RajSharma Stories आई लव यू
9 hours ago,
#1
RajSharma Stories आई लव यू
आई लव यू /कुलदीप राघव

अप्रैल का महीना शुरू हो चुका था। दिल्ली की गर्मी अपने तेवर दिखा रही थी। जैसे जैसे दिन चढ़ता, गर्मी तेज होने लगती, इसलिए सुबह जल्दी ऑफिस चले जाना और शाम को देर तक ऑफिस में बैठे रहने का रूटीन बना लिया था। ऑफिस में एसी की ठंडक अब सुकून देने लगी थी।
ऑफिस से लौटकर कमरे पर पहुँचा ही था, कि पापा का फोन आ गया था।

"हलो पापा, कैसे हो आप!" ।

"हम अच्छे हैं जनाब, आप कैसे हैं।"

“मैं भी अच्छा हूँ और अभी ऑफिस से आया हूँ।"

"तो, कल तो संडे है, आओगे न इस बार घर?"

"हाँ पापा, रात में ही तीन बजे निकलूंगा।"

"ठीक है,आओ; चलते ही फोन करना।"

ऑफिस की छुट्टी थी। तीन महीने बाद पहली बार मैं अपने घर ऋषिकेश के लिए निकला था। शीतल जब से मिली थी, तब से मैं घर ही नहीं गया था। जब भी घर जाने की बात करता था, तो शीतल का चेहरा उदास हो जाता था और उन्हें परेशान करके मैं कभी खुश नहीं रह सकता था। तीन महीने से घर पर पापा, मम्मी, छोटा भाई और बहन इंतजार कर रहे थे मेरे आने का, पर मैं हर संडे किसी न किसी काम का बहाना लगा देता था... यही वजह थी कि पिछले महीने होली पर भी मैं ऋषिकेश नहीं गया था।

सुबह के तीन बज रहे थे। कश्मीरी गेट से ऋषिकेश के लिए बॉल्वो में बैठ चुका था, तभी शीतल का फोन आया।

“कहाँ हो राज?"

"कश्मीरी गेट, बॉल्बो में; पर ये बताओ, अभी एक घंटे पहले ही तो मैंने मुलाया था तुमको... मना किया था कॉल मत करना, आराम से सोना, मैं दिन निकलने पर कॉल करुंगा।"

___“यार तुम जा रहे हो, वो भी दो दिन के लिए: मुझे बहुत डर लग रहा है... कैसे रहूँगी तुम्हारे बिना?"- शीतल ये बोलते-बोलते रोने लगी थी।।

"शीतल..शीतल...प्लीज! रोना बंद करो यार।"

“राज, प्लीज मत जाओ न यार, प्लीज वापस आ जाओ मेरे पास, प्लीज वापस आ जाओ।" - शीतल ये कहते-कहते रोए जा रही थीं। उनके आँसू नहीं थम रहे थे। मने उन्हें खूब समझाया। “मैं जल्दी आऊँगा शीतल, बच्चों की तरह ज़िद क्यों कर रहे हो। रोना बंद करो।"

“ठीक है, नहीं रोऊँगी; पर वादा करो, मुझे कॉल करते रहोगे और हर पल मुझसे बात करोगे।"

"ओके... प्रॉमिस; अब बिलकुल चुप हो जाओ और आराम से सो जाओ, मेरी बस चलने वाली है।"

"हम्म... अपना ध्यान रखना।"

"हाँ और तुम भी ध्यान रखना अपना; आई लव यू।"

"लब यू टू... आई बिल मिस यू माई डियर।" - शीतल ने इतना बोलते ही फोन रख दिया।
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9 hours ago,
#2
RE: RajSharma Stories आई लव यू
जैसे-जैसे बस दिल्ली को छोड़ती जा रही थी, वैसे-वैसे शीतल का खयाल बढ़ता जा रहा था। उनसे पहली बार दर जा रहा था। अब तक हर एक दिन उनसे ही शुरू होता था और उन पर ही खत्म होता था... लेकिन आज ये पहला दिन था, जो उनकी आँखों में आए आँसुओं से शुरू हुआ था।
यहाँ मेरे जाने से शीतल जितना परेशान थी, उतनी ही खुशी ऋषिकेश में मेरे आने की थी।

दिल्ली से बस निकली ही थी और पापा ने फोन कर दिया था।

"हाँ बेटा, निकले?"- पापा ने फोन पर बोला।

"हाँ पापा, निकल चुका हूँ; गाजियाबाद पार कर चुकी है वॉल्वो।"

"चलो,अपना ध्यान रखना।"

गाजियाबाद से आगे बढ़ते ही शीतल के बारे में सोचते-सोचते मेरी आँख लग गई थी। मेरठ से आगे एक ढाबे पर बस रुकी हुई थी। बस के शीशे के बाहर छाया रात का अँधेरा छैट चुका था। सूरज निकलने को बेताब था।


ओ हलो... मिस्टर..."- बराबर बाली सीट पर बैठी एक लड़की ने मुझे उठाने की कोशिश की थी।

मैंने अपनी भारी आँखों को खोलने की कोशिश की, तो देखा कि साथ वाली सीट पर बैठी एक 23-24 साल की बहुत खूबसूरत लड़की मेरी तरफ देखकर मुस्करा रही है।

'गुड मानिंग!'- उसने कहा।

'गुड मार्निग'

"बस रुकी हुई है, सब लोग नीचे टी-ब्रेकफास्ट ले रहे हैं; तुम नहीं चलोगे?"

"चलता हूँ यार, आई रियली वांट ए टी।"

वो मेरे साथ ही बस से उतरी थी। मैं मुंह धोकर वॉशरूम से बापस आया, तब तक उसने कॉफी ऑर्डर कर दी थी।

"आई एम राज एंड थेंक्स मुझे उठाने के लिए।"

__ “माई मेल्फ डॉली एंड इट्स ओके: तुम सो रहे थे, मुझे लगा जगा देना चाहिए: बैसे ऋषिकेश जा रहे हो या हरिद्वार?"

"आय एम गोइंग टू ऋषिकेश।"- उसके सवाल का जवाब देते हुए मैंने शीतल को मैसेज कर दिया था कि मैं मेरठ पहुंच चुका हूँ।

"ओके... यू आर फ्रॉम दिल्ली और ऋषिकेश?"- यह उसका अगला सवाल था।

"आय एम फ्रॉम ऋषिकेश एंड बकिंग इन दिल्ली। एंड बॉट अबाउट यू?"

इतने में ही शीतल का मैसेज आ गया था- "ओके, टेक केयर... घर पहुँचकर मुझे तुरंत कॉल करना, आई रियली बांट टू टॉक टू यू।"

“आई एम फ्रॉम दिल्ली; ऋषिकेश में मेरी मौसी रहती हैं, सो वीकेंड पर जा रही हूँ।" - डॉली ने मुस्कराते हुए बताया।
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9 hours ago,
#3
RE: RajSharma Stories आई लव यू
"ओह! अच्छा... दिल्ली में कहाँ से?"

"मयूर बिहार।"

-
"ओह, गुड; मैं भी वहीं रहता हूँ।"

"कहाँ, मयूर विहार में?"

'हाँ।'

"दैदम गरेट।"

"और तुम्हारा ऑफिस...?"

“सेक्टर-18 नोएडा।"

बस चलने का अनाउंसमेंट हो गया था। सब लोग बस में बैठ रहे थे। डॉली, सामने बाली सीट पर पैर रखकर बोफिकर अंदाज में बैठी थी। उसे देखकर मुझे लगा, जैसे उसका चलने का मन नहीं है।

"डॉली, चलें?"

"ओह हाँ, चलो-चलो।" उसने तुरंत अपनी स्लीपर पहनी और हम दोनों बम की तरफ बढ़ गए।

"क्या मैं विंडो की तरफ बैठ जाऊँ?"- डॉली ने बस के अंदर पूछा।

"हाँ, बैठ जाओ।"

'थॅंक्स । - उसने मुस्कराते हुए कहा और विंडो सीट पर बैठ गई।

"इट्स ओके डॉली।'

"तो अब मुझे इयरफोन बैग में रख देना चाहिए न?"

'क्यों ?'

"अब तो तुम मिल गए हो न, रास्ते भर बातें करते चलेंगे न।”

"हाँ,श्योर।" अभी तक डॉली को मैं जितना समझ पाया था, उसके हिसाब से वो बहुत ही बोल्ड और बिंदास लड़की थी, जो अपने हर पल को खुशी से जीना चाहती थी। अनजान लोगों से भी हाथ आगे बढ़ाकर दोस्ती कर लेना उसे पसंद था। हाँ, समझदार थी और सही-गलत में फर्क समझती थी।

बस, मेरठ से आगे बढ़ चली थी। डॉली और मेरी बातें शुरू हो चुकी थीं। कितना हँसती थी वो बात करते-करते।

"तो कब से हो दिल्ली में?" - उसने पूछा।

"चार साल से।"

“कहाँ जॉब करते हो तुम?"

“मैं एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी में असिस्टेंट मैनेजर हूँ; हम लोग पॉलिटिकल और एंटरटेनमेंट की इवेंट ऑर्गेनाइज करते हैं।"

"ओके, कूल।"

"वैसे तुम क्या करती हो?"

“मैंने फैशन डिजाइनिंग से पोस्ट ग्रेजुएशन किया है और अभी दो महीने पहले ही मेरी जॉब लगी है; आई एम बकिंग एज ए कॉस्ट्यूम डिजाइनर इन कनॉट प्लेस।"
"वाह...गुड! और तुम्हारी फैमिली?"
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9 hours ago,
#4
RE: RajSharma Stories आई लव यू
"मेरी फैमिली में पापा हैं, मम्मी हैं और एक छोटा भाई है: हम लोग बचपन से दिल्ली में ही रहते हैं। पापा बैंक में सीनियर मैनेजर हैं और मम्मी हाउस वाइफ हैं; भाई, दिल्ली यूनिवर्सिटी से बी कॉम. की पढ़ाई कर रहा है।"

"ओके...गुड।"

"और तुम्हारी फैमिली में कौन-कौन हैं?"

“पापा, मम्मी, मैं, छोटा भाई और बहन।"

'ओके।'

एक-दूसरे की फेमिली, जॉब और इधर-उधर की बात करते-करते कब हमारी बस हरिद्वार पहुँच गई, पता ही नहीं चला। मुझे घर के पास पहुँचने की खुशी थी, तो डॉली को अपनी मौसी से मिलने का उत्साह था। इसके साथ एक और खुशी हम दोनों को थी... ये खुशी थी एक दोस्त को पाने की खुशी। मुझे डॉली के रूप में एक अच्छी दोस्त मिल गई थी।

"तो घर पर सब बहुत खुश होंगेन?"- डॉली ने पूछा।

"हाँ, बहुत: तीन महीने बाद आया हूँ घर।"

"गुड । मैं भी पाँच महीने पहले आई थी। पैरेंट्स भी आए थे और हम लोगों ने रॉफ्टिंग की थी, खूब मजा आया था; नीलकंठ दर्शन के लिए भी गए थे हम लोग।"

"ओके कूल।"

"तो वापस कब जाओगे तुम?"

“मैं दो दिन रहूँगा, संडे और मंडे; टयूज्डे मॉनिंग में वापस।"

"ओके..

. मैं भी दो दिन रहेंगी और टयूज्डे को निकलूंगी; ऑफिस है टयूमडे को। तो फिर ऐसा करते हैं, अगर कोई प्रॉब्लम न हो, तो हम साथ वापस जा सकते हैं, अच्छा रहेगा ना? खूब बातें करेंगे।"- उसने मेरी तरफ मुड़ते हुए पूछा।

"कोई प्रॉब्लम नहीं है, पर मैं सुबह जल्दी निकलूंगा।"

"मुझे भी जल्दी निकलना है; ऑफिस पहुँचना है न 11 बजे।"

"ओके, तब फिर साथ ही चलेंगे।"

“मजा आएगा सच में..

. तो तुम्हारा मोबाइल नंबर..

. फोन से टच में रहेंगे न।"

सुबह के 10 बजे थे और बस ऋषिकेश बस स्टैंड पहुँच चुकी थी। सब लोग अपना सामान उतारने लगे थे। हम दोनों भी सीट से खड़े हो चुके थे और लगेज उतारने लगे थे।

"डॉली, ये मेरा कार्ड है; प्लीज मेरे नंबर पर एक मिस्ड कॉल दे देना।"

"ओके...3क्स।"

"तो डॉली, कहाँ है तुम्हारी मौसी का घर?"

"डॉक्टर कॉलोनी।"

“अच्छा..मेरे घर के पास ही है, मैं ड्रॉप कर देता हूँ तुम्हें।"

“ओके...नो प्रॉब्लम।"

"ऑटो..ऑटो! रेलवे रोड चलोगे?"

"बैठिए सर।" मैं और डॉली ऑटो में बैठ गए थे।
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9 hours ago,
#5
RE: RajSharma Stories आई लव यू
"भइया, डॉक्टर कॉलोनी होते हुए रेलवे रोड चलना।”- मैंने ऑटो वाले से कहा।

“ओके सर।"

"अच्छा डॉली, पूरे सफर की सबसे अच्छी बात क्या रही?"

"बेशक, तुमसे मिलना।"

"ओह ! सच?"

"हाँ, बिलकुल।"

"मेरे लिए भी; वरना सोते-सोते ऋषिकेश तक आता।"

"बस भइया, इधर ही रोक देना।"-डॉली ने ऑटो वाले से कहा।

डॉली की मौसी का घर आ चुका था। “राज, मेरा घर आ गया है; आओ अंदर, मौसी की फेमिली से मिलना।"

"नहीं डॉली, घर पर सब इंतजार कर रहे हैं। तुम्हारे सामने कितनी बार पापा फोन आ गया था न... फिर कभी आऊँगा।" __

_“ओके...बॉय...टयूज्डे को मिलते हैं और मैसेज किया है तुम्हें अपना नंबर।"- यह कहकर डॉली ऑटो से उतर गई थी।

"ओके...थॅंक्स...टेक केयर।"

डॉली बॉय करते हुए घर में जा रही थी और ऑटो चल पड़ा था। एक बार मैंने मुड़कर पीछे ज़रूर देखा था उसे। अब, बस घर पहुँचने की बेसब्री थी बस।

डॉक्टर कॉलोनी से बाहर निकलकर ऑटो, रेलवे रोड पर दौड़ रहा था। मेरी नजर ऑटो से बाहर घर की तरफ ही लगी हुई थी। ऑटो में बैठे हुए ही पचास रुपये निकाले और ऑटो बाले भइया को दे दिए।

"बस भइया, साइड में ही रोक देना।" फटाफट लगेज ले के उत्तरा, तो सामने पापा-मम्मी खड़े थे। बैग बाहर सड़क पर रखकर पापा और मम्मी के गले से लिपट गया। भाई और बहन दौड़कर अंदर से आए और लिपट गए मुझसे।

“कितना कमजोर हो गया है राज!''- मम्मी ने कहा।

“कहाँ माँ, ठीक तो हूँ, आप हर बार यही कहती हैं।"

"नहीं, फिट लग रहा है, तुम भी न; चलो बढ़िया नाश्ता बनाओ सबके लिए।"-

पापा -"हाँ, कपड़े चेंज करने दो इसे; चल तू फ्रेश हो जा।

"हाँ, मैं नहा लेता हूँ।"

"हलो! शीतल...मैं पहुँच गया हूँ।"- सेकेंड फ्लोर पर अपने कमरे में जाकर मैंने शीतल को फोन मिलाया।

“राज...कब से वेट कर रही हूँ तुम्हारे फोन का... अब फोन कर रहे हो।"- उसने नाराजगी में कहा था।

“सॉरी बेबी डॉल...बस से उतरने पर लगेज था साथ में, तो घर आके ही कर पाया कॉल।"

"इटम ओके...कैसे हैं घर पर सब?"

“सब बहुत अच्छे हैं और बहुत खुश हैं।"

"ओके...तो क्या कर रहे हो?"

“मैं अभी नहाने जा रहा है, फिर नाश्ता।"

"ठीक है, फ्रोश हो जाओ, फिर आराम से बात करना।"

"ओके...अपना ध्यान रखना, आई लब यू।"

"तुम भी ध्यान रखना; आई लव यू टू।"- यह कहकर शीतल ने फोन रख दिया और मैं नहाने के लिए बाथरूम में चला गया।

नहाकर मैंने सफेद रंग का लीनेन का कुर्ता-पजामा पहना था। लीनेन मेरा पसंदीदा फैविक है और शीतल का भी... उसे भी लीनन के कुर्ते और ट्राउजर खूब पसंद थे।
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9 hours ago,
#6
RE: RajSharma Stories आई लव यू
पापा, छोटे भाई-बहन के साथ मैं ड्रॉइंग रूम में बैठकर माँ के हाथ की बनी दाल की कचौड़ियों का आनंद ले रहा था। सब लोग इतने दिनों बाद एक साथ बैठकर नाश्ता कर रहे थे। पापा और भाई-बहन दिल्ली के हालचाल पूछ रहे थे और मैं उनसे ऋषिकेश के हवा-पानी के बारे में बात कर रहा था। खूब ठहाके लग रहे थे। सबके चेहरे पर गजब की खुशी थी।

"बेटा, खाने-पीने का ध्यान रखा करो अपना, कमजोर लग रहे हो"- माँ ने कहा।

"अरे क्या मम्मी, सब ठीक तो है।"

“कहाँ ठीक है; ध्यान रखा करो।"

"अरे, तुम रहने दो; अब तुम्हारी बहू आएगी, वो ही इसका ध्यान रखेगी।'- पापा ने माँ से कहा।

"क्या पापा, आप भी, हर वक्त शादी-शादी... हो जाएगी शादी, इतनी जल्दी क्या है?"

"देखो बेटा, अभी सही उम्र है तुम्हारी शादी के लिए हमने कुछ लड़कियां देखी हैं, तस्वीरें तुम भी देख लो।"

“पापा मुझे अभी शादी-बादी नहीं करनी है; मैं अभी अपना कॅरियर सेट कर रहा हूँ, थोड़ा वक्त चाहिए।"

"देना जरा वो तस्वीरे!''- पापा ने माँ से एक लिफाफे की तरफ इशारा करते हुए कहा। "ये लो... कुछ लड़कियों की तस्वीरें हैं, देख लो हम लोगों को यह पसंद हैं।"

“रख दीजिए, देख लूँगा मैं... माँ बहुत भूख लगी है, खाना बनाइये प्लीज।”

"हाँ, अब खाना-पीना खाओ, ये बातें बाद में करना।"

- माँ।

"देखो बेटा, हम तुम्हारे बारे में अच्छा ही सोचेंगे... जैसा हम कर रहे हैं उसे मानो।" पापा ने कहा।

“पापा, बाद में बात करते हैं इस बारे में।"

माँ रसोई में खाना बना रही थीं। पापा और बाकी लोग ड्रॉइंग रूम में बैठे थे। मैं सबके बीच से उठकर अपने फोन के साथ ऊपर अपने कमरे में आ गया था। मुझे पता था कि घर जाऊँगा तो शादी की बात आएगी ही। पापा और माँ अब तक पचास से ज्यादा लड़कियों की तस्वीर दिखा चुके थे। मैं हर बार कोई-न-कोई कमी निकालकर सबके लिए मना कर देता था। डरता था मैं ऐसी शादी से, जहाँ लड़की को जानता भी नहीं हैं। दूसरी तरफ शीतल का खयाल मन में आता था। जानता था, शीतल से शादी नहीं हो सकती है, फिर भी मैं उसे धोखा देना नहीं चाहता था। ___ मैं शीतल के सामने जब भी अपनी शादी की बात करता, हमेशा उसका चेहरा उतर जाता था। वो हमेशा कहती थी... इतनी जल्दी क्या है तुम्हें शादी की, अभी तो बच्चे हो तुम; आराम से करना शादी।

कमरे में पहुँचा ही था, कि शीतल की कॉल फिर से आ गई थी। "हैलो, कैसे हो? क्या हो रहा है घर पर?"- उसने फोन उठाते ही पूछा।

"कुछ नहीं शीतल, बहुत मूड खराब है।"

"अरे! क्या हुआ माई हीरो।"

"कुछ नहीं यार...वही शादी,शादी, शादी...।"

"क्या? शादी! यार राज, मजाक मत करो।"

“मजाक नहीं कर रहा हूँ शीतल, सच कह रहा हूँ; सब लोग शादी की ही बात कर रहे है।"-

"राज, तुम जानते हो न, जिस दिन तुम शादी कर लोगे, उस दिन से हम एक-दूसरे की जिंदगी में नहीं होंगे और मैं इतनी जल्दी तुम्हें खोना नहीं चाहती हूँ।"

"शीतल, मैं बहुत प्यार करता हूँ तुमसे और तुम भी मुझसे बहुत प्यार करती हो; पर मैं क्या करूँ यार, मेरी कुछ समझ में नहीं आ रहा है।"- मैंने कहा।

“राज, प्लीज वापस आ जाओ यार, मैं बहुत मिस कर रही हूँ तुम्हें।"

“आऊँगा कल के बाद। चलो, माँ खाना बना रही हैं, मैं जा रहा हूँ नीचे; तुम अपना ध्यान रखना और परेशान मत होना।"

“ओके... तुम भी अपना ध्यान रखना और जल्दी आना।"- उसने इतना कहकर फोन रख दिया।

मैं भी फोन साइड में रखकर बेड पर आँखें बंद कर लेट गया। दिमाग में बस शीतल की तस्वीर थी। दिल भी उसके अलावा कुछ और न सोच पा रहा था और न ही कुछ सोचना चाहता था। घर पहुँचे हुए अभी चार घंटे ही हुए थे, लेकिन मेरा मन कर रहा था कि भाग चलूँ दिल्ली वापस।

"बेटा, नीचे आओ, खाना तैयार है!''- माँ ने आवाज दी।

"आ रहा हूँ माँ।"- मैंने ऊपर से ही कह दिया। नीचे पहुँचा, तो सब टेबल पर मेरा इंतजार कर रहे थे। मैं भी बैठ गया। माँ ने पूरी, भिंडी की सब्जी, मटर-पनीर, रायता और जीरे वाले चावल बनाए थे। बहुत जोर से भूख लगी थी। मैं बिना किसी से बात किए चुपचाप खाना खा रहा था। माँ की बातों का जवाब जरूर दे रहा था। पापा समझ रहे थे कि मैं क्यों बात नहीं कर रहा हूँ, इसलिए बीच-बीच में वो मुझे समझाने की कोशिश कर रहे थे। मैं बस उनकी बातें सुन रहा था। __
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9 hours ago,
#7
RE: RajSharma Stories आई लव यू
“राज, तेरे सारे दोस्तों की शादी हो गई है और अब रोज शादी वाले आ रहे हैं... आस-पास के लोग भी कहने लगे हैं कि शादी कर लो अब राज की।"- माँ ने कहा।

"अरे माँ, सब टाइम पर होगा न, जल्दबाजी क्यों करनी।"

"हम जल्दबाजी नहीं कर रहे हैं, पर अब कर लेनी चाहिए शादी। अच्छा तुम ही बताओ, कैसी लड़की चाहिए तुम्हें?"- पापा ने कहा।

"पापा, लड़की अच्छी हो बस ... जो आप लोग तस्वीर दिखा रहे हैं उनमें से कोई पसंद नहीं है मुझे।"

"तो इन सबको मना कर दें?''- पापा ने बाने की प्लेट छोड़कर मेरी तरफ देखा और पूछा।

"हाँ, फिलहाल तो आप मना ही कर दीजिए।"

"ठीक है, हम मना कर देंगे; अब तुम ही कर लेना शादी फिर।"- ये कहकर पापा गुस्से में अपने कमर में चले गए।

पापा कई बार पूछ चुके थे कि अगर कोई लड़की तुम्हें पसंद है तो बताओ; लेकिन मैं उन्हें कैसे बता सकता था कि जिस लड़की को मैं पसंद करता हूँ, उसकी एक पाँच साल की बेटी है। मेरे परिवार के लोग इस रिश्ते को किसी कीमत पर मानने वाले नहीं थे। हाँ, मैं मनाने की कोशिश कर सकता था, लेकिन हम दोनों भी तो एक-दूसरे से शादी करने के लिए तैयार नहीं थे।

शीतल तो हमेशा कहती थीं कि तुम छोटे हो मुझसे और मैं एक बेटी की माँ भी हैं, ऐसे में कोई क्या कहेगा... लोग मुझसे कहेंगे कि राज तो छोटा था, पर तुम तो समझदार थी...उसकी जिंदगी क्यों बर्बाद की?

खैर, अभी दिमाग नहीं चल रहा था। वाना हो चुका था। कुछ देर वहीं बैठकर माँ से और छोटे भाई-बहन से इधर-उधर और पढ़ाई-लिखाई की बातें की। इसके बाद मैं अपने कमरे में जाकर सो गया।

शाम के पांच बज चुके थे। मां ने कमरे का दरवाजा खटखटाया। चाय के लिए बुला रही थीं माँ। मैं नहाकर नीचे पहुंचा और सबके साथ बैठकर चाय पी। इस बीच किसी ने भी शादी की कोई बात नहीं की। ___ भाई-बहन ने घूमने का प्लान बना रखा था, तो शाम उनके साथ बितानी थी। हम लोग चाय के बाद घूमने निकले। पहले परमार्थ-निकेतन घूमे... फिर लक्ष्मण झूला से मछलियों को दाना खिलाया। भाई-बहन के साथ गोलगप्पे और आलू टिक्की खाकर मैं मारी टेंशन भूल गया।

इस बीच एक पावभाजी की दुकान पर नजर पड़ी, तो मैंने उन लोगों से पूछा "पावभाजी खाओगे?" "हाँ भाई, खाएंगे।" पावभाजी शीतल को बेहद पसंद थी। शायद यही वजह थी कि मैंने उन दोनों को पावभाजी के लिए बोला था। पावभाजी खाते-खाते शीतल के साथ हल्दीराम में पावभाजी खाने वाले पल ताजा हो गए थे। जब भी मैं उसे सुबह घर से रिसीव करता था, या शाम को घर छोड़ता था, तो उसे वहीं पावभाजी खिलाता था। हाँ, कभी-कभी छोले-भटूरे भी खाते थे।
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9 hours ago,
#8
RE: RajSharma Stories आई लव यू
गंगा किनारे पत्थरों पर बैठे-बैठे, कब रात के दस बज गए, पता ही नहीं चला। इस बीच शीतल दो बार कॉल कर चुकी थी। पावभाजी की प्लेट हाथ में लेते ही उसका कॉल आ गया था और अब फोन आया था, ये पूछने के लिए कि घर पहुँचे या नहीं। यही पूछने के लिए पापा भी फोन कर चुके थे। अब हम लोग निकल चुके थे घर के लिए।

हम लोग घर पहुंचे, तो माँ-पापा खाना खा रहे थे। हम लोग साथ बैठकर अपने सैर सपाटे के बारे में उन्हें बताने लगे। खाने के बाद पापा टीवी देखने ड्राइंग रूम में चले गए और मैं और माँ वहीं बैठकर बातें करने लगे।

माँ की बातों में भी समझाने का भाव झलक रहा था। मैं भी ऐसा नहीं था कि शादी करना ही नहीं चाहता था... बस इस वक्त शादी की बात मुझे परेशान कर रही थी। माँ की बातों को समझकर उन्हें विश्वास दिलाया कि ऐसा कुछ नहीं है, शादी कर लूंगा।

इसके बाद मैं अपने कमरे में चला गया। घर की सभी लाइटें बंद हो चुकी थीं। सब लोग अपने-अपने कमरे में जा चुके थे। कपड़े बदलकर बिस्तर पर लेटकर सबसे पहले शीतल को कॉल लगाया।

"हैलो, शीतल, कैसे हो?"

"मैं ठीक हूँ, तुम बताओ कैसे हो? घर पर सब ठीक है न।”

"हाँ, सब ठीक है, तुम परेशान मत होना।"

शीतल की बातों में एक चिंता झलक रही थी। शायद यह चिंता थी मेरी शादी की। दिनभर घर में क्या-क्या हुआ, किसने क्या कहा, सब शीतल को बताया। हम लोग रात तीन बजे तक बातें करते रहे। अगले दिन शीतल को ऑफिस जाना था। हम दोनों में से अगर कोई एक ऑफिस में नहीं होता था, तो दूसरे का मन नहीं लगता था। इसीलिए शीतल भी ऑफिस नहीं जाना चाहती थी।

“यार राज, जल्दी आ जाओ न, मन ही नहीं लग रहा है तुम्हारे बिना।"

"हाँ यार मंगलवार को आऊँगा न ऑफिस।"

"तो मेरा सोमबार कैसे कटेगा मेरी जान, और याद है ना बुधवार को 14 तारीख है, मालविका का बर्थ-डे है।"

"हाँ, मुझे अच्छे से याद है, मैंने बुधवार की छुट्टी ली है... मैं, तुम और मालविका दिनभर साथ रहेंगे और तुमटेंशन मत लो यार, बस कल की ही तो बात है।"

“सुनिए, बुधवार शाम को घर पर बर्थ-डे पार्टी है; दिन में मैं और तुम मालविका को घुमाएँगे, शाम को तुम्हें घर आना है; मालविका से पहली मीटिंग होगी तुम्हारी जनाब।"

“पक्का मालविका को घुमाने ले चलेंगे, पर शाम को मैं शायद नहीं आ पाऊँगा।"

"अरे भई क्यूँ...?"

"शीतल, इतनी जल्दी में तुम्हारे घर नहीं आ सकता हूँ।"

"पहले तुम दिल्ली आओ फिर देखते हैं; चलो अब आराम कर लो, गुड नाइट।"

"हम्म, गुड नाइट, आई लव यू।"

"लव यू टू।"

वैसे तो पहाड़ों की सुबह बेहद खूबसूरत होती है, लेकिन ऋषिकेश की सुबह की बात ही अलग है। ठंडी-ठंडी हवा, चिड़ियों की चहचहाहट और गर्माहट देती सूरज की किरणें, स्वर्ग जैसी अनुभूति देती हैं।

सुबह के सात बज चुके थे। सूरज की रोशनी से कमरा नहा चुका था। मैं रोशनी से छपकर चादर के भीतर था। और माँ दरवाजे पर थीं।

"राज, दरवाजा खोलो बेटा! सात बज गए हैं; चाय तैयार है।"

“आ रहा हूँ माँ।"- मने बेड से उठते हुए कहा। दरवाजा खोला तो माँ चाय का मग लेकर सामने ही खड़ी थीं। वो जानती थीं कि सुबह सुबह मुझे कम-से-कम दो कप चाय चाहिए होती है। एक कप से मेरा भला नहीं होता है। मैंने चाय का मग लेने से पहले माँ को गले लगा लिया।

"अरे-अरे! चाय फैल जाएगी।"

"गुड मार्निग मम्मा।"
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9 hours ago,
#9
RE: RajSharma Stories आई लव यू
"गुड मार्निग बेटा।" मैं और माँ छत पर ही घूम रहे थे। पापा भी न्यूजपेपर लेकर ऊपर ही आ गए थे। छत से बाकी पड़ोसियों की छत भी दिख रही थी। पापा और माँ मुझे बता रहे थे कि पड़ोस वाले लोगों के क्या हाल हैं। छत पर घूमते हुए ही एक दो अंकल और आंटी लोगों से नमस्ते हो गई थी।

“और, आज कहाँ घूमने जाना है?"- पापा ने पूछा।

"आज पहले सबके साथ नाश्ता और फिर पुराने दोस्तों के साथ घूमने जाऊँगा।"

"तो बताओ नाश्ते में क्या खाओगे?"

"गर्म जलेबी और समोसा।"

"ठीक है, फिर मैं लेकर आता हूँ; तुम लोग नहाकर तैयार हो जाओ।"- पापा इतना कहकर बाजार चल दिए।

"तुम राज, नहाकर नीचे आ जाओ फिर!"- माँ ने कहा।

"ठीक है माँ, मैं आता है।"

अंदर रखा फोन रिंग कर रहा था। मुझे लगा शीतल इतनी जल्दी क्यों फोन कर रही है, उसे तो सोना चाहिए अभी... रात भी देर से सोई है। मैंने जैसे ही फोन हाथ में लिया, तो वो शीतल नहीं, बल्कि डॉली थी।

'हलो' "हाय राज ! गुड मॉर्निंग।"

"गुड मॉर्निंग डॉली... इतनी जल्दी।"

“जल्दी? साढ़े सात बजे हैं।"

"ओके, तो कैसे हैं मौसी के यहाँ सब?"

"सब अच्छे हैं... कल तुम आते तो अच्छा होता; मिलते सबसे।”

"चलो फिर कभी आऊँगा; तुम तो अक्सर आती रहती हो न!"

"हाँ, पक्का...अच्छा, तुम्हारे घर सब कैसे हैं?"

"सब बहुत अच्छे हैं... माँ-पापा, भाई-बहन सब अच्छे हैं।"

"गुड ! अच्छा आज का क्या प्लान है तुम्हारा? घर पर ही या कहीं घूमने जाने का है?"

“आज एक-दो दोस्तों के साथ रॉफ्टिंग पर जाऊँगा।"

"वाओ! राफ्टिंग...आई लब राफ्टिंग प्लीज मुझे भी ले चलो न।'

"हाँ, चल सकते हो; पर मौसी के बच्चे लोग कहाँ गए? उनके साथ आना चाहिए

“यार उन लोगों का स्कूल है आज... और मौसा जी ऑफिस जाएँगे; तो मैं अकेली रह जाऊँगी और घूम भी नहीं पाऊँगी।"

"चलो फिर साथ चलते हैं; 11 बजे मैं आपको पिक करने आ जाऊँगा।"

"ओके श्योर, मैं तैयार रहूँगी।"

"चलोटेक केयर।"- मैंने कहा और फोन रख दिया।

डॉली का फोन रखकर मैंने शीतल को फोन किया। आठ बज चुके थे और ये शीतल के उठने का वक्त था।

"हैलो...गुड मॉर्निंग...!"

"गुड मॉर्निंग मेरी जान ...गुड मॉर्निंग।"

"अरे भाई उठिए...ऑफिस नहीं जाना है क्या?"

“मेरी जान, तुम्हारे बिना नहीं जाना मुझे ऑफिस।"

"अरे...ऐसे थोड़ी होता है, चलिए उठिए..." "हम्म...और आज का क्या प्लान है?"

"बस नाश्ते के बाद दोस्तों के साथ रॉफ्टिंग पर जाना है। पापा अभी नाश्ता लेने गए

"ओके...कूल; एनज्वॉय रॉफ्टिंग।"

"चलो फिर तुम तैयार हो जाओ।"

"हाँ, तुम अपना ध्यान रखना मेरी जान।"

"हाँ, तुम भी।" पापा नाश्ता लेकर आ चुके थे। रेलवे रोड वाले पंडित हलवाई के यहाँ की गर्मागर्म जलेबियों के बारे में सोचकर ही मेरे मुँह में पानी आ जाता था। जब पापा हम बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते थे, तो रास्ते में यह दुकान पड़ती थी। हम तीनों भाई-बहन रोज जलेबी खाते थे। आज जब भी मैं ऋषिकेश आता है, तो जलबियाँ खाना नहीं भूलता। आज भी जलेबी और समोसे की खुशबू नीचे से मुझे बुला रही थी। माँ भी आवाज लगा चुकी थीं। बस देर क्या करनी। मैं भी फटाफट नहाने चला गया।

नीचे पहुंचा, तो माँ ने पूरा नाश्ता टेबल पर सजा रखा था और सब लोग मुँह में पानी लिए बैठकर मेरा इंतजार कर रहे थे। में जैसे ही पहुंचा, तो माँ ने एक प्लेट में जलेबी, ब्रेड और समोसा निकालकर मुझे दिया। इसके बाद क्या था... पापा, भाई और बहन टूट पड़े नाश्ते पर। अगर शादी की बात न हो, तो हमारे घर में बहुत खुशनुमा माहौल रहता था। एक शादी ही थी, जिसका जिक्र आते ही मुझे टेंशन हो जाती थी।
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9 hours ago,
#10
RE: RajSharma Stories आई लव यू
पापा को ऑफिस जाना था, तो वो उठ चुके थे। “ठीक है भाई, तुम एनज्वॉय करो, हम चले ऑफिस; शाम को मिलते हैं।"

"ओके पापा,बॉय-बाय।" मेरे कंधे पर एक थपकी देकर पापा ऑफिस चले गए और भाई-बहन कॉलेज। बाहर नमित,ज्योति और शिवांग आ चुके थे।

"आ जाओ, अंदर आ जाओ।"

"नमस्ते आंटी..हाय राज!"- तीनों ने अंदर आते हुए कहा।

"हाय...कैसे हो तुम लोग! आओ नाश्ता करो।"- मैंने उठकर गले मिलते हुए कहा।

"अरे वाह...जलेबी! नाश्ता तो हम लोग करके आए हैं, पर जलेबी खाएँगे।"- ज्योति ने मुस्कराते हुए कहा।

"अरे, लो न यार...खाओ।"

"तो आंटा, माहब आ ही गए तीन महीने बाद । डाँटा नहीं आपने। इतने दिन बाद आए हैं ये।"- ज्योति ने माँ से कहा।

"अब दो दिन के लिए आया है ज्योति ये, क्या डाँटें।"

"हाँ आँटी, आप सही कह रही हैं; चलो फिर फटाफट।"

मैं और ज्योति छठवीं क्लास से लेकर बारहवीं तक एक ही क्लास में थे और नमित और शिवांग दूसरे सेक्शन में थे... पर हम तीनों बहुत पक्के दोस्त थे। नमित और शिवांग, टेलीकॉम कंपनी में इंजीनियर थे और ज्योति, ऋषिकेश में ही बैंक में एक्जीक्यूटिव थी। आज तीनों ने मेरी वजह से अपने-अपने ऑफिस से छुट्टी ली थी। नमित की कार से हम चारों रॉफ्टिंग के लिए निकल चुके थे।

"नमित, मैं ड्राइव करूंगा!"- मैंने कहा।

“ओके...ये पकड़ चाबी।"- नमित ने चाबी मेरी तरफ फेंकते हुए कहा।

"और तुम तीनों पीछे बैठ जाओ...पट सीट खाली रखना।"

ओए क्यों?" - तीनों ने एक साथ कहा।

"अरे कह रहा है नयार; किसी को पिक करना है रास्ते से।"

“किसी को...मतलब कोई और भी चलेगा साथ?"- नमित।

'हाँ।'

"और वो लड़की है?"- ज्योति।

“ऐसा करो तुम ही चले जाओ, मैं जा रही हूँ।”-

ज्योति। "अरे, सुन न ज्योति, तू भी न यार... अरे दोस्त है ऐसे ही; मेरी गर्लफ्रेंड नहीं है बो।"

"तो तुम कैसे जानते हो उसे और गर्लफ्रेंड नहीं है, तो साथ रॉफ्टिंग पर क्यूँ ले जा रहे हो और कहाँ मिले तुम?"- ज्योति ने कहा।

"अरे यार, दिल्ली से है; आते हुए बस में मिल गई थी... अब ज्यादा तीन-पाँच मत करो, मिलवाता हूँ।"

ज्योति का मूड ऑफ हो चुका था। दसवीं क्लास में कल्चरल फेस्ट के बाद से ज्योति मुझे पसंद करने लगी थी। वो मेरे गाने से इंप्रेस हुई थी, पर कभी कह नहीं पाई। मेरा उसमें कोई इंटरेस्ट नहीं था... बस अच्छी दोस्त थी। तीनों, पीछे वाली सीट पर बैठ गए थे और मैंने कार डॉक्टर कॉलोनी की तरफ डॉली को पिक अप करने के लिए बढ़ा दी।

"हेलो डॉली...बाहर आओ घर के, हम बम पहुँचने वाले हैं।"

"ओके राज।"

"तो डॉली है उसका नाम?"- ज्योति ने कहा।

"अरे मेरी माँ, मिलवाऊंगा...दो मिनट रुको तो।"

"तो नाम ही तो पूछा है।"

"हाँ, डॉली नाम है उसका...और हम आ गए हैं उसके घर।"

डॉक्टर कॉलोनी पहुंचे, तो डॉली अपने घर के गेट पर ही खड़ी थी। मैंने हॉर्न दिया, तो उसने कार की तरफ देखकर हाथ हिलाया।

“ओहो। तो ये हैं मैडम डॉली।"- ज्योति ने कहा।

"ज्योति...चुप हो जाओ यार; बंद करोगी ताना मारना तुम?"

"हाय डॉली!"- मैंने कार का शीशा उतारकर कहा। 'हाय!'

मैं कार से उतरा और डॉली को कार में बिठाया। कार में बैठते ही डॉली ने पीछे वाली सीट पर बैठे तीनों लोगों को हाय बोला। ज्योति को छोड़कर बाकी दोनों ने डॉली को बहुत अच्छे से हाय बोला। ___

"डॉली, ये नमित है, ये शिवांग है और मास्टर गर्ल ज्योति... और ये डॉली है, दिल्ली से।”

कुछ ही देर में हम ब्रह्मपुरी पहुँच चुके थे। यहीं से रॉफ्टिंग का प्लान हम लोगों ने बनाया था। कार से उतरकर हम लोग गंगा किनारे कैंप में पहुंच गए थे। नमित और मैं पहले भी साथ में रॉफ्टिंग कर चुके थे। शिवांग को पानी से डर लगता था, लेकिन हम उसे ले आए थे। डॉली पहली बार रॉफ्टिंग करने जा रही थी, इसलिए उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। वो तो बिना कॉस्टयूम पहने ही पानी में कूद जाने को बेताब थी। पानी से इतना प्यार मैंने पहली बार किसी लड़की के भीतर देखा था। ज्योति का मुँह अभी भी फूला हुआ था।
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