौड़ी मेरे पास आई और मुझे अपने सीने से लगा कर चुप कराने लगी|
"माँ..... एक second opinion लेनी में क्या हर्ज है?" मैंने बिलखते हुए कहा| माँ ने पिताजी (ससुर जी) की तरफ देखा और मूक भाषा में मिन्नत की| पिताजी ने हाँ में सर हिला कर अपनी अनुमति दी!
"बेटी.... डॉक्टर सरिता को आने दो हम उनसे बात करते हैं|" पिताजी ने मुझे आश्वासन दिया| तभी अनिल एकदम से बोल उठा; "पिताजी क्यों न हम डॉक्टर सुरेंदर से पूछें?" {यदि आप सभी को याद ओ ओ डॉक्टर सुरेंदर वही हैं जिनकी गाड़ी से अनिल का accident हुआ था|} और इससे पहले की कोई कुछ कहता अनिल ने तुरंत ही डॉक्टर सुरेंदर को फ़ोन मिला दिया और उनसे बात करने लगा| बातचीत के बाद अनिल बोला की वो (सुरेंदर जी) इस बारे में पता कर के बताएँगे| करीब दो घंटे बाद उनका फ़ोन आया और उन्होंने बताया की बैंगलोर में एक specialized हॉस्पिटल है| उनका दावा है की उनका success rate 75% तक है| हमारे लिए तो ये ऐसे था जैसे अँधेरे कमरे में उम्मीद कोई किरण निकल आई हो| इससे पहले कोई कुछ कहता मैं उत्साह में आ कर बोल उठी; "पिताजी (ससुर जी) हमें इनको (मेरे पति को) वहाँ ले जाना चाहिए!" पर तभी मेरे पिताजी मुझ पर भड़क उठे; "गोद में उठा के ले जाएँ? मानु की हालत देख रही है ना तू?" ये सुन के मुझे होश आया की इस स्थिति में इन्हें (मेरे पति को) बैंगलोर कैसे ले जा सकते हैं?
पर इसका जवाब अनिल के पास था| वो बोला; "पिताजी... डॉक्टर सुरेंदर ने कहा है की air ambulance के जरिये हम जीजू को बैंगलोर ले जा सकते हैं| पर ये बहुत महंगा है ... तकरीबन 1.5 लाख से 2 लाख तक का खर्च होगा!" ये सुन कर तो मैं भी थोड़ा सोच में पड़ गई ... पर मेरा मन कह रहा था की पिताजी (ससुर जी) ये खर्च करने से नहीं चुकेंगे और ऐसा हुआ भी| उन्होंने बिना देर किये कहा; "अनिल बेटा... तू ऐसा कर बैंगलोर जा कर पहले इस हॉस्पिटल के बारे में पता लगा तब तक मैं इधर पैसा का इंंतजाम करता हूँ| प्राइवेट हॉस्पिटल है तो खर्च तो बहुत होगा और जब तक इन्तेजाम होता है तब तक हो सकता है डॉक्टर सरिता भी आ जाएं तो उनसे भी एक बार पूछ लेंगे|" अनिल तुरंत निकलने के लिए तैयार हो गया| पिताजी ने उसे सुबह जाने के लिए कहा तो जैसे-तैसे वो मान गया| अगले दिन सुबह अनिल और डॉक्टर सुरेंदर जी की बात हो गई| डॉक्टर सुरेंदर ने कहा की वो डायरेक्ट बैंगलोर मिलेंगे और अनिल भी उन्हें सीधा बैंगलोर ही मिलने वाला था| उन्होंने मुझे एक Link मेल किया था… मैंने सोचा की एक बार मैं भी बात कर लूँ! तो मैंने उन्हें फोन मिलाया;
"हेलो सुरेंदर जी बोल रहे हैं!"
"हाँ जी बोल रहा हूँ... आप कौन?"
"जी मैं संगीता.... अनिल की बहन|"
"ओह्ह...जी नमस्ते|"
"सुरेंदर जी अम्म्म.. मुझे आपसे कुछ पूछना था... actually आपने जिस हॉस्पिटल के बारे में बताया वो बैंगलोर में है| क्या यहाँ दिल्ली में कोई हॉस्पिटल नहीं?"
"संगीता जी... दरअसल हमारे doctor's journal में ये article आया था| मेरा एक दोस्त है जो बैंगलोर में रहता है| दिल्ली में मेरा कोई contact नहीं है... still i'll try my best .... meanwhile हम बंगलोरे में एक बार हॉस्पिटल चेक कर लेते हैं|
"जी.... and thank you .... very much!"
"अरे संगीता जी थैंक यू कैसा.... आप अनिल की दीदी हैं तो मेरी भी दीदी जैसी हुई ना| you don't worry."
मेरी सुरेंदर जी से बात हुई तो मन को थोड़ी तसल्ली हुई|
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01-04-2019, 01:48 AM,
#69
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
डॉक्टर सुरेंदर ने कहा की वो डायरेक्ट बैंगलोर मिलेंगे और अनिल भी उन्हें सीधा बैंगलोर ही मिलने वाला था| उन्होंने मुझे एक Link मेल किया था… मैंने सोचा की एक बार मैं भी बात कर लूँ! तो मैंने उन्हें फोन मिलाया;
"हेलो सुरेंदर जी बोल रहे हैं!"
"हाँ जी बोल रहा हूँ... आप कौन?"
"जी मैं संगीता.... अनिल की बहन|"
"ओह्ह...जी नमस्ते|"
"सुरेंदर जी अम्म्म.. मुझे आपसे कुछ पूछना था... actually आपने जिस हॉस्पिटल के बारे में बताया वो बैंगलोर में है| क्या यहाँ दिल्ली में कोई हॉस्पिटल नहीं?"
"संगीता जी... दरअसल हमारे doctor's journal में ये article आया था| मेरा एक दोस्त है जो बैंगलोर में रहता है| दिल्ली में मेरा कोई contact नहीं है... still i'll try my best .... meanwhile हम बंगलोरे में एक बार हॉस्पिटल चेक कर लेते हैं|
"जी.... and thank you .... very much!"
"अरे संगीता जी थैंक यू कैसा.... आप अनिल की दीदी हैं तो मेरी भी दीदी जैसी हुई ना| you don't worry."
मेरी सुरेंदर जी से बात हुई तो मन को थोड़ी तसल्ली हुई|
अब आगे.........
एक उम्मीद जिसके सहारे इस जीवन की नैय्या पार हो सकती थी! जैसे ही मैं मुड़ी तो पीछे मेरी 'माँ' नेहा खड़ी थी! वो एक डीएम से बोल पड़ी; "हुँह... आप... पापा अगर आपकी जगह झोटे तो आपको ठीक करने के लिए करोड़ों रूपए फूँक देते! और आप... आपको तो पैसे बचाने हैं! इतने पैसे बचा के करोगे क्या?" ये सब उसने मुझे टोंट मरते हुए कहा|
"बेटा ऐसा नहीं है, मैं तो......." मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही 'मेरी माँ' ने अपना 'फरमान' सुना दिया!
"मुझे सब पता है..... आप .... ये प्यार मोहब्बत... ये सब बस दिखावा है... और कुछ नहीं| जो लोग प्यार में पड़ते हैं उनका हाल पापा जैसा होता है| खेर मैं आपको कुछ बताने आई थी| मैंने decide किया है की मैं कभी शादी नहीं करुँगी!"
"बेटा....ये तू क्या कह रही है!" मैंने उसे समझाना चाहा पर अभी उसकी बात पूरी नहीं हुई थी|
"मैं ता उम्र पापा की सेवा करुँगी! कभी शादी नहीं करुँगी! ये प्यार-व्यार कुछ नहीं होता.... वैसे भी मुझे आपकी वजह से पापा का प्यार तो मिला नहीं.... बची हुई जिंदगी मैं पापा के साथ ही गुजरूँगी|" आगे कुछ कहने से पहले माँ (सासु माँ) आ गईं| म्हे लगा की वो अपना ये 'फैसला' माँ को भी सुनाएगी पर शायद उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी| उसने topic चेंज करते हुए कहा; "दादी जी... मामू आ गए?" माँ ने उसे कहा की अनिल नीचे उसका इन्तेजार कर रहा है| नेहा बिना आगे कुछ कहे नीचे भाग गई!
अपनी बेटी की मुंह से ये सब सुन कर मैं टूट गई.... अब तक उसने मुझे दोषी ही बनाया था और आज तो उसने मुझे सजा ही सुना दी| मैं फूट-फूट के रोने लगी.... माँ को कुछ समझ नहीं आया तो वो मुझे चुप कराने लगीं| मैंने रो-रो कर माँ से अपनी बात कही; "माँ..... अब.....अब जान नहीं बची मुझ में....टूट चुकी हूँ! मैं... मेरी किस्मत ऐसी है! ना तो मैं एक अच्छी बेटी साबित हो सकी और ना ही अच्छी पत्नी! ........... और अब तो मैं एक अच्छी माँ भी साबित नहीं हो सकी! मैं....बहुत अभागी हूँ...... ऐसा ...ऐसा देवता जैसा पति मिला और मैंने उसकी कदर तक ना की! इन्होने हर कदम पर मेरे साथ चलना चाहा और मैं इनके साथ चलने से कतराती रही|माँ..... आप लोग क्यों मेरी तरफदारी करते हैं.....मैं इस लायक ही नहीं! सच कहते हैं पिताजी मुझे मर ही जाना चाहिए था! इस हँसते-खेलते परिवार को मेरी ही नजर लग गई माँ...... मेरी बुरी किस्मत इस घर को ही निगल ना जाए....प्लीज माँ .... मुझे .... मुझे थोड़ा सा जहर ला दो.... मुझे मरने दो.... मैं ... " आगे कुछ कहने से माँ ने मुझे रोक दिया और मेरे आँसूं पोछते हुए बोलीं; "बेटी..... हम सब मानु से बहुत प्यार करते हैं ओ मानु तुझसे बहुत प्यार करता है तो इस हिसाब से हम तुझसे भी बहुत प्यार करते हैं! तेरी तरफदारी करना हक़ है हमारा आखिर शादी के बाद तू हमारी बेटी बन गई ना? उसी तरह मानु तेरे पिताजी का बेटा बन गया.... अब अगर उसकी वजह से तुझे कुछ तकलीफ हो जाती तो हम दोनों (सासु माँ और ससुर जी) उसका जीना बेहाल कर देते| और फिर तेरी कोई गलती नहीं है..... हाँ मैं समझ सकती हूँ की नेहा तुझसे नाराज है पर उसकी नाराजगी उसके पापा के ठीक होने पर खत्म हो जायेगी| तू चिंता मत कर...हिम्मत बांधे रख और ये हमेशा याद रख की इस वक़्त तू ही वो 'खूँटा' है जिससे ये पूरा परिवार बंधा है| अगर तू ने ही हार मान ली तो यहाँ कौन है जो इस समय में आगे आएगा| इन बूढी हड्डियों में अब हिम्मत नहीं की वो बेटे के साथ बहु को भी तकलीफ में देखे|
एक तू ही है जो बच्चों को संभाल रही है| आयुष तो अभी बहुत छोटा है और नेहा से तर्क करने की ताकत सिर्फ तुझ में है| मैं उससे बात करुँगी... तू फ़िक्र ना कर|"
माँ ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी पर मेरा दिल आज बहुत बेचैन था! माँ के सामने तो मैंने जैसे-तैसे खुद को रोक लिया पर माँ के जाने के बाद मेरे आँसूं फिर बहने लगी... मैं इनके सामने बैठ गई और इनका हाथ अपने हाथों में ले कर इनसे बात करने लगी; "आप क्यों मुझ पर इतना गुस्सा निकाल रहे हो? इतना ही गुस्सा है तो मेरी जान ले लो! पर इस तरह मुझ पर जुल्म तो मत करो! इतना प्यार करते हो मुझसे ...फिर इतनी नाराजगी क्यों? एक बार बस एक बार अपनी आँखें खोल दो... प्लीज ....i beg of you ..... !!! प्लीज .....i promise .... i promise मैं आज के बाद आपसे कभी नाराज नहीं हूँगी! कभी आपसे बात करना बंद नहीं करुँगी! प्लीज.... मन जाओ.... अच्छा मेरे लिए ना सही तो अपनी बेटी नेहा के लिए....आयुष के लिए ....प्लीज..... जानते हो नेहा ने प्रण किया है की वो कभी शादी नहीं करेगी! मेरे कारन सात साल....उसे आपका प्यार नहीं मिल पाया! कम से कम उसके लिए ही ..............." पर मेरी कही किसी भी आत का उन पर (मेरे पति) कोई असर नहीं पड़ा| वो अब भी उसी तरह मूक लेटे हुए थे! सारी रात मैं बस रोती रही ... बिलखती रही.... और सच पूछो तो उस वक़्त मुझे एहसास हुआ की मेरी आँख से गिरे एक कतरे आँसूं को देख ये इतने परेशान हो जाय करते थे की घर-भर अपने सर पर उठा लिया करते थे... और आज मैं यहाँ बिलख-बिलख के रो रही हूँ ... इनसे मिन्नतें कर रही हूँ की आप वापस आ जाओ.... मेरे आँसुओं की क्या कीमत थी, उस दिन मुझे ज्ञात हुआ! उस रात शायद भगवान को मुझ पर तरस आ गया हो...या फिर ये कहें की उन्होंने नेहा की दुआ कबूल कर ली और....................
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01-04-2019, 01:48 AM,
#70
RE: Sex Hindi Kahani एक अनोखा बंधन
डॉक्टर सुरेंदर ने कहा की वो डायरेक्ट बैंगलोर मिलेंगे और अनिल भी उन्हें सीधा बैंगलोर ही मिलने वाला था| उन्होंने मुझे एक Link मेल किया था… मैंने सोचा की एक बार मैं भी बात कर लूँ! तो मैंने उन्हें फोन मिलाया;
"हेलो सुरेंदर जी बोल रहे हैं!"
"हाँ जी बोल रहा हूँ... आप कौन?"
"जी मैं संगीता.... अनिल की बहन|"
"ओह्ह...जी नमस्ते|"
"सुरेंदर जी अम्म्म.. मुझे आपसे कुछ पूछना था... actually आपने जिस हॉस्पिटल के बारे में बताया वो बैंगलोर में है| क्या यहाँ दिल्ली में कोई हॉस्पिटल नहीं?"
"संगीता जी... दरअसल हमारे doctor's journal में ये article आया था| मेरा एक दोस्त है जो बैंगलोर में रहता है| दिल्ली में मेरा कोई contact नहीं है... still i'll try my best .... meanwhile हम बंगलोरे में एक बार हॉस्पिटल चेक कर लेते हैं|
"जी.... and thank you .... very much!"
"अरे संगीता जी थैंक यू कैसा.... आप अनिल की दीदी हैं तो मेरी भी दीदी जैसी हुई ना| you don't worry."
मेरी सुरेंदर जी से बात हुई तो मन को थोड़ी तसल्ली हुई|
अब आगे.........
एक उम्मीद जिसके सहारे इस जीवन की नैय्या पार हो सकती थी! जैसे ही मैं मुड़ी तो पीछे मेरी 'माँ' नेहा खड़ी थी! वो एक डीएम से बोल पड़ी; "हुँह... आप... पापा अगर आपकी जगह झोटे तो आपको ठीक करने के लिए करोड़ों रूपए फूँक देते! और आप... आपको तो पैसे बचाने हैं! इतने पैसे बचा के करोगे क्या?" ये सब उसने मुझे टोंट मरते हुए कहा|
"बेटा ऐसा नहीं है, मैं तो......." मेरे आगे कुछ कहने से पहले ही 'मेरी माँ' ने अपना 'फरमान' सुना दिया!
"मुझे सब पता है..... आप .... ये प्यार मोहब्बत... ये सब बस दिखावा है... और कुछ नहीं| जो लोग प्यार में पड़ते हैं उनका हाल पापा जैसा होता है| खेर मैं आपको कुछ बताने आई थी| मैंने decide किया है की मैं कभी शादी नहीं करुँगी!"
"बेटा....ये तू क्या कह रही है!" मैंने उसे समझाना चाहा पर अभी उसकी बात पूरी नहीं हुई थी|
"मैं ता उम्र पापा की सेवा करुँगी! कभी शादी नहीं करुँगी! ये प्यार-व्यार कुछ नहीं होता.... वैसे भी मुझे आपकी वजह से पापा का प्यार तो मिला नहीं.... बची हुई जिंदगी मैं पापा के साथ ही गुजरूँगी|" आगे कुछ कहने से पहले माँ (सासु माँ) आ गईं| म्हे लगा की वो अपना ये 'फैसला' माँ को भी सुनाएगी पर शायद उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी| उसने topic चेंज करते हुए कहा; "दादी जी... मामू आ गए?" माँ ने उसे कहा की अनिल नीचे उसका इन्तेजार कर रहा है| नेहा बिना आगे कुछ कहे नीचे भाग गई!
अपनी बेटी की मुंह से ये सब सुन कर मैं टूट गई.... अब तक उसने मुझे दोषी ही बनाया था और आज तो उसने मुझे सजा ही सुना दी| मैं फूट-फूट के रोने लगी.... माँ को कुछ समझ नहीं आया तो वो मुझे चुप कराने लगीं| मैंने रो-रो कर माँ से अपनी बात कही; "माँ..... अब.....अब जान नहीं बची मुझ में....टूट चुकी हूँ! मैं... मेरी किस्मत ऐसी है! ना तो मैं एक अच्छी बेटी साबित हो सकी और ना ही अच्छी पत्नी! ........... और अब तो मैं एक अच्छी माँ भी साबित नहीं हो सकी! मैं....बहुत अभागी हूँ...... ऐसा ...ऐसा देवता जैसा पति मिला और मैंने उसकी कदर तक ना की! इन्होने हर कदम पर मेरे साथ चलना चाहा और मैं इनके साथ चलने से कतराती रही|माँ..... आप लोग क्यों मेरी तरफदारी करते हैं.....मैं इस लायक ही नहीं! सच कहते हैं पिताजी मुझे मर ही जाना चाहिए था! इस हँसते-खेलते परिवार को मेरी ही नजर लग गई माँ...... मेरी बुरी किस्मत इस घर को ही निगल ना जाए....प्लीज माँ .... मुझे .... मुझे थोड़ा सा जहर ला दो.... मुझे मरने दो.... मैं ... " आगे कुछ कहने से माँ ने मुझे रोक दिया और मेरे आँसूं पोछते हुए बोलीं; "बेटी..... हम सब मानु से बहुत प्यार करते हैं ओ मानु तुझसे बहुत प्यार करता है तो इस हिसाब से हम तुझसे भी बहुत प्यार करते हैं! तेरी तरफदारी करना हक़ है हमारा आखिर शादी के बाद तू हमारी बेटी बन गई ना? उसी तरह मानु तेरे पिताजी का बेटा बन गया.... अब अगर उसकी वजह से तुझे कुछ तकलीफ हो जाती तो हम दोनों (सासु माँ और ससुर जी) उसका जीना बेहाल कर देते| और फिर तेरी कोई गलती नहीं है..... हाँ मैं समझ सकती हूँ की नेहा तुझसे नाराज है पर उसकी नाराजगी उसके पापा के ठीक होने पर खत्म हो जायेगी| तू चिंता मत कर...हिम्मत बांधे रख और ये हमेशा याद रख की इस वक़्त तू ही वो 'खूँटा' है जिससे ये पूरा परिवार बंधा है| अगर तू ने ही हार मान ली तो यहाँ कौन है जो इस समय में आगे आएगा| इन बूढी हड्डियों में अब हिम्मत नहीं की वो बेटे के साथ बहु को भी तकलीफ में देखे|
एक तू ही है जो बच्चों को संभाल रही है| आयुष तो अभी बहुत छोटा है और नेहा से तर्क करने की ताकत सिर्फ तुझ में है| मैं उससे बात करुँगी... तू फ़िक्र ना कर|"
माँ ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी पर मेरा दिल आज बहुत बेचैन था! माँ के सामने तो मैंने जैसे-तैसे खुद को रोक लिया पर माँ के जाने के बाद मेरे आँसूं फिर बहने लगी... मैं इनके सामने बैठ गई और इनका हाथ अपने हाथों में ले कर इनसे बात करने लगी; "आप क्यों मुझ पर इतना गुस्सा निकाल रहे हो? इतना ही गुस्सा है तो मेरी जान ले लो! पर इस तरह मुझ पर जुल्म तो मत करो! इतना प्यार करते हो मुझसे ...फिर इतनी नाराजगी क्यों? एक बार बस एक बार अपनी आँखें खोल दो... प्लीज ....i beg of you ..... !!! प्लीज .....i promise .... i promise मैं आज के बाद आपसे कभी नाराज नहीं हूँगी! कभी आपसे बात करना बंद नहीं करुँगी! प्लीज.... मन जाओ.... अच्छा मेरे लिए ना सही तो अपनी बेटी नेहा के लिए....आयुष के लिए ....प्लीज..... जानते हो नेहा ने प्रण किया है की वो कभी शादी नहीं करेगी! मेरे कारन सात साल....उसे आपका प्यार नहीं मिल पाया! कम से कम उसके लिए ही ..............." पर मेरी कही किसी भी आत का उन पर (मेरे पति) कोई असर नहीं पड़ा| वो अब भी उसी तरह मूक लेटे हुए थे! सारी रात मैं बस रोती रही ... बिलखती रही.... और सच पूछो तो उस वक़्त मुझे एहसास हुआ की मेरी आँख से गिरे एक कतरे आँसूं को देख ये इतने परेशान हो जाय करते थे की घर-भर अपने सर पर उठा लिया करते थे... और आज मैं यहाँ बिलख-बिलख के रो रही हूँ ... इनसे मिन्नतें कर रही हूँ की आप वापस आ जाओ.... मेरे आँसुओं की क्या कीमत थी, उस दिन मुझे ज्ञात हुआ! उस रात शायद भगवान को मुझ पर तरस आ गया हो...या फिर ये कहें की उन्होंने नेहा की दुआ कबूल कर ली और....................
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