Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
08-18-2019, 02:01 PM,
#81
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
मुझे नही पता कि मैं कैसे बचा, मुझे किसने बचाया,मुझे किसने हॉस्पिटल मे अड्मिट किया...जब,मुझे होश आया तो मैं नही जानता था कि मैने आज कितने दिनो बाद अपनी आँखे खोली है.....मैने तो उस दिन पक्का सोच लिया था कि जब मुझे होश आएगा तो मैं यमराज के सामने खड़ा होऊँगा और दो देवदूत मुझे स्वर्ग मे ले जाने के लिए मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे...उस दिन ग्राउंड पर मैने ये भी सोच लिया था कि स्वर्ग मे जाकर सबसे पहले मैं स्वर्ग के राजा इंद्र की माल को सेट करूँगा लेकिन मेरे इन अरमानो पर पानी तब फिर गया जब मैने देखा कि मैं एक हॉस्पिटल मे हूँ और मेरे शरीर के कयि हिस्सो मे ना जाने कैसी-कैसी भयानक मशीन्स लगी हुई है ,जो मेरी हर मूव्मेंट पर अलग-अलग आवाज़ कर रही थी.....
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"सॉरी स्वर्ग वालो..."उपर देखकर मैने कहा"तुम लोगो से बाद मे मिलूँगा ,लेकिन उदास मत होना क्यूंकी मैं जल्द ही कुच्छ लोगो को स्वर्ग भेजने वाला हूँ...."

जब मुझे होश आए हुए कुच्छ वक़्त बीत गया तो मैने सबसे पहले ये चेक किया कि मेरे शरीर का कौन-कौन सा अंग काम कर रहा है....

गर्दन...बराबर दाए-बाए ,उपर-नीचे हिल रही थी...दोनो पैर भी सही सलामत थे लेकिन कयि जगह टाँके लगे थे, एक हाथ मे प्लास्टर चढ़ा हुआ था,लेकिन दूसरा हाथ बिल्कुल मस्त था,..लेकिन जब मैं अपने दूसरे हाथ की हथेलियो को हिलाता-डुलाता तो हल्का सा दर्द उभर रहा था....मेरे दोनो शोल्डर के साथ-साथ मेरी कमर को किसी चीज़ से बाँध कर रखा हुआ था,वो शायद इसलिए क्यूंकी मेरी हड्डिया बुरी तरह टूट चुकी थी जिसे वापस अपनी जगह सेट करने के लिए ये सब इंतज़ाम किया गया था....मेरे सर पर क्या-क्या करामात डॉक्टर लोगो ने की है ये मैं नही जानता था लेकिन जैसा कि मुझे अहसास हो रहा था उस हिसाब से सर पर भी काई जगह शायद टाँके लगाए होंगे...मैने अपना एक हाथ जो थोड़ा-बहुत हिल डुल सकता था उसे उठाकर अपने सर पर फिराया तो दंग रह गया क्यूंकी मेरे सर के सारे बाल ,जो कि मेरे हॅंडसम होने मे अहम भमिका निभाते थे ,उनको सॉफ कर दिया गया था...यानी कि मैं इस वक़्त एक हॉस्पिटल मे अपने हाथ-पैर, कंधे,सर और पीठ तुडवा के लेटा हुआ था....मुझे किसी चीज़ का ज़्यादा गम नही था सिवाय इसके के मेरे बाल अब मेरे सर पर नही है और मैं टकला हूँ

"साला कितना धाँसू हेअर स्टाइल था मेरा,महीनो की मेहनत एक पल मे ये साले उड़ा ले गये...इनकी तो "अंदर ही अंदर हॉस्पिटल वालो को गाली देते हुए मैने खुद से कहा...

इस सदमे से उभरने मे मुझे थोड़ा वक़्त लगा और थोड़े वक़्त के बाद मैने अपने अगल-बगल झाँका तो पाया कि वहाँ और भी कयि लोग लेटे हुए है...लेकिन सब के सब बेहोश थे या फिर सो रहे थे.

"इस समय टाइम क्या हुआ है , घड़ी भी नही टन्गी है कही..."जिस रूम मे मैं था ,उस रूम की दीवारो को मैने च्चन मारा, लेकिन इस समय टाइम क्या हुआ है,ये मालूम चल सके ,इसका वहाँ कोई इंतेज़ां नही था...जिस बेड पर मैं लेता था उससे थोड़ी डोर पर एक डॉक्टर(फीमेल) चेर पर बैठी किसी फाइल के पन्ने पलट रही थी...
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"जानेमन....."एक घुटि हुई सी आवाज़ उस लेडी डॉक्टर को देख कर मेरे मुँह से निकली,जिसे मैं खुद ही ढंग से नही सुन पाया....

मैने एक और बार उस लेडी डॉक्टर को पुकारा ,जो एप्रन पहने हुए मुझसे थोड़ी दूर पर बैठी हुई कुच्छ पढ़ रही थी..मेरी आवाज़ वो डॉक्टर तो नही सुन पाई लेकिन मेरे हिलने डुलने से ना जाने कैसी-कैसी भयानक मशीन ,जो कि मेरे मेरे बॉडी से कनेक्टेड थी,वो चू-चू..तू-तू की आवाज़ करने लगी और फाइनली उस डॉक्टर ने मेरी तरफ नज़र मारी.....
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"बोलो मत, रूको मैं तुम्हारे फॅमिली को इनफॉर्म करती हूँ कि तुम्हे होश आ गया है..."मेरे पास आते हुए वो बोली...

वैसे तो उसने मुझे ना बोलने के लिए कहा था, लेकिन मैने टाइम पुछने के लिए एक बार फिर अपना मुँह फाडा और घुटि हुई आवाज़ मे उससे टाइम पुछा...

"2 बज रहे है...और तुम कुच्छ मत बोलो..."

"तेरी दाई की चूत, प्राब्लम मुझे होगी या तुझे...ज़्यादा होशियारी मत चोद वरना सारी डॉक्टर गिरी गान्ड मे ठेल दूँगा..."उसने जब अपना डाइलॉग दोबारा रिपीट किया तो मैने उसको देखकर अंदर ही अंदर खुद से कहा और एक बार फिर से अपना मुँह फाडा" एम या पीएम..."
"ह्म...."
"2 एम या 2 पीयेम"अबकी बार मैने अपना पूरा ज़ोर लगाकर कहा और ये बोलने के बाद ही निढाल होकर बेड पर लंबी-लंबी साँसे भरने लगा...

"मैने बोला था ना,बोलने की कोशिश मत करो...नाउ रिलॅक्स, मैं तुम्हारे रिलेटिव्स को इनफॉर्म कर दूँगी..."

"साली रंडी... जा चूत मरा बीसी"
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उसके बाद जो मेरी जो आँख लगी वो मुझे नही पता कि कब खुली...और जब मेरी आँख दोबारा खुली तो मुझे सिर्फ़ इतना पता था कि मैं दूसरी बार जगह हूँ...मैने कुच्छ देर तक अपने हाथ-पैर हिलाए ,जिससे मेरे बॉडी से कनेक्टेड वो भयानक मशीन्स फिर से अपना अलार्म बजने लगी और एक नर्स तुरंत मेरे पास आई....

"अपने हाथ-पैर मत हिलाओ..."मेरे पैर को पकड़ कर सीधा करते हुए उसने कहा...जिससे कि मेरा माथा एक बार फिर गरम हो गया...

"लवडा मेरा हाथ-पैर है ,मैं हिलाऊ चाहे ना हिलाऊ...तू कौन होती है मुझे टोकने वाली..."सोचते हुए मैने एक बार फिर से अपने पैर को टेढ़ा किया ,जिसे सीधा बेड पर करते हुए उस नर्स ने ना जाने मेरे पैर पर क्या बाँध दिया और एक दवाई से भरी सीरिंज मेरे पिछवाड़े मे घुसा दी....

"तू रुक, होश आने दे...फिर यही सरिंज तेरे गान्ड मे डालूँगाआअ...."जमहाई मारते हुए मैं बड़बड़ाया और फिर से सो गया....
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नेक्स्ट टाइम जब मेरी नींद खुली तो पिछली बार की तरह इस बार भी मुझे सिर्फ़ इतना ही मालूम था कि मेरी आँख पहले भी खुल चुकी है....मेरा पैर अब भी किसी चीज़ से बँधा हुआ था और वो नर्स जिसने मेरे पिछवाड़े मे सुई घुसाई थी वो इस समय किसी दूसरे पेशेंट के पिछवाड़े मे सुई डाल रही थी...

"अबे मुझे होश आ गया है,कोई जाकर मेरे घरवालो को इसकी खबर देगा या मैं खुद जाउ उन्हे ये बताने "अपनी पूरी ताक़त इकट्ठा करके मैं चीखा,लेकिन आवाज़ उतनी तेज़ नही थी ,जितनी की अक्सर मे चीखने से होती थी...लेकिन वहाँ मौज़ूद सभी लोगो को सुनाई दे...इतनी तेज़ तो थी ही...

"वेट..."उस पेशेंट के पिछवाड़े मे सरिंज डालकर उस नर्स ने वहाँ मौज़ूद दूसरी नर्स से कहा कि वो मेरे रिलेटिव्स को ये खबर दे दे....
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अब मुझे अंदाज़ा हो चला था कि अब से कुच्छ देर बाद क्या होने वाला है..जैसे मैने सोचा था उसके हिसाब से किसी हिन्दी मूवी की तरह मेरी माँ सबसे आगे दौड़ते हुए मेरे पास आएगी ,उसके आँखो मे खुशी के आँसू होंगे...देन मेरे पिता जी मेरी माँ के बाद एंट्री मारेंगे, वो खुश तो होंगे लेकिन रिएक्ट ऐसे करेंगे,जैसे उन्हे कोई फरक ही नही पड़ता उसके बाद मेरा बड़ा भाई एंट्री मारेगा और ये जानते हुए भी मैं ठीक से बात नही कर सकता वो मुझसे बहुत सारे सवाल करेगा...मेरे बड़े भाई के सवाल के बम-बारी से जब मैं घायल हो जाउन्गा तो फिर मेरी माँ जिसके आँख मे इस वक़्त भी खुशी के आँसू होंगे,वो मेरे भाई को दाँटेगी और मेरे पिता श्री से फलाना मंदिर मे फलाना भगवान के नाम पर दान-दक्षिणा करने को कहेगी....
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ऐसा मैने बेड पर पड़े-पड़े सोचा था लेकिन लगता है कि शनि और मंगल अब भी मुझसे खफा-खफा है क्यूंकी मुझसे सबसे पहले मिलने के लिए ना तो मेरी माँ आई और ना ही मेरे पापा....मुझसे सबसे पहले मिलने दो लोग आए...एक था मेरा बड़ा भाई विपेन्द्र और दूसरा था मेरा गे दोस्त-अरुण.......

विपिन भैया को देखते ही मैं समझ गया था कि अब सवाल-जवाब की जोरदार बम-बारी होने वाली है...इसलिए मैने तय कर लिया था कि अब मैं 2.2 एक्स 1 जे 0.7 एम ,साइज़ वाले बेड पर चुप-चाप लेटा हुआ सिर्फ़ सर हिलाउन्गा और ऐसे शो करूँगा जैसे कि मैं कुच्छ बोल ही नही सकता,जैसे कि मैं गूंगा ही हो गया हूँ.....अरुण और विपिन भैया मेरे सामने आए ,मैने दोनो को देखा और अरुण को देख कर मेरा कलेजा जल उठा कि उसके सर पर बाल है उसके बाद मैने एक और चीज़ ऐसी देखी जिसे देखकर मेरा कलेजा और भी जला...वो था उन दोनो की हालत, पिटाई मेरी हुई थी, सारे शरीर पर ज़ख़्म खाकर मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था ...लेकिन दर्द उन दोनो की आँखो मे मैं सॉफ देख सकता था.अरुण और बड़े भैया की आँखो मे खुशी और दुख का बड़ा अजीब कॉंबिनेशन था.जिसे समझने के लिए मुझे थोड़ा वक़्त लगा. वो दोनो बहुत खुश इसलिए थे क्यूंकी आज मैने ना जाने कितने दिनो बाद अपनी आँखे खोली थी....और मुझे मेरे ज़ख़्मो के साथ देखकर वो दोनो बहुत ज़्यादा दुखी थे, उस एक पल मे दोनो की ये हालत देखकर दिल किया कि साला अभी बिस्तर से उठु और गौतम के बाप का मर्डर कर दूं,दीपिका को नंगा सड़क पर दौड़ाऊ और नौशाद को हॉस्टिल मे ही दफ़ना दूं...वो एक पल साला पूरा फिल्मी महॉल था और ऐसे फिल्मी मोमेंट मे उबाई मारने वाला मैं खुद भी कुच्छ देर के लिए भावनाओ मे बह गया था...कुच्छ देर तक तो वहाँ ऐसी ही सिचुएशन रही और उस एक पल मे मैं ये भी भूल गया कि मुझे अपना मुँह नही खोलना है,चाहे धरती पलट जाए या फिर आसमान उलट जाए, लेकिन मैने अपना मुँह खोला,आँखो मे नमी लाते हुए अपना मुँह खोला...
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"सॉरी भैया...."

मेरे द्वारा सॉरी बोलने पर मेरा बड़ा भाई अब गुस्से मे आया लेकिन मुझसे कुच्छ नही बोला....

"मुझे नही पता था कि बात इतनी आगे बढ़ जाएगी..."मैने दोबारा विपिन भैया की तरफ देख कर कहा...

"घरवालो को कुच्छ मत बताना और मम्मी-पापा से तुझे क्या कहना है ये अरुण तुझे बता देगा..."

इतना बोलकर मेरा बड़ा भाई वहाँ से चलता बना.मेरी हालत और मुझे होश मे देख कर मेरा बड़ा भाई कुच्छ ज़्यादा ही एमोशनल हो गया था और मैं जानता था कि यदि वो थोड़ी देर और उधर मेरे पास रुकते तो एक धांसु बोरिंग सीन बनाते...

"क्या हाल है बे टकले..."विपिन भैया के जाने के बाद अरुण बोला"अब मूठ कैसे मारेगा बेटा...तेरा एक हाथ तो कुच्छ हफ़्तो के लिए गया काम से और दूसरा हाथ इस काबिल नही है कि तू मूठ मार सके..."

"मैने सोचा था कि तू थोड़ा बहुत दुखी होगा मेरी ये हालत देखकर "

"अबे दुखी तो मैं अब हुआ हूँ,तुझे होश मे देखकर..."अपनी चेयर को मेरी तरफ और पास खिसकाते हुए अरुण बोला"जब तक तू मरे हुए की तरह लेटा था ना तो मैं बेदम खुश था,मालूम है क्यूँ..."
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08-18-2019, 02:01 PM,
#82
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"क्यूँ ? "

"क्यूंकी तब मैं तेरे सारे कॉपी-किताब को बेचकर मस्त पैसे बनाता...तेरे कपड़ो से मैं अपना रूम सॉफ करता...खामख़ाँ ज़िंदा हो गया बे तू "

"चल छोड़ ये सब और ये बता कि बड़े भैया ने ये क्यूँ कहा कि मैं मोम-डॅड से कुच्छ ना कहूँ..."

"क्यूंकी बड़े भैया ने सबको यही बता के रखा है कि तेरा आक्सिडेंट एक ट्रक के साथ हो गया था...."

"क्या यहाँ के डॉक्टर्स इतने काबिल है जो इन्हे मेरा इलाज़ करते वक़्त मालूम नही चला कि मेरा आक्सिडेंट नही बल्कि जोरदार ठुकाई हुई है "

"डॉक्टर्स को सब पता है लेकिन बड़े भैया ने बात दबा ली और तू भी बात दबा लेना....चोदु की तरह सब उगल मत देना...समझा..."

"ओके, बेबी..."
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बड़े भैया ने मेरा काम आसान कर दिया था क्यूंकी अब मुझसे कोई नही पुछने वाला था कि मुझे किसने मारा और क्यूँ मारा....साथ ही साथ इससे मेरी इज़्ज़त भी बच रही थी, क्यूंकी आक्सिडेंट तो आए दिन होते रहते है .इसमे कोई बड़ी बात नही थी....अरुण थोड़ी देर तक और मेरे साथ रहा और फिर वहाँ से चला गया .अरुण के जाने के बाद मेरे मोम-डॅड ने एंट्री मारी और मुझे और भी ज़्यादा एमोशनल कर दिया....उनके बाद मुझसे मिलने के लिए जैसे पूरी इंडिया की पब्लिक ही आ गयी ...एक जाता नही कि दूसरा इसके पहले ही पहुच जाता...मुझसे मिलने-जुलने वालो को मुझसे बात करने के लिए सॉफ मना किया गया था...मुझसे मिलने मेरे लगभग सारे रिलेटिव्स आए थे और उन्होने जब अंदर आकर मेरा हाल चाल पुछ लिया तो फिर मेरे दोस्तो क जमावड़ा लगना शुरू हो गया...वरुण, नवीन,सुलभ,सौरभ,अमर सर ईवन अपना भोपु भू तक मुझसे मिलने आया था, इतने लोगो को एक साथ देखकर सीना जैसे गर्व से चौड़ा हो गया था और ऐसे लगा जैसे कि बस कुच्छ ही देर मे मैं एक दम से ठीक हो जाउन्गा....लेकिन सच तो इससे कोसो दूर था.कुच्छ सच ऐसे थे जिसे मैं पहले से जानता था और कुच्छ सच ऐसे थे जिन्हे जानना बाकी थी...
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सबसे मिलने के बाद मैं थक हार कर अपने 2.2 एक्स 1 एक्स 0.7 मीटर के बेड पर एक हाथ से सर सहलाते हुए एक नर्स को आवाज़ दिया क्यूंकी मेरा सर अब हल्का-हल्का दर्द कर रहा था...मैने नर्स को अपने सर के दर्द के बारे मे बताया जिसके बाद उसने मुझे एक लाल कलर की टॅबलेट दी

"पानी किधर है..."

"इसे मुँह मे रख कर चूसना है.."

"क्या "

"सीधे से मुँह मे रखो और चूस्ते रहो..."

"ओके..."(लवडी ये तेरे निपल्स नही है जो चूस्ता रहूं, ये टॅबलेट है...जो कड़वी होती है..)
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उस लाल कलर की टॅबलेट को मुँह मे रखने के बाद मैने चूसना शुरू ही किया था कि मेरे मुँह का पूरा टेस्ट बदल गया और मैने टॅबलेट निकाल कर हाथ मे पकड़ लिया ताकि मौका देखकर चौका मार सकूँ,,.लेकिन थोड़ी देर बाद मुझे ध्यान आया कि इधर तो कोई मौका ही नही है...ये आइसीयू था ,जहाँ धूल का एक कण भी नही था ऐसे मे टॅबलेट को उधर फेकना मतलब खुद के गले मे फंदा डालना था....फिर मैने सोचा कि क्यूँ ना टॅबलेट को बिस्तर के नीचे छिपा दूं ,लेकिन तभिच मेरे भेजे ने मुझे ऐसा करने से रोक दिया और बोला कि यदि मैने ऐसा करने की कोशिश भी की तो वो भयानक मशीन फिर से अपना राग अलापना शुरू कर देगी...तब मुझे अरुण का ध्यान आया कि अभी टॅबलेट को इधर ही कही छिपा देता हूँ और जब अरुण आएगा तो उसे देकर बाहर फिकवा दूँगा...कितना होशियार हूँ मैं
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उस दिन रात को मेरी आँखो से नींद गायब थी क्यूंकी रह-रह कर मुझे दीपिका और नौशाद के करतूत याद आ रहे थे...नौशाद का तो फिर भी समझ मे आता है लेकिन दीपिका ने मुझे क्यूँ फँसाया ? और गौतम के बाप के साथ उसका क्या रिश्ता है ? ये मेरे समझ से परे था...लेकिन इस समय मेरे अंदर एक चीज़ नौशाद और दीपिका के लिए एकदम सेम और ईक्वल थी और वो थी मेरा गुस्सा ,उन दोनो से मेरे बदला लेने की चाहत. मुझे मालूम था कि इस वक़्त जैसे मैं उनके बारे मे सोच रहा हूँ वैसे वो भी मेरे ही बारे मे सोच रहे होंगे आंड अकॉरडिंग टू माइ सिक्स्त सेन्स ,उन दोनो की गान्ड बुरी तरह से फट चुकी होगी क्यूंकी उन दोनो ने ही ये सोचा था कि मैं ज़िंदा नही बचूँगा...लेकिन हुआ ठीक उल्टा ...

कुच्छ और भी चीज़े मेरी ज़िंदगी मे उल्टी हो चुकी थी जिसका मुझे अंदाज़ा नही था....मैं हॉस्पिटल मे हर दिन सुबह उठता ,कुच्छ ख़ाता-पीता और फिर सो जाता...दोपहर मे मैं फिर उठता ,फिर कुच्छ ख़ाता-पीता और सो जाता...उसके बाद मैं डाइरेक्ट शाम को उठकर दिन की आख़िरी खुराक लेकर फिर से सो जाता था.....हॉस्पिटल मे मेरे दिन ऐसे ही बीत रहे थे कि मुझे एक दिल को चीर देने वाली बात पता चली...

इस समय अरुण मेरे साथ बैठा बक्चोदि कर रहा था कि मैने उससे पुछा....
"अबे आज तारीख क्या है..."
"उम्म...मेरे ख़याल से आज 26 होना चाहिए..." अंदाज़ा लगाते हुए अरुण ने कहा..

"बक्चोद है क्या 25 अक्टोबर को तो ये कांड हुआ था जब मैं घर जा रहा था...मेरे ख़याल से आज 2-3 नवेंबर होगा...क्यूँ ?

"अरुण को देखकर मैने सोचते हुए कहा"साला 28 नवेंबर से एग्ज़ॅम है थर्ड सेमेस्टर के और मैं यहाँ बेड पर लेटा हुआ हूँ"

"अरमान...."

"हां बोल.."

"एग्ज़ॅम ख़तम हो चुके है और आज 26 डिसेंबर है, तू लगभग 2 महीने तक कोमा मे रहा था...."

"ये तो मुझे भी मालूम था कि तू 2 महीने तक कोमा मे था...लेकिन मुझे ये नही मालूम था कि तेरा ट्रक के साथ आक्सिडेंट नही बल्कि गौतम के बाप के कहने पर तेरी ठुकाई हुई थी....इन शॉर्ट मुझे तो तूने एश और गौतम के बारे मे कभी बताया ही नही था...."वरुण बोला...

"विपिन भैया ने सिचुयेशन हॅंडल कर लिया था...वो नही चाहते थे कि मोम-डॅड को मेरी लड़ाई के बारे मे पता चले...."

"बहुत बड़े-बड़े झंडे गाढ़े है भाई तूने तेरी कॉलेज लाइफ मे..."

"एक मिनिट रुक..."मैं वहाँ से उठा और अरुण का मोबाइल माँगा ,ताकि निशा को कॉल करके उसके डॅड का हाल-चाल जान सकूँ....निशा को कॉल करने की एक और वजह ये भी थी कि मुझे अब कुच्छ बेचैनी सी महसूस हो रही थी और ऐसी सिचुयेशन मे एक लड़की जो आपके दिल के करीब हो वो कुच्छ ऐसा कर जाती है कि दिल को सुकून सा मिलता है....
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"अब क्या हालत है..."

"मैं ठीक हूँ,मुझे क्या हुआ है..."

"तेरे बारे मे नही तेरे बाप...सॉरी अंकल जी के बारे मे पुच्छ रहा हूँ..."

"वो भी एक दम ठीक है,शाम तक लीव मिल जाएगी..."

"सेक्स करेगी,बहुत मन हो रहा है..."ऐसा मैने जान बूझकर कहा ताकि निशा मुझे फटकारे जिससे मुझे थोड़ा सुकून मिले....

"एक्सपाइरी मेडिसिन मेरे डॅड ने खाई लेकिन लगता है असर तुम्हारे उपर हो रहा है....ये कोई वक़्त है ये सब बात करने का...तुम्हारे अंदर ज़रा सी भी इंसानियत और समझ नही है क्या जो सेक्स करने को कह रहे हो...इधर मेरे डॅड तुम्हारी वजह से बीमार पड़े है,मेरी माँ उदास है और तुम सेक्स करने को कह रहे हो...बाय्स आर ऑल्वेज़......"

"हेलो...हेलो...निशा,लगता है कि नेटवर्क खराब है...तुम्हारी आवाज़ सुनाई नही दे रही है..मैं बाद मे कॉल करता हूँ..."बोलते हुए मैने कॉल डिसकनेक्ट कर दिया और एक लंबी साँस लेकर वापस बैठ गया.....

"ले बे अरुण ,अपना मोबाइल थाम और बेटा यदि निशा की कॉल आए तो खुद को अरमान बताकर उससे मत भिड़ जाना...समझा"फिर मैने वरुण से कहा"हां बोल ,तू क्या बोल रहा था..."

"अरमान ,मैं ये बोल रहा था कि तूने कॉलेज लाइफ मे बहुत सारे झंडे गाढ़े और गढ़वाए है....मैं भी ऐसी ही कॉलेज लाइफ जीना चाहता था...जिसमे हरदम ट्विस्ट आंड टर्न हो...एश जैसी एक लड़की हो ,जिसे पाने की चाहत हो लेकिन रास्ते मे उसका प्रेमी और उस प्रेमी का गुंडा बाप खड़ा हो...थोड़ा फाइट-साइट हो...लेकिन अपुन अपनी कॉलेज लाइफ मे ऐसा कुच्छ नही कर पाया ,मेरी कॉलेज लाइफ तो एक दम बोरिंग बीती है ,इतनी बोरिंग कि यदि मैं तुम लोगो को सुनाना चालू करू तो तुम दोनो बेहोश होकर कोमा मे चले जाओगे...."

"हम इंजिनीयर्स की बात ही कुच्छ और है.क्यूँ बे अरमान "अरुण गर्व से बोला...

"यस... "

"उसके बाद क्या हुआ...मतलब कि तूने दीपिका और नौशाद से बदला लिया या नही...."
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"एग्ज़ॅम ख़तम हो चुके है और आज 26 डिसेंबर है, तू लगभग 2 महीने तक कोमा मे रहा था...."

ये सुनकर ना तो मेरा मुँह खुला और ना ही मेरी आँखे शॉक्ड होकर बड़ी हुई,जैसा कि मेरे चौकने के दौरान मेरे साथ होता था...मैं दो महीने कोमा मे था,ये जानकार मैं बाहर से नॉर्मल था मतलब कि मैं ठीक उसी तरह 2.2 एक्स 1 एक्स 0.7 एम के बेड पर लेटा हुआ था,जैसे कि पिछले कयि दिनो से था....मैं बाहर से भले ही नॉर्मल दिख रहा था लेकिन मेरे अंदर एक भूचाल सा आ गया था उस वक़्त...मुझे ऐसा लगा जैसे मेरे सर पर फिर से किसी ने रोड दे मारा हो...मेरा सर इस समय ठीक उसी तरह झन्ना रहा था...उस वक़्त मेरी हालत ऐसी थी जैसे की अभी-अभी किसी ने मेरे सर के बाल को ,जो की नही थे, पकड़ कर ज़ोर से खींचा हो और मैं ,मेरे सर के बाल खीचने वाले को चुप-चाप देखने के सिवाय और कुच्छ नही कर सकता...इस बीच मेरे बॉडी से कनेक्टेड मशीन्स अपना राग आलाप रही थी , और उस समय मुझे सिर्फ़ उन मशीन्स की आवाज़ मुझे सुनाई दे रही थी....

"सच मे मैं दो महीने तक कोमा मे था या तू मज़ाक कर रहा है..."दूसरी तरफ देख कर मैने अरुण से पुछा...

"हां यार..."
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जब कुच्छ दिनो पहले मुझे होश आया था तो अपने शरीर के ज़ख़्मो को देखकर मैने ये सोचा था कि मैं कितना स्ट्रॉंग हूँ,जो इतनी पेलाइ के बाद भी मेरे हाथ-पैर लगभग सही सलामत है...मैने ये सोचा था कि उन एमकेएल गुन्डो मे शायद उतना दम नही था कि वो मुझे अपंग बना सके...लेकिन सच ये था कि मैं उस दिन बहुत बुरे तरीके से उनके फंदे मे फँसा था क्यूंकी दो महीने बाद भी मेरे पैर पर कयि ज़ख़्म हरे थे और एक हाथ मे प्लास्टर चढ़ा हुआ था...कमर और पीठ भी किसी चीज़ से बाँध के रखी गयी थी....लेकिन यहाँ समस्या ये नही थी कि उन्होने मुझे इतनी बुरी तरह से मारा बल्कि यहाँ समस्या ये थी कि थर्ड सेमेस्टर के एग्ज़ॅम मैं नही दे पाया मतलब कि इस सेमेस्टर मे मुझे पूरा एक साल का पढ़ना होगा...और तो और मैं एक-दो महीने बाद ही यहाँ से डिसचार्ज होने वाला था तो मेरे पास अब कुल मिलकर 4-5 महीने ही बाकी थे,जिनमे मुझे एक साल का पूरा पढ़ना था....मैं बहुत देर तक शांत रहा और फिर अरुण से बिना कुच्छ बोले सो गया...सोते वक़्त मुझे कयि सपने भी आए और वो सारे सपने एग्ज़ॅम हॉल के थे...मैने सपने मे देखा कि मैं एग्ज़ॅम हॉल मे गुम्सुम सा अपनी सीट पर बैठा कुच्छ सोच रहा हूँ...वक़्त निकलते जा रहा है,लेकिन मैं हूँ कि बिना कुच्छ लिखे ना जाने किन ख़यालो मे खोया हुआ हूँ....और फिर अचानक किसी ने मेरे कान मे ज़ोर से चिल्लाया कि "तू फैल हो गया है...तू मरने वाला है..."
उस आवाज़ ने मुझे बुरी तरह डरा दिया और मैने जब उस आवाज़ की तरफ अपना रुख़ किया तो अपने उसी दोस्त को वहाँ खड़े हुए पाया,जिसकी मौत का सपना मैने अपने स्कूल मे देखा था....
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"अरमान..."किसी ने मुझे पकड़ कर ज़ोर से हिलाया...

"भैया...."हान्फते हुए मैने आँखे खोली और विपिन भैया को सामने देखकर राहत की साँस ली...

"क्या हुआ...तबीयत तो सही है..."

"हां...सब सही है...बस गर्मी कुच्छ ज़्यादा लग रही थी..."अपने माथे के पसीने को सॉफ करते हुए मैं बोला"अभी टाइम क्या हुआ है..."

"रात के 9 बज रहे है, खाना लाया हूँ तेरे लिए....ले खा ले..."बोलते हुए भैया ने टिफिन खोला...
"मम्मी,पापा कहाँ है..."
"कुच्छ दिन के लिए घर गये है...दो तीन दिन मे वापस आ जाएँगे..."
"आइ आम रियली सॉरी ,भैया..."जब मैने खाना खा लिया तो बोला...

लेकिन विपिन भैया ने कुच्छ नही कहा ,वो कुच्छ देर तक मुझे देखते रहे और फिर वहाँ से चले गये....
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दोपहर की लंबी नींद के बाद अब नींद मेरी आँखो से कोसो दूर थी, उस सपने को तो मैं भूल चुका था...लेकिन लाख कोशिशो के बावजूद ये बात मेरे जेहन से नही उतर रही थी कि मैने थर्ड सें का एग्ज़ॅम मिस कर दिया है...मुझे नौशाद और दीपिका मॅम पर एक बार फिर से गुस्सा आया और दिल किया कि वेमपाइर बनकर उन दोनो को काट डालु,क्यूंकी वो दोनो ही मुझे इस हालत मे पहुचने के ज़िम्मेदार थे....

"साला कितनी अच्छी लाइफ चल रही थी लेकिन अरुण के एक किस ने सब कुच्छ ख़तम कर दिया, यदि मैं उस दिन गौतम को नही मरता तो ये नौबत ही नही आती..."

"नींद नही आ रही है क्या...."मेरे सिरहाने के पास खड़े होकर उस नर्स ने मुझसे पुछा ,जिसने मुझे कल सुई लगाई थी...

"मैं ठीक कितने दिन मे हो जाउन्गा..."

"दिन नही ,महीने बोलो...कुच्छ महीने लगेंगे ठीक होने मे..."

"अंदाज़न बता सकती हो कि कितने महीने लगेंगे..."

"आप अभी सो जाओ , कल सुबह डॉक्टर से पुच्छ लेना...."बोलकर वो आगे बढ़ गयी....
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मुझसे अब भी हर दिन बहुत से लोग मिलने आते रहते , कुच्छ मेरी फिक्र की वजह से आते थे तो कुच्छ बस फॉरमॅलिटी निभाने के लिए...अभी तक मेरा इस तरफ ध्यान नही गया था लेकिन अचानक ही मेरा ध्यान एमटीएल भाई की तरफ गया तो मैं थोड़ा हैरान हो गया क्यूंकी जहाँ तक मुझे याद है एमटीएल भाई मुझे देखने,मेरा हाल-चाल पुछने के लिए एक बार भी हॉस्पिटल नही आए थे...जो अपने आप मे ही एक चौकाने वाली बात थी...मैं अपने 1400 ग्राम के दिमाग़ को फ्लश बॅक मे ले गया ये कन्फर्म करने के लिए की क्या सच मे सीडार मुझसे मिलने नही आया या फिर वो मुझसे मिलने आया था,लेकिन अब मुझे याद नही है....

"पांडे अंकल,वर्मा जी,शर्मा जी,मॅतमॅटिक्स वाले सक्सेना सर, दीक्षित सर,वरुण,भू,नवीन, सुलभ,सौरभ,अमर सर, क्लास के सभी लड़के-लड़किया...विपिन भैया के कयि दोस्त....जब ये सब मुझे याद है तो फिर सीडार क्यूँ याद नही है...नाउ आइ आम स्योर कि एमटीएल भाई अभी तक मुझसे मिलने नही आए है....शायद घर मे होंगे ,"मैने ऐसा अंदाज़ा लगाया...लेकिन अपने सामने बैठे अरुण से पुच्छ ही बैठा कि सीडार अभी तक आया क्यूँ नही....

"क..क्या बोला तूने..."

"हकला क्यूँ रहा है..मैने पुछा कि सीडार अभी तक आया नही..."

"आया था ना, तुझे याद नही होगा..."

"सच ...क्या मुझे सच मे ये याद नही है कि एमटीएल भाई मुझसे मिलने आए भी थे या नही..."

"आए थे ना..."अपने सूखे होंठो को दांतो से दबाते हुए अरुण ने कहा....

ऐसा बोलते वक़्त वो कभी उपर देखता तो कभी नीचे,कभी दाए देखता तो कभी बाए...उसने बात को टालने के लिए मुझसे मेरे घाव के बारे मे पुच्छना शुरू कर दिया...लेकिन उसकी इस हरकत से मुझे ये हवा लग गयी थी ,लौंडा झूठ बोल रहा है....
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"अरुण, तू तो मेरे साथ हमेशा रहता है तो क्या तुझे ये नही मालूम कि मुझे हमे रिक्षन के बारे मे थोड़ी-बहुत जानकारी है...तेरे हाव-भाव से सॉफ मालूम चल रहा है कि तू झूठ बोल रहा है....खैर कोई बात नही ,आइसीयू से जाने के बाद एमटीएल भाई को कॉल करके बोल देना कि अरमान उन्हे पुच्छ रहा था...."

"ठीक है...ठीक है...मैं बोल दूँगा, मैं बोल दूँगा...."

"तेरे स्पीकर से एक ही लाइन दो-दो बार क्यूँ निकल रही है...मैने कहा ना कोई बात नही..."

"अरमान...आक्च्युयली बात ये है कि...."अपने होंठ को अपने दाँत से चबाते हुए अरुण ने मेरी आँखो मे देखा और कुच्छ बोलकर अपनी आँखे बंद कर ली....

अरुण ने जो कुच्छ भी कहा था वो मेरे कान को गरम लोहे की रोड की तरह भेदता हुआ मेरे कानो से पार हो गया....दिल के धड़कनो की रफ़्तार हद से ज़्यादा तेज़ हो गयी जिसकी वजह से मेरे बॉडी से कनेक्टेड मशीनो ने एक बार फिर अपना राग अलापना शुरू कर दिया था...आइसीयू के उस एर कंडीशनर रूम मे भी मेरा पूरा शरीर एक पल मे बहुत ज़्यादा गरम हो गया और मेरा दिमाग़ फिर से झन्ना उठा और मैने एक बार फिर से अरुण के कहे शब्दो को महसूस किया....
"सीडार भाई ,अब ज़िंदा नही है...दो दिन पहले उनकी एक आक्सिडेंट मे मौत हो चुकी है..."
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08-18-2019, 02:01 PM,
#83
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
मुझे कुच्छ समझ नही आया कि अरुण ने इस वक़्त जो कहा उसपर मैं कैसे रिएक्ट करूँ....ये अब तक की एक ऐसी घटना थी जिसे मैं सबसे बुरी घटना कह सकता था, मेरे दिल की धड़कने एक बार फिर से रेकॉर्ड तोड़ स्पीड के साथ चलने लगी थी....सीडार के मौत के बारे मे सुनते ही मुझे एक पल मे वो पल याद आने लगे ,जो मैने उसके साथ बिताए थे....उस एक पल मे जब मुझे उसके इस दुनिया मे ना होने की खबर मालूम हुई तो मुझे सच मे बहुत दुख हुआ, दिल और दिमाग़ दोनो से दुख हुआ....

सीडार से मेरी पहली मुलाक़ात तब हुई थी,जब मुझे उसकी सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, उस घटना को एक साल से अधिक बीत चुका था लेकिन मुझे अब भी याद है कि मेरी रॅगिंग लेकर कैसे वरुण और उसके दोस्तो ने मेरा बुरा हाल कर दिया था और तब मेरे उस बुरे वक़्त मे मेरा साथ देने के लिए एक अंजान शक्स आगे आ गया, जिससे मैं पहली बार मिला था....उसके बाद जो हुआ वो सब जानते है कि सीडार के दम पर मैने कैसे मेरी रॅगिंग लेने वालो को कुत्ते की तरह घसीट-घसीट कर मारा था...लेकिन अभी-अभी मुझे जो खबर मिली वो ये थी कि सीडार अब ज़िंदा नही है.....
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मुझे अब भी याद है कि कैसे मैं फर्स्ट एअर मे शेर बना घूमा करता था, इस बुनियाद पर कि यदि कुच्छ लफडा हो जाएगा तो एमटीएल भाई मुझे बचाने के लिए अपनी पूरी ताक़त लगा देंगे, मुझे अब भी याद है कि कैसे मैं कॅंटीन मे भर पेट खाने के बाद बिल सीडार के अकाउंट मे डलवा देता था...लेकिन उन्होने मुझसे कभी एक लफ्ज़ भी इस बारे मे नही कहा और ना ही मुझसे पुछा....लेकिन अभी-अभी मुझे मेरे खास दोस्त ने बताया था कि सीडार अब मर चुका है....
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मुझे अब भी अच्छे से याद है कि जब पोलीस स्टेशन मे मुझपर एफ.आइ.आर. होने की वजह से मेरे पसीने छूट रहे थे तो उस वक़्त अचानक सीडार बीच मे आया और मुझे बचा ले गया...उसके बाद उसी की मदद से मैने, मुझपर एफ.आइ.आर. करने वाले फर्स्ट एअर के दोनो लड़को को बहुत मारा था और बिना किसी परेशानी के उस पूरे झमेले से निकल गया था...लेकिन अब सच ये था कि मेरे कॅंटीन का बिल पे करने वाला,मुझे सारे झमेलो से बेदाग निकलने वाला सीडार अब ज़िंदा नही है....
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मुझे दुख इस बात का नही था कि अब मुझसे एक स्ट्रॉंग सपोर्ट छूट गया है, बल्कि मुझे दुख इस बात का है कि मेरा एक सबसे अच्छा दोस्त...जो मुझे हर वक़्त कयि नसीहत दिया करता था,जिसे मैं अपने बड़े भाई के समान मानता था,उसे मैं अब कभी नही देख पाउन्गा....अब मेरी पूरी ज़िंदगी मे शायद ही सीडार जैसा कोई मिले ,जो बिना कुच्छ सोचे, बिना अपनी परवाह किए...मेरे हर अच्छे-बुरे काम मे कंधे से कंधा मिला कर चलेगा...अब शायद ही मुझे कभी कोई मिले,जिसकी नसीहत,जिसकी सीख को मैं मानूँगा, सच तो ये था कि मैने एक बड़े भाई के समान अपना एक दोस्त खो दिया था...


सीडार मे वो सभी खूबिया थी जो हमेशा से मैं विपिन भैया के अंदर देखना चाहता था...सीडार मेरी ग़लत हरकतों पर मुझे डाइरेक्ट फटकार नही लगाता था ,बल्कि सबसे पहले वो मुझे मेरी उस ग़लत हरकत की वजह से खड़ी हुई मुसीबत से निकालता और फिर जब सब कुच्छ सही हो जाता तो मुझे समझाता कि मुझे ऐसा नही करना चाहिए...लेकिन अब सच तो ये था कि अब मुझे सही तरीके से समझाने वाला कोई नही था.....
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"कहीं सीडार की मौत मेरी वजह से तो नही हुई...यदि ऐसा हुआ तो मेरी ज़िंदगी हर दिन बाद से बदतर होता जाएगा...क्यूंकी ऐसा होने पर मैं भले ही उसकी मौत का ज़िम्मेदार ना ठहराया जाउ...लेकिन मेरा दिल और दिमाग़ मुझे जीने नही देगा कि सीडार की मौत का ज़िम्मेदार मैं हूँ...."

दिल की धड़कने इस वक़्त कम होने का नाम ही नही ले रही थी...बल्कि वो तो समय के साथ बढ़ते ही जा रही थी....
"ये सब कैसे हुआ..."घबराई हुई आवाज़ मे मैने अरुण से पुछा..

"एनटीपीसी मे कुच्छ हफ्ते पहले स्ट्राइक शुरू हुई थी पवर सप्लाइ को लेकर...जिससे एनटीपीसी को लगातार लॉस हो रहा था और जब ये बात सीडार को मालूम चली तो उसने स्ट्राइक शुरू कर दी ,जिसमे एनटीपीसी के कयि बड़े ऑफिसर्स उसके साथ थे...."

"फिर..."

"और फिर दो दिन पहले पूरे कॉलेज मे ये खबर फैल गयी कि स्ट्राइक करने वाले और पोलीस के बीच झड़प हो गयी है...उस झड़प मे कयि लोग मारे गये ,जिसमे से एक हमारा सीडार भी था...."
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बोलकर अरुण चुप हो गया और मैं भी गुम्सुम सा बेड पर लेटा रहा....बहुत देर तक हम दोनो मे कोई कुच्छ नही बोला और फिर अरुण ने ही चुप्पी तोड़ी...

"सीडार भाई की बॉडी अब भी इसी हॉस्पिटल मे है...."

"व्हाट "चौुक्ते हुए मैने अरुण की तरफ देखा....लेकिन कुच्छ बोला नही ,मेरे इस तरह से चौकने का कारण मेरा खास दोस्त अरुण मेरी शकल देख कर ही जान गया ,वो आगे बोला...

"सीडार की मौत के बाद वॉर्डन के मुँह से एक बहुत बड़ा सच हमे मालूम हुआ अरमान,जिसने हम सबको झकझोर के रख दिया था.."

"क्या..."अपने सीने पर हाथ फिराते हुए मैने पुछा...मैने अपने सीने को इसलिए सहलाया क्यूंकी आगे जो सच अरुण बताने वाला था ,वो सच,सच मे बहुत कड़वा होगा...ऐसा मैने अंदाज़ा लगा लिया था....

"सीडार एक अनाथ था, उसे अनाथ बच्चो को पालने वाली असोसियेशन ने पल-पोश कर बड़ा किया था और इस काबिल बनाया कि वो अपने पैरो पर खड़ा हो सके....कॉलेज मे ये सच सिर्फ़ हमारे प्रिन्सिपल और हॉस्टिल वॉर्डन को मालूम था और सीडार की मौत के बाद ये सच सबके सामने आया तो सबका कलेजा अपने मुँह को आ गया....किसी को यकीन नही हो रहा था की सीडार एक अनाथ था..."
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सीडार के अनाथ होने की खबर से जहाँ एक तरफ मेरे कलेजे का दुख दुगना हो गया वही दूसरी तरफ मुझे ,मेरे कयि छोटे सवालो का जवाब मिल गया था...मैं अक्सर एमटीएल भाई से पुछा करता था कि वो छुट्टियो मे घर क्यूँ नही जाते ?, क्या उन्हे हॉस्टिल मे अकेले वॉर्डन के साथ रहने मे ज़्यादा मज़ा आता है ? क्या आपके घर वाले आपको कुच्छ नही कहते ?
ऐसे ना जाने कितने सवाल मैं एमटीएल भाई से आए दिन पुछते रहता था और जवाब मे वो हर बार मेरे इन सवालो को मुस्कुरा कर टाल देते थे....और आज जब मुझे सच मालूम हुआ तो मुझे उनकी उस मुस्कुराहट के पीछे छिपे उस दर्द का अहसास हुआ,जिसे उन्होने कभी किसी के सामने ज़ाहिर नही किया था..... मैने ना जाने कितनी ही दफ़ा अंजाने मे ऐसे सवाल करके उनका दिल दुखाया था....मुझे अब भी याद है कि एक बार उन्होने मुझसे कहा था कि "अरमान यदि तू जनम से मेरा छोटा भाई होता तो मुझे बहुत खुशी होती....आइ लव यू यार..."
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"तो क्या तुम लोगो ने अनाथ बच्चो को सहारा देने वाली उस असोसियेशन को सीडार के बारे मे खबर नही दी..."

"दो दिन पहले ही उनको ये न्यूज़ हमने दे दी थी कि सीडार की मौत हो चुकी है लेकिन वो सीडार की बॉडी को लेने अब तक नही आए है..."

"आइ वान्ट सी हिम...नाउ"

"क्या..."झटका खाते हुए अरुण बोला

"हां, आइ वान्ट टू सी एमटीएल भाई...."

सीडार शायद ये भूल गया था कि कॉलेज के अंदर की लीडरशिप और बाहर की लीडरशिप मे बहुत डिफरेन्स होता है...कॉलेज के अंदर आप कुच्छ भी कर सकते है लेकिन कॉलेज के बाहर आपको कोई कुच्छ भी कर सकता है...सीडार से यही चूक हो गयी,वो एनटीपीसी की स्ट्राइक को कॉलेज के अंदर होने वाली स्ट्राइक समझ बैठा था,लेकिन वो स्ट्राइक करते वक़्त ये भूल चुका था मामला सरकार. से था जिनके हाथ मे पोलीस की बागडोर होती है...ना जाने क्यूँ मुझे ऐसा लग रहा था कि सीडार की मौत कोई कोयिन्सिडेन्स ना होकर फुल प्लॅनिंग मर्डर था...मैं सिर्फ़ ऐसा सोच सकता था कुच्छ कर नही सकता था और इस समय मैं सीडार की डेत बॉडी के सामने खड़ा उसको निहार रहा था....ये सच है कि मौत ,मरने वालो को इस दुनिया से आज़ाद कर देती है लेकिन एक सच ये भी है कि वही मौत उस मरने वाले से कयियो को जोड़ भी देती है....पता नही ,पर मुझे सीडार की बॉडी देखकर ना जाने ऐसा क्यूँ लग रहा था कि जैसे मेरी ज़िंदगी की बहुत बड़ी खुशी सीडार के साथ चली गयी है.....


किसी महान हस्ती ने कहा है कि“डेत एंड्स आ लाइफ, नोट आ रिलेशन्षिप.” और ये सच भी है ,क्यूंकी ढाई अक्षरो का शब्द "मौत" मुझसे ,सीडार को लाख कोशिशो के बावजूद भी अलग नही कर सकता था...मैं सीडार के साथ उस समय भी नही था जब वो कॉलेज छोड़ रहा था और मैं उसके साथ तब भी नही था जब वो ये दुनिया छोड़ रहा था....सीडार की मौत के तीन दिन बाद अनाथ बच्चो को पालने वाली उस असोसियेशन से एक आदमी हॉस्पिटल मे आया और उसने सीडार के शरीर को उन्ही पाँच तत्वो मे विलीन कर दिया जिन पाँच तत्वो से मिलकर उसका शरीर बना हुआ था और ये मेरी बदक़िस्मती थी कि उस आख़िरी वक़्त मे मैं वहाँ मौजूद नही था...क्यूंकी हॉस्पिटल के डॉक्टर्स ने विपिन भैया से सॉफ कह दिया था मुझे वहाँ नही जाना चाहिए.....और उस घटना के एक महीने से अधिक बीत जाने पर मैं पूरी तरह से ठीक हुआ , मेरे दोनो हाथ,दोनो पैर अब बिल्कुल सही-सलामत थे और पहले की तरह मज़बूत भी...मेरी कमर और शोल्डर भी अब पहले की तरह स्ट्रॉंग हो चुके थे...लेकिन हॉस्पिटल के उन आख़िरी दिनो मे मैने डॉक्टर्स को ये जताया कि अभी पूरी तरह से ठीक होने मे मुझे कुच्छ दिन का समय और लगेगा...डॉक्टर्स ने मेरी एक्स-रे रिपोर्ट देखी और मुझे ,मेरी हथेलियो को ओपन-क्लोज़ करने के लिए कहा तो मैने जान बूझकर वैसा नही किया और कहा कि मुझे ऐसा करने पर दर्द होता है....मेरी एक्स-रे रिपोर्ट देखकर डॉक्टर्स को जब यकीन हो गया की मैं अब पूरी तरह से ठीक हूँ तो उन्होने मुझे बिना किसी सहारे के चलने के लिए कहा और मैं जानबूझकर थोड़ी दूर चलने के बाद ज़मीन पर गिरा...ताकि उन्हे वो यकीन हो जाए जो मैं उन्हे यकीन दिलाना चाहता था....

"एक्स-रे रिपोर्ट के मुताबिक़ तो सब कुच्छ सही है...फिर तुझे प्राब्लम कहाँ हो रही है..."विपिन भैया ,जो कि इस समय मेरे पास बैठे थे उन्होने एक्स-रे रिपोर्ट उठाकर कहा...
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08-18-2019, 02:01 PM,
#84
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"शायद हड्डियो को पुरानी जगह पर फिट होने मे कुच्छ टाइम लगे..."

"मतलब कि मुझे कुच्छ दिन और यहाँ रुकना पड़ेगा...."रिपोर्ट को एक किनारे रखते हुए भैया ने कहा...

"अरे नही...आप क्यूँ रुकोगे, अब तो मैं नॉर्मल हूँ,अब आप घर जाओ...थोड़े दिन बाद मैं भी हॉस्टिल से चला जाउन्गा...."

"स्योर..."

"हां...आप जाओ"

"ठीक है तो मैं आज ही रात की ट्रेन से निकलता हूँ..."अपनी घड़ी पर टाइम देखते हुए उन्होने कहा"अरुण को मैं कॉल कर दूँगा ,वो कल आ जाएगा...."

"वो तो क्या ,उसका बाप भी आएगा..."

"क्या..."

"कुच्छ नही...आप जाने की तैयारी करो "
.
विपिन भैया को घर वापस भेजने के लिए मैं इतना उतावला इसलिए था क्यूंकी उनके यहाँ रहते तक मैं वो नही कर पाता जो मैं अब करने जा रहा था...जो मैं अब करने वाला था उसके लिए बड़े भैया का इस शहर से जाना बहुत ज़रूरी था और इसीलिए मैने बहुत ज़ोर देकर उन्हे जाने के लिए कहा...

दूसरे दिन अरुण मुझ से मिलने आया और आते ही उसने मेरे बेड के बगल मे रखी टेबल के उपर देखा कि कुच्छ खाने-पीने का समान रखा है या नही और जब उसे कुच्छ नही मिला तो मेरे सर के छोटे-छोटे बाल को खींच कर बोला...
"पूरा खा गया टकले,कुच्छ तो मेरे लिए छोड़ा होता...."

"अभी लंच आया नही ,आता होगा थोड़ी देर मे...."

"चल सही है...वैसे भी मुझे इस वक़्त सॉलिड भूख लग रही है..."

"बाइक पर आया है क्या..."

"और नही तो क्या हॉस्टिल से 20 किलोमेटेर पैदल आउन्गा...टकले तेरा दिमाग़ आजकल काम नही कर रहा है क्या..."

"गुड, मैं बहुत दिनो से इस मौके की तालश मे था..."एक पल मे कूदकर खड़ा होते हुए मैने कहा...

"बीसी...ये क्या था बे...कल तक तो तू ढंग से चल भी नही पा रहा था और आज एक दम से कूद कर खड़ा हो गया...."

"वो सब तू अभी नही समझेगा.."हॉस्पिटल द्वारा मुझे दी गयी मरीज़ो की ड्रेस उतारते हुए मैने वो कपड़े पहने जो मेरा भाई मुझे देकर गया था....

"साला कल तो एक चम्मच पकड़ते वक़्त तू दर्द से कराह रहा था और आज तो तुझे देखकर लगता है कि अभिच अपने हाथो से मूठ मार लेगा... "

"वो मैं नही कर सकता..."

"क्यूँ..."

"क्यूंकी कल रात ही मैने मूठ मारा है...ला बाइक की चाभी दे..."

"चूतिया है क्या...अगर कोई तुझे देखने आ गया तो..."

"अबे ये आइसीयू नही है जहाँ हर 15 मिनिट्स मे मुझे देखने कोई ना कोई आता रहेगा...इतने दिन बेड पर झूठी आक्टिंग करते हुए मैने जो नोटीस किया है उसके अनुसार अभी एक बार लंच सर्व करने के लिए हॉस्पिटल वाले आएँगे और फिर लंच देने के एक घंटे बाद ये देखने आएँगे कि मैं गोली,दवाई सही टाइम पर ले ली या नही....तो जब वो खाना देने आएँगे तो उनसे कहना कि मैं बाथरूम गया हूँ और जब वो एक घंटे बाद दोबारा आएँगे तो ये बोलना कि मैं फिर से बाथरूम गया हुआ हूँ....समझा"

"कुच्छ नही समझा, सीधे से लेट जा ...और वैसे तू कहाँ जाने की प्लॅनिंग कर रहा है..."मेरे हाथ से चाभी छीनते हुए अरुण ने पुछा....

"यदि मैने तुझे ये बता दिया तो तू मुझे जाने नही देगा और यदि तूने बिना सवाल-जवाब किए मुझे जाने दिया तो तुझे मैं वापस लौटने पर बहुत बड़ी खुशख़बरी दूँगा....सोच ले"बेड पर वापस बैठकर मैने कहा...
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अरुण कुच्छ देर तक किसी सोच मे डूबा रहा और फिर मुझे बाइक की चाभी पकड़ाते हुए बोला"जहाँ जाएगा,वहाँ से खाना खाकर आना...क्यूंकी तेरा लंच तो मैं सफ़ा चट करने वाला हूँ..."

"ओके...अपना मोबाइल, वॉलेट भी दे.."

"वो क्यूँ..."तीसरी बार चौक कर अरुण ने पुछा...

"तेरे लिए लड़की जुगाड़ करने जा रहा हूँ...अब जल्दी से वॉलेट और मोबाइल निकल...."
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हॉस्पिटल से बाहर आकर मैं जब पार्किंग की तरफ बढ़ा तब मुझे ध्यान आया कि मैने अरुण से बाइक का नंबर तो पुछा ही नही और मोबाइल अपने साथ ले आया हूँ तो अब उसे कॉल भी नही कर सकता....

"शायद उसने पार्किंग की स्लिप अपने पर्स मे डाली हो... "क्या करूँ ,क्या ना करूँ की उस अजीब सी उलझन मे फँसे मेरे 1400 ग्राम के दिमाग़ की बत्ती जैसे एका एक जली और तुरंत अरुण का वॉलेट निकाल कर चेक किया ...जिसमे मुझे अरुण की बाइक की स्लिप मिल गयी और मैं बाइक लेकर सीधे हॉस्पिटल से बाहर निकला

मेरा पहला टारगेट था नौशाद,क्यूंकी नौशाद को सबक सिखाने के लिए आज से अच्छा मौका मुझे कभी नही मिलता और इस वक़्त सारी सिचुयेशन ,सारी कंडीशन सेम वैसी ही थी जैसा कि मैने सोचा था...यहाँ तक कि अट्मॉस्फियरिक टेम्परेचर भी
हॉस्टिल की तरफ जाते वक़्त मैं उसी मेडिकल स्टोर के पास रुका,जहाँ से मैने दीपिका के लिए कॉंडम खरीदा था

"एक पॅड देना...."मेडिकल स्टोर वाले लड़के से मैने कहा

"कौन सा दूं, विस्पर या फिर स्टायफ्री...."

विस्पर और स्टायफ्री का नाम जब उस मेडिकल स्टोर वाले लड़के ने लिया तो मुझे अपनी ग़लती का अहसास हुआ लेकिन मैं अपनी ग़लती सुधारता उससे पहले ही वो मेडिकल स्टोर वाला लड़का बोल पड़ा...

"आइ नो..गर्लफ्रेंड के लिए चाहिए ना...भाई एक सजेशन है ,फोन करके पुच्छ ले उससे कि उसकी पसंद क्या है मतलब कि किस ब्रांड का पॅड वो यूज़ करती है...."

उसके ऐसा बोलने पर मैने अपनी आँखे छोटी की और उसे कुच्छ सेकेंड्स तक घूरता रहा.दिल किया कि साले का सर पकड़ कर सारे बाल नोच डालु और अपनी तरह टकला बना दूं...दिल किया कि सीधे उसका सर पकडू और बाहर खींचकर उसपर लातों की बारिश कर दूं....लेकिन मैने ऐसा नही किया क्यूंकी मुझे अपनी एनर्जी नौशाद के लिए बचा कर रखनी थी...

"गॉज़ पॅड देना बोले तो पट्टी और रूई भी देना...."

जब मैने उससे लड़कियो वाले पॅड की जगह दूसरा पॅड माँगा तो अबकी बार उसने अपनी आखे छोटी कर ली और कुच्छ सेकेंड्स तक मुझे घूरता रहा....

"तू समान देगा या मैं दूसरे दुकान से जाकर ले लूँ..."

"देता हूँ...देता हूँ..."
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उस मेडिकल स्टोर से निकल कर मैं फिर से हॉस्टिल की तरफ बढ़ने लगा और जैसे ही हॉस्टिल के करीब पहुचा तो मैने बाइक एक साइड रोक दी और अरुण का मोबाइल निकाल कर ,अमर सर को कॉल किया...

"मैं आ गया हूँ..."मैने कहा

"कहाँ है..."

"यही एस.पी. के बंगलों से थोड़ी दूर खड़ा हूँ..."

"ठीक है ,वही रुक मैं आता हूँ..."बोलकर अमर सर ने फोन काट दिया...
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वैसे तो मैं जो भी प्लान सोचता हूँ ,किसी को लेकर मैं जो भी स्ट्रॅटजी बनाता हूँ,उसकी खबर शुरुआत मे सिर्फ़ मुझे और मेरे दिमाग़ को होती है...लेकिन इस बार मेरे स्ट्रॅटजी ,मेरे प्लान की खबर अमर सर को भी थी...क्यूंकी वो इस प्लान मे बहुत इंपॉर्टेंट रोल प्ले कर रहे थे....बड़े भैया के मोबाइल से अक्सर रात को 12 बजे के बाद मैं अमर सर को कॉल करके उनसे नौशाद की खबर लेता रहता था और दो दिन पहले ही उन्होने मुझे बताया था कि इन दिनो मिड टर्म चल रहे है और नौशाद मिड टर्म देने ना जाकर पूरे दिन हॉस्टिल मे रहता है...यही सबसे सही मौका था क्यूंकी अकॉरडिंग टू माइ प्लान, मैने नौशाद को हॉस्टिल मे ठोका...ये बात जितने कम लोगो को मालूम चले ये उतना ही मेरे लिए सही था.जब मुझे सड़क के किनारे बाइक खड़े किए हुए कुच्छ देर बीत गई तो मैने सामने की तरफ नज़र डाली और अमर सर मुझे दूर, आते हुए दिख गये...

"क्या हाल है ,अरमान सर...बहुत दिन लगा दिए हॉस्टिल आने मे..."

"हॉस्पिटल की नर्सस को मुझसे प्यार हो गया है,साली डिसचार्ज ही नही करती...."मुस्कुराते हुए मैने कहा...

"ये ले खून की डिब्बी..."एक छ्होटी से डिब्बी मेरे हाथ मे पकड़ाते हुए अमर सर ने कहा"अब जा और छोड़ना मत साले को...*** चोद देना उस बीसी ,एमकेएल की....बेस्ट ऑफ लक..."

"लक तो मेरे ही हाथ मे है इसलिए यदि बोलना है तो ऑल दा बेस्ट बोलो..."

"ठीक है भाई,जैसी तेरी मर्ज़ी...ऑल दा बेस्ट...और सुन"

"टेलो..."

"सिर्फ़ आधा घंटा है तेरे पास क्यूंकी उसके बाद लड़के कॉलेज से हॉस्टिल आना शुरू कर देंगे..."

"डॉन'ट वरी..."बाइक स्टार्ट करके मैने स्कार्फ से अपना फेस बाँधा और बोला"मेरे पास जुगाड़ है..."
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कॉलेज मे सीनियर्स के मिड टर्म चल रहे थे ,इसलिए हॉस्टिल लगभग खाली ही था...लेकिन कुच्छ लौन्डे ऐसे होते है जिन्हे कॉलेज के मिड टर्म से कोई फ़र्क नही पड़ता और वो पूरे दिन हॉस्टिल मे रहकर खटिया तोड़ते रहते है.नौशाद उनमे से एक था. और भी कयि लड़के थे जो कॉलेज ना जाकर हॉस्टिल मे मौज़ूद थे...जिसमे से मेरा दोस्त सौरभ भी एक था और उसे इसकी भी जानकारी थी कि मैं आज यहाँ आने वाला हूँ....
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आज महीनो बाद हॉस्टिल को देखकर सीडार की याद खुद ब खुद आ गयी लेकिन मैने सीडार की यादों को अपने जहाँ से निकाल कर बाहर फेका क्यूंकी ये वक़्त किसी की याद मे दुखी होने का नही था और जब मैं इसमे कामयाब हुआ यानी कि खुद से सीडार की यादों को दूर करने के बाद मैने अपने फेस को स्कार्फ से बाँधे हुए अपने रूम की तरफ बढ़ा,जहाँ मेरा खास दोस्त सौरभ, मेरे दूसरे खास दोस्त सुलभ के साथ बैठा तब से मेरा इंतज़ार कर रहा था,जब से मैने उन्हे कॉल करके बताया था कि मैं हॉस्टिल आ रहा हूँ.....जब मैं अपने रूम की तरफ जा रहा था तो मुझे हॉस्टिल मे रहने वाले कुच्छ लड़को ने देखा लेकिन वो इतने जल्दी मे थे कि मुझे पहचान तक नही पाए..मुझे ना पहचान पाने की एक वजह शायद ये भी हो सकती है कि मैने उस वक़्त अपने चेहरे और सर को स्कार्फ से बँधा हुआ था....


अपने रूम की तरफ जाते हुए मैने ये सोचा था कि जाकर उन दोनो कामीनो से मैं गले मिलूँगा जिसके बाद दोनो शुरू मे मेरा हाल पुछेन्गे और फिर मेरे सर पर हाथ फिरकर मुझे टकलू-टकलू कहेंगे....लेकिन अंदर जाकर ना तो मैं उनसे गले मिला और ना ही उनका हाल पुछा....

"साले ,तू मेरे बिस्तर पर लेटकर मूठ मार मार रहा है उठ भोसडी के वहाँ से..."

मेरे अचानक रूम के अंदर आने से और मेरी तेज़ आवाज़ के कारण सौरभ बौखला गया और जल्दी से अपने पैंट को,जो कि घुटनो तक खिसक गया था,उसे कमर के उपर लाते हुए मेरी तरफ बढ़ा...

"कैसा है अरमान..."अपना एक हाथ मेरी तरफ बढ़ाते हुए सौरभ ने मेरा हाल पुछा....

"पीछे हट और लवडे मुझे छुना मत...साला जिस हाथ से मूठ मारता है उसी हाथ से हाथ मिलाता है..."अपने बिस्तर की बेडशीट को किनारे से पकड़ कर मैने खींचा और उसकी गठरी बनाकर सौरभ के मुँह पर दे मारा"बेटा इसे धो देना और सुलभ कहा है..."

"वो बाथरूम मे कर रहा है "

"वेरी गुड, लवडा मैं यहाँ इतने बड़े मिशन मे निकला हूँ और तुम दोनो यहाँ ये सब कर रहे हो...."

सौरभ को मैने बहुत सुनाया और जब सुलभ बाथरूम को स्पर्म डोनेट करके रूम मे आया तो मैने उसे भी बहुत गाली बाकी और फिर काम की बात करने लगे...

"नौशाद कहाँ है इस वक़्त..."उसका नाम लेते ही मेरा खून खौलने लगा ,क्यूंकी अब मुझे वो सब कुछ याद आने लगा था...जिसकी वजह से मैं 3 महीने से अधिक हॉस्पिटल मे पड़ा रहा था...उस दिन मुझे जितने भी ज़ख़्म मिले थे वो अब एक-एक करके हरे होते जा रहे थे....जब मेरे सारे ज़ख़्म एक-एक करके हरे हो रहे थे तो उसी वक़्त सौरभ ने मुझे सर्क्युलर शेप का लोहे का एक टुकड़ा दिया

"ये कहाँ से लाया ,मैने तो ड्यूस बॉल माँगा था..."

"कॉलेज के वर्कशॉप से चोरी कर लिया और वैसे भी ये ड्यूस बॉल से ज़्यादा हार्ड और भारी है...जिसको भी पड़ेगा उसका सर फॅट जाएगा..."

"ठीक है"सौरभ के हाथ से मैने बॉल ली...बॉल सच मे हद से ज़्यादा भारी थी...बॉल को अपने हाथो मे लेकर मैने सौरभ से रोड के बारे मे पुछा...

"रोड का जुगाड़ नही हो पाया ,लेकिन हॉकी स्टिक दरवाजे के पीछे छुपा दी है...."

"चल कोई बात नही..."रूम के बाहर आते हुए मैं बोला"और अपनी आँखे खुली रखना और जैसे ही नौशाद बाथरूम मे घुसे ,काम मे लग जाना..."
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सौरभ और सुलभ को हिदायत देने के बाद मैं उस फ्लोर के बाथरूम की तरफ बढ़ा...नौशाद का रूम बाथरूम के बगल मे था इसलिए वहाँ से गुज़रते वक़्त मैने नौशाद के रूम मे नज़र डाली तो देखा कि वो लोग दिन दहाड़े दारू पी रहे थे....यानी कि मेरा काम अब और भी आसान होने वाला था...

मैं बाथरूम के अंदर गया और दरवाजे की ओट मे खड़ा होकर अपने जेब से खून की डिब्बी निकाली और उसे रूई पर डालकर मैने रूई को अच्छी तरह से खून मे भिगोया और अपने दाहिने हाथ मे खून से सनी रूई को रखकर उसपर पट्टी बाँध दिया....अब मुझे इंतज़ार था कि कब नौशाद बाथरूम मे आए और मैं उसके सर पर लोहे की ये बॉल सीधे फेक कर मारू...लेकिन उसी वक़्त मेरे दिमाग़ मे ख़यालात कौंधा कि...कही इतने भारी वजन के बॉल से नौशाद की मौत ना हो जाए.....

मैने उस लोहे की बॉल को अपने दोनो हाथो से उछाला तभी अचानक मुझे बॅस्केटबॉल की याद आ गयी और मैने सामने वाली दीवार पर खून से एक गोला बनाया और खून से बने उस गोले के अंदर बॉल को फेकने लगा...मेरा निशाना अब भी पहले की तरह अचूक था ये जानकार मुझे थोड़ा प्राउड फील हुआ...नौशाद का इंतज़ार करते हुए जब मैं बॉल को खून से बने उस गोले पर निशाना साध रहा था तो मुझे वो दिन याद आ रहा था ,जब मुझे दीपिका मॅम ने बुरी तरह उन गुन्डो के बीच फँसा दिया था...मुझे वो पल याद आ रहा था जब नौशाद को मैने कॉल किया था और उसने मुझे "चूतिया" कहकर फोन रख दिया था.....उस निशान के अंदर बॉल को बार-बार डालते हुए मैं अमर सर के बारे मे भी सोच रहा था, जो एक समय नौशाद के खास दोस्तो मे से थे लेकिन जब से मैने उन्हे ये बताया था कि उस दिन मेरी जो हालत हुई उसका ज़िम्मेदार नौशाद है तो उनका चेहरा तमतमा उठा था और उन्होने मुझसे कहा कि "वो अभिच हॉस्टिल जाकर उस साले ,एमसी नौशाद को ज़िंदा दफ़ना देंगे...."

उनके उस दिन के अंग्री यंग मॅन रूप को देखकर मैं डर गया था ,क्यूंकी अमर सर विदाउट एनी प्लान ,नौशाद पर अटॅक कर देते और बाद मे फस जाते...जो मैं नही चाहता था....उन्हे उस दिन रोकने की एक और वजह ये भी थी मैं नौशाद को अपने हाथो से लाल करना चाहता था....
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जब भी कोई दोस्त,दोस्ती...फ्रेंड ,फ्रेंडशिप के बारे मे बात करता है तो मेरी सोच अरुण,सौरभ,सुलभ से शुरू होकर इन्ही तीनो पर ख़तम हो जाती है और जब भी कोई अपने दोस्त की बात मेरे सामने करता है तो मैं उनके उस दोस्त को अपने दोस्तो से कंपेर करता हूँ, मुझे ऐसा लगता है जैसे कि उसके दोस्त भी अरुण,सुलभ और सौरभ की तरह होंगे...इसीलिए जब मुझे नौशाद और अमर सिर की दोस्ती के बारे मे पता चला तो मैं कुच्छ देर के लिए थोड़ा मुश्किल मे पड़ गया था कि कही अमर ,नौशाद का साथ ना दे...लेकिन हक़ीक़त मेरी शंका के विपरीत थी....उस दिन हॉस्पिटल मे जब मेरे एक हाथ से प्लास्टर उतारा गया था और अमर सर मुझसे मिलने आए थे तो उन्होने कहा था कि "अरमान...नौशाद बहुत सेल्फिश है मौका पड़ने पर वो मुझे भी इस्तेमाल करके कॉंडम की तरह फेक सकता है...इसलिए मैं तेरे साथ हूँ...."
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"ये साले सौरभ और सुलभ ने नौशाद को इधर नही भेजा...कुत्तो कर क्या रहे हो...भूल तो नही गये..."खुद से बाते करते हुए मैने अपने चेहरे से स्कार्फ उतारा और नौशाद का इंतज़ार करने लगा और आख़िरकार वो वक़्त भी आ गया ,जब नौशाद सिगरेट के छल्ले उड़ाते हुए बाथरूम मे घुसा....वो एक गाना गुनगुनाते हुए सिगरेट पी रहा था....बाथरूम के अंदर आकर नौशाद एक तरफ अपने पैंट की ज़िप खोल कर खड़ा हो गया

"हाउ आर यू, नौशाद सर..."पट्टी का आख़िरी सिरा बाँधते हुए मैं बोला....

नौशाद ने पीछे मुड़कर मुझे देखा और मुझे देखते ही साले की पेशाब रुक गयी ,अपना मुँह फाड़कर वो मुझे देखने लगा....वो कभी मुझे देखता ,तो कभी मेरे दाहिने हाथ मे खून से सनी पट्टी को और बाद मे उसने बाथरूम के गेट की तरफ देखा...जो नौशाद के अंदर घुसने के तुरंत बाद ही बाहर से बंद हो चुका था...बाथरूम के दरवाजे के साथ-साथ ही उस फ्लोर मे जितने रूम थे उनके गेट को भी सौरभ और सुलभ ने बाहर से लॉक कर दिया था...ताकि जब बाथरूम मे धूम-धड़ाका हो तो कोई भी अपने रूम से निकल कर मुझे डिस्टर्ब ना करे....
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" दरवाजा बाहर से बंद है एमसी...अब उधर क्या देख रहा है..."बॉल को ज़मीन पर पटक कर मैने पीछे दीवार के सहारे टिकाए हुए हॉकी स्टिक पर अपना हाथ जमाया लेकिन अपना हाथ पीछे ही रखा ताकि नौशाद को मालूम ना चले कि मेरे पास हॉकी स्टिक है...
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"तू अरमान है ना..."अपनी आँखे मलते हुए नौशाद ने मुझसे पुछा...

"क्यूँ, गान्ड फट गयी ना नाम सुन कर..."

"बीसी...अरमान ही है तू, तू यहाँ क्या कर रहा है..."

"तेरी ***** चोदने आया हूँ...जा बुला कर ला..."

नौशाद का आधा होश दारू ने उड़ा रखा था और उसका आधा होश मेरी इस गाली ने उड़ा दिया....वो ये भूल गया कि जब मैं यहाँ आया हूँ तो कुच्छ तो सोचकर ही आया होऊँगा..

नौशाद मेरी गाली से एक दम तमतमा गया और मेरी तरफ दौड़ा और तभिच मैने अपने हाथो मे रखे हॉकी स्टिक को पकड़ा और अपनी तरफ आते हुए नौशाद के थोबडे पर धौंस दिया...जिसके बाद वो लड़खड़ा कर एक किनारे गिर पड़ा...लेकिन उस बीसी मे दम था,वो मुझे मारने के लिए तुरंत उसी वक़्त उठ खड़ा हुआ और मैं अबकी बार उसे हॉकी स्टिक से ठोकता उसके पहले ही उसने अपना सर झुकाया और दोनो हाथो से मेरी कमर को पकड़ कर मुझे दीवार की तरफ धक्का दे दिया जिसकी वजह से मेरा सर दीवार से टकरा गया....
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"रुक लवडे अभी तुझे बताता हूँ..."नौशाद को गाली बकते हुए मैं दीवार से हटा ही था कि नौशाद ने फिर से अपना सर झुकाया और दोनो हाथो से मुझे दीवार पर एक और बार ज़ोर से धकेला ,जिसके कारण मेरा सर और पीठ एक बार फिर दीवार से बुरी तरह टकराया....

"बीसी...ये तो ववे खेल रहा है "
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मैने जल्दी ही खुद को संभाल लिया और एक दम सीधे खड़ा हुआ...नौशाद ने इस बार भी वही पैतरा आजमाना चाहा लेकिन अबकी बार मैने साले के सर के बाल को ज़ोर से पकड़ लिया और अपनी पूरी ताक़त से उखाड़ने लगा...मैने सोचा था कि अबकी बार नौशाद कामयाब नही होगा लेकिन उस साले के अंदर शराब पीने के बाद भी बहुत दम था उसने पहले मेरे दाहिने हाथ मे खून से सनी पट्टी को ये सोचकर ज़ोर से दबाया कि ,वहाँ सच मे कोई घाव है और उसके ज़ोर से दबाने के कारण मैं दर्द से कराहते हुए उसके सर के बाल छोड़ दूँगा...लेकिन हक़ीक़त तो ये थी कि ना तो मेरे दाहिने हाथ मे कोई घाव था और ना ही मैने उसका बाल छोड़ा...बल्कि और भी तेज़ी से उसके सर के बाल खींचने लगा...नौशाद ज़ोर से चिल्लाया और आख़िर मे जब उसके सर के एक तिहाई बाल मेरे हाथ मे आ गये तो उसने एक बार फिर ववे का पैतरा अपनाया मुझे दीवार पर ज़ोर से धकेला...

"साला तूने मुझे समझ क्या रखा है..."उसके सर को पकड़ कर मैने उसका सर दीवार से दे मारा और नीचे पड़ी हॉकी स्टिक उठाकर पूरी ताक़त से उसके पीठ पर मारना शुरू कर दिया....अब नौशाद ढीला पड़ने लगा था, उसका शरीर पस्त होने लगा और वो वही लेट गया....

"बोला था एमसी कि अपनी गान्ड संभाल कर रख वरना ऐसी गान्ड मारूँगा कि मुँह से सब कुच्छ करना पड़ेगा..."

नौशाद कुच्छ नही बोला और अपनी आँखे बंद कर ली ,जिसके बाद मैने उसके बॉडी के हर उस अंग को तोड़ा जो मेरा टूटा था....हॉकी स्टिक से मारते-मारते जब मैं थक गया तो बेहोश हो चुके नौशाद को मैने दीवार के सहारे टिकाया और लोहे की उस बॉल को उठाकर कर उससे थोड़ी दूर जाकर खड़ा हो गया....

"अपने सर को बॅस्केटबॉल कोर्ट मे लगा रिंग समझ और ये लोहे की भारी भरकम बॉल जो मेरे हाथ मे है ,उसे बॅस्केटबॉल समझ..."बेहोश हो चुके नौशाद को देखकर मैने कहा...और उसके सर को निशाना बनाकर लोहे की बॉल उच्छाल दी...बॉल सीधे उसके सर से टकराई और खट्ट की आवाज़ हुई...जिसके बाद उसके सर से खून बहने लगा....

मुझे उसे अब छोड़ देना चाहिए था ,लेकिन मुझे अब मज़ा आने लगा था...मैने कयि बार ऐसे ही उसके सर को लोहे की बॉल से फोड़ा और आख़िरी मे उसके फेस पर दे मारी...बॉल सीधे जाकर उसके नाक के नीचे लगी.एक बार फिर वही जानी पहचानी आवाज़ हुई और वही जाना पहचाना लाल रंग उसके मुँह और नाक से निकला....

"बीसी ...अब जाकर हॉस्पिटल मे तीन महीने तू भी उसी तरह सडेगा..जैसे मैं सड़ा था...तू भी अब इस सेमेस्टर का एग्ज़ॅम नही दे पाएगा,जैसे कि मैं नही दे पाया था...."नौशाद को बुरी तरह पीटने के बाद भी जब मेरी हसरत पूरी नही हुई तो मैने उसके सर के बाकी बचे बाल को पकड़ कर वही घसीटना शुरू कर दिया और बाथरूम की खिड़की खोलकर नौशाद को वहाँ से नीचे फेक दिया....
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08-18-2019, 02:02 PM,
#85
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
नौशाद को मारने के बाद मैं सीधे हॉस्पिटल पहुचा,जहाँ अरुण मामला संभाले हुए था....

"आ गया लवडे,कहाँ मार रहा था..."मुझे देखते ही अरुण ने पुछा...

"मरने नही मार कर आ रहा हूँ,नौशाद को और साइड चल...आराम करने दे..."हॉस्पिटल की ड्रेस पहनकर मैने तीन-चार ग्लास पानी पिया और बिस्तर पर गिर पड़ा.....

बिस्तर पर लेटे-लेटे मैं सोच रहा था कि उस रंडी का क्या हाल होगा जब उसके कान मे नौशाद की ठुकाई की खबर पड़ेगी....साली जहाँ होगी वही मेरा नाम सुनकर मूत देगी, बीसी कुतिया,...छिनार.

मैं बिस्तर पर लेटा हुआ था और मैं ,नौशाद को ठोक कर आ रहा हूँ,ये सुनकर अरुण का दिमाग़ भी बस लेटने वाला था...वो इस समय हद से ज़्यादा शॉक्ड था...

"मैने सोचा था कि,तेरा सिगरेट,दारू पीने का मन हो रहा होगा और तू ये सब हॉस्पिटल के अंदर पी नही सकता इसलिए मुझे यहाँ की रखवाली सौंप कर बाहर चला गया है...लेकिन मुझे ये नही मालूम था कि तू मुझे चोदु बनाकर लड़ने गया था...."गुस्सा होते हुए अरुण बोला

" मैने यदि तुझे बताया होता कि मैं कहाँ जा रहा हूँ तो तू यक़ीनन मुझे नही जाने देता...इसलिए तुझे चोदु बनाना पड़ा..."वापस बिस्तर पर बैठते हुए मैने कहा"साले तू खुश नही है क्या..."

"खुशी....माइ लंड..."

उसके बाद अरुण वहाँ एक पल भी नही रुका और मुझे बुरा-भला बोलकर वहाँ से चला गया....

मेरा वो काम हो चुका था,जो मैं हॉस्पिटल मे रहकर करना चाहता था और मैं अब जल्द से जल्द यहाँ से निकलने के फिराक़ मे था, इसलिए जब शाम को सोते वक़्त एक नर्स राउंड पर आई तो मैने तुरंत लाइट जला दी....

"तुम सोए नही अभी तक..."

"तू भी तो नही सोई है अभी तक जानेमन...आजा प्यार करते है..."ऐसा मैं बोलना चाहता था...लेकिन बोल नही पाया

"लाइट बंद करो और सो जाओ..."अंदर आते हुए नर्स ने कहा और मेरे बिस्तर के सिरहाने के पास जो डेस्क रखी हुई थी,उसके उपर ये देखने लगी कि मैने दवाई ले ली है या नही....

"मैं यहाँ से हॉस्टिल कब जाउन्गा..."

"जब ढंग से चलने लगोगे तब..."

"चल तो मैं कब से रहा हूँ, अब बोलो तो दौड़ कर दिखाऊ..."नर्स को बैठने का इशारा करते हुए मैं बोला...

"अभी कुच्छ करने की ज़रूरत नही है, अभी फिलहाल सो जाओ...कल सुबह डॉक्टर को दिखाना...."खड़े-खड़े ही उस नर्स ने मुझसे कहा...

वो शायद समझ गयी थी कि मुझे नींद नही आ रही है और मैं उससे टाइम पास करने के मूड मे हूँ...

"ओके आंटी "

ये सुनकर रूम से बाहर जाते उसके कदम जहाँ थे वही रुक गये और मुझे घूरते हुए उसने कहा"क्या बोला... "

"कुच्छ नही..."मैने फटाक से बल्ब का स्विच ऑफ किया और चादर तानकर लेट गया....
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यदि मेरी याददाश्त सही है ,जो कि हमेशा ही सही रहती है,तो जिस दिन मैने नौशाद को मारा था उसके चार दिन बाद हॉस्पिटल से मुझे डिसचार्ज कर दिया गया और मैं खुशी-खुशी हॉस्टिल पहुचा...हॉस्टिल मे मेरा स्वागत बड़े जोरो-शॉरो से हुआ . जिस दिन मैं हॉस्पिटल से डिसचार्ज होकर हॉस्टिल पहुचा था...उस दिन ,रात को हॉस्टिल मे बहुत बड़ा केक काटा गया था...हॉस्टिल के लौन्डे मुझे देखकर ऐसे खुश हो रहे थे ,जैसे कि कोई योद्धा ,जंग जीत कर आया हो और जब पार्टी ख़तम हुई तो मेरे करीबी मुझे एक-एक करके ये बताने लगे कि पिछले 3 महीनो मे हॉस्टिल मे क्या-क्या हुआ है...कुच्छ मुझे ये बता रहे थे कि हॉस्टिल के हर कमरे मे नये पंखे लगे है और खिड़किया सुधारवा दी गयी है तो कुच्छ मुझे ये बता रहे थे कि कैसे फलाना लौन्डे ने अपने बर्तडे के दिन उन्हे भरपेट दारू पिलाई थी...
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"यदि मेरा अनुमान सही है तो ये रूम नौशाद का ही है ना..."अपने रूम की तरफ जाते हुए जब मैं नौशाद के रूम के पास पहुँचा तो वहाँ रुक कर हॉस्टिल के लड़को से पुछा"इसके रूम मे ताला क्यूँ लगा है..."

"अरे अरमान भैया....बीसी को पता नही किसने मारकर हॉस्टिल के पीछे जंगल मे फेक दिया था...किस्मत थी साले की जो बच गया "राजश्री पांडे जो मेरे पीछे खड़ा था वो आगे आते हुए बोला"उसके बाद से नौशाद के रूम पार्ट्नर्स की फॅट गयी और उन्होने हॉस्टिल छोड़ दिया...उन सबका कहना है कि हॉस्टिल के लड़को ने मिलकर नौशाद को मारा था...."

"सब साले गे है,"बोलते हुए मैं अपने रूम की तरफ बढ़ गया,जहाँ अमर सर,पहले से मौज़ूद थे....मुझे इतने सारे लौन्डो के साथ देखकर उन्होने मुझे इशारा किया कि वो मुझसे अकेले मे बात करना चाहते है...

"ठीक है भाई लोग...अब आप सभी यहाँ से खिसकिये और जिस लड़की को भी चोदने का दिल करता है, उसे अपने ख्वाबो मे चोदो और मूठ मारो....गुड नाइट,स्वीट ड्रीम...लव यू ऑल..."उनके जाने के बाद मैं अमर भाई की तरफ घूमा"हां बोलो..."

"एक बुरी खबर है...या फिर कहे तो दो बुरी खबर है..."

"अब क्या हुआ..."

"पहली बुरी खबर ये कि नौशाद को होश आ चुका है और दूसरी बुरी खबर ये कि उसने पोलीस को तेरे खिलाफ बयान दिया है...."

"आप टेन्षन मत लो, मैं संभाल लूँगा...."

"यह !मैं जानता हूँ कि तू सब संभाल लेगा...चल बाइ, गुड नाइट..."

"गुड नाइट..."
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अमर के जाने के बाद मैने रूम अंदर से बंद कर लिया,क्यूंकी मैं नही चाहता था कि अब ,जब मैं खुद को पोलीस से बचाने के बारे मे सोच रहा हूँ तो कोई नमूना आकर मुझे डिस्टरब कर दे....

अमर के जाने के बाद मैने बहुत सोचा...आधे घंटे तक लगभग मैं यही सोचता रहा कि अब आगे क्या करना है और आधे घंटे बाद मुझे मालूम चला कि इस केस मे कुच्छ सोचने की ज़रूरत ही नही है...जो हुआ सारी दुनिया के सामने हुआ...मतलब की सबको पता है कि जब नौशाद की हॉस्टिल मे ठुकाई हुई तो मैं हॉस्पिटल मे अड्मिट था...

जब मैं नौशाद वाली झंझट से अलग हुआ तो मेरा ध्यान मेरे रूम मे रहने वाले मेरे दोनो खास दोस्तो पर गया,जो आज यहाँ नही थे....सौरभ और अरुण ,भू से मिलने उसके कॉलेज गये थे और उन दोनो का प्लान कुच्छ दिनो तक वही रुकने का था यानी कि अब मैं दो-तीन दिन अकेले इस रूम मे रहने वाला था....अचानक मुझे याद आया कि कल मुझे कॉलेज भी जाना है और कॉलेज के मेरे सारे अस्त्र-शस्त्र का कोई आता-पता नही था....

"मेरा बॅग....आल्मिराह मे होगा..."सोचते हुए मैने आल्मिराह खोली तो मुझे मेरा बॅग मिला...

आज कॉलेज मे आए हुए मुझे लगभग 2 साल होने वाले थे और आज ये पहला मौका था जब मैं कॉलेज जाने के एक दिन पहले अपना बॅग भर रहा था...लेकिन बॅग भरते वक़्त मुझे ध्यान आया कि मेरे पास तो 4थ सेमिस्टर. का कोई मेटीरियल ही नही है ,अब कल कॉलेज मे जाकर लवडा हिलाउन्गा क्या बाथरूम जाकर मैने टवल पानी से भीगोया और वापस आकर पानी मे भीगे टवल से अपने कॉलेज को मस्त चमका कर,एक पेन और एक कॉपी डाल दी.....
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"बीसी, इस सेमिस्टर. मे 12 पेपर देने है...मतलब की पढ़ना पड़ेगा..."मैने खुद से कहा और खिड़की खोलकर एक सिगरेट जलाई....

चाहे हालत कितने भी बुरे रहे हो, भले ही उसके दिल मे मेरे लिए कितना भी कड़वापन क्यूँ ना भरा हो...लेकिन उसके लिए दिल कल भी धड़कता था और आज भी धड़क रहा है....मुझे अब भी याद है कि जब मैं कोमा से वापस होश मे आया था तो एश के बारे मे सोचने लगा था....

मैं उस समय ये सोच रहा था कि शायद मेरी ये हालत देखकर एश मुझसे मिलने आएगी, जब मुझे होश आया तो मुझसे मिलने के लिए,मेरा हाल चाल जानने के लिए तक़रीबन मेरे सभी जान-पहचान वाले आए...सिवाय दो को छोड़ कर. एक सीडार था तो दूसरी एश...सीडार तो बहुत दूर जा चुका था ,इसलिए उससे मिलने की मुझे कोई उम्मीद नही थी..लेकिन एश का इंतज़ार मैं हर दिन करता था इस उम्मीद के साथ की शायद आज वो दिन है,जब वो भूरी आँखो वालो लड़की ,अपना गाल फुलाए मुझसे मिलने आएगी,दो चार बाते करेगी...लेकिन वो दिन कभी नही आया. एश मुझसे मिलने हॉस्पिटल मे नही आई. दिल थोड़ा उदास तो हुआ लेकिन फिर मैने खुद को ये कहकर राज़ी कर लिया कि,शायद उसे खबर ही नही होगी कि मुझे होश आ गया है....लेकिन मैं ये जानता था कि सच ये नही है क्यूंकी जहाँ मेरे होश मे आने की खबर पूरे कॉलेज को थी,वहाँ ये खबर एश के कानो तक ना पहुँचे ये हो ही नही सकता था....
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"अरमान भैया...दरवाजा खोलो.."

इस आवाज़ ने मेरा ध्यान तोड़ा .कोई मेरे रूम के दरवाजे को ज़ोर से पीट रहा था....

"तेरी माँ का आल्फा,बीटा ,गम्मा...कौन है बे..."

"अरमान भैया मैं हूँ , राजश्री पांडे..."

"राजश्री पांडे..."मैने टाइम देखा,रात के 2 बज रहे थे"इसे तो हॉस्टिल मे होना चाहिए था,ये यहाँ क्या कर रहा है...."

"वॉर्डन से लड़ाई हो गयी अरमान भैया..."लड़खड़ाते हुए राजश्री पांडे अंदर आया और पीछे मुड़कर किसी और को भी अंदर आने के लिए कहा.,जिसके बाद 5-6 लड़के एक साथ मेरे रूम के अंदर आ गये....

"निकलो सब,ये अपुन के सोने का टाइम है..."जबर्जस्ति गुस्सा होते हुए मैने कहा...

"क्या भैया, इतनी जल्दी सोकर क्या करोगे,अभी तो रात के 2 ही बजे है..."बोलते हुए वो मेरे बिस्तर पर पहले बैठा और फिर लेट गया...

"पहली बात तो ये कि..."उसे पकड़ कर ज़मीन मे फेंकते हुए मैं बोला"पहले पूरा लफडा बताओ और दूसरी बात ये कि मेरे बिस्तर को किसी ने टच भी किया तो चोद दूँगा...साला आज ही नयी चादर डाली है..."
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"बीसी, पॉवर दिखा रहा था वो वॉर्डन.."राजश्री पांडे बोला"साला होशियारी चोद रहा था अपुन के सामने, बोल रहा था कि यदि हॉस्टिल मे रहना है तो रात को सही टाइम पे आओ ,वरना मत आओ.."

"फिर...? "

"फिर क्या, मेरा मुंडा सटक गया और साले को बहुत मारा और भाग कर सीधे इधर आएला हूँ ,आपके पास..."
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08-18-2019, 02:02 PM,
#86
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"इधर क्या अब मुझसे लड़ने आया है,चल भाग यहाँ से..."घूरते हुए मैने कहा

"क्या अरमान भाई...मैने सोचा था कि आज रात आपके हॉस्टिल मे रुकुंगा और सुबह निकल लूँगा...."
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पहले मैने सोचा कि उन सबको लात मार के भगा दूं,लेकिन फिर ख़याल आया कि ,अपने ही लौन्डे है..लड़ाई झगड़े मे साथ देते रहते है,इसलिए इनकी मदद करना तो मेरा फ़र्ज़ बनता है

"एक शर्त पर मैं तुम सबको यहाँ रुकने के लिए कहूँगा...आक्च्युयली एक नही दो शर्त पर...मतलब कि तीन शर्त पर..."

"अरे आप हुक़ुम करो..आपके लिए तो जान भी हाज़िर है ,यहाँ तक कि मेरे जेब मे पड़ी राजश्री के 10 पॅकेट आपको दे दूं...बस माँग मत लेना "

"ना तो मुझे तेरी राजश्री चाहिए और ना ही तेरी जान....मेरी पहली शर्त ये है तुम मे से कोई भी बिस्तर पर नही सोएगा..."

"क़बूल है..."वो सब एक साथ चिल्लाए

"मेरी सिगरेट कोई नही पिएगा..."

"क़बूल है..."वो सब एक बार फिर एक साथ चिल्लाए...

"और कोई मूठ नही मारेगा ,वरना लंड काट के मुँह मे दे दूँगा..."

"अरे आप टेन्षन नक्को करो, मुझे आपकी सब शर्त मंज़ूर है..."ज़मीन से खड़ा होकर राजश्री पांडे मेरे पास आया और मेरे कंधे पर हाथ रखकर अपना सीना ठोकते हुए बोला"देखो अरमान भाई..मैं एक किसान का बेटा हूँ, इसलिए ज़मीन मे सोने मे मुझे कोई दिक्कत नही होगी और मेरे पास ऑलरेडी सिगरेट की दो-दो पॅकेट है...एक आप भी रख लो..."बोलते हुए उसने सिगरेट की एक पॅकेट निकाली और मेरे जेब मे डाल दी...

"थॅंक्स और तीसरी शर्त याद है ना..."

"बिल्कुल याद है, आप फ़िकरा मत करो अरमान भाई...हम लोगो ने इतनी दारू चढ़ा रखी है कि मूठ मारना तो दूर की बात है,यदि इस वक़्त दीपिका मॅम अपना दूध मेरे हाथ मे थमा दे तो मैं उसे ना दबा पाऊ..."उसके बाद राजश्री पांडे ने मेरे गाल को चूमा और गुड नाइट बोलकर वही ज़मीन पर अपने दोस्तो के साथ पलट हो गया....
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"साला गे..."मेरे गाल पर जिस जगह राजश्री पांडे ने किस किया था उसे सॉफ करते हुए मैने कहा"ये लौंडा भी दीपिका पे फिदा है....और तभी मेरे 1400 ग्राम के दिमाग़ मे कुच्छ आया...कुच्छ ऐसा जिससे ,मैं दीपिका का सारा गुरूर तोड़कर उसकी चूत मे डाल सकता था..."

दिमाग़ मे तुरंत एक सूनामी की लहर उठी और फिर शांत हो गयी. अभी-अभी मेरे अंदर आए सूनामी ने मुझे आने वाले दिनो मे क्या करना है,कैसे करना है...इसके सारे फॅक्ट्स समझा दिए थे. लेकिन मैं इस समय एक बार फिर खुद से जूझ रहा था और मेरे सामने एक बार फिर वही सवाल था कि...क्या मुझे ये करना चाहिए ?
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एक लड़की की खूबसूरती उसे तभी तक बचा सकती है जब तक उसकी वो खूबसूरती किसी के आँख मे खटक ना जाए क्यूंकी यदि ग़लती से भी उस लड़की की खूबसूरती नफ़रत मे बदल गयी तो फिर उसका खूबसूरत जिस्म भी बदसूरत शरीर लगने लगता है और ऐसा ही इस वक़्त मेरे साथ हो रहा था....चाहे पूरा जमाना दीपिका मॅम के लिए पागल हो लेकिन अब वो मेरे लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ एक बदसूरत सी घमंडी लड़की थी...जिससे मुझे बदला लेना था....मुझे अब उसकी ना ही वो छातियाँ आकरसीत लगती और ना ही उसका मॉडेल फिगर. दीपिका माँ अब मेरी आँखो मे खटक रही थी और उसका नामे जहाँ मे आते ही मैं गुस्से से तड़प उठता था...दिल करता था की अभी उस म्सी का बाल पकाडू और घसीट-घसीट कर उसकी जान ले लूँ....

जब मेरे दिल और दिमाग़ ने दीपिका मॅम से बदला लेने वाले मेरे आइडिया पर अपनी मुँहार लगा दी तो मुझे एक और लड़की का ख़याल आया...और ये लड़की जो अभी मेरे ख़यालो मे आई थी वो कोई और नही बल्कि वही लड़की थी जो अक्सर मेरे ख्वाबो मे भी मुझे दर्शन देती थी...बस फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि मेरे ख्वाब मे वो मेरे लिए आती थी लेकिन हक़ीक़त मे वो किसी और के लिए आती थी...फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि ख्वाब मे मैं जिस जुस्तजु के साथ उसके करीब होता था ,हक़ीक़त मे मैं इसके बिल्कुल उलट उसी जुस्तजु के साथ उससे बहुत दूर हो रहा था....


ऐसा नही है कि मैने उसे कभी भूलने की कोशिश नही की लेकिन जब भी ऐसा करने की सोची तभी दिल से आवाज़ आई कि एक बार कोशिश करने मे क्या जाता है...?
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कभी-कभी जब वो सपने मे आती और मेरे करीब बैठी रहती तो दिल करता कि मेरी कभी आँख ही ना खुले .कयि बार जब मैं सपना देख रहा होता था तो मुझे ना जाने कहाँ से मालूम चल जाता था कि ये हक़ीक़त नही बल्कि हक़ीक़त के दुनिया की एक झूठी परच्छाई है,जिसका हक़ीक़त की बाहरी दुनिया मे कोई वज़ूद नही है.....लेकिन फिर भी मैं दिल को समझाने मे नाकाम ही रहा.
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उस दिन मैं पूरी रात नही सोया, खिड़की के पास बिस्तर खिसककर सिगरेट के धुए से सारी रात अपने सीने को जलाता रहा..क्यूंकी उस वक़्त मेरे अंदर हज़ारो सवालो ने एक साथ दस्तक दे दी थी ,जिसका जवाब मैं ढूँढ रहा था....मैने एक और सिगरेट जलाई और फिर सोचने लगा एमटीएल भाई के बारे मे....
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ऐसा नही है कि इतने दिन बीत जाने के बाद मैं सीडार को भूल चुका हूँ...उसकी मौत की खबर अब भी मेरे कानो मे गूँजती है और जब भी ये खबर मेरे कानो मे गूँजती है तो सारी दुनिया को एक तरफ करके,सारे साइंटिस्ट्स के थियरीस ,प्रिन्सिपल्स की माँ-बहन एक करके मैं खुद को उसी जगह पाता हूँ जहाँ मुझे हॉस्पिटल मे ये खबर पता चली थी....सीडार भाई कयि सारे सवाल अपने पीछे छोड़ गये थे जिसका जवाब शायद मुझे कभी नही मिलने वाला था...लेकिन एक चीज़ जो मैने करने की ठानी थी वो ये कि सीडार के उस हॉस्टिल का रुतबा मैं कायम रखूँगा ,जिसमे उसने अपनी ज़िंदगी के सबसे अहम चार साल बिताए थे...ऐसा सोचना भले ही किसी को पागलपन लगे लेकिन मुझे इससे कोई फ़र्क नही पड़ता....इस वक़्त दिल कर रहा था कि सीडार भाई कहीं से...कही से भी बस एक बार लौट कर आ जाए ताकि मैं उनसे गले मिल सकूँ....दिल कर रहा था कि एक बार फिर मैं कोई ग़लती करूँ और सीडार मुझे डाँटदे और फिर कंधे मे हाथ रखकर समझाए कि"अरमान, ऐसा मत कर..."

लेकिन अब ये हो नही सकता था...क्यूंकी अब ना तो एमटीएल भाई कभी वापस आने वाले थे और ना ही उनको लेकर मेरे अरमान कभी पूरे होने वाले थे....
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रात से सुबह हुई ,लेकिन मैं पिछले कयि घंटो की तरह अब भी उसी खिड़की के पास बैठा अपने अतीत के कुच्छ पन्ने पलट रहा था और अपने ज़िंदगी के उन पॅलो को याद कर रहा था,जो अब कभी आने वाले नही थे.....सीडार को इस वक़्त याद करने की एक वजह शायद ये भी थी कि मुझे खिड़की से हॉस्टिल के बाहर रखी वो चेयर दिख रही थी...जिसपर बैठकर मैं सीडार से अक्सर बात किया करता था....
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"क्या सोच रेले हो अरमान भाई..."

"हुउऊउन्ण..."मैं जैसे झटके से होश मे आया...

"इतना चौक क्यूँ गये...मैं तो कल रात ही इधर आया था..."आँखे मलते हुए राजश्री पांडे बोला...

"कुच्छ नही,सीडार के बारे मे सोच रहा था...."

अबकी बार राजश्री पांडे कुच्छ नही बोला और अपने दोस्तो को उठाकर रूम से बाहर करने लगा....

"पांडे....सुन"जब वो वहाँ से जाने लगा तो मैने उसे आवाज़ दी"उस लड़के को जिसका चक्कर दीपिका मॅम के साथ चल रहा है ,उसे बोलना कि शाम को कॉलेज ख़तम होने के बाद मुझसे मिले..."

"बिल्कुल...मैं खुद उसे इधर लेके आउन्गा...."
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राजश्री पांडे और उसके दोस्तो के वहाँ से जाने के बाद मैं कुच्छ देर यूँ ही खुद से उलझता रहा और जब कॉलेज जाने का टाइम हुआ तो बढ़िया तैयार होकर हॉस्टिल से बाहर निकला....हॉस्टिल से कॉलेज जाते समय मुझे ऐसा लगा कि आज सूरज की रोशनी कुच्छ ज़्यादा ही है.आज कॉलेज की बिल्डिंग मुझे मेरे किसी बिच्छड़े हुए आशियाने की तरह लग रहा था,जहाँ मैं जल्द से जल्द पहुचना चाहता था और जैसे ही मैने कॉलेज के बौंड्री मे एंट्री मारी,सबकी नज़ारे मुझ पर आ टिकी...सभी स्टूडेंट्स अपने साथी स्टूडेंट्स से मेरे बारे मे खुसुर-फुसुर करने लगे...कुच्छ मेरे बॉडी को भी देख रहे थे ,कुच्छ मेरे शरीर पर ज़ख़्म के निशान ढूँढ रहे थे....उन सबको को इग्नोर मारते हुए मैं सीधे ,चुप-चाप कॉलेज मे घुसा और वहाँ की हालत भी बाहर की तरह ही थी...मतलब की सब मुझे देखते और फिर आपस मे बात करते...जब मैं कॉरिडर मे चलते हुए आगे बढ़ रहा था तो मेरे आयेज जो स्टूडेंट्स थे वो मुझे देखते ही साइड होते जा रहे थे...मुझे पहले से ही अंदाज़ा था कि मेरे कॉलेज आने पर कुच्छ-कुच्छ ऐसा ही महॉल होगा...

आज ना जाने कितने दिनो बाद मैं राइट टाइम पर कॉलेज पहुचा था.मैने क्लास मे बॅग रखा तो मुझे चाहने वालो ने मेरा हाल-चाल पुछा और कुच्छ लड़के अपना रोला जमाने के लिए मुझे अपने साथ क्लास से बाहर आने के लिए कहा.
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"अरमान...वो देख एश ,गौतम और उसकी वो बहन...जिसके चक्कर मे इतना बड़ा लफडा हुआ था..."एक लौन्डे ने मुझे इशारा करते हुए धीरे से कहा...

ये सुनकर मैं शुरू मे घबरा गया और सोचा कि तुरंत वहाँ से क्लास के अंदर चला जाउ...मेरे दिल ने,जो कि एश से बहुत प्यार करता था..उसने कहा कि मुझे अभी ही गौतम से उस दिन के लिए माफी माँग लेनी चाहिए ताकि एश मुझसे फिर से बात करने लगे, मैने ऐसा करने के लिए सोचा भी लेकिन तभी मेरे अहंकार ने मुझे ऐसा करने से सॉफ मना कर दिया...
"सही है...यदि मैने गौतम से माफी माँगी तो थूक कर चाटने वाली बात हो जाएगी और जब मैने दीपिका मॅम की गुलाबी चूत नही चाटी तो फिर ये क्यूँ करो...ब्लॅक होल मे जाए एश और मेरे हाथ से मार खाने वाला उसका बाय्फ्रेंड..."उनको अपनी तरफ आता हुआ देख मैने गॉगल्स निकाला और पहन कर वहाँ की दीवार से एक हाथ टीकाया....

गौतम की हालत देखकर ऐसा लग रहा था जैसे वो आज ही कॉलेज मे आया है या फिर पिछले दो-तीन दिन से ही कॉलेज आ रहा होगा....वो एक पैर से लंगड़ा रहा था और एश के सहारे चल रहा था...

"अब ये बीसी गौतम मुझे यहाँ देखकर फिर से लफडा करेगा...क्या मुझे अभी क्लास के अंदर चले जाना चाहिए...."मैने खुद से पुछा लेकिन जवाब एक बार फिर मेरे अहंकार ने दिया"यदि तू गौतम को देखकर क्लास के अंदर गया तो ये सारे लौन्डे यही समझेंगे कि तेरी गौतम को देखकर फॅट गयी है और फिर इज़्ज़त डाउन हो जाएगी सोच ले..."
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आख़िरकार मैने वही दीवार पर एक हाथ टिका कर खड़े रहने का फ़ैसला किया और च्विन्गम मुँह मे ना होते हुए भी बड़े ताव से ऐसे मुँह चला रहा था जैसे 5-6 चिनगम मेरे मुँह मे एक साथ हो...
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"सुन बे..."जब वो तीनो मेरे सामने आए तो मैने दूसरी तरफ खड़े अपने क्लास के एक लड़के से तेज़ आवाज़ मे कहा"उस लड़के को होश आ गया क्या ,जिसे मैने कल रात सर पर रोड से मारा था या अभी भी कोमा मे है...."

पता नही मुझे अचानक क्या हुआ,जो मैं ये सब गौतम के मुँह पर बोल गया,क्यूंकी अंदर से तो मेरी भी बुरी तरह से फटी हुई थी...मेरी बात सुनकर गौतम एक पल के लिए जहाँ था वही रुक गया लेकिन अगले ही पल वो वहाँ से आगे बढ़ने लगा....मैने जिस लड़के को बलि का बकरा बनाकर आवाज़ दिया था वो अपना मुँह फाडे मुझे देख रहा था कि ये मैने उससे क्या कह दिया....जब गौतम ,एश और दिव्या के साथ आगे बढ़ गया तो एक बार फिर मैने जले पर नमक छिड़का और बलि का बकरा एक बार फिर से उसी लड़के को बनाया

"ओये उसकी उस आइटम का क्या हुआ, जिसका बाप बेदम रहीस है और जो कार से एक और आइटम के साथ आती है...."

"क्या बोल रहा है भाई,मरवाएगा क्या..."उस बलि के बकरे ने रोनी सी सूरत बनाई लेकिन मैं कहाँ मानने वाला था,अबकी बार मैने गौतम के ज़ख़्म पर सीधे नमक की एक बोरी डालते हुए बोला

"यदि वो लड़का,जिसके सर पर मैने रोड मारी थी,वो तुझे दिखे तो उससे बोलना कि मेरे सामने औकात मे रहे वरना एक बार फिर से ठोकुन्गा..."

गौतम इस बार भी चुप रहा लेकिन उसे सहारा देने वाली एसा पीछे पलट कर अपने मन मे मुझे गालियाँ देने लगी और मैं आँखो मे काला चश्मा लगाए उसको देखकर मुस्कुराता रहा जिससे वो और जल-भुन गयी...जिस लड़के को मैने तीन बार बलि का बकरा बनाया था वो इस समय वहाँ से भाग चुका था.
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मुझे आज थोड़ा गौतम के बर्ताव पर ताज्जुब हुआ क्यूंकी वो आज मेरे मुँह से इतनी सारी बाते सुनकर भी चुप चाप रहा था....लेकिन कब तक ? क्यूंकी इतना तो मैं जानता था कि ना तो वो मेरे सामने झुकेगा और मेरे झुकने का तो सवाल ही पैदा नही होता....इसलिए मैने उसी वक़्त आँखो मे काला चश्मा लगाए ये अंदाज़ा लगा लिया था कि हम दोनो यदि कभी भूले से भी एक-दूसरे के आमने सामने आए तो अंजाम बहुत ही बुरा होगा,क्यूंकी अबकी बार गौतम का गुंडा बाप सीधे मेरी जान लेगा लेकिन मैं इतना चोदु नही जो पिछली बार की तरह गौतम के बाप के चंगुल मे फँस जाउन्गा....कुल-मिलकर जो भी होने वाला था बहुत बुरा होने वाला था.
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"अरमान तुम..."

"हां मैं, "विभा को देखकर मैने कहा...

"हाउ आर यू,..."

"एक दम झक्कास और तू..."

"फाइन...और ज़रा ढंग से पेश आओ ,ये कॉलेज है इसलिए गॉगल्स उतारो और चिनगम थूक कर क्लास के अंदर आओ..."
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आज बहुत दिन बाद कॉलेज आया था इसलिए क्लास मे आज थोड़ा शांत था...मेरी शांत रहने की एक और वजह शायद ये भी थी कि आज मेरे खास दोस्तो मे से कोई भी कॉलेज मे नही था...इसलिए यदि मैं बक्चोदि करता भी तो किससे करता...मैने अपने आस-पास बैठे लड़को से कयि बार बात करने की कोशिश भी की लेकिन मैं जिससे भी बात करता वो मेरी बात को सुनकर अनसुना कर देता और बोलता कि उसे क्लास से बाहर निकाल दिया जाएगा......

"साले कितने बोरिंग हो बीसी तुम लोग..."जब रिसेस हुआ तो अंगड़ाई मारते हुए मैं बोला"इससे अच्छा तो मैं लास्ट बेंच पर अकेले ही बैठू...."
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रिसेस के बाद फिर क्लास चालू हुई और अब मैं लास्ट बेंच पर अकेला बैठा हुआ था...मैने बहुत प्रयास किया कि मुझे नींद ना आए लेकिन टीचर्स के लेक्चर्स मुझे किसी लॉरी की तरह लग रहे थे और रिसेस के बाद दूसरे पीरियड मे ही मेरी आँखे भारी होने लगी....मैने सामने डेस्क पर अपना बॅग रखा और फिर बाग पर सर रखकर सो गया....
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"उठो,क्लास मे ताला लगाना है..."किसी ने मुझे ज़ोर से हिलाते हुए कहा...

"क्लास के बाकी लोग कहाँ गये..."आँखे मलते हुए मैने पीयान से पुछा...

इस समय पूरी क्लास मे मेरे और उस पीयान के सिवा कोई और नही था,इसलिए मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ

"छुट्टी हो गयी है,सब अपने घर को निकल गये अब तुम भी इधर से निकलो ,मुझे ताला लगाना है..."

"ये कैसे हो गया..."तुरंत खड़े होकर मैने अपना बॅग टांगा और बड़बड़ाते हुए क्लास से बाहर आया...

"बीसी, सालो ने मुझे जगाया तक नही और टीचर्स कैसे झन्डू थे जो उन्होने मुझे कुच्छ कहा तक नही...ज़रूर सालो की फॅट गयी होगी कि कही मुझे जगाने पर मैं उन्हे ना पेल दूं. "

टाइम देखने के लिए मैने अपने जेब से मोबाइल निकलना चाहा तो मोबाइल मेरे जेब से गायब था , तब मुझे याद आया कि मोबाइल तो मेरे डेस्क पर ही छूट गया है....

"सुनो भैया, क्लास दोबारा खोलना तो ,मेरा मोबाइल अंदर छूट गया है..."

उस पीयान को आवाज़ देकर मैने कहा लेकिन वो पीयान अपनी पीठ मेरी तरफ किए बाहर कॉरिडर मे झाड़ू लगा रहा था....उसके बाल अचानक से बहुत लंबे हो गये और वो पीयान मेरी तरफ झाड़ू लेकर घूमा तो मेरा दिल जैसे एक पल के लिए रुक ही गया...क्यूंकी उस पीयान की शकल आतिन्द्र की शकल मे बदल चुकी थी....

"बीसी, मैं फिर से सपना देख रहा हूँ..."मैने कहना चाहा लेकिन पता नही क्यूँ आवाज़ गले से बाहर ही नही निकली...

मैने तुरंत वहाँ से भागने का सोचा लेकिन आतिन्द्र को वहाँ देखकर पैर ज़मीन मे ऐसे चिपक गये कि वहाँ से भागना तो दूर एक कदम आगे-पीछे भी नही हो रहे थे और इधर आतिन्द्र अपने लंबे बालो की लटो को पीछे करते हुए एक डरावनी मुस्कान के साथ मेरे तरफ बढ़ रहा था.

मैं जानता था कि आतिन्द्र का भूत सिर्फ़ मेरे दिमाग़ मे है और हक़ीक़त से इसका कोई वास्ता नही है...लेकिन एक सच ये भी था कि आतिन्द्र को सपने मे देखकर मेरी सिट्टी-पिटी गुम हो जाती थी...साला कभी कुच्छ समझ ही नही आता था कि मैं क्या करूँ ? कैसे मेरे दिमाग़ मे बैठे आतिन्द्र से पीछा छुड़ाऊ...इस वक़्त सपना भले ही मेरा था लेकिन राज़ आतिन्द्र कर रहा था.....
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08-18-2019, 02:02 PM,
#87
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
आज कल हमारे देश मे बहुत सारे धरम गुरु है...कुच्छ फ़र्ज़ी है तो कुच्छ धर्म की आड़ मे अपना काला धंधा चलाते है....इसलिए इनके पास जाकर अपनी प्राब्लम बताना मतलब एक दूसरी प्राब्लम मे फँसना है...मैं जब अकेले रहता हूँ तो अपने दिमाग़ मे बैठे आतिन्द्र को दूर करने के लिए बहुत सोचता हूँ और कुछ नये प्लान बनाता हूँ...लेकिन पता नही क्यूँ आतिन्द्र को देखते ही जैसे मुझे कुच्छ याद ही नही आता. उस वक़्त मुझे ऐसा लगता है जैसे इस पूरी दुनिया मे मेरे सिवा सिर्फ़ और सिर्फ़ वो ही है...मेरे सपने के आस-पास का द्रिश्य आज भी ठीक वैसा ही था जैसे कि हरदम होता था, यानी कि आस-पास हम दोनो के आलवा कोई तीसरा नही था ,जिसे मैं मदद के लिए पुकार सकूँ....


मैने कयि बार सोचा कि किसी बाबा,पंडित के पास जाकर अपनी प्राब्लम उन्हे बताऊ कि मुझे मेरा मरा हुआ दोस्त सपने मे मुझे बहुत परेशान करता है लेकिन फिर मैने अपना विचार बदल दिया और इन फ़र्ज़ी बाबाओं से मदद लेने की बजाय गूगल महाराज के दरबार मे शरण ली....मैने गूगल की साइट पर जाकर सर्च किया कि एक बुरे सपने से कैसे बचा जा सकता है. मेरे सर्च करने के बाद अपनी आदत अनुसार गूगल महाराज ने हज़ारो तरीके मुझे बताए और मेरा 3-4 घंटे का समय खाया...लेकिन सिर्फ़ एक काम की बात मुझे उस 3-4 घंटे मे समझ आई और वो काम की बात ये थी कि "उस बुरे सपने से निकलने की जल्द से जल्द कोशिश करो..."
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गूगल महाराज ने मुझे ये भी बताया कि मैं जो सपने मे करूँगा उसका थोड़ा- बहुत एफेक्ट मेरे वास्तविक जीवन पर भी पड़ेगा.....
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"अरमान...अरमान..."आतिन्द्र सीधे कूदकर मेरे उपर चढ़ गया और अपनी डरावनी हँसी से मेरे कान मे दर्द पैदा करने लगा....

मैने आस-पास कुच्छ जुगाड़ देखा, जिससे कि मैं सपने से बाहर आ जाउ और तभिच मेरे 1400 ग्राम के दिमाग़ ने पहली बार आतिन्द्र के सामने अपनी बत्ती जलाई और मैने अपना सर पास की दीवार मे ज़ोर से दे मारा.....
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इधर मैने अपना सर दीवार पर मारा और उधर दूसरी तरफ मेरी नींद डेस्क मे मेरे सर टकराने से खुली...

"आहह..."अपने सर को सहलाते हुए मैने क्लास की तरफ देखा .

"क्या हुआ अरमान...."विभा अपनी हँसी दबाते हुए बोली"अपना सर डेस्क पर क्यूँ पटक रहे हो..."

"अभी-अभी मैने सपने मे भूत देखा और सपने से बाहर आने के लिए अपना सर ज़ोर से दीवार पर दे मारा..."

"अच्छा...भूत ने और क्या-क्या किया..."

"बस इतना ही किया, आगे मैने कुच्छ करने ही नही दिया उसे..."
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विभा ने और भी तरह-तरह के सवाल पुच्छे और उसके हर सवाल पर मैने एक दम सही जवाब दिया ,लेकिन वो और पूरी क्लास हंस रही थी...सबको लग रहा था कि मैं कॉमेडी कर रहा है...

"कमाल है यार, साला सच बोलो...तब भी किसी को यकीन नही होता "
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"रुक...रुक...रुक...एक इंपॉर्टेंट कॉल है..."वरुण बोला और अपना मोबाइल लेकर वहाँ से उठ गया...

वरुण के जाने के बाद अरुण अपनी आँखे बड़ी किए हुए और मुँह फाडे हुए मुझे देख रहा था....
"तुझे क्या हुआ..."

"सच मे वो लौंडा तेरे सपने मे आता है या तू मिर्च मसाले लगाकर कहानी को इंटरेस्टिंग बनाने की कोशिश कर रहा है..."

"कहानी को इंट्रेस्टिंग बनाने के लिए मेरे पास और भी कयि फ़ॉर्मूले है चोदु...क्या तुझे यकीन नही हो रहा "अरुण का कॉलर पकड़ते हुए मैं बोला...

"मुझे याद आ गया और ये यकीन भी हो गया कि तू सच बॉलिंग...क्यूंकी जब मैं और सौरभ, भू से मिलने के बाद अपने कॉलेज पहुँचे थे तो किसी ने मुझसे कहा था कि तू एक दिन चलती क्लास के बीच मे अपना सर फोड़ रहा था...."
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"ओके..ओके मैं कर दूँगा...काम हो जाएगा..."फोन पर किसी से बात करते हुए वरुण वापस मेरे सामने बैठा"वो सब तो सही है लेकिन एक बात समझ मे नही आई कि ,गौतम को तो तूने सर पर रोड मारी थी,फिर वो लंगड़ा कर कैसे चल रहा था..."

"अपना चेहरा ज़रा करीब लाना..."

"क्यूँ..."

"चुम्मा लूँगा अबे चोदु ,उस वक़्त ,जब हॉस्टिल मे मेरी गौतम से लड़ाई हुई थी तो, वहाँ हमलोग लुडो और साँप-सीढ़ी का गेम नही खेल रहे थे...लड़ाई कर रहे थे और कौन कब किसकी बजा के निकल जाए ,इसकी हवा तक नही लगती...किसी ने पेल दिया होगा गौतम के पैर मे..."

"ह्म....ये हो सकता है.."

"ये हो सकता है...नही ये हुआ है "

" फिर तूने दीपिका को कैसे चोदा , आइ मीन उससे अपना बदला कैसे लिया...और वो लड़का कौन था जिसने पत्थर के उपर से कूदकर तेरी ठुकाई स्टार्ट की थी..."

"दीपिका को मैने बहुत अच्छे से चोदा और वो लड़का वही था,जिसने फर्स्ट एअर मे मेरी रॅगिंग ली थी..."

"क्या "चौुक्ते हुए वरुण ने अपने सर पर अपना हाथ फिराया"मैने गेस किया था कि वो लड़का वरुण होगा...."

"उस रात अंधेरे मे उस लौन्डे को देखकर मुझे उसकी शकल कुच्छ जानी-पहचानी सी लगी थी...और मैने भी यही मान लिया था कि वो लड़का यक़ीनन वरुण ही है...लेकिन मेरा ये कन्फ्यूषन अमर सर ने डोर कर दिया...जब वो हॉस्पिटल मे मुझसे मिलने आए थे तो उन्होने मुझे बताया था कि उन गुन्डो मे वो लड़का भी शामिल था जिसने फर्स्ट एअर मे मेरी रॅगिंग ली थी. तब मुझे तुरंत समझ मे आ गया था कि मुझपर सबसे पहले अटॅक करने वाला वरुण नही था "

"फिर एक सवाल यहाँ ये भी पैदा होता है कि अमर को ये इन्फर्मेशन किसने दी..."बोलते-बोलते वरुण अचानक चुप हो गया और थोड़ी देर बाद उसने डरते हुए कहा"दिल पे मत लेना ,लेकिन मुझे ऐसा क्यूँ लग रहा है कि तेरी पिटाई मे अमर का भी हाथ था..."
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वरुण के ऐसा कहने पर मैं मुस्कुराए बिना नही रह सका...

"आक्च्युयली यहाँ मॅटर थोड़ा और कन्फ्यूज़ करने वाला है...अमर सर ने मुझे हॉस्पिटल मे ये भी बताया था कि सीडार को सब मालूम चल गया था...जैसे कि नौशाद ने मेरा कॉल डिसकनेक्ट कर दिया ,दीपिका ने मुझे फसाया और मेरी रॅगिंग लेने वाला सीनियर गुन्डो के उस ग्रूप मे शामिल था..."

"एक मिनिट...सर थोड़ा घूम रहा और मेरी फट भी रही है..."अरुण की तरफ इशारा करते हुए वरुण ने थोड़ी दूर रखी टेबल पर से पानी की बोतल लाने के लिए कहा....

"अब मैं जो भी बोलने वाला हूँ, उस दिल पे ना लेकर सीधे मुँह मे लेना..."

"बक.."

"सीडार कैसे मरा,एक बार फिर से बताएगा क्या ? प्लीज़ "

वरुण के इस सवाल ने मुझे कुच्छ देर के लिए सोचने पर मजबूर कर दिया...मुझे समझ नही आ रहा था कि कहाँ से शुरुआत करूँ और फिर मैने कहा..

"तुझे क्या लगता है कि मैने सीडार के बारे मे खोज-बीन नही की...वरुण ,वो 22 साल का लड़का जो उस दिन मरा था, वो मेरे लिए कोई आम नही था,जिसके बारे मे दुनिया कुच्छ भी बोले और मैं बिना किसी सबूत के सब कुच्छ मानता चला जाउ..मैने बहुत खोज बीन की ,बहुत हाथ-पैर चलाए...एनटीपीसी मे काम करने वाले उसके दोस्तो से पुछा यहाँ तक कि मैने पोलीस स्टेशन के भी कई चक्कर लगाए,लेकिन रिज़ल्ट पहले जैसा ही था...सारी कड़िया इसी बात की तरफ इशारा कर रही थी कि सीडार की मौत एक हादसा था ना कि मर्डर....."

"ओके...जब तूने सब कुच्छ पता किया था तब मैं कुच्छ नही बोल सकता,लेकिन फिर भी मुझे ना जाने क्यूँ ऐसा लग रहा है कि सीडार के साथ कुच्छ ऐसा हुआ होगा जो किसी को नही मालूम..."

"शुरू-शुरू मे मुझे भी यही लगता था..मैं घंटो अकेला हॉस्टिल की बाहर वाली कुर्सिया पर बैठकर इस बारे मे सोचता था ,लेकिन इससे कुच्छ भी हासिल नही हुआ...क्यूंकी सारी कड़िया हर बार घूम करके इसी पॉइंट पर अपनी मुन्हर लगा देती थी कि सीडार के साथ हादसा हुआ था ना कि मर्डर....."

"ठीक है ,चल छोड़...फिलहाल तो तू ये बता कि दीपिका से तूने अपना बदला कैसे लिया...मेरे ख़याल से तूने उसे लिटा-लिटा कर,रगड़-रगड़ कर...आगे-पीछे ,उपर-नीचे ...हर जगह चोदा होगा....मैं बहुत एग्ज़ाइटेड हूँ उस हॉट मोमेंट को सुनने के लिए "
"उसके लिए फिर से अतीत के समुंदर मे डुबकी मारनी पड़ेगी..."
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08-18-2019, 02:02 PM,
#88
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"हां तो मार ना डुबकी..3 घंटे है मेरे पास.."घड़ी मे टाइम देखते हुए वरुण बोला...
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सौरभ और अरुण को वापस आने मे तीन से चार दिन का समय लग गया और ये तीन से चार दिन मेरे लिए बहुत बोरिंग साबित हुए...साला बिल्कुल मज़ा ही नही आ रहा था इन दोनो के बिना...कॉलेज मे तो फिर भी सुलभ के रहने के कारण थोड़ा बहुत मन लग जाता था लेकिन हॉस्टिल मे आने के बाद साला पूरा टाइम मुझे काटने को दौड़ता....

जब ये दोनो भू से मिलकर वापस आए तो जान मे जान आई .सौरभ और अरुण के वापस आने के बाद फिर से अपनी वही पुरानी ज़िंदगी शुरू हो गयी. हमलोग दिन भर कॉलेज मे टीचर्स को परेशान करते और कॉलेज से आने के बाद किसी जूनियर को पकड़ कर उससे सिगरेट मँगवाते और फ्री मे पीते , हमारे इस काम मे हमारा जूनियर राजश्री पांडे हमारी बहुत हेल्प करता था, वो खुद हमे आकर उन लड़को के नाम बता जाता जिनके पास बहुत पैसे थे और वो थोड़े फट्टू टाइप के थे...बदले मे राजश्री पांडे को हमलोग कुच्छ सिगरेट पॅकेट से निकाल कर दे देते थे....

दिन ऐसे ही बीत रहे थे कि एक दिन कॉलेज जाते वक़्त कॉलेज के बाहर मुझे दीपिका मॅम दिखी जो अपनी कार से उतर रही थी...मेरी जानकारी मे ये बात आ चुकी थी कि दीपिका मॅम ने एक नयी कार खरीदी है, जिसके बाद मुझे ये समझने मे बिल्कुल भी देर नही लगी की दीपिका के पास ये कार गौतम के बाप की मेहरबानी से आई है मतलब कि ये कार दीपिका मॅम के उस काम का मेहताना था जिसके बदौलत मैं 3 महीने तक हॉस्पिटल मे अड्मिट था...

वैसे तो दीपिका माँ को देखते ही मेरा शरीर का आधा खून जल उठा लेकिन फिर मैने जबर्जस्ति अपने होंठो पर एक मुस्कान बिखेरते हुए उसकी तरफ बढ़ा....

"उसके पास क्यूँ जा रहा है, अभी ये सही वक़्त नही है..."मुझे दीपिका की तरफ जाते देख अरुण ने मुझे रोक कर कहा...

"अब क्या मैं शुभ महूरत निकल वाउन्गा उस रंडी से बात करने के लिए...आजा टाइम पास करके आते है..."

"तू फिर लफडा करेगा यार "

"तीन महीने पहले जो हुआ ,उससे तो छोटा ही लफडा होगा और वैसे भी उस कुतिया को इसका अहसास होना चाहिए कि मैं फॉर्म मे आ चुका हूँ और उसकी *** चोदने के लिए बिल्कुल तैयार हूँ..."

"तू जा मैं तुझे डाइरेक्ट क्लास मे मिलता हूँ..."बोलते हुए अरुण कॉलेज के गेट की तरफ बढ़ने लगा तो मैने पीछे से उसका कॉलर पकड़ा और बोला..

"तू किधर खिसक रहा है बे..."

"जाने दे यार..."

"अबे समझा कर,जब किसी के सामने उसका मज़ाक उड़ाउंगा तो उसकी और भी ज़्यादा जलेगी..चल अब..."

अरुण को जबर्जस्ति खीचते हुए मैं पार्किंग की तरफ बढ़ा,जहाँ दीपिका मॅम अपना कार लॉक कर रही थी...

"और सुन बाकलोल...वहाँ उस म्सी के सामने चुप-चाप मत रहना,मतलब कि जब भी मैं उसकी छिलाइ करूँ तो ज़ोर से हँसना...समझा"

जवाब मे अरुण ने अपनी गर्दन हां मे हिलाई और शांति से मेरे साथ पार्किंग की तरफ बढ़ा.दीपिका मॅम कार को लॉक कर चुकी थी और पार्किंग से निकल ही रही थी कि मैने अरुण के साथ वहाँ पीछे से एंट्री मारी...
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08-18-2019, 02:02 PM,
#89
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
"ओये दीपिका सुन..."दीपिका मॅम के ठीक पीछे पहूचकर मैने उसे ज़ोर से आवाज़ दी ,जिसके कारण वो शुरू मे थोड़ा डर गयी और पीछे पलटी...पार्किंग मे इस वक़्त हम तीनो के सिवा और भी कुच्छ लोग थे,लेकिन वो हमसे दूर थे इसलिए उन्हे मेरी आवाज़ सुनाई नही दी....पहले-पहल तो दीपिका मॅम मुझे देखते ही कहीं खो गयी लेकिन बाद मे अपने होंठो पर स्माइल लाते हुए मेरी तरफ बढ़ी....

"तू,मुझे डाइरेक्ट नाम से बुला रहा है...डू यू थिंग कि मैं इसकी शिकायत होड़ और प्रिन्सिपल सर से नही करूँगी...हुह "

"पहली बात तो ये कि तू इसकी शिकायत चाहे होड़ से कर या फिर प्रिन्सिपल से...तू चाहे तो इसकी शिकायत अपने बाप से भी कर दे,मुझे कोई फ़र्क नही पड़ता और दूसरी बात ये हुह,पुह ,मुँह मेरे सामने मत कर...वरना यही एक मुक्का तेरे दूध मे दे मारूँगा...साली रंडी.."

मैने कहा और जैसा कि प्लान था अरुण ने जोरदार ठहाका लगाया...मेरी इस हरकत पर दीपिका एक बार फिर कुच्छ देर के लिए कहीं खो गयी , वो शायद उस वक़्त ये सोच रही थी कि मुझे क्या जवाब दे,जिससे कि मैं चुप हो जाउ...जिससे कि मेरी बेज़्जती हो जाए...लेकिन हर कोई अरमान नही होता जो एक सेकेंड्स मे डाइलॉग सोच कर सामने वाले के उपर ज़ोर से फेक कर मार दे

"रहने दे, तुझसे नही होगा...तू बस डिफरेंट वेराइटी के लंड अपने मुँह मे ले सकती है...चल ये बता कि इस कार के बदले तूने गौतम के बाप का लवडा भी लिया है या फिर तूने मेरे साथ जो दोगलाई की उसी से तेरा काम हो गया..."

"शट अप ! गेट लॉस्ट फ्रॉम हियर..."अपने दाँत चबाते हुए दीपिका मॅम ने बड़ी धीमी आवाज़ मे कहा...ताकि वहाँ आस-पास वालो को ये मालूम ना चले कि मैं उसका एक्सटर्नल तरीके से रेप कर रहा हूँ....वैसे तो ये काम मेरा था कि जब मैं उसका एक्सटर्नल तरीके से रेप करूँ तो किसी को इसकी भनक ना लगे ,लेकिन अब जब वो मेरा काम खुद कर रही थी तो मुझे अब किसी भी बात की परवाह नही थी...

"पहली बात तो ये कि तेरे मुँह से स्पर्म की बदबू आ रही है ,पक्का तूने किसी का लवडा मुँह मे सुबह-सुबह लिया है और ब्रश नही किया....और दूसरी बात ये कि ये पार्किंग तेरे बाप की नही है जो मैं तेरे बोलने से चला जाउ...."

मैने कहा जिसके बाद हमारे प्लान के मुताबिक़ अरुण ने फिर से अपने दाँत दिखा दिए....

"दोबारा मार खाएगा तब सुधरेगा तू...रुक जा शाम तक..."बोलकर दीपिका पलटी और वहाँ से जाने लगी...

"एक मिनिट रुक जा जानेमन..."दौड़कर मैं दीपिका के सामने गया और बोला"पहली बात तो ये कि गौतम के बाप को कैसे हॅंडल करना है मुझे मालूम है...कल ही एस.पी. से बात हुई है मेरी और आज कॉलेज के बाद मैं उन्ही के घर मे शिफ्ट होने वाला हूँ...जहाँ गौतम का बाप मेरे लंड का एक बाल भी नही उखाड़ सकता और दूसरी बात ये कि तू मुझे शाम तक मे अपना जलवा दिखाएगी ना...तो तू दिखा,तुझे जो करना है तू कर..चाहे तो नंगी होकर नाच ले या फिर अपने गान्ड मे बम्बू घुसा ले क्यूंकी तुझसे अपना बदला लेने के लिए मैं आज शाम तक का इंतज़ार नही करूँगा,बल्कि अभी ही कुच्छ पीरियड्स के बाद मैं तुझे इस कदर कॉलेज मे नंगा करूँगा कि लोग तुझपर मुतेन्गे भी नही....आज तेरा इस कॉलेज मे आख़िरी दिन है...अरुण,प्लान याद है ना कि हमे क्या करना है..."

"अरे साला बिल्कुल याद है, मेरी उन लोगो से बात हो चुकी है..."अरुण ने भी मेरे हां मे हां मिलाया ,जिसके बाद दीपिका की और भी फॅट गयी .
.
"अरमान ,वैसे प्लान क्या है...मुझे तो कुच्छ भी नही बताया तूने..."पार्किंग मे दीपिका की गान्ड फाड़ने के बाद जब हम दोनो कॉलेज के अंदर दाखिल हुए तो अरुण ने पुछा...

"आक्च्युयली,कोई प्लान ही नही है,वो तो मैने दीपिका रंडी को ऐसे ही डराने के लिए कह दिया था... "

"बोसे ड्के, लवडा मैं तो पार्किंग मे तेरी बड़ी-बड़ी बाते सुनकर भारी खुश था...पर तू तो साला मुझे चोदु बना गया.."

"तुझे चोदु क्या बनाना ,वो तो तू ऑलरेडी है "अरुण की शकल देखकर मैने हँसते हुए कहा"देख, ये मुझे मालूम है कि मैं आज उसका कुच्छ नही करने वाला ,ये तुझे मालूम है कि मेरे पास अभी फिलहाल कोई प्लान नही है...लेकिन ये बात उस रंडी को नही मालूम..."

"इससे क्या होगा..."

"इससे ये होगा मेरे गे पार्ट्नर कि"अरुण के कंधे पर हाथ रखते हुए मैने कहा"उसकी आज पूरे दिन फटेगी कि अब कुच्छ होने वाला है...उसके दिल और दिमाग़ मे एक डर बैठा रहेगा ,जिसके बाद वो अपनी गान्ड सहलाती हुई बेचैन रहेगी..."

"ओह...अब समझा.."

"चल बोल पापा,इसी बात पे.

"तू रुक क्यूँ गया, आगे बता ना.."

"भूख लगी है, जाओ तुम दोनो वरुण और अरुण मेरे लिए खाना बनाकर लाओ..."पेट पकड़ कर लेटते हुए मैने कहा और वरुण को पुकारा..
"हां बोल.."
"यार वरुण ! अपुन सोच रेला है कि जब निशा मेरे साथ रहेगी तब वो क्या मस्त धाँसू खाना बनाएगी...तेरी तरह नही कि कभी खाना जल गया, कभी चावल गीला हो गया..."

"तू उसकी बढ़ाई कर रहा है या मेरी बुराई..."

"दोनो... "बोलते हुए मैने एक बार फिर अपना पेट सहलाया ,जो भूख से तड़प रहा था .

अरुण और वरुण खाना बनाने मे बिज़ी थे और मैं अरुण का मोबाइल उठाकर निशा का नंबर ट्राइ कर रहा था...मैं अभी तक तीन बार निशा को कॉल कर चुका था ,लेकिन निशा ने एक बार भी फोन नही उठाया....

"लगता है ससुर जी उसके आस-पास है..."मोबाइल को बिस्तर पर दूर फेक कर मैं बोला कि तभी मोबाइल बाज उठा....स्क्रीन पर नंबर देखा तो मेरा नाम लिखा हुआ था, यानी कि कॉल निशा की थी.

"बहुत जल्दी रिप्लाइ कर दिया..."

"वो..वो गेम खेल रही थी मोबाइल पे और जब तुमने कॉल किया तो सोचा कि ये वाला स्टेज पहले ख़त्म कर लूँ..फिर तुमसे बात करती हूँ"

"तो कर लिया स्टेज ख़त्म..."

"नो...गेम ओवर हो गया "

"लॉल..."हँसते हुए मैने कहा"एक बात बता, तू खाना बना लेती है ना..."

"उम्म्म...ना"

"क्या तुझे खाना बनाना नही आता..."जबर्जस्त तरीके से मैं चौका और एक दम से खड़ा हो गया..

"किसी ने कभी सिखाया ही नही..."

"तो सीख ले, वरना बहुत मारूँगा "

"तुम मज़ाक कर रहे हो ,राइट"

"रॉंग, मैं एक दम से सीरीयस हूँ...."
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"ले बे ठूंस ले..."एक प्लेट मेरे हाथ मे पकड़ाते हुए वरुण बोला"जब तक मेरे साथ है खाना खा ले,बाद मे तो तुझे खुद से ही बना कर खाना पड़ेगा..."

"निशा, मैं बाद मे कॉल करता हूँ...तब तक तू गेम खेल "
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निशा से बात करने के बाद मैने अपना पेट भरा और जब पेट भर गया तो मैं बोला...
"साले कितना बेकार खाना बनाते हो बे,शरम करो लवडो ,"

"देख बेटा, ऐसा है कि ज़्यादा बोलेगा तो रात का खाना तुझे ही बनाना पड़ेगा...."

"मैं तो मज़ाक कर रहा था... "जब रात के खाना बनाने की तलवार मुझ पर अटकी तो मैने तुरंत जवाब दिया .

अरुण और वरुण ,जब खाना खा चुके तो मैने अपनी याददाश्त को वही से प्ले किया जहाँ पर कुच्छ देर पहले फ्यूज किया था
.
.
उस दिन पार्किंग मे दीपिका मॅम को मैने जो धमकी दी थी ,उसका उसपर बहुत गहरा असर हुआ. मेरी धमकी इतनी असरदार थी कि उसी दिन शाम को जब हम लोग हॉस्टिल मे बैठकर कैरम खेल रहे थे तो विभा ने मुझे कॉल किया. विभा की कॉल देखकर सबसे पहले मेरे शरीर के मैं पॉइंट ने रिएक्ट किया और फिर बाद मे मेरे हाथ ने....
"लवडा गद्दारी कोई नही करेगा मैं अभी आया..."

मैने कैरम का गेम छोड़ा और रूम से बाहर आकर विभा की कॉल रिसीव किया....

"अरमान, मैं विभा..."

"विभा, मैं अरमान..."

"अरमान, तुम मेरा मज़ाक उड़ा रहे हो..."

"काम क्या है ये बोल, अभी अपुन भारी बिज़ी है..."

"वो मुझे कहना था कि तुम...मैं तुमसे कहना चाहती हूँ कि...आक्च्युयली मुझे बहुत इंपॉर्टेंट बात करनी है,आइ होप कि तुम बुरा नही मनोगे..."

"आइ होप कि मैं बुरा ना मानु..."

"वो मुझे दीपिका ने कॉल करने को कहा था, वो अपने किए पर बहुत शर्मिंदा है और उसने कहा है कि यदि तुम सब कुच्छ भूल जाओ तो तुम दोनो के बीच पहले वाला रीलेशन हो जाएगा "इतना बोलकर विभा चुप हो गयी और मैं उसके कुच्छ और कहने का इंतज़ार करने लगा "आंड ऐज आ टीचर , मैं तुम्हे सलाह देती हूँ कि तुम्हे दीपिका मॅम की बात मान लेनी चाहिए...क्यूंकी फालतू मे लड़ने का कोई फ़ायदा नही है..."

मैं कुच्छ देर के लिए चुप रहा और फिर बोला"ओके..."

"क्या.."

"ठीक है ,मुझे मंजूर है...लेकिन.."

"थॅंक्स..."विभा बीच मे बोली

"लेकिन मेरी एक शर्त है और वो शर्त ये है कि तुझे मेरे साथ सेक्स करना पड़ेगा और एलेक्ट्रिकल ब्रांच मे जो नयी मॅम आई है ,उसे भी मेरे साथ सेक्स करने के लिए उसे राज़ी करना पड़ेगा..."

"व्हाट...तुम्हारा दिमाग़ खराब हो गया है ,क्या..."

"दिमाग़ तो बहुत पहले से खराब है और उस दीपिका रंडी को बोल देना कि वो अपनी चूत का लालच देकर मुझसे बच नही सकती..उससे ये भी कहना कि मैं जब चाहू उसकी जैसी माल पटा सकता हूँ लेकिन वो मेरे जैसा लौंडा नही पटा सकती,ईवन उसका प्रेज़ेंट टाइम मे जो बाय्फ्रेंड है ,वो आकर मुझे सर...सर कहते रहता है...."

"माइंड युवर लॅंग्वेज..."

"माइंड युवर बिज़्नेस...चल फोन रख,वरना तेरी भी बेज़्जती कर दूँगा..."
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उसके बाद विभा ने मुझे कभी कॉल नही किया.एग्ज़ॅम नज़दीक होने कारण कॉलेज मे प्रेपरेशन लीव लग गया...जिसके कारण अब हमारा सारा दिन हॉस्टिल मे बीत रहा था...ऐसे ही एक दिन ,सुबह-सुबह जब मैं गहरी नींद मे था तो किसी ने रूम का दरवाजा बहुत ज़ोर से पीटा...

"कौन है बे बीसी..."सौरभ ने गुस्से मे कहा और तकिये से अपना कान ढक लिया

"भाग जा वरना ,जहाँ छेद दिखेगा वही चोदुन्गा..."अरुण ने भी गुस्से मे कहा और तकिये से अपने कान को ढक लिया...

"भाग जा वरना एक बार लंड फेक कर मारूँगा तो सारा खानदान चुद जाएगा..."मैने भी तकिये से कान को ढकते हुए कहा...

"अरे मैं हूँ, राजश्री पांडे..."

"अरे ये तो भाई है ,अपना.." सौरभ बोला..

"अरे ये तो यार है अपना..."अरुण भी सुर मे सुर मिलाते हुए बोला

"अरे ये तो प्यार है अपना,.."दरवाजा खोलते हुए मैने कहा"क्यूँ बे लोडू, पहले नाम बता देता तो क्या होता...और तू साले इतनी सुबह कर क्या रहा है...."

"आपको वो टॉप मोस्ट ब्रेकिंग न्यूज़ पता चली या नही..."

"कौन सी ब्रेकिंग न्यूज़..."आँख मलते हुए और उबाई लेते हुए मैने पुछा...

"दीपिका मॅम को प्रिन्सिपल ने लाइफ टाइम के लिए कॉलेज से निकाल दिया और साथ ही उसे कॉलेज मे मिस्बेअहविन्ग का सर्टिफिकेट भी थमा दिया..."

"हो गया ,अब चल निकल यहाँ से..."

"क्या अरमान भाई..मैने सोचा था कि आप बहुत खुश होंगे..."

"दिल पे मत ले, अब चल जा यहाँ से..."
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राजश्री पांडे को भगाने के बाद मैने दरवाजे को उपर से,नीचे से और बीच से बंद करके पीछे मुड़ा तो देखा कि अरुण और सौरभ अपने पूरे शरीर को चादर से लपेटे हुए मुझे देख रहे थे और साथ मे मुझे घूर भी रहे थे....

"सॉरी यार ! मैने तुम लोगो को मेरे इस प्लान के बारे मे नही बताया था...लेकिन प्लान सक्सेस्फुल हो गया,इसलिए आज पार्टी."

बरसो पहले एक महान व्यक्ति ने ये कहा था कि यदि सारी दुनिया बदले की आग मे आँख के बदले आँख लेने लगे तो एक दिन ऐसा आएगा जब पूरी दुनिया अंधी हो जाएगी...मुझे उस महान व्यक्ति का नाम तो नही मालूम(यहाँ तक कि ये भी नही मालूम की वो मेल थे या फीमेल ) ,लेकिन उनके द्वारा कही गयी वो चन्द पंक्तिया मुझे हमेशा के लिए याद हो गयी थी.फिर भी मैने दीपिका से अपना बदला लिया यानी कि आँख के बदले आँख और यदि अपने बॉलीवुड स्टाइल मे कहे तो खून के बदले खून :

मैं उस महान व्यक्ति का विरोध नही कर रहा लेकिन कभी - कभी हमारे सामने ऐसी सिचुयेशन आ जाती है ,जब हमे भगत सिंग बनना पड़ता है.
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"ये तूने किया है क्या, मुझे माँ कसम यकीन नही हो रहा..."

"मुझे भी यकीन नही हो रहा..."

अरुण और सौरभ अभी तक अपने शरीर मे चादर लपेटे हुए बिस्तर पर बैठे थे .

"मैं धीरे-धीरे करके एक्सप्लेन करता हूँ..."उनकी तरफ बढ़ते हुए मैं बोला...

"वो तो तुझे करना ही पड़ेगा, लेकिन पहले ये फॅन बंद कर...साला ठंड के मारे गान्ड फटी जा रही है...."

मैने फॅन बंद किया और वापस उन दोनो की तरफ जाते हुए पुछा"तो कहाँ से शुरू करू..."

"कहाँ से शुरू करू का क्या मतलब बे...सारी बाते वही से शुरू कर जहाँ से तूने इसकी शुरुआत की थी...."

"एक मिनिट..."अपने दिमाग़ को प्रेज़ेंट से पास्ट मे ले जाते हुए मैने वापस प्रेज़ेंट मे लाया और पास मे रखी चेयर को खींच कर उसपर बैठते हुए बोलना शुरू किया"दीपिका मॅम को प्रिन्सिपल ने कॉलेज से इसलिए निकाला क्यूंकी आज सुबह-सुबह ही उसने दीपिका का सेक्स वीडियो कॉलेज के एक लड़के के साथ देखा है...इसकी शुरुआत तब हुई थी जब तू और सौरभ, भू से मिलने उसके कॉलेज गये थे.उस दिन, रात को नशे मे होने के कारण राजश्री पांडे और उसके दोस्तो की उनके वॉर्डन से लड़ाई हो गयी थी ,जिसके बाद वो सब भाग कर मेरे रूम मे रात बिताने आए थे..उनसे बातो ही बातो मे मुझे ये मालूम चला कि उनमे से एक वो लड़का भी है जो दीपिका मॅम का करेंट टाइम मे बाय्फ्रेंड है.बस तभी मेरे 1400 ग्राम के दिमाग़ मे एक सूनामी आई ,ऐसी सूनामी जो दीपिका मॅम को बहा कर ले जाने वाली थी...मैने उसी पल ये सोचा कि यदि इन दोनो की चुदाई का सीन किसी तरह प्रिन्सिपल की आँखो तक पहुचा दिया जाए,तो दीपिका मॅम की जबर्जस्त बेज़्जती भी होगी और साथ ही साथ उसे ज़िंदगी भर के लिए कॉलेज निकाला घोसित कर दिया जाएगा....जब पूरा प्लान तैयार हुआ तो मैने इसपर तुरंत काम चालू कर दिया और अगले ही दिन उस लड़के से मिला जिसे दीपिका ने फँसा रखा था. शुरू मे तो उसने मेरी बात मानने से इनकार कर दिया और तब मुझे उसे धमकाना पड़ा...जैसे कि मैं उसका वही हाल करूँगा..जो मैने वरुण और गौतम का किया था...मैने उस लड़के से कहा कि यदि वो मेरी बात नही मानेगा तो मैं उसके बाप को कॉल करके उसके और दीपिका मॅम के रीलेशन के बारे मे सब-कुच्छ बता दूँगा..मेरी धमकिया सुनकर वो साला एक पल मे रो पड़ा, पता नही दीपिका ने कैसे फट्टू को अपना बाय्फ्रेंड बनाया था उस दिन मैने उससे ये भी कहा कि यदि वो मेरा साथ देता है तो आज के बाद वो मेरा खास दोस्त कहलाएगा और मैं चुदाई के वीडियो मे उसका फेस नही दिखाउन्गा....मैने उसे और भी कयि धमकिया और लालच दिए ,आख़िरकार जब वो मान गया तो मैने उससे इन्फर्मेशन ली कि दीपिका मॅम उसके साथ कब और कहाँ सेक्स करती है, जवाब मे मुझे पता चला कि हर सॅटर्डे को जब कॉलेज की जल्दी छुट्टी होती है तो वो और दीपिका कंप्यूटर लॅब मे अपना प्रोग्राम शुरू करते है.
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ये इन्फर्मेशन मेरे लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित होने वाली थी ,क्यूंकी दीपिका अपने रूम मे चाहे बराक ओबामा से सेक्स करे, वो उसका पर्सनल मॅटर था,लेकिन कॉलेज के अंदर कॉलेज के ही स्टूडेंट से चुदाई करवाना ,ये एक तरह से इल्लीगल भी था और कॉलेज की रेप्युटेशन को गिराना भी इसमे शामिल था . मैने बहुत जगह हाथ-पैर मारकर...कहीं से एक छोटा सा कॅमरा का जुगाड़ किया और कंप्यूटर लॅब मे उसी लड़के के हाथो उस जगह सेट करवाया ,जहाँ से उन दोनो का खेल उस कॅमरा मे आसानी से रेकॉर्ड हो जाए....और फिर एक दिन मौका देखकर दीपिका ने फर्स्ट एअर के साथ मिलकर उधर कंप्यूटर लॅब मे चुदाई मचाई और इधर मेरा काम पूरा हो गया..."

"कब से था वो वीडियो तेरे पास..."सौरभ ने पुछा

"यही पिछले कुच्छ 10-12 दिन पहले वो वीडियो मेरे हाथ आ गया था..."

"तो क्या अभी तक शुभ महूरत का इंतज़ार कर रहा था..."

"अबे चूतियो, फर्स्ट एअर के उस लड़के के फेस की एडिटिंग करवानी थी ,इसलिए टाइम लग गया..."

"बोले तो एक दम सॉलिड प्लान था भाऊ, ला जल्दी से फ़ेसबुक मे अपलोड करके उस रंडी की *** चोदते है "एग्ज़ाइटेड होते हुए अरुण ने कहा...

"नही यार, पता नही क्यूँ लेकिन ऐसा करने के लिए मेरे लेफ्ट साइड ने मुझे रोक दिया...वरना मुझे यदि फ़ेसबुक मे ये वीडियो अपलोड करना होता तो मैं कब का कर चुका होता ,ईवन हज़ारो पॉर्न साइट्स मे अपलोड करके उसे बदनाम कर सकता था...लेकिन मेरा मक़सद ये नही था. "
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"वो सब तो ठीक है कक्के,लेकिन तू ये बता कि तुझे हम दोनो पर भरोशा नही है क्या...जो कभी भी कोई बात हमे नही बताता, साले हम तेरे दोस्त है लेकिन तेरे कारनामे की खबर हमे सबसे आख़िरी मे मालूम चलती है और वो भी दूसरो के मुँह से..."बिस्तर से नीचे आते हुए अरुण ने सौरभ से कहा"सौरभ, वो हॉकी स्टिक निकाल तो,अभी साले को तीन महीने के लिए फिर से कोमा मे भेजता हूँ..."

"मुझे मालूम है अरुण, तू मज़ाक कर रहा है.तू मुझे मार नही सकता..."

"मुझे तो ऐसा नही लगता "कहते हुए अरुण ने एक जोरदार मुक्का मेरे पेट मे मारा....

"अबे,इतनी ज़ोर से मारेगा क्या..."

"यदि इतना ही दर्द हो रहा है तो ये बता कि तू हमे सारी बात पहले क्यूँ नही बताता...लवडे "इसी के साथ दूसरा मुक्का मेरी पीठ पर पड़ा...

"वो क्या है कि... किसी महान पुरुष ने कहा है कि ,जब आप खुद कोई राज़ की बात अपने अंदर नही रख पाए ,तो फिर आप दूसरो से कैसे एक्सपेक्ट कर सकते हो कि वो ये बात किसी और को ना बताए..."

"कोई फ़ायदा नही होने वाला बेटा,आज तो तू कोमा मे जाकर रहेगा..."

"एक और बात ऐसी है जो तुम लोग को मैं सबसे पहले बताने जा रहा हूँ...अब तो छोड़"

"अच्छा ,चल बता.."

"वो फर्स्ट एअर मे जिस सीनियर ने मेरी रॅगिंग ली थी ना, उसका भी खेल आज ख़त्म होने वाला है..."

"वो कैसे..."अरुण और सौरभ एक साथ बोल पड़े"जल्दी से बता..."

"आज दोपहर मे वो कुच्छ काम से सिटी जाएगा,जहाँ उसकी किसी से बहस होगी और फिर वो बहस लड़ाई मे तब्दील हो जाएगी...जिसके बाद उस सीनियर की जोरदार पेलाइ होगी . मेरे ख़याल से अब ये बताने की कोई ज़रूरत नही कि जो लोग उस म्सी को मारेंगे वो मेरे आदमी होंगे

"अरमान सर, आइ हॅव आ क्वेस्चन..."बीच मे ब्रेक लगाते हुए वरुण ने कहा"तूने वीडियो प्रिन्सिपल को कैसे दिखाया.क्यूंकी प्रिन्सिपल तेरा कोई दोस्त तो है नही जो तू उसके कंधे पर हाथ रखकर दीपिका मॅम की चुदाई का वीडियो प्ले कर देगा... "

"याद है मैने एक बार कहा था कि सरकारी कॉलेज के टीचर्स को सर भले ना कहो...लेकिन पीयान को सर कहना ही पड़ता है..."

"इसका मतलब तूने पीयान की मदद से वो वीडियो..."

"यस..."बीच मे ही वरुण को रोक कर मैने कहा"और तू ये बार-बार डिस्टरब मत किया कर बे,फ्लो बिगड़ जाता है..."

"ओकाययी...अब कुच्छ नही बोलूँगा."
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Reply
08-18-2019, 02:03 PM,
#90
RE: Desi Sex Kahani दिल दोस्ती और दारू
फौर्त सेमेस्टर के एंड तक वो सारी आग बुझ चुकी थी जिसकी शुरुआत थर्ड सेमेस्टर से हुई थी. मैने अपने सारे दुश्मनो से अपना बदला ले लिया था,चाहे वो गौतम हो या फिर नौशाद...चाहे वो दीपिका हो या फिर फर्स्ट एअर मे मेरी रॅगिंग लेने वाला वो सीनियर जो आज हॉस्पिटल मे पड़ा हुआ था. मुझे ये जानकार उस दिन बहुत सुकून मिला जब मुझे ये इन्फर्मेशन मिली कि नौशाद और वो सीनियर 4थ सेमिस्टर. का एग्ज़ॅम नही दे पाएँगे और फाइनली हमारे कॉलेज को दीपिका मॅम से छुटकारा मिल ही गया. मेरे ख़याल से दीपिका मॅम को कॉलेज से निकलवाने के कारण जहाँ एक तरफ मेरा बदला पूरा हुआ वही दूसरी तरफ मैने कयि सारे लड़को को बिगड़ने से बचा लिया था.(मुझे तो नोबल प्राइज़ मिलना चाहिए ).दीपिका मॅम कॉलेज से भले चली गयी थी लेकिन इतना तो श्योर था कि उनका नाम इस कॉलेज मे अमर हो चुका था क्यूंकी कॉलेज के लड़के अब उसके नाम पर डिफरेंट वेराइटी के जोक बनाने वाले थे और जब लड़के इंजिनियर हो तो जोक और भी ज़्यादा गहरा और ख़तरनाक हो जाता है

गौतम के बाप के गुन्डो ने मुझे बहुत धोया ,मैं इससे इनकार नही करता....लेकिन मैने गौतम को बुरी तरह धोया ,इसको भी कोई इनकार नही कर सकता. इसलिए मन ही मन मे मैने ये मान लिया कि इसमे भी जीत मेरी ही हुई है.मुझसे बुरी तरह मार खाने के बाद गौतम मे अचानक से बहुत बड़ा बदलाव आ गया था. अक्सर कॉलेज मे जब हम ना चाहते हुए भी एक-दूसरे के सामने आ जाते तो वो चुप-चाप वहाँ से निकल लेता था, अब उसका रोल कॉलेज मे सिर्फ़ बॅस्केटबॉल की वजह था.गौतम एक हॅंडसम लौंडा था इसे मैं मानता हूँ लेकिन कॉलेज की बहुत सी लड़किया उसके पीछे सिर्फ़ उसका बॅस्केटबॉल का गेम देखकर पड़ी थी और लड़कियो मे उसका क्रेज़ आज भी वही था जो पहले के दिनो मे हुआ करता था लेकिन एक सवाल यहाँ भी पैदा होता है कि आख़िर कब तक...क्यूंकी जिस भी दिन मैं बॅस्केटबॉल कोर्ट मे दोबारा कदम रखूँगा उस दिन मेरे ख़याल से उसका वो रोल भी ख़तम हो जाएगा और फिर कॉलेज की आधी लड़किया मेरे पीछे पागल होगी. लेकिन मेरा ऐसा कुच्छ भी करने का कोई मूड नही था ,जिसकी दो वजह थी...पहली वजह ये कि मैं खुद अब बॅस्केटबॉल नही खेलना चाहता था और दूसरी वजह ये कि अब मैं इस लड़ाई-झगड़े से तंग आ चुका था...मैं नही चाहता था कि बॅस्केटबॉल के गेम से गौतम की धाक ख़तम करके मैं एक नये विवाद को जानम दूं,जिससे एक बार फिर वही सब कुच्छ हो...जो पिछले कुच्छ महीने मे हुआ था.
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वैसे एक हिसाब से देखा जाए तो कॉलेज का ये साल मेरे लिए बहुत अच्छा भी रहा क्यूंकी मैने कॉलेज के उन बड़े से बड़े लौन्डो को पेला,जो शेर बने फिरते थे और उन सबको मारने के बाद कॉलेज मे अब सिर्फ़ एक शेर ही बचा था और वो मैं था .मेरी कॉलेज मे एंट्री होते ही लड़के ऐसे बिहेव करते जैसे मैं कोई सूपर हीरो हूँ और अभी-अभी दुनिया को बचा कर आ रहा हूँ...अब मेरे आस-पास अक्सर बहुत से लड़को का झुंड रहने लगा था. सारे लड़के अक्सर मुझसे पुछते रहते कि मैने कैसे सबको पेला और मैं मिर्च मसाले लगाकर उन सबको अपने बहादुरी के किस्से ऐसे सुनाता कि वो लोग मेरे फॅन बन जाते थे.

कॉलेज मे मेरी पॉप्युलॅरिटी का ग्रॅफ एक दम मॅग्ज़िमम लेवेल पर जा पहुचा था,जिसका अंदाज़ा मैने फ़ेसबुक से लगाया. जब मैने पहले क़ी तरह वापस फ़ेसबुक पर आक्टिव हुआ और अपनी आइडी लोग इन की तो गेट वेल सून के ना जाने कितने मेससेजस, कितने कॉमेंट मेरी प्रोफाइल पर थे. और कॉलेज के कयि सारे लड़को की फ्रेंड रिक्वेस्ट भी पेंडिंग मे थी. मैं जब भी कोई स्टेटस या फोटो फ़ेसबुक मे चिपकाता तो उनपर 100-150 लाइक तो आम सी बात हो गयी थी और कॉमेंट्स की तो पुछो ही मत
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मुझे एक नुकसान भी मेरी इन हरकतों की वजह से उठाना पड़ा और वो नुकसान ये था कि कॉलेज की लगभग सभी लड़कियो ने मुझे अनफ्रेंड कर दिया था.... ये नुकसान उठाने वाला मैं अकेला नही था . सौरभ और अरुण को भी कॉलेज की लगभग सारी आइटम्स ने अनफ्रेंड कर दिया था ,जिसका रीज़न सिर्फ़ इतना सा था कि मैं उन दोनो का खास दोस्त था....

मुझपर कॉलेज की लड़कियो की इस हरकत का कोई खास असर तो नही पड़ा लेकिन सौरभ और अरुण की तो जैसे ज़िंदगी भर की फ़ेसबुक मे कमाई हुई लड़किया लूट गयी थी.बेचारे इन्ही लड़कियो की वजह से वो दोनो ना जाने कितने दिन फ़ेसबुक मे ब्लॉक रहे थे
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यदि इस साल किसी चीज़ ने मेरा दिल दुखाया तो वो था मेरा एग्ज़ॅम ना दे पाना...क्यूंकी सेमेस्टर मे 6 पेपर ही बड़े मुश्किल से क्लियर होते थे और अब फोर्त सेमेस्टर मे मुझपर डाइरेक्ट 12 पेपर का लोड आ गया था, जो कि बहुत ही ज़्यादा मेरा दिल दुखा रहा था. दूसरी चीज़ जिसने मेरा दिल दुखाया था ,वो थी एश का मुझसे बात ना करना....ना जाने उस भूरी आँख वाली लड़की मे ऐसा क्या था कि इतने सारे झमेले होने के बावजूद,इतने सारे टेन्षन होने के बावजूद...उसकी तस्वीर आज भी दिल और दिमाग़ मे एक दम क्लियर थी. जब भी मैं अकेले होता ,जैसे कि रात को सोते समय, थोड़ी-बहुत पढ़ाई करते समय और बाथरूम मे नहाते समय उसकी याद आ ही जाती थी. लेकिन अभी कुच्छ दिनो पहले जब मैने फ़ेसबुक पर लोग इन किया तो पाया कि उसने मुझे ब्लॉक करके रखा हुआ है...यानी कि बात करने का आख़िरी रास्ता भी क्लोस्ड !
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तीसरी चीज़ जो मेरा दिल दुखाती है ,वो है सीडार की मौत....ये एक ऐसी घटना थी,जिसका असर सबसे ज़्यादा हुआ था.मुझे अभी भी कभी-कभी लगता कि सीडार की मौत एक झूठ है, धोखा है...ज़िंदगी का छलावा है...अक्सर उसकी कही हुई बाते मेरे कानो मे गूंजने लगती और तब मुझे लगता कि जैसे मैने अपने इस चार साल के सफ़र के एक बहुत ही अहम ,एक बहुत ही खास हमसफ़र को खो दिया था.....
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एग्ज़ॅम ख़त्म हुए और मेरे सारे पेपर अनएक्सपेक्टेड गये, क्यूंकी जहाँ मैने एक तरफ उम्मीद लगा रखी थी कि मेरे हज़ारो बॅक लगेंगे वही दूसरी तरफ मैं दस पेपर मे श्योर था कि ये तो क्लियर ही होंगे...बाकी के दो पेपर मे 50-50 का चान्स था...लेकिन फिर भी एक उम्मीद थी कि मैं इस बार फुल एसी के साथ निकलूंगा और सबकी फाड़ दूँगा...एग्ज़ॅम के बाद मेरे मन मे एक विचार आया कि यदि मैं अभी भी पढ़ना शुरू कर दूं तो मैं क्लास मे टॉप मार सकता हूँ...

थर्ड एअर शुरू होने से पहले मैने बहुत सारे प्लान बनाए...जैसे कि रोज सुबह 6 बजे उठना ,फिर पढ़ाई करना ,फिर नहा धोकर कॉलेज जाना,शाम को 5 बजे कॉलेज से आने के बाद दो घंटे आराम करना ,फिर 3-4 घंटे पढ़ाई करना और आख़िर मे बाक़ायदा मूठ मारकर सोना....मैने सोचा कि अब नो फाइट,नो पंगा...मैने तय किया कि अब मैं भी एक नॉर्मल स्टूडेंट की लाइफ जीऊँगा मतलब कि खूब दिल लगाकर पढ़ुंगा और एग्ज़ॅम मे अच्छे मार्क्स लाकर घरवालो को खुश करूँगा...
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ये सब करने के लिए सबसे पहला काम जो मुझे करना था वो था अपने टीचर्स की रेस्पेक्ट करना और क्लास मे एक भी बक्चोदि ना करके एक दम सिन्सियर रहना..क्यूंकी मेरा ऐसा मानना है कोई भी स्टूडेंट अपने टीचर से तभी कुच्छ सीख सकता है,जब वो उस टीचर की रेस्पेक्ट करे...इसलिए मेरा काम ये था कि किसी भी टीचर को कोई भी गाली नही बकुँगा...फिर चाहे वो विभा डार्लिंग ही क्यूँ ना हो...


दूसरा काम जो मुझे करना था वो ये कि मैं पढ़ने वाले लड़को के साथ रहूं इसलिए मैं भी वो करू जो 3 ईडियट्स मे राजू रस्तोगी ने किया था...यानी कि अपना रूम बदल कर किसी चतुर जैसे लड़के के रूम मे शिफ्ट हो जाए...लेकिन मेरे हॉस्टिल मे ना तो कोई चतुर जैसा था और ना ही मैं राजू रस्तोगी था ,इसलिए इस प्लान को मैने तुरंत अपने माइंड से डेलीट मार दिया...

तीसरा काम जो मुझे करना था वो ये कि हर नॉर्मल स्टूडेंट की तरह फाडू तरीके से डिसिप्लिन मे रहना..बोले तो ड्रेस एक दम सॉफ हो और चप्पू किस्म की हो....लेकिन दूसरे प्लान की तरह इसमे भी दिक्कते थी...पहली दिक्कत ये कि मैं कोई चप्पू ड्रेस नही पहनने वाला था और दूसरी दिक्कत ये कि अब साला कौन रोज-रोज अपनी कॉलेज ड्रेस धोए,इसलिए मैने इस प्लान को भी माइंड से डेलीट किया और सोचा कि बाद मे सोचेंगे,जब कॉलेज शुरू हो जाएगा फिलहाल अभी जो छुट्टी मिली है उसको एंजाय करते है और घर का बढ़िया खाना खाते है

लंबी छुट्टी और ट्रैनिंग के बाद आख़िरकार कॉलेज शुरू हो ही गया और हॉस्टिल मे आकर जो सबसे पहला ख़याल मेरे दिमाग़ मे आना चाहिए था ,वो पढ़ाई के बारे मे होना चाहिए था. लेकिन मेरे दिमाग़ मे जो ख़याल आया वो पढ़ाई के बारे मे ना होकर मेरी सीनियारिटी के बारे मे था. मैं अब थर्ड एअर मे आ चुका था यानी कि प्री-फाइनल एअर और नॉर्मली कॉलेज के न्यू स्टूडेंट्स थर्ड एअर और फाइनल एअर के लड़को से बहुत डरते है.इसलिए कॉलेज के हॉस्टिल मे अंदर घुसते ही मैने अपना सीना चौड़ा किया और अपने रूम मे गया....

जब मुझे कोई फर्स्ट एअर और सेकेंड एअर मे नही रोक पाया तो थर्ड एअर मे कोई क्या रोकेगा...ये सोचते हुए मैं दूसरे दिन कॉलेज जाने के लिए तैयार हो रहा था.

"यार ,अरमान...अब तो हम लोग थर्ड एअर मे आ गये है,बोले तो अब एक दम फाडू मस्ती करेंगे क्यूंकी अब हमे रोकने से टीचर्स की भी गान्ड फटेगी..."मुझे आईने के सामने से हटाते हुए अरुण बोला

"यो...बेटा अरुण ,आज कॉलेज का पहला दिन है..इसलिए मेरे पैर छुकर मेरा आशीर्वाद ले ले..पूरा साल अच्छा जाएगा..."

"तू अब सुबह-सुबह मत खा और ला कंघी दे..."

"कंघी......उम्म्म..."याद करते हुए मैं बोला"साला कोई आया था रूम मे कंघी माँगने,फिर मैने उसे दिया..."

अभी मैं याद ही कर रहा था कि कंघी किसके पास है,तभी अरुण ने तेज़ आवाज़ मे मुझे टोका...

"तो जा लेकर आ...मना किया था ना किसी को कंघी देने से..."

"देख..वो क्या है कि मैं दानवीर कर्ण की तरह हूँ,इसलिए सुबह-सुबह मुझसे यदि कोई मेरी जान भी माँग ले तो मैं मना नही कर सकता.उसने तो फिर भी एक कंघी माँगी थी..."

"बेटा यदि ,दानवीर बनने का इतना ही शौक है तो अपनी चीज़े दान किया कर,वरना मुँह मे लवडा पेल दूँगा और क्या कहा तूने...कि सुबह-सुबह तुझसे कोई भी आकर कुच्छ भी माँगे तो तू उसे मना नही करता..."
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