Chodan Kahani घुड़दौड़ ( कायाकल्प )
12-17-2018, 02:24 AM,
RE: Chodan Kahani घुड़दौड़ ( कायाकल्प )
सुबह :

सुबह का उजाला घर के आँगन में अपने पैर पसार रहा था। अंजू ने अपनी आँखें धीरे धीरे खोलीं। आज बहुत ही अरसे के बाद उसने अच्छे से नींद ली थी – यह बात उसको भी समझ में आ रही थी। कल से आज वह काफी तरो ताज़ा महसूस कर रही थी। उसने जम्हाई भरी, अंगड़ाई ली, और फिर अचानक ही उसको कल रात के सपने की बातें याद आ गईं। उसको स्वयं पर बहुत ही लज्जा आई – अपना पति होते हुए भी ऐसे ऐसे सपने आते हैं..! लेकिन जाने क्यों वो पुरुष भी कोई अपना सा ही लग रहा था। उसने कुंदन को आँगन से इधर उधर होते हुए देखा। वो मुस्कुराई – कल जब कुंदन उसके स्तनों का पान कर रहा था तो उसको बहुत ही आनंद आया। वो भी कैसे नटखट बच्चों के जैसे मचल मचल कर पी रहा था।

कल शाम को कुंदन ने अंजू को बताया की उसकी उम्र सोलह साल की नहीं है.. बल्कि अंजू के बराबर ही है.. अंजू थोड़ा निराश हो गयी – अगर सोलह की उम्र होती, तो कुछ उम्मीद भी थी, लेकिन अभी तो... खैर!

उसके मन में एक बात उठी की उन दोनों की पहली रात कैसी रही होगी? कैसे कुंदन ने उसके कपड़े उतारे होंगे, और कैसे उसके साथ सम्भोग किया होगा! 

कुंदन ने अंजू को देखा तो मुस्कुराया। एक बार उसके मन में आया की अंजू से पूछे की ये नीलू कौन है.. फिर उसको याद आया की अंजू को तो कुछ याद ही नहीं.. क्यों अनायास ही ऐसी बातें छेड़ना? कहीं लेने के देने पड़ गए तो!

“ठीक से सोई?” उसने पूछा।

“हाँ.. आप क्या कर रहे हैं?”

“नाश्ता बना रहा हूँ... काम पर भी तो जाना है..”

“ओ माँ! कितनी देर सोती रही मैं.. और आपने जगाया क्यों नहीं?”

“अरे कोई बात नहीं.. पहले ठीक हो जाओ.. ये सब तो होता रहता है..”

“नहीं नहीं.. अब से खाना मैं ही बनाउंगी..”

“ठीक है.. बना लेना.. लेकिन अभी तो आराम से रहो न..”

“समय कितना हो रहा है..”

“साढ़े नौ हो रहे हैं..”

“बाप रे!” फिर कुछ सोच कर, “आपने... खा लिया?”

“हाँ.. बस अभी अभी.. कुछ देर में निकल जाऊँगा..”

“अच्छा..” अंजू ने कुछ बुझे हुए स्वर में कहा। अकेला रहना भला किसको पसंद आएगा? “कब आयेंगे वापस?”

“शाम को..”

“ओह!”

“कहो तो न जाऊं..” कुंदन ने रोमांटिक बनने की असफल एक्टिंग करी।

अंजू मुस्कुराई, “कुछ देर में चले जाइए?”

“हम्म.. देर में चला तो जाऊं.. लेकिन उसके बदले में मुझे क्या मिलेगा?”

“मेरी गोदी में सर रख कर लेटेंगे आप?” अंजू मुस्कुराई। कुंदन भी मुस्कुराया।

“और?”

“पहले रखिए तो सही..”

कुंदन बिस्तर पर आ कर अंजू के बगल आ कर उसकी गोदी में सर रख कर लेट गया। कुंदन का शिश्न उत्तेजित होने लगा – लेकिन फिर भी वो इस समय काफी आराम महसूस कर रहा था। आश्चर्यजनक रूप से उसको किसी भी तरह का उतावलापन नहीं महसूस हुआ। अंजू बड़े प्यार से कुंदन के सर और चेहरे को सहला रही थी। कुंदन को ठीक वैसा महसूस हुआ, जैसा की अगर वो अपनी माँ की गोदी में सर रखता! उतना ही आराम! उतना ही चैन! उतनी ही कोमलता!

‘बढ़िया!’

सुख और आनंद से उसकी आँखें बंद हो गईं, जो कपडे की हलकी सरसराहट की आवाज़ के बाद ही खुलीं। अंजू ने मैक्सी के सामने के बटन खोल दिए थे, और कुंदन को स्तनपान करवाने के लिए अपने स्तन स्वतंत्र कर दिए थे। कुंदन ने देखा – अंजू के आदर्श स्तन और चूचक उसको निमंत्रण दे रहे थे। उसके चूचक उत्तेजनावश कड़े हो गए थे, मानो कह रहे हों – ‘सैयां! आ जाओ.. हमें अपने मुँह में ले लो.. और चूसो!’

कुंदन ने वही किया। अंजू समझ गयी की आधे घंटे का प्रोग्राम तो बन गया। कल की चुसाई के बाद उसके चूचक थोड़े से पीड़ित थे, लेकिन अकेला रहने से यह ज्यादा अच्छा यह था की वो यह पीड़ा बर्दाश्त कर ले। कुंदन भी पूरी सतर्कतापूर्व चूस रहा था, जिससे अंजू को चोट न लगे। कुछ देर बाद जब उसने दूसरे स्तन को मुँह में लिया, तब अंजू के मुँह से एक कराह निकली।

‘क्या उसको दर्द हुआ?’ कुंदन ने दूध पीना छोड़ कर एक प्रश्नवाचक दृष्टि अंजू पर डाली। वो आँखें बंद किए सिसकारी भर रही थी। जब अंजू ने देखा की कुंदन ने पीना छोड़ दिया, तो उसने आँखों में ही वापस पूछा, ‘क्या हुआ?’

कुंदन ने ‘कुछ नहीं’ में सर हिलाया, और वापस दूध पीने में लग गया। उसी के साथ उसने अंजू की मैक्सी भी उसके कन्धों से नीचे सरका दी – अब वो ऊपर की और नंगी बैठी हुई थी। और कुंदन बिना झिझक के अंजू के स्तन पी रहा था। जब उसका मन भर गया तो अंत में वो अलग हुआ। अलग हो कर वो अंजू की गोदी से उठा, और उसको बिस्तर पर लिटाने लगा। लिटाने साथ साथ ही वो उसकी मैक्सी को नीचे की तरफ खींचने लगा जिससे वो पूरी नंगी हो जाय। अंजू को शर्म आई, लेकिन उसने मना नहीं किया।

“छुन्नी के साथ खेलोगी?”

अंजू शर्माती हुई मुस्कुराई।

“अपनी चूत के साथ खेलने दोगी?”

‘चूत?’ यह तो सुना हुआ शब्द है.. “वो क्या होता है?”

“यह..” कुंदन ने अंजू की योनि की तरफ इशारा किया। अंजू ने जांघे सिकोड़ लीं।

कुंदन अपनी पैंट उतार रहा था। अंजू देख रही थी की आगे क्या होने वाला है। कुछ ही देर में उसका भिन्डी के आकर का शिश्न मुक्त हो गया। वाकई अभूतपूर्व घटना थी की अभी तक उसके लिंग ने वीर्य नहीं छोड़ दिया था। कुंदन ने अंजू का हाथ पकड़ कर अपने छुन्नू पर रख दिया। अंजू ने अपनी उंगलियाँ उसके इर्द गिर्द लपेट लीं।

“कितना गरम है..”

कुंदन गर्व से मुस्कुराया।

“रुको.. आज तुम्हारी चूत के साथ खेलता हूँ.. बहुत दिन हो गए..” उसने प्रभाव के लिए आगे जोड़ा।

कह कर वो अंजू की घने बालों के अन्दर छुपी योनि की दरार पर अपनी उंगली फिराने लगा। अंजू नख-शिख तक कांप गयी, और कुंदन को कामुक लालसा से देखने लगी। कुछ देर यूँ ही दरार पर उंगली चलाने के बाद उसने अपनी उंगली वहां पर दबाई – पट से अन्दर जाने का रास्ता खुल गया। कुंदन मुस्कुराया और अपनी तर्जनी को अंजू की योनि के भीतर डालने लगा। उधर अंजू भी अपनी जांघ खोलने लगी – जैसे उसको अन्दर आने के लिए और जगह दे रही हो..

उंगली पूरी अन्दर जाने के बाद उसने धीरे धीरे ही उसको बाहर निकाला और वापस अन्दर बाहर करने लगा। उसी ताल में अंजू भी अपने नितम्ब हलके हलके उछालने लगी। 

कुंदन अंजू के पास आया, और उसके कान में फुसफुसाते हुए बोला, “इसको कहते हैं उंगल चुदाई..” और उंगली अन्दर बाहर करने का क्रम करते हुए वो उसके स्तन भी चूसने लगा। अंजू के अन्दर का ज्वार बहुत दिनों से उठा हुआ था। कुंदन ने उंगली डाल कर बस जैसे किसी बाँध को तोड़ दिया। दो मिनट के भीतर ही अंजू यौन उत्तेजना के चरमोत्कर्ष पर पहुँच गयी... उसका शरीर किसी अनियंत्रित यंत्र जैसे कम्पित होने लगा।

उसको यूँ स्खलित होते देख कर कुंदन चाह कर भी खुद पर नियंत्रण न रख सका, और उसके कुछ कर पाने से पहले ही उसका वीर्य निकल पड़ा, और सामने अंजू के सपाट पेट पर जा कर गिरा। दो तीन विस्फोटों में वह खाली हो गया। अंजू हाँफते हुए अपने पेट पर पड़े सफ़ेद रंग के तीन छोटे छोटे तलैयों को देखने लगी – और उनको अपनी हथेली से पोंछने लगी।

कुंदन बोला, “सम्हाल कर रानी! हाथ धो लेना पहले.. कहीं मेरे पानी से सना हाथ अपनी चूत पर लगा लिया तो गाभिन हो जाओगी.. समझी?”

अंजू ने हामी में सर हिलाया, और बिस्तर से उठा कर हाथ धोने चल दी। नंगी ही।

कुंदन अपनी किस्मत पर खुद ही रश्क करने लगा।

कुंदन अपनी तरफ से पूरा प्रयास कर रहा था की अंजू के बारे में उसके किसी पडोसी को न पता चले। इसलिए उसने अंजू को जैसी जैसी हिदायदें दी थीं, उनको सुन कर वो खुद भी अचरज में पड़ गयी। वो अगर इस घर की मालकिन थी, तो क्यों नही वो छत पर जा सकती थी? क्यों नहीं वो अपने कपड़े धूप में सुखा सकती थी? क्यों नहीं वो घर में बिना खट-पट के रह सकती थी.. इत्यादि! और सबसे बड़ी बात की कुंदन घर के बाहर ताला लगा कर क्यों जाय? अगर उसको घर से बाहर निकलने की ज़रुरत पड़ी तो? लेकिन उसको कोई उत्तर नहीं मिला। अंजू ने भी कोई अधिक प्रतिवाद नहीं किया – कुछ तो सोचा होगा कुंदन ने! 

नहा धो कर उसने नाश्ता किया, और फिर दवाई खाई। अकेले बंद घर में वो क्या करती भला? जल्दी ही वो फिर से सो गयी। उसको गहरी नींद आई, या उथली यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन उसको अत्यंत सजीव से सपने आये। और उन सपनो ने फिर से वही पुरुष विभिन्न अवस्थाओ में दिखा – कभी उसको अपनी गोद में बैठाए, कभी सूट पहने, कभी कार चलाते, कभी नग्न, और कभी उसके साथ रमण करते! 

“रूद्र?” अंजू ने ऊंची आवाज़ में कहा, और नींद से जाग उठी। उसका शरीर पसीने पसीने हो गया था, और एक कम्पन भी हो रहा था। 

‘क्या नाम था उसका?’ अंजू को वापस याद नहीं आया।

कुछ देर में उसको घर के दरवाज़े पर आहट हुई। कुंदन वापस आ गया था, और घर का दरवाज़ा खोल रहा था। अंजू ने घड़ी पर नज़र डाली – शाम के चार बज रहे थे।

अन्दर आते हुए उसने बहुत सावधानीपूर्वक दरवाज़ा वापस बंद किया और फिर अंजू को अपनी बाहों में भर लिया। ऐसा करते ही अंजू उसके आलिंगन में सिमट गयी – उधर कुंदन अंजू के गालो, होंठ और माथे पर अपने चुम्बन की छाप लगाने लगा। कुंदन शायद दिन भर इसी क्षण के सपने संजो रहा था। उस पर इस समय वासना का तूफ़ान परवान चढ़ रहा था –उसके हाथ अंजू के शरीर की टोह लेने में व्यस्त थे – वो कभी अंजू के स्तनों को मसलता, तो कभी उसके नितम्बों को! अंत में उसके हाथ अंजू के चूतड़ों पर जम गए।

“अंजू रानी! आज मैं रुक नहीं पाऊँगा! आज मुझे तेरे अन्दर जाना ही है..” चुम्बनों के बीच में कुंदन ने अंजू को अपने इरादों से अवगत कराया। 

उसकी बात पर अंजू ने एक पल को सोचा, और फिर कुंदन के एक हाथ को अपने एक स्तन पर रख दिया। जोश में आ कर कुंदन अंजू को फिर से चूमने लगा। अंजू ने आज शलवार कुरता पहना हुआ था। उसने जल्दी ही अंजू का कुरता उतार दिया – उसने अन्दर कुछ नहीं पहना हुआ था। फिर उसने अंजू के शलवार का नाड़ा भी ढीला कर दिया। 

शलवार उसके कूल्हों से सरक कर नीचे गिर गया।

उसका ऐसा नज़ारा देख कर कुंदन काफी आवेश में आ गया। आज दूकान पर जाते ही उसने किसी से अव्वल गुणवत्ता का शिलाजीत खरीद कर उसका सेवन किया था। अब उसका प्रभाव हो, या न हो, लेकिन इस समय कुंदन को विश्वास भी था, और आत्म-विश्वास भी। लिहाजा, उसका अब तक का प्रदर्शन, उसके लिए अत्यंत संतोषजनक था। अंजू ने चड्ढी पहन रखी थी – गुलाबी चड्ढी पहने हुए, और अन्यत्र पूर्ण नग्न अंजू का रूप बहुत सुहाना लग रहा था। वो सचमुच काम की देवी लग रही थी। उससे रहा नहीं जा रहा था – आज तो बस कर ही डालना है!
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12-17-2018, 02:24 AM,
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आत्मविश्वास से लबरेज़, उसने अंजू के नितम्बों को दबाना, कुचलना शुरू कर दिया। उसके साथ ही उसकी चड्ढी भी नीचे की तरफ सरकानी शुरू कर दी। अंजू समझ गयी की कुंदन आज रुक नहीं सकता। किसी का कोई डर तो था नहीं! वो थोड़ा सा कसमसाई, लेकिन अपनी हर हरकत के साथ वो बस कुंदन की बाहों में और समाती गयी। वैसे, अंजू को भी अच्छा लग रहा था – पति का संसर्ग तो सबसे सुखद होता है। और वैसे भी अपनी याद में प्रेमालाप का उसका यह पहला अनुभव था।

कुछ ही देर में अंजू पूरी तरह से नंगी हो गई, और कुंदन उसको अपनी गोद में उठा कर बिस्तर तक ले गया। बिस्तर पर लिटा कर उसने अंजू की टाँगें मोड़ कर, उसके घुटने उसके सीने से लगा दिए। इस अवस्था में अंजू की योनि की दोनों फांकें पूरी तरह से खुल गईं, और उनके बीच में से योनि का गुलाबी हिस्सा झाँकने लगा। अंजू को अपने गुप्तांगों का ऐसा निर्लज्ज प्रदर्शन होते देख कर शर्म भी बहुत आई और रोमांच भी! उसकी अवस्था ऐसी थी की कुंदन उसकी योनि के पूरा भूगोल, और यहाँ तक कि उसकी गुदा को भी खूब अच्छी तरह से देख सकता था।

अंजू की रस से भरी, गुलाबी योनि देख कर कुंदन के मुँह में पानी आ गया। उसने बस स्टेशन पर बिकती सस्ती काम-प्रसंगों से भरी पुस्तिकाओं में पढ़ा था की अगर स्त्री की योनि को पुरुष मुख से चाटे, तो उसको बहुत आनंद आता है। लिहाजा, उसने यह काम भी आजमाने का सोचा। अंजू की टाँगों को वैसे ही मोड हुए, उसने झुक कर उसकी योनि की दरार पर जीभ फिराई। वहां से मूत्र की हलकी सी गंध आ रही थी – कुंदन का मन जुगुप्सा से भर गया, लेकिन फिर भी उसने मैदान नहीं छोड़ा। जब ओखली में सर डाल दिया है, तो मूसल से क्या डरना?

दो तीन बार जीभ फिराने के बाद, कुंदन सहज हो गया और तबियत से अंजू की योनि चाटने लगा। उसको योनि की संरचना का कोई ख़ास ज्ञान नहीं था – उसको नहीं मालूम था की बस थोड़ा ऊपर चाटने से उसकी ‘प्रेमिका’ ऐसी पागल हो जायेगी की उसने नाम की माला अपने उम्र भर जप्ती रहेगी। खैर, इस समय वो जो कुछ कर रहा था, वही अंजू के लिए काफी भारी होता जा रहा था। दोनों के सम्भोग का पहला स्खलन अंजू को बुरी तरह कम्पित कर गया। 

“ओह कुंदन..” अंजू ने बस इतना ही कहा, लेकिन इतनी कामुक तरीके से कहा की कुंदन का स्खलन होते होते बचा। अंजू कोई दो मिनट तक कांपती रही, तब जा कर वो कुछ संयत हुई। इतनी देर तक वो बस आँखें बंद किये आनंद ले रही थी। जब उसकी आँख खुली, तब उसने अपनी ही तरफ देखते कुंदन को देखा। वो मुस्कुरा रहा था। पहला किला फतह!! अंजू उसको देख कर लज्जा से मुस्कुराई। इस बीच में वो कब निर्वस्त्र हो गया, अंजू को अंदाजा नहीं हुआ।

“रानी – अब मेरी बारी!”

कह कर उसने अपने तने हुए लिंग का सर, उसकी योनि के खुले हुए होंठों के बीच लगा दिया। अब यह शिलाजीत का प्रभाव हो, या फिर कुंदन के आत्म-विश्वास का, इस समय उसके लिंग में अतिरिक्त तनाव बना हुआ था, इसलिए खुद कुंदन को भी अपना आकार और तनाव काफी प्रभावशाली लग रहा था। 

कुंदन अनुभवहीन था, यह साफ़ दिख रहा था। किसी लड़की से सम्भोग का यह पहला अवसर था। उसको लगता था की योनि पर लिंग टिका कर बस धक्का लगा देने से काम हो जाएगा। उसने वैसा ही किया – लेकिन बार बार उसका लिंग फिसल जा रहा था। अंत में अंजू ने ही उसकी मदद करी – उसने अपनी योनि के होंठों को उँगलियों की सहायता से हल्का सा फैलाया, और अपने हाथ से पकड़ कर कुंदन के लिंग को प्रवेश कराने में मदद करी। उसका लिंग गर्म था, और साफ़ लग रहा था की बेहद उतावला हो रहा था। चाहे कुछ भी हो – हर स्त्री अपने प्रेमी को – वो चाहे पति के रूप में हो, या सिर्फ प्रेमी के रूप में – अपने लिए ऐसे उतावला होते देख कर ख़ुशी से फूली नहीं समाएगी। 

उसने कुंदन के लिंगमुख को अपनी योनि के द्वार पर टिका दिया, और मन ही मन भगवान् का नाम लिया। कुंदन ने रास्ता साफ़ देख कर एक जोरदार झटका दिया – उसका सारा का सारा लिंग एक ही बार में उसकी योनि के भीतर समा गया। 

अब भले ही उसका लिंग काफी पतला सा रहा हो, लेकिन अंजू के लिए इतने अरसे के बाद यह पहला सम्भोग था। अपनी गहराई में उस गरमागरम लिंग को उतरते हुए महसूस कर के अंजू की आह निकल गयी। 

“ऊह्ह्ह! अह्ह… उईई … आआआअ… ऊऊऊ… उह… ओह्ह…” हर धक्के के साथ अंजू नए प्रकार की आवाज़ निकालती जा रही थी। उसको शर्म तो बहुत आ रही थी, लेकिन फिर भी कामुक उन्माद के सम्मुख वो नतमस्तक थी। 

ख़ुशी से उछल पड़ी वह, और फिर जोरों से धक्के मार-मार कर किलकारियां भरने लगी।
उधर कुंदन भी स्वयं के भीतर एक नए प्रकार का जीव उत्पन्न होता महसूस कर रहा था – इतना देर तो वो हस्त मैथुन करते हुए भी नहीं टिक पाता। वो इसी ख़ुशी में पूरे जोश के साथ धक्के लगा रहा था। बीच बीच में वो अंजू के होंठों को चूमता, तो कभी चूचकों का रस पीता। अंजू भी खुल कर अपने प्रथम सम्भोग का आनंद उठा रही थी – उसकी योनि बहुत गीली हो गई थी, और वो खुद भी अपने चूतड़ उचका उचका कर सम्भोग में सहयोग दे रही थी। 

अंततः कुंदन ने पूरी ताकत से एक ज़ोर का धक्का लगाया। आखिरी।

“आआआआआआह्ह…”

और इसी धक्के के साथ कुंदन ने अपना पूरा वीर्य अंजू की चूत में खाली कर दिया और उसी अवस्था में अंजू के ऊपर ही पस्त होकर गिर गया। 

“अंजू अंजू! मेरी प्यारी! …आई लव यू… तू मेरी जान है! जान!”

जवाब में अंजू मुस्कुरा दी, और कुंदन के माथे पर चुम्बन दे कर उसने आँखें बंद कर लीं।

सुमन से आफिस के काम का झूठा बहाना बना कर, दो दिन बाद मैं गुड़गाँव चला गया – नेशनल जियोग्राफिक के ऑफिस, उस अफसर से मिलने, जिन्होंने मुझे अपनी तरफ से सारी मदद देने का वायदा किया था! उन्होंने मुझ पर कृपा कर के उस डाक्यूमेंट्री की सारी अतिरिक्त फुटेज, कैमरामैन और डायरेक्टर – सभी को बुला रखा था। कैमरामैन कुछ निश्चित तौर पर बता नहीं पाया – लेकिन उसका कहना था की हो न हो, यह शॉट गौचर में फिल्माया था। वह इतने विश्वास से इसलिए गौचर का नाम ले रहा था क्योंकि वहीँ पर हैलीकॉप्टर इत्यादि से त्रासदी के पीड़ित लोगों को लाया जा रहा था। सेना ने वही की एयर स्ट्रिप का प्रयोग किया था। इसलिए बहुत संभव है की गौचर के ही किसी अस्पताल की फुटेज रही हो। मैंने बाकी की फुटेज भी देख डाली, लेकिन न तो रश्मि की कोई और तस्वीर दिखी, और न ही उस अस्पताल की! 

मैंने उन सबसे बात कर के उनकी डाक्यूमेंट्री बनाते समय वो लोग किस किस जगह से हो कर गए, उसका एक सिलसिलेवार नक्शा बना लिया, और फिर उनसे विदा ली। इस पूरे काम में एक दिन निकल गया। अब जो हो सकता था, अगले ही दिन होना था। शाम को सुमन को फ़ोन कर के मैंने बता दिया की काम आगे बढ़ गया है, और कोई तीन चार दिन और लग जायेंगे। वो अपना ख़याल रखे, और वापसी में क्या चाहिए वो सोच कर रखे। हम खूब मस्ती करेंगे! उससे ऐसे बात करते समय मन में टीस सी भी उठ रही थी की मैं सुमन से झूठ बोल रहा था। वैसे यह उसके लिए भी एक तरह से अच्छा था – अगर उसको पता चलता की मैं रश्मि की खोज में निकला हूँ, तो वो ज़रूर मेरे साथ हो लेती। और मुझे अभी तक नहीं मालूम था की जिस लड़की को मैंने टीवी पर देखा, वो सचमुच रश्मि थी, या मेरा वहम। कुछ कह नहीं सकते थे। ऐसे में, अगर रश्मि न मिलती, तो बिना वजह ही पुराने घाव कुरेदने वाली हालत हो जाती। सुमन बहुत ही भावुक और संवेदनशील लड़की है, ठीक रश्मि के जैसे ही। और मन की सच्ची और अच्छी भी.. ऐसे लोगों को अनजाने में भी दुःख नहीं देना चाहिए। तो मेरा झूठ उसको एक तरह से रक्षा देने के लिए था।

रात में दिल्ली के एक होटल में रुका। वहां पर मेरी कंपनी जिस ट्रेवल एजेंसी का उपयोग करती थी, वहां पर फ़ोन लगा कर एक भरोसेमंद कार और ड्राईवर का इंतजाम किया – दिन रात की सेवा के लिये। वो अगले सुबह छः बजे होटल आने वाला था। शुभस्य शीघ्रम!


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एक बार शेर को खून का स्वाद पता चल जाए, तो फिर उससे पीछा छुड़ाना मुश्किल है। कुंदन का भी यही हाल था – एक तो शिलाजीत का अत्यधिक सेवन, और उससे होने वाले लाभ – दोनों का ही लालच उसको लग गया था। अगले दो दिन उसका यही क्रम चलता रहा। वह दिन भर यौन शक्ति वर्द्धक दवाइयों, खास तौर पर शिलाजीत का सेवन करता, और जैसे कैसे किसी भी बहाने अंजू के साथ सम्भोग! 

उसी के कहने पर अंजू घर पर या तो निर्वस्त्र रहती थी, या फिर उस गुलाबी ब्रा-पैंटीज में। अंजू की किसी भी प्रकार की नग्नावस्था का प्रभाव, कुंदन पर एक जैसा ही पड़ता था। जब भी वो उसकी गोरी टाँगे और जांघें देख लेता था, तो उसका मन डोल जाता था। जब अंजू चलती, तो उसके गदराये हुए ठुमकते नितम्ब उसके दिल पर कहर बरपा देते। उसकी कठोर चूंचियाँ देख कर कुंदन सोचता की ऊपर वाले ने बड़ी फुर्सत से जैसे संगमरमर को तराश तराश कर निकाला हो। नमकीन चेहरा, और रसीले होंठ! कोई देख ले तो बस चूमने का मन करे! 

सम्भोग के बाद से दोनो ही एक दूसरे को बहुत प्यार से देखते। साथ में हँसी मज़ाक भी करते। कुंदन हंसी मजाक में कभी कभी अंजू के बाल पकड़ लेता, तो कभी कमर पकड़ कर भींच लेता। अंजू उसकी हर बदमाशी पर हंसती रहती। जब वो रोमांटिक हो जाता, तो अंजू को कहता की आज बहुत सुन्दर लग रही हो। अंजू उसकी इतनी सी ही बात पर शर्म से लाल हो जाती। रह रह कर वो अंजू के नग्न नितम्बों पर हौले से चिकोटी काट लेता, तो कभी उसकी चूंचियाँ दबा देता। उसकी इन शैतानियों पर अंजू जब उसको झूठ मूठ में मारने दौड़ती, तो वो उसको प्यार से अपनी गोदी में उठा लेता, और उसके चूचकों को मुँह में भर कर चूमने लगता। 

इसके बाद होता दोनों के बीच सम्भोग! भले ही उनकी यौन क्रिया पांच मिनट के आस पास चलती, कुंदन के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उधर अंजू इस बात से संतुष्ट थी की कुंदन उसकी सेवा और देखभाल में कोई कसर नहीं रखता था। अपनी तरफ से खूब प्रेम उस पर लुटाता था। पिछले दो दिनों में उन दोनों ने तीन बार सम्भोग किया था – अंजू को हर बार आनंद आया था। प्रत्येक सम्भोग से एक तरीके से उसको मानसिक शान्ति मिल जाती थी। कुछ तो होता था, की संसर्ग के कुछ ही देर बाद अंजू आराम की अवस्था में आ जाती थी – और कब सो जाती थी, उसको खुद ही नहीं मालूम पड़ता।

बस दो बातें थीं जिनके कारण उसको खटका लगा रहता – एक तो यह की उसके सपनों का पुरुष हर बार दिखता था। इससे अंजू को विश्वास हो गया की वो कोई मानसिक कल्पना नहीं था – बल्कि उसके अतीत का एक हिस्सा था। कब और कैसे, उसको समझ नहीं आता। लेकिन जिस प्रकार से वो दोनों सपनों में निर्भीक हो कर सन्निकट रहते थे, उससे न जाने क्यों अंजू को लगता जा रहा था की अंजू उस पुरुष की पत्नी रही होगी। 

लेकिन अगर यह सच था तो कुंदन से उसकी शादी कब हुई? अगर कुंदन से उसकी शादी हुई है, तो फिर इस घर में उसके कोई चिन्ह क्यों नहीं मौजूद हैं? घर को देख कर साफ़ लगता था की यह किसी कुंवारे पुरुष का घर है.. माना की वह इतने लम्बे अरसे तक अस्पताल में रही थी, लेकिन एक शादी-शुदा परिवार और घर में स्त्री का कुछ प्रभाव तो मौजूद रहना ही चाहिए था न? 

दूसरा खटका उसको इस बात का लगता था की कुंदन हमेशा उसको पड़ोसियों से छुपा कर रखता था। उसकी इस हरकत का कोई तर्कसंगत विवरण उसके लाख पूछने पर भी उसको नहीं मिल पाता था। यह दोनों ही बातें मन ही मन में अंजू को बहुत अधिल साल रही थीं। उसको यकीन हो रहा था की कुछ न कुछ तो गड़बड़ है। उसने सच का पता लगाने की ठान ली।

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12-17-2018, 02:25 AM,
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दिल्ली से गौचर पहुँचने में पूरे दो दिन लग गए। एक कारण तो पहाड़ी रास्ता है, और दूसरा यह की गौचर से कोई पचास किलोमीटर पहले ही से मैंने अस्पतालों में जा जा कर रश्मि के बारे में पता लगाना शुरू कर दिया था। रश्मि की तस्वीरों की प्रिंट मैंने दिल्ली में ही निकाल ली थीं, जिससे लोगों तो दिखाने में आसानी हो। मैं उनको सारी बातें विस्तार में बताता, यह भी बताता की नेशनल जियोग्राफिक वालों ने त्रासदी के समय डाक्यूमेंट्री फिल्माई होगी यहाँ। गौचर तक पहुँचते पहुँचते कोई पांच छोटे बड़े अस्पतालों में बात कर चुका था, लेकिन कोई लाभ, कोई सूत्र, अभी तक नहीं मिला था।

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हर रोज़ की तरह कुंदन घर के दरवाज़े पर बाहर से ताला डाल कर काम पर चला गया। जाने से पहले उसने दैनिक सम्भोग की खुराक लेनी न भूली। कुन्दन के जाने के कोई पंद्रह मिनट के बाद अंजू ने कपडे पहने, और दरवाज़े पर घर के अन्दर से दस्तक दी। पहले धीरे धीरे, और फिर तेज़ से। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया।

कोई पंद्रह बीस मिनट तक ऐसे ही खटखटाने के बाद अंजू बुरी तरह से निराश हो गयी, और निरी हताशा, खीझ और गुस्से में आ कर दरवाज़े को पीटने लगी। अंत में बाहर से आवाज़ आई,

“कौन है अन्दर?”

“मैं हूँ.. अंजू!”

“अंजू? कौन अंजू? कौन हो तुम बेटी?”

“आप..?”

“मैं यहाँ पड़ोस में रहता हूँ.. मेरा नाम रामलाल है। तुम बहुत देर से दरवाज़ा पीट रही हो। यहाँ मेरे साथ सात आठ और लोग हैं.. तुम घबराओ मत.. मेरी बात का जवाब दो.. कौन हो तुम?”

“जी.. मैं अंजू हूँ..”

“वो तो हमने सुना.. लेकिन कौन हो?”

“जी मैं.. इनकी.. पत्नी हूँ!”

“किसकी पत्नी?” रामलाल ने जोर से पूछा, जैसे उसको सुनाई न दिया हो।

“इनकी.. कुंदन की..”

“कुंदन की पत्नी?”

“जी!”

रामलाल कुछ कहते कहते रुक गया। फिर कहा,

“लेकिन तुम अन्दर क्यों बंद हो?”

“वो ही बाहर से बंद कर के गए हैं..”

“बाहर आना चाहती हो?”

“जी.. लेकिन..”

“देखो बेटी, अगर बाहर आना चाहती हो, तो बताओ.. हम तब ही कुछ कर पाएंगे।”

“जी.. मैं आना चाहती हूँ..”

“ठीक है.. कुछ पल ठहरो, और दरवाज़े से दूर हट जाओ..”

कुछ देर के बाद दरवाज़े पर जोर की खट-पट हुई.. फिर कुछ टूटने की आवाज़ आई। नहीं दरवाज़ा नहीं, बस ताला ही टूटा था। दरवाज़ा खुल गया। अंजू को घोर आश्चर्य हुआ जब उसने देखा की घर के बाहर कम से कम बीस पच्चीस लोगों की भीड़ लगी हुई थी। वो बहुत डर गयी, और अपने आप में ही सिमट कर घर के कोने में बैठ गई।

उसकी ऐसी हालत देख कर दो महिलाएँ घर के अन्दर आईं, और उसको स्वन्त्वाना और दिलासा देने लगीं। उसको समझाने लगीं की यहाँ कोई उसको कैसे भी कुछ नहीं पहुंचाएगा। खैर, कोई आधे घंटे बाद अंजू बात करने की हालत में वापस आई। 

“हाँ बेटी, अब बोल! तू कह रही थी की तू कुंदन की पत्नी है?”

“ज्ज्जी...” अंजू को लग गया की कुछ गड़बड़ तो हो गयी है। उसकी स्त्री सुलभ छठी इन्द्रिय कह रही थी कुछ भारी गड़बड़ थी। अगर वो कुंदन की पत्नी थी, तो कोई पडोसी उसको जानते क्यों नहीं थे?

“कब हुई तेरी शादी?”

इस बात का क्या उत्तर देती वो! 

“आप मुझे नहीं जानते?” उसने एक तरीके से विनती करते हुए रामलाल से पूछा। मन ही मन भगवान् से प्रार्थना भी करी की काश उसको ये लोग जानते हों!

“उसका उत्तर मैं बाद में दूंगा, पहले ये बता की तू आई कब यहाँ?”

“चार दिन पहले!”

“कहाँ से?”

“मैं अस्पताल में थी न.. कोमा में.. कोई दो साल के आस पास..”

“कोमा में..?”

“ज्जी..”

“तो क्या तुमको याद नहीं है की तुम कौन हो?”

“नहीं..”

“और तुम्हारा नाम?”

“उन्होंने ही बताया..”

“अच्छा?”

“हाँ!”

“और यह भी बताया की तुम उसकी पत्नी हो?”

“जी..” इस पूरे प्रश्नोत्तर के कारण अंजू का दिल बहुत धड़क रहा था। 

‘हे प्रभु! हे भगवान एकलिंग! बचा लो!’

“और तुम दोनों पति पत्नी के जैसे रह रहे हो – पिछले चार दिनों से?”

इस प्रश्न का भला क्या उत्तर दे अंजू? वो सिमट गई – कुछ बोल न पाई। लेकिन रामलाल को अपना उत्तर मिल गया।

“अब कृपा कर के मेरे प्रश्नों के उत्तर बताइए! क्या आप मुझे जानते हैं?”

“बिटिया,” रामलाल ने पूरी गंभीरता से कहा, “मैं अपनी पूरी उम्र यहाँ रहा हूँ.. इसी कस्बे में! और मेरे साथ ये इतने सारे लोग। मैं ही क्या, यहाँ कोई भी तुमको नहीं जानता। लेकिन तुम्हारी बातों से मुझे और सबको समझ में आ रहा है की क्या हुआ है तुम्हारे साथ..” 

रामलाल ने आखिरी कुछ शब्द बहुत चबा चबा कर गुस्से के साथ बोले। और फिर अचानक ही वो दहाड़ उठे,

“हरिया, शोभन.. पकड़ कर घसीटते हुए लाओ उस हरामजादे को..”

अंजू हतप्रभ रह गयी! घसीटते हुए? क्यों? उसने डरी हुई आँखों से रामलाल को देखा। 

कहीं इसी कारण से तो कुंदन उसको घर में बंद कर के तो नहीं रखता था? कहीं उसको पड़ोसियों से खतरा तो नहीं था? रामलाल ने जैसे उसकी मन की बात पढ़ ली।

“बिटिया.. घबराओ मत! इस बात की मैं गारंटी देता हूँ, की तू उस कुंदन की पत्नी नहीं है.. उस सूअर ने तेरी याददाश्त जाने का फायदा उठाया है, और तेरी... इज्ज़त से भी... खिलवाड़ किया है.. पाप का प्रायश्चित तो उसे करना ही पड़ेगा..”

‘पत्नी नहीं.. फायदा उठाया... इज्ज़त से खिलवाड़..’

“..उसकी तो अभी तक शादी ही नहीं हुई है.. उस नपुंसक को कौन अपनी लड़की देगा?” रामलाल अपनी झोंक में कहते जा रहा था।

‘शादी नहीं.. नपुंसक..?’

अंजू को लगा की वो दहाड़ें मार कर रोए.. लेकिन उसको तो जैसे काठ मार गया हो। न रोई, न चिल्लाई.. बस चुप चाप बुत बनी बैठी रही.. और खामोश आंसू बहाती रही। 

हाँलाकि अंजू अब किसी बात का कोई जवाब नहीं दे रही थी, लेकिन फिर भी रामलाल और कंपनी ने सारे घटना क्रम का दो दूनी चार करने में बहुत देर नहीं लगाई। उनको मालूम था की कुंदन केदारनाथ यात्रा करने गया था, और वहां वो भी त्रासदी की चपेट में आ गया था। वहीँ कहीं उसको यह लड़की मिली होगी – जाहिर सी बात है, इसका नाम अंजू नहीं है। उसने अपने आपको उस लड़की का पति बताया होगा, जिससे अस्पताल वाले खुद ही उस लड़की को उसके हवाले कर दें, और वो बैठे बिठाए मौज करे!

तब तक हरिया और शोभन कुंदन को सचमुच में घसीटते हुए लाते दिखे। माब-जस्टिस के बारे में तो सुना ही होगा आप लोगो ने? खास तौर पर तब, जब मामला किसी लड़की की इज्ज़त का हो। भीड़ का पारा ऐसी बातों से सारे बंधन तोड़ कर चढ़ता है, और जब तक अत्याचारी की कोई भी हड्डी सलामत रहती है, तब तक उसकी पिटाई होती रहती है। हरिया और शोभन ने लगता है कुंदन को वहां लाने से पहले जम कर कूटा था। 

अंजू ने देखा – कुंदन का सर लहू-लुहान था, उसकी कमीज़ फट गयी थी, और कुहनियाँ और बाहें रक्तरंजित हो गई थी। घसीटे जाने से उसकी पैन्ट भी जगह जगह से घिस और फट गयी थी। सवेरे का आत्मविश्वास से भरपूर कुंदन इस समय वैसे ही डरा हुआ लग रहा था, जैसे हलाल होने के ठीक पहले कोई बकरा। अंजू ने उसको देखा तो मन घृणा से भर उठा। कुंदन ने उसकी तरफ देखा – पता नहीं उसको अंजू दिखी या नहीं, लेकिन उसकी व्याकुल और कातर निगाहें किसी भी हमदर्दी भरी दृष्टि की प्यासी हो रही थीं। कोई तो हो, जो इस अत्याचार को रोक सके!

लेकिन लगता है की किसी को भी कुंदन पर लेशमात्र की भी दया नहीं थी। वहां लाये जाते ही भीड़ उस पर पिल पड़ी – बरसों की पहचान जैसे कोई मायने नहीं रखती थी। जिस गति से कुंदन पर लातें और घूंसे बरस रहे थे, उसी गति से उस पर भद्दी भद्दी गालियों की बौछार भी हो रही थी। कस्बे के चौराहे पर कुंदन के साथ साथ उसके पूर्वज, और पूरे खानदान की इज्ज़त नीलाम हो रही थी। 

“मादरचोद, इस मरियल सी छुन्नी में बहुत गर्मी आ गई है क्या?” कोई गरजा।

अंजू ने उस तरफ देखा। कुंदन को वही एक तरफ पेड़ से टिका कर बाँध दिया गया था। वो इस समय पूरी तरह से नंगा था। वो कहते हैं न, आदमी शुरू की मार की पीड़ा से डरता है.. बाद मैं गिनती भी कहाँ याद रह जाती है? कुंदन एकदम निरीह सा लग रहा था! वो कुछ बोल नहीं पा रहा था, लेकिन उसकी आँखें चिल्ला चिल्ला कर अपने लिए रहम की भीख मांग रही थीं।

“अरे सोच क्या रहे हो.. साले को बधिया कर दो! वैसे ही नपुंसक है.. गोटियों का क्या काम?” किसी ने सुझाया।

ऐसा लग रहा था की न्यायपालिका वहीँ कस्बे के चौराहे पर खुल गयी थी।

“सही कह रहे हो.. अबे शोभन.. ज़रा दरांती तो ला.. इस मादरचोद का क्रिया-करम यहीं कर देते हैं..” एक और न्यायाधीश बोला।

अंजू की आँखों की घृणा यह सब बातें सुन कर अचानक ही पहले तो डर, और फिर कुंदन के लिए सहानुभूति में बदल गयी। ठीक है कुंदन ने उसके साथ वो सब कुछ किया, जो उसको नहीं करना चाहिए था, लेकिन उसने अंजू की जान भी तो बचाई थी। एक क्षणिक अविवेक, और स्वार्थ की भावना के कारण जो कुछ हो गया, उसकी ऐसी सजा तो नहीं दी सकती। कम से कम अंजू तो नहीं दे सकती।

“नहीईईईईईईईईईईईई!” वो जोर से चीखी! “बस करो यह सब! जानवर हो क्या सभी?” 

एकाएक जैसे अफीम के नशे में धुत्त भीड़ को किसी ने झिंझोड़ के जगा दिया हो। सारे न्यायाधीश लोग एकाएक सकते में आ गए। 

“जिसको अपनी उम्र भर जाना, उसके साथ यह सब करोगे? कोई मानवता बची हुई है? इसको तुम नपुंसक कहते हो? तो तुम लोग क्या हो? मर्द हो? ऐसे दिखाते हैं मर्दानगी?” 

अंजू चीखती जा रही थी.. अचानक ही उसकी आवाज़ आना बंद हो गई। जिस वीभत्स दृश्य से वो अभी दो-चार हुई थी, उसके डर से अंजू का गला भर गया। उसकी हिचकियाँ बंध गयी, और वो रोने लगी। कुंदन अचेत होने से पहले बस इतना समझ पाया की उसकी जान बच गई थी।

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12-17-2018, 02:25 AM,
RE: Chodan Kahani घुड़दौड़ ( कायाकल्प )
मैं शाम को सुमन से बात कर रहा था की जिस प्रोजेक्ट को करने निकला हूँ, वो अगर ठीक से हो गया, तो हम दोनों की ज़िन्दगी बदल जाएगी! उत्तर में सुमन ने मुझसे कहा की उसको पूरा यकीन है की मेरा प्रोजेक्ट ज़रूर पूरा होगा। मैंने हंस कर उसकी बात आई गयी कर दी। अगर उसको मालूम होता की मेरा प्रोजेक्ट क्या है, तब भी क्या वो ऐसे कहती? सच में हम दोनों की ही ज़िन्दगी बदल जाएगी! यह बात मैंने पहले सोची ही नहीं। अगर वाकई रश्मि जीवित है, और उसको मिल जाती है, तो सुमन और मेरे वैवाहिक जीवन में बहुत सी जटिलताएं आ जाएँगी! और तो और, हमारे विवाह पर ही एक सवालिया निशान लग जायेगा।

यही सब सोचते सोचते मैं सो गया।

अगले दिन एक घंटे के सफ़र के बाद हम गौचर के इलाके में पहुंचे। मेरी उत्तराँचल यात्रा के समय में मैं यहाँ से हो कर गुजरा था। पुरानी बातें वापस याद आ गईं। एक वो समय था, जब मैंने रश्मि को पहली बार देखा था.. और एक आज का समय है, मैं रश्मि को ढूँढने निकला हूँ। 

गौचर का सरकारी अस्पताल ढूंढ निकालने में मुझे अधिक दिक्कत नहीं हुई। लेकिन सरकारी अस्पताल में से सूचना निकालना बहुत ही मुश्किल काम है। इसी चक्कर में कल इतना समय लग गया था। रिसेप्शन पर दो बेहद कामचोर से लगने वाले वार्ड बॉयज बैठे हुए थे। देख कर ही लग रहा था की उनका काम करने का मन बिलकुल भी नहीं है; और वो सिर्फ मुफ्त की रोटियाँ तोडना चाहते हैं। 

“भाई साहब,” मैंने बड़ी अदब से कहा, “एक जानकारी चाहिए थी आपसे।“

“बोलिए..” एक ने बड़ी लापरवाही से कहा।

“यह तस्वीर देखिए..” मैंने रश्मि की तस्वीर निकाल कर रिसेप्शन की टेबल पर रख दी, 

“इस लड़की को देखा है क्या आपने?”

उसने एक उचाट सी नज़र भर डाली और कहा, “नहीं! क्या साब! सवेरे सवेरे आ गए यह सब करने! देखते नहीं – हम कितना बिजी हैं..”

“अरे एक बार ठीक से देख तो लीजिए!” मैंने विनती करी।

इस बार उसने भारी मेहनत और अनिच्छा से तस्वीर पर नज़र डाली – जैसे मैंने उसको एक मन अनाज की बोरी ढोने को कह दिया हो।

“क्या साब! एकदम कंचा सामान है..” उसके शब्द कपटता से भरे हुए थे, “इसको यहाँ अस्पताल में क्यों ढूंढ रहे हैं?”

इसी बीच दूसरे वार्ड बॉय ने शिगूफा छोड़ा, 

“ऐसे सामान तो देहरादून में भी नहीं मिलते हैं.. आहाहाहा!” 

“सही कह रहे हो.. जी बी रोड जाना पड़ेगा इसके लिए तो..”

और दोनों ठठा कर हंसने लगे। उन दोनों निकम्मों की धूर्ततापूर्ण बातें सुन कर मेरे शरीर में आग लग गयी। मेरा बायाँ हाथ विद्युत् की गति से आगे बढ़ा और पहले वाले वार्ड बॉय की गर्दन पर जम गया; दाहिना हाथ उससे भी तेज गति से उठा और उसका उल्टा साइड दूसरे वाले वार्ड बॉय के गाल पर किसी कोड़े के सिरे के जैसे बरसा।

तड़ाक!

वह थप्पड़ इतना झन्नाटेदार था की अस्पताल की पूरी गैलरी में उसकी आवाज़ गूँज उठी। वैसे भी सवेरा होने के कारण अधिक लोग वहां नहीं थे।

“लिसन टू मी यू बास्टर्ड्स! तुम जैसे हरामियों को मैं दो मिनट में ठीक कर सकता हूँ। समझे!” 

मैंने पहले वार्ड बॉय के टेंटुए को दबाया, दूसरा वाला अभी अपने गाल को बस सहला ही रहा था। 

“तमीज से बात करोगे, तो ज़िन्दगी में बहुत आगे जाओगे.. नहीं तो जिंदगी भी आगे नहीं जा पाएगी..” 

मैं दांत पीस पीस कर बोल रहा था। मेरी रश्मि की बेईज्ज़ती करी थी उसने। वो तो मैं सब्र कर गया, नहीं तो दोनों की आज खैर नहीं थी।

“ए मिस्टर.. ये क्या हो रहा है..” 

मैंने आवाज़ की दिशा में देखा – एक अधेड़ उम्र की नर्स या मैट्रन तेजी से मेरी तरफ आ रही थी.. लगभग भागते हुए। मैंने पहले वार्ड बॉय को गर्दन से पकडे हुए ही पीछे की तरफ धक्का दिया, और उस नर्स ले लिए रेडी हो गया। अगर ज़रुरत पड़ी, तो इसकी भी बंद बजेगी – मैंने सोचा।

“ये अस्पताल है.. अस्पताल.. तुम्हारे मारा पीटी का अड्डा नहीं.. चलो निकालो यहाँ से..” उसने दृढ़ शब्दों में कहा।

“मैट्रन.. मुझे मालूम है, ये अस्पताल है! और मेहरबानी कर के इन दोनों को भी यह बात सिखा दीजिए। ये दोनों महानिकम्मे ही नहीं, बल्कि एक नंबर के धूर्त भी हैं..”

लगता है मैट्रन को भी उन दोनों की हरकतों की जानकारी थी.. मैंने उसके चेहरे पर कोई आश्चर्य के भाव नहीं देखे। उल्टा उसने उन दोनों वार्ड-बॉयज को घूर कर खा जाने वाली नज़र से देखा। दोनों सकपका गए।

“तुम दोनों ने मेरा जीना हराम कर दिया है.. दफा हो जाओ.. एडमिनिस्ट्रेशन से कह कर मैं तुम लोगो को सस्पेंड करवा दूँगी नहीं तो..”

दोनों निकम्मे सर पर पांव रख कर भागे।

“अब बताइए.. इन दोनों की किसी भी बात के लिए आई ऍम सॉरी! आप यहाँ कैसे आये?”

“जी मैं यहाँ अपनी पत्नी की तलाश में आया हूँ...”

“पत्नी की तलाश? यहाँ?”

“जी.. एक बार गौर से यह फोटो देखिए..” मैंने रश्मि की तस्वीर मैट्रन को दिखाई, 

“आपने इसको कभी देखा अपने अस्पताल में?”

मैट्रन ने तस्वीर देखी – उसकी आँखें आश्चर्य से फ़ैल गईं।

“ये ये.. फोटो.. आपको..”

“जी ये फोटो मेरी पत्नी की है.. उसका नाम रश्मि है! आपने देखा है इसको?”

मैट्रन की प्रतिक्रिया देख कर मुझे कुछ आस जागी – इसने देखा तो है रश्मि को। मतलब यही अस्पताल था डाक्यूमेंट्री का! मतलब मैं सही मार्ग पर था। मंजिल दूर नहीं थी अब!

“आपकी पत्नी? ये?”

“जी हाँ! आपने देखा है इसको?” मैंने अधीर होते हुए कहा।

“लेकिन लेकिन.. ये तो अंजू है.. कुंदन की पत्नी!”

“कुंदन? अंजू?” 

‘हे प्रभु! रहम करना!’

“मैट्रन प्लीज! आप प्लीज मेरी बात पूरी तरह से सुन लीजिए.. प्लीज!” मैंने हाथ जोड़ लिए।

मैट्रन आश्चर्यचकित सी भी लग रही थी, और ठगी हुई सी भी! ऐसा क्यों? मैंने सोचा। मेरी बात पर उसने सर हिलाया और मुझे वहां लगी बेंच पर बैठने का इशारा किया। वो मेरे बगल ही आ कर बैठ गयी।

“मैट्रन, देखिए.. मेरा नाम रूद्र है..” कह कर मैंने उनको सारी बातें विस्तारपूर्वक सुना दीं। बस सुमन और मेरी शादी की बात छोड़ कर। मेरी बात सुन कर मैट्रन को जैसे काठ मार गया। वो बहुत देर तक कुछ नहीं बोली। 

“आपने मेरी पूरी बात सुन ली है.. अब प्लीज आप बताइए.. ये अंजू कौन है?”

“जी ये लड़की, जिसकी तस्वीर आपके पास है, हमारे यहाँ भर्ती थी – जब ये यहाँ थी, तब से वो कोमा में थी। जिस डाक्यूमेंट्री की आप बात कर रहे हैं, शायद यहीं की ही हो.. मैं कह नहीं सकती.. लेकिन वो लड़की हूबहू इस तस्वीर से मिलती है। एक कुंदन नाम का मरीज़ भी भर्ती हुआ था उसी लड़की के साथ.. वो खुद को उसका पति कहता था। और उसको अंजू!”

“तो फिर?”

“वो अंजू को ले गया..”

“ले गया? कहाँ? कब?”

“अभी कोई पांच-छः दिन पहले.. रुकिए, मैं आपको उसका डिटेल बताती हूँ..”

‘पांच छः दिन पहले! हे देव! ऐसा मज़ाक!’

कह कर वो एक रिकॉर्ड रजिस्टर लेने चली गयी। जब वापस आई, तो उसके पास एक नहीं, दो दो रजिस्टर थे। 

“यह देखिए..” उसने एक पुराना रजिस्टर खोला, और उसमे कुंदन के नाम की एंट्री दिखाई, फिर दूसरे में अंजू के नाम की एंट्री दिखाई – दोनों में ही एक ही दस्तखत थे। मतलब वो सही कह रही है। एंट्री रिकॉर्ड में पता भी एक ही था, और फ़ोन नंबर भी। अंजू के डिस्चार्ज की तारिख आज से एक सप्ताह पहले की थी।

“देखिए मिस्टर...”

“रूद्र.. आप मुझे सिर्फ रूद्र कहिए..”

“रूद्र.. हमसे बहुत बड़ी गलती हो गयी.. लेकिन हमारे पास क्रॉस-चेक करने का कोई तरीका नहीं था.. उस बदमाश ने कहानी ही ऐसी बढ़िया बनाई थी! काश आप हमारे पास पहले आ जाते..”

“मैट्रन! इसमें आपकी कोई गलती नहीं है.. मैं खुद ही रश्मि को भगवान के पास गया हुआ समझ रहा था.. मैं तो बस इतना चाहता हूँ की वो सही सलामत हो, और मेरे पास वापस आ जाय..”

“रूद्र.. आपके पास कोई सबूत है की ये लड़की आपकी पत्नी है?”

“जी बिलकुल है.. ये देखिए..” कह कर मैंने अपना और रश्मि दोनों का ही पासपोर्ट दिखा दिया। ‘स्पाउस’ के नाम के स्थान पर हमारे नाम लिखे हुए थे, और दोनों पासपोर्ट में तस्वीरें हमारी ही थीं। शक की कोई गुंजाइश ही नहीं थी। 

“थैंक यू मिस्टर रूद्र.. दूध का जला छाछ भी फूंक फूंक कर पीता है..” कह कर उन्होंने मेरा पता लिख लिया और मुझसे मेरा फ़ोन नंबर माँगा, जिससे की अगर कोई ज़रूरी बात याद आये तो मुझे बता सकें! उन्होंने अपना नंबर भी मुझे दिया।

अगर यह कुंदन कहीं गया न हो, तो अभी कोई देर नहीं हुई है। लगता तो नहीं की वो कहीं जाएगा।

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अंजू जब सो कर उठी, तो उसके सर में भीषण पीड़ा थी। असंख्य विचार उठते गिरते – सब गड्डमड्ड हो रहा था। 

“ओह रूद्र! मेरे रूद्र!” यह उठते ही उसके पहले शब्द थे। 

“लेटी रह बेटी, लेटी रह.. तुम कल दोपहर अचेत हो गयी थी.. याद है?” रामलाल की पत्नी ने अंजू को पुचकारा।

“कल?” अंजू कुछ समझ नहीं पाई।

“अच्छा कोई बात नहीं.. ये हैं डॉक्टर संजीव.. इनको पहचानती हो?”

‘संजीव? नाम तो सुना हुआ सा है.. कहाँ सुना है?’

प्रत्यक्ष में अंजू ने ‘न’ में सर हिलाया।

डॉक्टर संजीव मुस्कुराए, “हेल्लो! अच्छा, तुमको अपना नाम याद है?”

अंजू ने हामी में सर हिलाया।

“हमको बताओगी?”

“जी क्यों नहीं! मेरा नाम रश्मि है..” उसने बहुत ही खानदानी अंदाज़ में उत्तर दिया।

संजीव मुस्कुराए, “वैरी गुड! और ये रूद्र कौन है?”

“मेरे पति.. हम बैंगलोर में रहते हैं.. मैं कहाँ हूँ?”

“आप गौचर में हैं..”

“गौचर में?” कहते हुए रश्मि सोच में पड़ गयी। “लेकिन, मुझे तो केदारनाथ में होना चाहिए था!”

डॉक्टर संजीव समझ गए की रश्मि / अंजू को अब सारी बातें याद आ गयी हैं। हमारा मष्तिष्क कुछ ऐसे चेकिंग मैकेनिज्म (प्रणाली) लगाता है, जिससे हमको दुर्घटनाओं की याद नहीं रहती। एक तरीके से यह प्रणाली हमारे जीवित रहने के प्रयास में एक अति आवश्यक कड़ी होती है। 

“हाँ! हम आपको सारी बातें बाद में विस्तार से बताएँगे.. लेकिन पहले आप एक बात बताइए, आप किसी कुंदन को जानती हैं?”

“कुंदन? नहीं...! पता नहीं.. कुछ याद नहीं आता..”

“आप मुझे जानती हैं? मतलब आज से पहले आपने मुझे देखा है?”

“नहीं डॉक्टर, याद नहीं आता.. सॉरी! लेकिन आप मुझसे यह सब क्यों पूछ रहे हैं?”

“डॉक्टर का काम है मरीज़ को ठीक करना.. मुझे लगता है की आप अब ठीक हो गईं हैं..”

“ठीक हो गयी हूँ? लेकिन मुझे रोग ही क्या था?”

“आई प्रॉमिस! मैं आपको सब कुछ बताऊँगा.. लेकिन बाद में! अच्छा, आपको अपने पति का नंबर याद है?”

“जी हाँ! क्यों?”

“अगर आपकी इजाज़त हो, तो मैं उनसे बात कर सकता हूँ?”

“हाँ! क्यों नहीं!” रश्मि कुछ समझ नहीं पा रही थी की यह सब क्या हो रहा है!

“आप मुझे उनका नंबर बताएंगी?”

“जी बिलकुल.. उनका नंबर है.. नाइन एट, एट जीरो...” कह कर रश्मि ने उनको रूद्र का नंबर बता दिया।

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12-17-2018, 02:25 AM,
RE: Chodan Kahani घुड़दौड़ ( कायाकल्प )
कुंदन का पता और फ़ोन नंबर ले कर, सिटी हॉस्पिटल से मैं जैसे ही बाहर निकला, मेरे फ़ोन की घंटी बजने लगी। अनजाना नंबर था – मैंने फोने करने वाले को मन ही मन कोसा, ‘लोग कहीं भी पीछा नहीं छोड़ते...” मुझे लगा की किसी क्लाइंट का फ़ोन होगा। मैंने फ़ोन उठाया, और बहुत ही अनमने ढंग से जवाब दिया, “हल्लो!”

“मिस्टर सिंह..?” उधर से आवाज़ आई।

“स्पीकिंग! हू ऍम आई टाकिंग टू?”

“मिस्टर सिंह, आई ऍम डॉक्टर संजीव! आई वांट टू टॉक टू यू अबाउट योर वाइफ..”

“माय वाइफ?” पहले तो डॉक्टर, और फिर अपनी पत्नी का जिक्र सुन कर मेरे पैरों के तले ज़मीन खिसक गई। क्या हुआ सुमन को? वो ठीक तो है न! मेरे दिल की धडकनें तेज हो गईं। अभी सुबह ही तो बात हुई थी उससे – उस समय तो सब ठीक था.. अचानक.. क्या हो गया? वो कहते हैं न, जब किसी अनिश्चित समय घर से दूर रहने वालों को घर से कॉल आता है तो उनके दिमाग में सबसे पहला ख्याल अमंगल का ही होता है.. वही हाल मेरा था।

“व्हाट हैप्पंड टू हर, डॉक्टर?”

“व्ही फाउंड हर..”

“फाउंड हर? डॉक्टर प्लीज.. ठीक ठीक बताइए.. यह पहेलियाँ न बुझाइए प्लीज..” मैं रिरियाया..

“आई ऍम सॉरी, मिस्टर सिंह! मैं पहेलियाँ नहीं बुझा रहा हूँ.. आपकी पत्नी रश्मि मिल गई हैं..”

“क्या?” रश्मि मिल गई है! ओह प्रभु! आपका करोड़ों करोड़ों धन्यवाद! “कहाँ है वो? कैसी है?”

“जी इस समय गौचर के बगल एक गाँव से बोल रहा हूँ.. सुगी!”

“सुगी से?” वहां तो कुंदन रहता है! मेरे दिमाग में ख्याल कौंधा! मतलब सचमुच रश्मि ही है..!

“जी हाँ.. आप यहाँ कब तक आ सकते हैं?”

“जी एक बार रश्मि से...”

“हाँ हाँ! क्यों नहीं? आप बात कर लीजिए उनसे!” कह कर डॉक्टर संजीव ने फ़ोन रश्मि को पकड़ा दिया।

“जा नू.. मेरे.. रूद्र!”

“ओह भगवान्!” यह आवाज़ सुने एक लम्बा लम्बा अरसा हो गया.. लेकिन अभी फिर से उसकी आवाज़ सुन कर जैसे दिल पर ठंडा पानी पड़ गया हो। भावातिरेक में आ कर मैं सिसकने लगा। एक मुद्दत के बाद दिल की सारी तमन्नाएँ पूरी हो गईं! उसकी आवाज़ सुन कर ऐसा लगा की जैसे ये बरस हुए ही नहीं!

“आप रो रहे हैं?” रश्मि ने पूछा। उसके स्वर में वही जानी पहचानी चिंता!

“नहीं जानू!” मैंने आंसू पोंछते हुए कहा, “क्यों रोऊँगा भला! आज तो मेरे लिए सबसे ख़ुशी का दिन है..”

“आप कहाँ हैं?” मुझे उसकी आवाज़ से लगा की वो मुस्कुरा रही है।

“तुम्हारे बहुत पास!”

“तो जल्दी से आ जाइए...” रश्मि को लग रहा होगा की मैं बैंगलोर में ही हूँ।

“आता हूँ जानू! बहुत जल्दी! बस वहीँ रहना!”

“आई लव यू!”

“सबसे ज्यादा जानू.. सबसे ज्यादा!”

“जी मिस्टर सिंह.. आप कब तक आ सकते हैं?” ये डॉक्टर संजीव थे।

“आप वहां पर कुछ देर और हैं डॉक्टर साहब?”

“जी हाँ.. क्यों?”

“मैं आता हूँ... आधे घंटे में!”

“क्या?”

“जी.. आप रश्मि को मेरे आने की बात न बताइयेगा.. मैं आकर आपसे मिल कर सारी बात बताता हूँ..”

“जी ओके ओके! मुझे भी आपको कुछ बाते बतानी हैं.. आप जल्दी से आ जाइए” इतना कह हर उन्होंने फ़ोन कॉल विच्छेद कर दिया।

मैं भागता हुआ कार के पास पहुंचा.. 

“ड्राईवर, जल्दी से चलो! जितना जल्दी हो सके!”

“किधर साहब?”

“सुगी.. मैं रास्ता बताता हूँ..” 

*************************************

“डॉक्टर बाबू, क्या बात है? क्या हुआ है इस लड़की को? और अचानक ही पिछले कुछ दिन की बात याद क्यों नही है?” संजीव को बाहर कोने में ले जा कर रामलाल ने चिंतातुर होते हुए पूछा।

“देखिए ठीक ठीक तो मैं भी कुछ नहीं बता सकता। आदमी का मष्तिष्क इतनी अबूझ पहेली है, की उसको सुलझाने के लिए कम से कम मेरे पास काबिलियत नहीं है... जहाँ तक इस लड़की का सवाल है, तो मुझे इतना तो समझ आ रहा था की एक लम्बी बेहोशी की वजह से इसकी याददाश्त गायब हुई थी.. कल की घटनाओं के कारण हो सकता है की इसके दिमाग पर इतना जोर पड़ा हो की उसको अपनी पुरानी सब बातें याद आ गईं हों!

“लेकिन, ये किसी को पहचान नहीं रही है न..” 

"हाँ! यह बात तो वाकई बहुत निराली है.. ऐसा लग रहा है जैसे पिछले एक सप्ताह की बातें इसके दिमाग की स्लेट से किसी ने पोंछ दी है.. सच कहूं, मेरे पास आपके सवाल का कोई जवाब नहीं है। एक तरीके से अच्छा है.. ये अब अपनी पिछली जिंदगी मे वापस पहुँच गई है। ज़रा सोचिए – अगर इसको सारी बातें याद रहती, तो कुंदन वाला केस बिगड़ सकता था.. और आप लोग भी लम्बा नप जाते! इसलिए अच्छा ही है, की यह बात यहीं दब जाय, और ये लड़की अपने घर वापस चली जाय..”

“और इसके पति को क्या कहेंगे?”

“मैं उसको सब सच सच बता दूंगा.. वो आपका तो कोई नुकसान नहीं करेगा.. आपने तो इस लड़की की सिर्फ मदद ही करी है... हाँ, लेकिन हो सकता है की कुंदन पर केस ठोंक दे।“

“अच्छा ही है.. साला मनहूस नपुंसक जाएगा यहाँ से..”

“रामलाल जी, एक बात कहूँ.. आप बुरा मत मानियेगा.. वो नपुंसक है, तो उसमे उसका कोई अपराध नहीं। आप ठन्डे दिमाग से सोचिएगा कभी... उसने कभी भी किसी का भी नुकसान किया है? इस लड़की को भी उसी ने तो बचाया.. मेरी मानिए, जो हुआ उसको भूल जाइए, और उसको भी इज्ज़त से जीने का मौका दीजिए..”

रामलाल को प्रत्यक्षतः डॉक्टर संजीव की बात अच्छी तो नहीं लगी, लेकिन उसको मलूम था की वो सोलह आने सही बात कह रहे हैं! इसलिए वो चुप ही रहा। 

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कुंदन अपने शरीर पर पट्टियाँ बंधवाए, अपने घर में चारपाई पर लेटा हुआ था। कल जिस प्रकार से सारे कस्बे वालों ने जिस बेदर्दी से उसकी ठुकाई करी थी, उसको पूरा यकीन हो गया था की उसको वहां कोई भी पसंद नहीं करता। एक अंजू ही थी – नहीं अंजू नहीं.. रश्मि! हाँ, यही नाम है उसका। एक वही थी, जिसने उसको अपने पास आने का मौका दिया, और उसको वो सुख दिया जो उसे अंजू से पहले कभी नहीं मिल सका, और अब लगता है की जीवन पर्यंत नहीं मिलेगा। 

उसने गलत तो किया था – लेकिन न जाने क्यों वो सब करते समय उसको गलत नहीं लग रहा था। कल उसकी जान अंजू के कारण ही बची.. नहीं तो न जाने क्या हो जाता! उसके मष्तिष्क के पटल पर अनायास ही पिछले सप्ताह के सारे दृश्य उजागर होने लगे। कैसी प्यारी सी है अंजू! यह कहना अतिशयोक्ति नहीं थी की इतने कम समय में ही वो उसकी ज़रूरत बन चुकी थी। या यह भी हो सकता है की यह सब कुंदन का विमोह हो! उसको भला किसी स्त्री का संग कब मिला! 

किसी ने उसको बताया की अंजू को अब उसके बारे में कुछ याद नहीं है.. इस बात की भी पीड़ा रह रह कर उसके दिल में उठ रही थी। उसकी आँखो मे आँसू आ गये – कुछ शरीर के दर्द के कारण, और कुछ भाग्य के सम्मुख उसकी विवशता के कारण! संभव है, आंसू की कुछ बूँदें पश्चाताप की भी हों! 

‘हे बद्री विशाल, आपकी लीला भी अपरम्पार है! अब मैं इस बात पर हंसूं.. की रोऊँ? यह कैसी सज़ा है? अंजू के दिमाग से मेरी सारी स्मृति ही भुला दी? .. वैसे एक तरह से ठीक ही किया। उसकी स्मृतियों की ज़रुरत तो मुझे है.. उसको नहीं! उसका जीवन तो वैसे ही खुशियों से भरा हुआ था! सही किया प्रभु! अंजू की स्मृति मैं उम्र भर सम्हाल कर रखूंगा!’


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12-17-2018, 02:25 AM,
RE: Chodan Kahani घुड़दौड़ ( कायाकल्प )
सुगी में गाड़ी नहीं जाती – वहां पैदल जाना होता है। खैर, मैं ड्राईवर को पीछे छोड़ कर लगभग भागता हुआ सा सुगी तक पहुंचा। लोग बाग़ जैसे मुझे देखते ही पहचान गए की मैं कौन हूँ; वो सभी लोग मुझे इशारे से किसी रामलाल के घर जाने को कह रहे थे, और रास्ता भी बता रहे थे। खैर, मैं कोई आधे घंटे के अन्दर ही वहां पहुँच गया।

“मिस्टर सिंह?”

“डॉक्टर संजीव?” 

हम दोनों एक दूसरे को देखते ही पहचान गए। संजीव इस बात पर हैरान थे की मैं सचमुच आधे घंटे में कैसे वहां पहुँच गया। मैंने उनको सारी बातें विस्तार से बता दीं। वो विस्फारित से नेत्रों से मुझे देखने लगे.. 

“सचमुच, कुदरत का करिश्मा है तुम दोनों की मोहब्बत!” उन्होंने मुझे बस इतना कहा और मुझे बहुत बहुत बधाइयाँ दीं।

फिर उन्होंने मुझे रश्मि के साथ घटी सारी बातें विस्तार से बताई – उन्होंने मुझे बताया की कैसे लगभग मरणासन्न सी हालत में उसको वहां लाया गया था। उन्होंने बताया की उस अवस्था में रश्मि का गर्भ भी गिर गया। उन्हें वैसे उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं थी, लेकिन कोई एक महीने के बाद अचानक ही रश्मि की हालत सुधरने लगी। लेकिन वो इस पूरे घटनाक्रम के दौरान अपने होश में नहीं थी – कोमा में थी। डॉक्टर्स विदआउट बॉर्डर्स के कुछ सहयोगियों ने कुछ नवीन तरीके से रश्मि का इलाज जारी रखा, इसलिए कोमा में रहने के बाद भी, उसकी मांसपेशियों का क्षय नहीं हुआ। बीच बीच में उसकी आँखें खुलती, लेकिन शायद वो किसी तरीके का रिफ्लेक्स रिएक्शन था। वो देखा और सुना हुआ कुछ समझ नहीं पाती थी।

लेकिन कोई आठ दस दिनों पहले.... फिर उन्होंने मुझे कुंदन, और कस्बे में जो घटना हुई, उसके बारे में बताया। सच कहूं, मुझे यह जान कर बिलकुल भी बुरा नहीं लगा, की कुंदन ने रश्मि के साथ सम्भोग किया। उल्टा मुझे उस बेचारे पर दया आई। मेरी नज़र में उसको अपने किये की बहुत ही बड़ी सजा मिली थी.. उसका ऐसा अपराध था भी नहीं।

रश्मि से मिलने से पहले मैंने कुंदन के घर का रुख किया – उसकी बुरी हालत देख कर मेरा दिल वैसे ही बैठ गया। हमारा परिचय हुआ, तो वो हाथ जोड़ कर बिस्तर से उठने की कोशिश करने लगा। मैंने उसको सहारा दे कर लिटाया, और लेटे रहने का आग्रह किया।

“कुंदन,” मैंने कहा, “तुमने मेरी रश्मि के लिए जो कुछ किया, उसका एहसान मैं अपनी पूरी जिंदगी नहीं भूलूंगा! यह तुम्हारा एक क़र्ज़ है मुझ पर.. जिसको मैं चुका नहीं सकता। मैं तो यही सोच कर रह गया था की वो अब इस दुनिया में नहीं है.... लेकिन वो आज मुझे मिली है, तो बस सिर्फ तुम्हारे कारण!”

“लेकिन...” कुंदन कुछ कहने को हुआ..

“मुझे मालूम है, की तुमने रश्मि के साथ सेक्स किया है। लेकिन वो तुम्हारी नादानी थी। वैसे भी रश्मि को उस बारे में कुछ याद नहीं.. और क्योंकि कल उसी ने तुम्हारी जान बचाई थी, इसलिए मैं मान कर चल रहा हूँ की उसने तुमको माफ़ कर दिया..”

“मुझे माफ़ कर दीजिए..” उसने फिर से हाथ जोड़े।

“कुंदन, माफ़ी के लिए कुछ भी नहीं है! अगर तुम माफ़ी चाहते ही हो, तो मेरी एक बात सुनो, और हो सके तो अमल करो।“

“बताइए सर!”

“मैं चाहता हूँ की तुम आगे की पढाई करो – इंजिनियर बनो – ढंग के इंजिनियर! तुम्हारी पढाई लिखाई का खर्चा मैं दूंगा। बोलो – मजूर है?”

कुंदन की आँखों में आंसू आ गए।

“जी! मंज़ूर है..” उसने भर्राए हुए स्वर में कहा।

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दुनियादारी से फुर्सत पाकर अब मैं अपनी रश्मि से मिलने चला।

इतने दिनों के बाद.. ओह भगवान् मैं ख़ुशी से पागल न हो जाऊं! पैरों में मेरे पंख जैसे निकल आये.. 


रश्मि कुछ व्यग्र सी रामलाल के घर के दरवाज़े के ठीक सामने एक चारपाई पर बैठी हुई थी। मन में न जाने कितने सारे विचार आ और जा रहे थे। भले ही किसी ने उसको पूरी बात विस्तार से न बताई हो, लेकिन किश्तों में और छोटे छोटे टुकड़ों में उसको जो सब कुछ पता चला, वो उसको हिला देने वाला था। सबसे पहले तो उसके आँखों के सामने वो दिल दहला देने वाला दृश्य पुनः सजीव हो उठा।


मष्तिष्क के खेल निराले होते हैं – केदारनाथ आपदा के समय जब अभी जीवन अभी मृत्यु जैसी दशा बन आई, तब किस तरह से वो, सुमन और उनके पिता भंवर सिंह जी अपनी जान बचा कर वहां से निकले। माँ को तो उसने आँखों के सामने उस अथाह जलराशि में बह जाते हुए देखा था – बाढ़ में होटल का अहाता बुरी तरह से टूट गया था, और होटल ढलान पर होने के कारण, वहां से पानी भी बड़ी तीव्रता से बह रहा था। पकड़ने के लिए न कोई रेलिंग थी न कोई अन्य सहारा। बहुत सम्हाल कर निकलने के बाद भी माँ का पैर फिसल गया और वो सबकी आँखों के सामने बह गईं। एक पल को आँखों के सामने, और अगले ही पल गायब! कितनी क्षणिक हो सकती है ज़िन्दगी! कितनी व्यर्थ! पिताजी उनके पीछे भागे – बिना अपनी जान की परवाह किये! लेकिन पानी में इतना सारा मिट्टी और पत्थर मिला हुआ था, की उसकी रंगत ही बदल गई थी। माँ फिर कभी नहीं दिखाई दीं। वो कुछ दूर तक गए तो, लेकिन जब वापस आये तो लंगड़ा कर चल रहे थे – टूटे हुए किसी राह पर गलत पैर पड़ गया और उनके में चोट लग गयी। 

जान बचाते लोगों ने उनको पहाड़ पर ऊंचाई की तरफ जाने की सलाह दी। काफी सारे लोग वही काम कर रहे थे – मतलब लोग पहाड़ की ढलान के ऊपर की तरफ जा रहे थे। उन्ही की देखा देखी वो तीनों भी ऊपर की चढ़ाई करने लगे। पर्वतों की संतानें होने के बावजूद उस चढ़ाई को तय करने में बहुत समय लग गया। न तो पिताजी ही ठीक से चल पा रहे थे, और न ही खुद रश्मि। वैसे भी गर्भावस्था में ऐसे कठिन काम करने से मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। चलते चलते अचानक ही उसकी हिम्मत जवाब दे गई, और वो वहीँ एक जगह भहरा कर गिर गई। जब होश आया तो उसने देखा की पिताजी उसको पानी पिलाने की कोशिश कर रहे हैं। 

रात गहरा गई थी, और आस पास कोई भी नहीं दिख रहा था। बस इसी बात की आस थी की कम से कम हम तीनो तो बच गए.. लेकिन पिताजी दिन भर उल्टियाँ करते करते मृत्यु से हार गए। एक साथ कितनी यातनाएँ सहती वो? दिन भर के अंतराल में दोनों लड़कियों के सर से माँ बाप का साया उठ गया। अब तक वो भावनात्मक, शारीरिक और मानसिक – तीनों स्तर पर अपने हथियार डाल चुकी थी। न जाने कहीं से कुछ सड़ा हुआ मांस मिल गया – जिसने कुछ देर और उन दोनों की जान बचाई। जंगली जानवरों की आवाज़ के बीच न चाहते हुए भी उसको नींद सी आ गई – पलकें बंद करते करते उसने नज़र भर सुमन को देखा। रश्मि समझ गयी की अब अंत समय आ गया – उसको दुःख बस इस बात का था, की वो अपनी छुटकी – अपनी छोटी बहन – के लिए कुछ नहीं कर पा रही थी। संभवतः प्रभु के घर उसको अपने माँ बाप के सामने लज्जित होना और लिखा था।

जब खुद का होश हुआ, तो मालूम हुआ की वो यहाँ इस अनजान सी जगह पर है, और डॉक्टर उसकी जांच पड़ताल कर रहे थे। उसको अपने शरीर में हुआ परिवर्तन समझ में आ गया था – रश्मि समझ गयी की रूद्र और उसके प्रेम की निशानी अब नहीं बची। उसका जी हुआ की बुक्का फाड़ कर रोए, लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया। डॉक्टर उससे सवाल जवाब कर रहे थे.. उसको समझ नहीं आया की उससे ऐसी जवाब-तलबी क्यों करी जा रही है.. लेकिन फिर भी वो पूरे संयम से उनकी बातों का ठीक ठीक उत्तर देती रही। फिर मालूम हुआ की रूद्र यहीं आने हैं.. यह सुन कर उसकी जान में जान आई – कम से कम पूरी बात तो समझ आएगी! 

लेकिन रूद्र के आने से पहले उसको लोगों की दबी आवाज़ में कही गई बातें सुनाई दे गईं। उसने डॉक्टर संजीव पर दबाव डाला की वो उसे सब कुछ सच सच बताएं – उसको सब सच जानने का पूरा हक़ था। संजीव और रामलाल ने उसको सारी बातें, हिचकते हुए ही सही, बता दीं। उसको यकीन ही नहीं हुआ की उसके दिमाग में जो बात अभी तक जीवित थी, वो कोई दो साल पुरानी यादें थीं, और यह की पिछले हफ्ता दस दिन तक उसके साथ जो कुछ भी हुआ, वो उसको याद ही नहीं था! उसने यह भी जाना की उसने ऐसे आदमी की जान बचाई थी, जिसने उसकी याददाश्त का फायदा उठा कर उसके साथ शारीरिक ज्यादतियां करी थीं। अब क्या मुँह दिखाएगी वो रूद्र को? 

ऐसी ही न जाने कितनी बातें सोचती हुई, उम्मीद और नाउम्मीद के झूले में झूलते हुए, सुमन का अंतर्मन बेहद आंदोलित होता जा रहा था। वो बहुत बेसब्री से रूद्र की प्रतीक्षा कर रही थी।

‘रूद्र!’

रूद्र पर निगाह पड़ते ही वो चारपाई पर से उछल कर खड़ी हो गई। रूद्र को देखते ही जैसे उसके मन के सारे संताप ख़तम हो गए। उसके चेहरे पर तुरंत ही राहत के भाव आ गए। रश्मि के मुँह से कोई बोल तुरंत तो नहीं फूटे, लेकिन रूद्र को जैसे उसके मन की बातें सब समझ आ गईं। रश्मि ने सुना तो कुछ नहीं, लेकिन उसको लगा की रूद्र ने उसको ‘कुछ मत कहो’ जैसा कुछ कहा था।

रूद्र ने रश्मि को देखा – अपलक, मुँह बाए हुए! दो वर्ष क्या बीते, जैसे दो जन्म ही बीत गए! 

‘हे भगवान्! कितनी बदल गयी है!’ उसका गुलाब जैसे खिला खिला चेहरा, एकदम कुम्हला गया था; सदा मुस्कुराती हुई आँखें न जाने किस दुःख के बोझ तले बुझ गईं थीं। 

न जाने क्यों रूद्र का मन आत्मग्लानि से भर गया। रूद्र लगभग दौड़ते हुए उसकी तरफ बढ़ रहे थे; रश्मि भी लपक कर उनकी बाहों में आ गई। आलिंगनबद्ध हुए ही रूद्र उसका शरीर यूँ टटोलने लगे जैसे उसकी मुकम्मल सलामती की तसदीक कर रहे हों! 

“ओह जानू!” रूद्र ने कहा। 

उनकी आवाज़ में गहरी तसल्ली साफ़ सुनाई दे रही थी – उम्मीद है की दिल का दुःख रश्मि ने न सुना हो। आलिंगन बिना छोड़े हुए ही, रूद्र ने रश्मि के कोमल कपोलों को अपनी हथेलियों में ले कर प्यार से दबाया, 

“ओह जानू!”

रूद्र का गला भर आया था। उनकी आँखों से आंसू बह रहे थे। 

“ओह जानू..” कहते कहते वो फफक फफक कर रो पड़े। गले की आवाज़ भावावेश में आ कर अवरुद्ध हो चली थी।

ऐसे भाव विह्वल मिलन का असर रश्मि पर खुद भी वैसे हुआ, जैसे रूद्र पर! रूद्र को अपने आलिंगन में बांधे रश्मि की आँखें बंद हो गईं। वो निःशब्द रोने लगी। उन आंसुओं के माध्यम से वो पिछले दो वर्षों की भयानक यादें भुला देना चाहती थी – अपनी भी, और संभवतः रूद्र की भी। रूद्र को इस तरह से रोते हुए उसने कभी नहीं देखा था – वो कभी कभी भावुक हो जाते थे, लेकिन, रोना!! रश्मि को तो याद भी नहीं है की रूद्र कभी रोए भी हैं! रश्मि को अपने आलिंगन में बांधे रूद्र रोते जा रहे थे। एक छोटे बच्चे के मानिंद! गाँव वाले पहले तो तमाशा देखने के लिए उन दोनों को घेर कर खड़े रहे, लेकिन रामलाल ने जब आँखें तरेरीं, तो सब चुपचाप खिसक लिए।

पता नहीं कब तक दोनों एक दूसरे को थामे, रोते रहे और एक दूसरे के आंसूं पोंछते रहे। लेकिन आंसुओं का क्या करें? थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे। रूद्र विगत दो वर्षों की निराशा, दुःख, हताशा, और सब कुछ खो जाने के संताप से रो रहा था, और रश्मि उन्ही सब बातों को सोच सोच कर! वो रूद्र के लिए रो रही थी, सुमन के लिए रो रही थी, अपने माता पिता के लिए रो रही थी, और अपनी अजन्मी संतान के लिए रो रही थी। कैसा था वो समय.. और कैसे होगा आने वाला कल?

रोते रोते एक समय ऐसा भी आता है जब रोने के लिए आँसूं भी नहीं बचते है... उस गहरे अवसाद में रूद्र ने ही सबसे पहले खुद को सम्हाला,

“बस जानू बस.. अब चलते हैं...”

रश्मि की हिचकियाँ बंध गईं थीं। उसके ठीक से बोल भी नहीं निकल रहे थे।

“नी.. नी..ही..ही..अह..लम क..कैसी ..?” हिचकियों के बीच में उसने पूछा।

इस प्रश्न पर रूद्र को जैसे करंट लग गया। अचानक ही उसके मन में अपराध बोध घर कर गया। 

‘ओह भगवान्! क्या सोचेगी रश्मि, जब उसको मेरी करतूत के बारे में पता चलेगा! इतना भी सब्र नहीं हुआ? और ऐसा भी क्या की उसी की छोटी बहन पर हाथ साफ़ कर दिया! कितनी ज़िल्लत! सुन कर क्या सोचेगी रश्मि? अपने से चौदह साल छोटी लड़की के साथ! छिः छिः!’ 

“अच्छी है..” 

मेरे गले में अपराध बोध वाली फाँस बन गयी, “बड़ी हो गई है काफी..” जैसे तैसे वाक्य ख़तम कर के मैंने बस यही सोचा की रश्मि अब सुमन के बारे में और पूछ-ताछ न करे। 

“म म्मेरी अह अह.. उस उस से अह.. ब बात क क करा..अहइए..” रश्मि ने बंधे गले से जैसे तैसे बोला। 

“जानू.. अभी नहीं! अभी चलते हैं.. उसको सरप्राइज देंगे.. ठीक है?”

तकदीर ने साथ दिया, रश्मि मेरी बात मान गयी, और उसने आगे कुछ नहीं पूछा। मैंने जल्दी जल्दी कई सारी औपचारिकताएँ पूरी करीं, सारे ज़रूरी कागज़ात इकट्ठे किए, स्थानीय पुलिस थाने में जा कर रश्मि से सम्बंधित जानकारियों का लेखा जोखा पूरा किया और वहां से भी ज़रूरी कागज़ात इकट्ठे किए और फिर वापसी का रुख किया। निकलते निकलते ही काफी शाम हो गई थी, और गाँव वालों ने रुकने की सलाह दी, लेकिन मेरा मन नहीं माना। मेरा मन हो रहा था की उस जगह से जल्दी निजात पाई जाय – और यह की वहां का नज़ारा दोबारा न हो! मैंने अपने ड्राईवर से पूछ की क्या वो गाडी चला सकता है, तो उसने हामी भरी। हम लोग तुरंत ही वहां से निकल गए।

वैसे तो रात में पहाड़ी रास्तों में वाहन नहीं चलाना चाहिए, लेकिन अभी रात नहीं हुई थी। हमारा इरादा यही था की कोई दो तीन घंटे के ड्राइव के बाद कहीं किसी होटल में रुक जायेंगे, और फिर अगली सुबह वापस दिल्ली के लिए रवाना हो जाएँगे। ड्राईवर साथ होने से काफी राहत रही – रश्मि न जाने क्या क्या सोच सोच कर या तो रोती, या फिर गुमसुम सी रहती। उस मनहूस घटना ने मेरी रश्मि को सचमुच ही मुझसे छीन लिया था – मैं मन ही मन सोच रहा था की अपनी रश्मि को वापस पाने के लिए क्या करूँ! ऊपर से रश्मि के पीछे पीछे मैंने जो जो काण्ड किए थे, उनके रश्मि के सामने उजागर हो जाने की स्थिति में उनसे दो चार होने का कोई प्लान सोच रहा था। लेकिन इतना सोचने पर भी कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

खैर, मन को बस यही कह कर धाडस बंधाया की अंत में सत्य तो उजागर हो कर रहेगा। इसलिए छुपाना नहीं है। वैसे भी सुमन को अभी तक कुछ भी मालूम नहीं हुआ था। वो तो सब कुछ बोल ही देगी। न जाने क्यों सब कुछ विधि के हिसाब से होने के बावजूद मन में एक अपराधबोध सा घर कर गया था। न जाने क्या होगा!
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12-17-2018, 02:25 AM,
RE: Chodan Kahani घुड़दौड़ ( कायाकल्प )
रास्ते में सुमन के कई सारे कॉल आए – जैसे हर रोज़ उससे रोमांटिक बातें होती थीं, आज करना संभव नहीं था। जैसे तैसे उसको भरोसा और दिलासा दिला कर और बाद में बात करने का वायदा कर के शांत किया। लेकिन फिर भी उसके sms आते रहे। वो तो रश्मि गुमसुम सी बैठी थी, इसलिए यह सब सिलसिला चल गया। साला मैं तो बिना वजह ही चक्की की दोनों पाटिया के बीच बस फंस कर ही रह गया! कैसी किस्मत थी – दो दो बीवियाँ, और वो भी दोनों सगी बहने! ऊपर से दोनों को एक दूसरे के बारे में पता भी नहीं! वैसे यहाँ तक भी गनीमत थी... पिसना तो अभी बाकी है!

तो ऐसे गुमसुम हालात में मेरे से तो गाडी नहीं चलाई जा पाती। इसलिए ड्राईवर साथ होने से बहुत सहूलियत हो गई। हमारे पास वैसे भी कोई सामान नहीं था। मेरे पास बस दो जोड़ी कपडे थे, और रश्मि के पास कुछ भी नहीं – जो उसने पहना हुआ था, बस वही था। मैंने दिमाग में नोट कर लिया की उसके लिए दिल्ली में कपड़े खरीदने हैं। बहुत देर की चुप्पी के बाद मैंने ड्राईवर को गाड़ी में लगे संगीत तंत्र को चलाने को कहा – कम से कम हम दोनों लोग अपनी अपनी चिंता के दायरे से बाहर निकालेंगे! मुझे तो लगा की बस कोई एक घंटा चले थे, लेकिन जब मैंने बाहर ध्यान दिया, तो घुप अँधेरा हो गया था, और अब मेरे हिसाब से गाड़ी चलाना बहुत सुरक्षित नहीं था। 

“भाई, आगे कोई होटल या धर्मशाला आये, तो रोक लेना!”, मैंने ड्राईवर से कहा, “अब अँधेरा बढ़ गया है, और ऐसे में गाड़ी चलाना ठीक नहीं। आज रात वहीँ रुक जायेंगे, और कल आगे का सफ़र करेंगे। क्यों, ठीक है न?“

“बिलकुल ठीक है साहब! मैं भी यही कहने वाला था.. जैसे ही कोई सही होटल दिखेगा मैं वैसे ही रोक लूँगा। रात में ड्राइव करते रहने का कोई इरादा नहीं है मेरा।“

ऐसे ही बात करते हुए मुझे एक बंगलेनुमा होटल दिखा। मुझे अचानक ही पुरानी बातें याद हो आईं – शादी के बाद जब मैं रश्मि को विदा कर के ला रहा था तो हम इसी होटल में रुके थे। मैंने ड्राईवर को उसी होटल के प्रांगण में पार्क करने को कहा, और उसको कहा की आज हम यहीं पर रुकेंगे।

जैसा की मैंने पहले भी लिखा है, यह एक विक्टोरियन शैली में बनाया गया बंगला था, जिसमें चार बड़े बड़े हाल नुमा कमरे थे। हर कमरे ही छतें ऊंची-ऊंची थीं, जिनको लकड़ी की मोटी मोटी शहतीरें सम्हाले हुई थी। बिस्तर पहले के ही जैसे साफ़ सुथरे थे। किस्मत की बात थी, एक कमरा खाली मिल गया हम लोगों को। होटल के सभी कमरों में मेहमान थे, लेकिन फिर भी वहां का माहौल बहुत शांत था। ड्राईवर को खाने के लिए पैसे दे कर रश्मि और मैं अपने कमरे में आ गए। पहले की ही भांति मैंने वहां के परिचारक को कुछ रुपये दिए और गरमा-गरम खाना बाहर से लाने को कह ही रहा था की रश्मि ने माना कर दिया – उसने कहा की हम दोनों बाहर ही चले जायेंगे।

खैर, मेरे लिए तो यह भी ठीक था। सामान तो कुछ खास था नहीं, इसलिए हम दोनों बाहर चले आये। दुकाने ज्यादातर बंद हो रही थीं, लेकिन एक दो दुकाने, जो लगभग सभी प्रकार की वस्तुएं बेच रही थीं, अभी भी खुली थीं। वहां जा कर रश्मि के लिए हमने एक और जोड़ी शलवार कुर्ता खरीदा, और फिर खाने के लिए चल दिए। छोटी जगह पर कोई खासमखास इंतजाम तो रहता नहीं, लेकिन फिर भी उस छोटे से ढाबे में दाल तड़का, आलू की सब्जी और रोटियाँ खा कर अपार तृप्ति का अनुभव हुआ। खाने के बाद हम लोग तुरंत ही होटल में नहीं गए – रश्मि के कहने पर वहां की मुख्य सड़क से अलग हट कर नीचे की तरफ जाने वाली सड़क की और चल दिए। उसने ही मुझे बताया की अलकनंदा नदी यहाँ से बहती है।

मैंने कोई प्रतिरोध नहीं किया – इतनी देर के बाद रश्मि ने वापस कुछ कहना बोलना शुरू किया था – मेरे लिए वही बहुत था। बात उसी ने शुरू करी,

“आप अपना ख़याल नहीं रखते न?”

अब मैं उसको क्या बताता! उसके जाने के बाद मुझ पर क्या क्या बीती है, यह तो मैं ही जानता हूँ। और, वह सब बातें मैं रश्मि को कैसे कह दूं?

“कैसे रखता? आपकी आदत जो है..” यह वाक्य बोलते बोलते गले में फाँस सी हो गयी।

“मेरे कारण..” वो कुछ और कहती की मैंने उसको बीच में टोक दिया,

“जानू.. किसी के कारण कुछ भी नहीं हुआ.. जो हुआ, वो हुआ.. इसमें न किसी की गलती है, और न ही किसी का जोर! वो कहते हैं न.. आगे की सुध ले.. तो हम लोग भी आगे की ही सुध लेते हैं.. भगवान को जो करना था, वो कर दिया.. ज़रूर कुछ सिखाना चाहते थे, जिसके लिए यह सब हुआ!”

रश्मि कुछ देर चुप रही।

हम लोग टहलते हुए जल्दी ही नदी के किनारे पहुँच गए। अलकनंदा अपनी मंथर गति से बहती जा रही थी। नदी की कर्णप्रिय ध्वनि से आत्मा तक को आराम मिल रहा था। हम लोग चुपचाप उस आवाज़ का देर तक आनंद लेते रहे... चुप्पी रश्मि ने ही तोड़ी, 

“पिछली बार जब हम यहाँ आये थे, तो मेरा मन हुआ था कि आपको यहाँ लाया जाए...”

“हम्म... तो फिर लाई क्यों नहीं?”

“आपको ठंडी लग जाती न... इसलिए..” रश्मि मुस्कुराई।

ओह प्रभु! इस एक मुस्कान के लिए मैं अपना जीवन कुर्बान कर सकता हूँ! कितने सारे कष्ट सहे हैं बेचारी ने! हे मेरे प्रभु – प्लीज.. अब यह मुस्कान मेरी रश्मि से कभी मत छीनना!

“अच्छा जी! आपको नहीं लगती?”

“नहीं! बिलकुल भी नहीं.. मैं तो पहाड़ों की बेटी हूँ.. याद है?” रश्मि की मुस्कान बढती जा रही थी!

“हाँ! याद है... इन्ही पहाड़ों ने मेरा दिल और दिमाग दोनों ले लिया!”

“हैं! तो मुझे क्या मिला?”

“... और आपको दे दिया..”

“हा हा! बातें बनाना कोई आपसे सीखे!”

हम दोनों अब तक नदी के किनारे एक बड़े से पत्थर पर बैठ कर अपनी टाँगों को पानी में डाले हुए सौम्य मालिश का आनंद उठा रहे थे।

“आपने बताया नहीं की आप यहाँ इतनी जल्दी कैसे आ गए?”

“रश्मि – भगवान् के खेल तो बस भगवान् ही जानता है! बस यह कह लो की हमको मिलना था वापस, इसीलिए भगवान् ने कोई युक्ति लगा कर मिला दिया... सोचने समझने जैसी बात ही नहीं है.. कोई और मुझे यह कहानी सुनाता तो मैं कहता की फेंक रहा है.. लेकिन, अब जब यह खुद मेरे साथ हुआ है, तो और कुछ भी नहीं कह सकता! अभी कोई सप्ताह भर पहले की बात है – मैं घर पर बैठा टीवी देख रहा था। वहां नेशनल जियोग्राफिक में उत्तराँचल त्रासदी के ऊपर कोई डाक्यूमेंट्री चल रही थी। उसी में मैंने झलक भर आपको देखा।“

उसके बाद मैंने रश्मि को सब कुछ सिलसिलेवार तरीके से बता दिया। वो मंत्रमुग्ध सी मेरी बात सुनती रही।

“समझ ही नहीं आया की आँखों का देखा मानूं या दिल का कहा सुनूं, या फिर दिमाग पर भरोसा करूँ! मैंने तो इस बार बस भगवान् पर भरोसा कर के यह सब कुछ किया.. और देखो.. यहाँ तक आ गया..”

सारी बात पूरी करते करते मेरी आँखों से आंसूं गिर गए। रश्मि ने कुछ कहा नहीं – बस मेरी बाँह को पकड़ कर मुझसे कस कर चिपक गई।

“अब तुम मुझे छोड़ कर कहीं मत जाना..” बहुत देर के बाद मैंने बहुत ही मुश्किल से अपने दिल की बात रश्मि को कह दी, “चाहे कुछ हो जाय..”

“नहीं जाऊंगी जानू.. कहीं नहीं! आपको छोड़ कर मैं कहीं नहीं जाऊंगी!”

कह कर रश्मि मुझसे लिपट गई, और हम दोनों एक दूसरे के आलिंगन में बंधे भाव-विभोर हो कर रोने लगे। कुछ देर बाद जब हम दोनों आलिंगन से अलग हुए तो रश्मि ने कहा,

“अब मैं रोऊंगी भी नहीं.. आप मुझे मिल गए.. अब क्या रोना?”

मैंने भी अपने आंसू पोंछे, और कहा, “सही है.. अब क्यों रोना! .... चलें वापस?”

रश्मि ने उत्तर में मुझे नज़र भर कर देखा, और हलके से मुस्कुराई,

“जानू..” उसने पुकारा।

रश्मि की आवाज़ में ऐसा कुछ था जिसने मेरे अन्दर के प्रेमी को अचानक ही जगा दिया। मैं इतनी देर से उसके अभिवावक, और रक्षक का रोल अदा कर रहा था। लेकिन रश्मि की उस एक पुकार ने ही मेरे अन्दर के प्रेमी को भी जगा दिया।

“हाँ?”

“आपको शकुंतला और दुष्यंत की कहानी मालूम है?”

“हाँ..” क्या कहना चाहती है!

“आप मेरे दुष्यंत हो?”

“हाँ.. अगर आप मेरी शकुंतला हो!”

“मैं तो आप जो कहें वो सब कुछ हूँ..”

“लेकिन, मैं तो नहीं भूला .. भूली तो आप..”

रश्मि मुस्कुराई, “वो भी ठीक है.. चलो, मैं ही दुष्यंत.. हा हा!”

“हा हा..”

“आप भी तो भूल गए होंगे..!”

“नहीं.. मैं कै..” मेरे पूरा कहने से पहले ही रश्मि ने अपना कुरता उतार दिया।

“आप नहीं भूले?” वो मुस्कुराते हुए अपनी ब्रा का हुक खोल रही थी।

रश्मि से मैंने इतने दुस्साहस की उम्मीद नहीं करी थी। एकदम नया था यह मेरे लिए। और आश्चर्यजनक भी। सुखद आश्चर्यजनक!

“ह्म्म्म.. अंगूठी किधर है?” मैंने भी ठिठोली करी।

“अंगूठी? हा हा.. आप फिलहाल तो इन अंगूरों से याददाश्त वापस लाइए.. अंगूठी आती रहेगी..” वो मुस्कुराई।

“बस अंगूर ही मिलेंगे?”

“नहीं जानू.. शहद भी...”

तब तक मेरा लिंग तन कर पूरी तरह तैयार हो चला था। शलवार का नाडा रश्मि खोल ही चुकी थी, तो उसको उतारने का उपक्रम मैंने कर दिया। साथ ही साथ उसकी चड्ढी भी उतर गयी।

“इन अंगूरों में रस कब आएगा?”
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12-17-2018, 02:26 AM,
RE: Chodan Kahani घुड़दौड़ ( कायाकल्प )
पूर्ण नग्न हो कर रश्मि वहीँ पत्थर पर पीठ के बल लेट गयी। उस पत्थर के वृत्त पर लेटने से रश्मि का शरीर भी कमानीदार हो गया – अर्द्ध चांदनी में उसके शरीर का भली भांति छायांकन हो रहा था। यह सोच लीजिए जैसे खुलेआम एक बेहद निजी अनावृत्ति! उसके नग्न शरीर को सिर्फ मैं देख सकता था और कोई नहीं। हलकी चांदनी उसके शरीर के हर अंग को दिखा भी रही थी, और छुपा भी रही थी। उसके गाल, उसकी नाक, उसके होंठ, उसके कंधे, और उत्तेजना से जल्दी जल्दी ऊपर नीचे होते उसके स्तन! सपाट, तना हुआ पेट, और उसके अंत में सुन्दर नितम्ब! कुल मिला कर रश्मि के शरीर में बहुत अंतर नहीं आया था – हाँ, कम खाने पीने से वो कुछ पतली तो हो गयी थी, लेकिन ऐसा कुछ नहीं तो हफ्ते भर में ठीक न हो जाय। अस्पताल में सचमुच उसकी अच्छी देखभाल हुई थी।

वो मुस्कुराई, “जब आपका रस अन्दर जाएगा..”

मैंने रश्मि के क्रोड़ की तरफ देखा – उसका योनि मुख – उसके दोनों होंठ फूले हुए थे। घने बालों के बीच से भी यह दिख रहा था। फूले हुए, रसीले भगोष्ठ! 

“सचमुच भूल गया!”

“तो अब आप याद कर लीजिए, और मुझे भी याद दिला दीजिए..” रश्मि ने बहुत ही धीमी आवाज़ में यह कहा – फुसफुसाते हुए नहीं, बस दबी हुई आवाज़ में! 

“एक तरह से हमारी दूसरी सुहागरात!” उसने एक आखिरी प्रहार किया.. 

मुझे उस प्रहार की वैसे भी कोई आवश्यकता नहीं थी। मैंने रश्मि के पैर थोड़े से फैलाए। और अपनी उंगली को उसकी योनि की दरार पर फिराने लगा। रश्मि एक परिचित छुवन से कांप गयी। इतने अरसे से दबी हुई कामुक लालसा इस समय उसके अन्दर पूरे चरम पर थी। कुछ देर योनि की दरार पर उंगली चलाने के बाद मैंने अपनी उंगली को अन्दर की तरफ प्रविष्ट किया – उंगली जैसे ही अन्दर गयी, रश्मि की योनि ने तुरंत ही उसके इर्द गिर्द घेरा डाल कर उसे कस कर पकड़ लिया। मैं मुस्कुराया।

“उ उंगली उंगली नहीं जानू..” रश्मि हांफते हुए बोली।

रश्मि की इस बात पर मेरा लिंग जलने सा लगा। मेरे तने हुए जलते लिंग को अगर मैं अमूल बटर की ब्रिक से लगा देता तो उसमें लिंग की मोटाई के समान ही एक साफ़ छेद हो जाता। खैर, मैंने अपनी उंगली को बाहर खींचा और उंगली और अंगूठे की सहायता से उसके योनि-पुष्प की पंखुड़ियों को अलग करने लगा। रश्मि के उत्तेजक काम रसायनों की महक हमारे आस पास की हवा में घुल गयी। 

स्वादिष्ट!

मैंने उसकी खुली हुई योनि को अपने मुख से ढंका और उन रसायनों का आनंद उठाने लगा। रश्मि का रस, सुमन के रस जैसा मीठा नहीं था। खैर, इस बात की मैं कोई शिकायत तो करने वाला नहीं था। मैंने धीरे धीरे से रश्मि की पूरी योनि को चूसना चाटना आरम्भ कर दिया। उतनी जल्दी तो उसकी योनि काम रस बना भी नहीं पा रही थी। जल्दी ही जब इस क्रिया से उसका रस समाप्त हो गया, तब मैं कभी दाहिने, तो कभी बाएँ होंठ को चूसने लगा। हार मान कर उसकी योनि पुनः काम रस का निर्माण करने लगी। और मैं उस रस को सहर्ष पी गया।

रश्मि बड़े प्यार से मेरे बालों में हाथ फिराती हुई मेरा उत्साह-वर्धन कर रही थी। आज एक अरसे के बाद मैं रश्मि की योनि चाट रहा था, इसलिए मुझे बहुत रोमांचक आनंद आ रहा था। थोड़ी ही देर बाद मेरा लिंग खड़ा हो गया। 

मैंने कहा, “जानू, लगाता है कि आज तुम मूड में हो।”

रश्मि ने फुसफुसाते और कराहते हुए कहा, “आ ह हाँ, इतने दिनों बाद अपने कामदेव से मिली हूँ.. आज तो मैं सचमुच बड़े मूड में हूँ। आप मुझे चोदिये, और जम कर चोदिये.. जैसे मन करे वैसे.. जितनी बार मन करे, उतनी बार...।”

“तब तो आज खूब मज़ा आयेगा।”

कह कर मैं वापस रश्मि की योनि को चाटने में मग्न हो गया। वो सचमुच बहुत ज्यादा जोश में आ चुकी थी। थोड़ी ही देर में रश्मि स्खलित हो गयी.. 

फिर आई उसके भगनासे की बारी। मैंने उसके उस छोटे से अंग को देर तक कुछ इस तरह से चूसा जैसे कोई स्त्री अपने प्रेमी के लिंग को चूसती है। इस क्रिया का रश्मि पर नैसर्गिक प्रभाव पड़ा – वो अपने नितम्ब गोल गोल घुमा कर और उछाल कर मुख मैथुन का पूरा आनंद उठा रही थी। खैर, जब तक मैंने उसके भगनासे से अपना मुँह हटाया, तब तक रश्मि तीन बार और स्खलित हो गयी। रश्मि की संतुष्टि भरी आहें वातावरण में गूँज रही थीं। 

“ओह गॉड!” उसने कामुकता भरी संतुष्टि से कराहा।

मैंने रश्मि को रतिनिष्पत्ति का पूरा आनंद उठाने दिया। मुझे शंका थी की कहीं रश्मि की आहें और कराहें सुन कर कोई आस पास न आ गया हो। उस जगह निर्जनता तो थी, लेकिन इतनी नहीं की कोई इतनी ऊंची आवाज़ न सुन सके। खैर, कोई देखता है, तो देखे! क्या फर्क पड़ता है! मैंने अपने भी कपडे उतार दिए। मेरा लिंग तो पूरी तरह से तना हुआ था। 

मैंने अपने आप को रश्मि की टाँगों के बीच व्यवस्थित किया और उसकी टाँगों को उठा कर अपने कंधे पर रख लिया। फिर मैंने उसकी योनि के होंठों को फैला कर अपने शिश्नाग्र को वहां व्यवस्थित किया। कोई दो ढाई साल बाद रश्मि की चुदाई होने वाली थी (कुंदन वाला कुछ भी मान्य नहीं होगा) – इसलिए मुझे सम्हाल कर ही सब कुछ करना था। 

रश्मि को खुद भी इस बीते हुए अरसे का एहसास था – इसलिए वो भी उत्तेजना के मारे एकदम पागल सी होने लगी। खुले में सम्भोग करने जैसी हिमाकत वो ऐसे नहीं कर सकती थी। 

“शुरू करें?” कह कर मैंने लिंग को उसकी चूत में फंसा कर एक जोर का धक्का लगाया। रश्मि के मुँह से चीख निकल पड़ी। उसकी योनि सचमुच ही पहले जैसी हो गई थी – संकरी और चुस्त! मैंने नीचे देखा तो सिर्फ सुपाड़ा ही अन्दर गया था – बाकी का पूरा का पूरा अभी अन्दर जाना बचा हुआ था। 

“क्या बात है रानी! आपकी चूत तो एकदम कसी हुई है! ठीक उस रात के जैसे जब हम दोनों पहली बार मिले थे! असल में, उस से भी ज्यादा कसी हुई...।”

पीड़ा में भी रश्मि की खिलखिलाहट निकल गई।

“आप जो नहीं थे, इसके कस बल खोलने के लिए...”

“कोई बात नहीं... अब आपकी ये शिकायत दूर कर दूंगा..”

“वो मुझे मालूम है... अब शुरू कीजिए..”

“क्या?” मैंने छेड़ा।

“चुदाई...” उसने फुसफुसाते हुए कहा और मेरे लिंग को अपनी योनि के मुहाने पर छुआ दिया।

मैंने धीरे धीरे लिंग को अन्दर घुसाया; रश्मि की कराह निकल रही थी, लेकिन उसके खुद में ही उसको ज़ब्त कर लिया। रश्मि की चूत सचमुच संकरी हो गई थी। सुमन से भी अधिक कसावट लिए! उस घर्षण से लिंग के ऊपर की चमड़ी पीछे खिसक गयी – अब मेरा मोटा सुपाड़ा रश्मि की योनि की दीवारों को रगड़ रहा था। हम दोनों का ही उन्माद से बुरा हाल हो गया। मैं अन्दर के तरफ दबाव देता गया जब तक लिंग पूरी तरह से रश्मि के अन्दर समां नहीं गया।

“देख तो! मेरा लंड कैसे तेरे अन्दर फिट हो गया है...” 

रश्मि ने सर उठा कर देखा और बोली, “ओ भगवान! शुक्र है की पूरा अन्दर आ गया.. मेरे अन्दर की खाली जगह आखिरकार भर ही गई! उम्म्म.. मुझे डर लग रहा था की शायद न हो पाए! अब बस.. आप जोर से चोद डालिए मुझे... यह भी तो बहुत आतुर हो रहा है..."

मैंने रश्मि की दोनों टाँगे अपने कन्धों पर रख लिया।

“तैयार हो?” 

"हाँ... आप ऐसे मत सताइए! मेरे पूरे शरीर में आग सी लगी हुई है। बुरी तरह...”, रश्मि ने कहा।

"क्या सच में!” मैंने पूछा।

मेरे इतना कहने की देर थी कि रश्मि नीचे से खुद ही धक्के लगाने लगी। मैंने कुछ नहीं कहा, बस रश्मि को तेजी के साथ चोदना शुरु कर दिया। हम दोनों ही बहुत जोश में थे और तेजी से मंथन कर रहे थे। अति उत्तेजना के कारण सिर्फ पाँच मिनट में ही रश्मि चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई। रश्मि की योनि से कामरस निकलता हुआ देख कर मेरा जोश भी बढ़ गया और मैंने भी अपनी गति बढ़ा दी। मैं उसको तेजी से चोदने लगा। हाँ, यही शब्द ठीक है! जो हम कर रहे थे, वो विशुद्ध सम्भोग था, जिसका सिर्फ एक और एक ही उद्देश्य था – और वो था हमारे शरीरों की काम पिपासा को शांत करना। और इसका सटीक शब्द चुदाई ही था। आगे दो तीन मिनटों में मेरे लिंग ने भी वीर्य छोड़ दिया और रश्मि की योनि भरने लगी। पूरी तरह से स्खलित हो जाने के बाद मैंने अपना लिंग उसकी योनि से बाहर निकाला, और हट गया। रश्मि ने मुझको अपनी तरफ़ खींच लिया, और मेरा लिंग चाटने लगी। 

एक और नई बात! 

“आज तो मज़ा आ गया।” जब रश्मि ने अपना काम ख़तम किया तो मेरे मुँह से अनायास ही निकल गया।

“भैना, और मजा आएगा... आप ये जड़ी लिया करें!” 

हम दोनों ही चौंक कर आवाज़ की दिशा की तरफ देखने लगे। एक लड़का, किशोरावस्था में ही रहा होगा वह, अपने कंधे पर एक झोला लटकाए हमारी ही तरफ देख रहा था। जाहिर सी बात है, उसने यह बात भी हमको ही कही थी।

वो न जाने कब से हमारी रति-क्रिया देख रहा होगा, इसलिए मैंने तो अपनी नग्नता छुपाने की कोई कोशिश नहीं करी, लेकिन रश्मि अपने आप में ही सिमट सी गई।

“कौन है?” मैंने पूछा।

“जी मैं जड़ी-बूटी बेचने वाला हूँ... तरह तरह की जड़ी-बूटियाँ बेचता हूँ.. आप लोगों को देखा तो रुक गया।“

“अच्छा तो तू दूसरों को चुदाई करते हुए देखता है?”

“नहीं भैना! लेकिन आप लोग भी तो खुले में...” वो झिझकते हुए बोला।

“अच्छा अच्छा! ठीक है! क्या जड़ी बेच रहे हो?”

“है तो भैना यह कामवर्धक जड़ी.. अरे! पूरी बात सुन तो लीजिए!” 

संभवतः उसने मेरे चेहरे पर उत्पन्न होने वाले झुंझलाने वाले भाव देख लिए थे, 

“यह जड़ी शुद्ध शिलाजीत, इलाइची, अश्वगंधा और चन्दन से बनी है.. शुद्ध है! आप चाहें तो चख कर देख लें.. ऐसा स्वाद आपने कभी नहीं चखा होगा.. इसका नियमित इस्तेमाल करें.. दीदी खुश हो जाएँगी! ... और आप भी!”

“अभी खुश नहीं थीं?”

“थीं भैना.. खुश थीं... लेकिन और हो जाएँगी! आपका ब्वारू लम्बी देर तक कड़क रहेगा..”

“अच्छा..” अपनी मर्दाना ताकत पर ऐसी टिपण्णी होते सुन कर मुझे अच्छा नहीं लगा, “तू खाता है ये जड़ी?”

“भैना, महँगी जड़ी है.. उतना तो नहीं खा पाता!”

“उतना नहीं..? अरे! तुझे क्या ज़रुरत हुई इस जड़ी की?”

“भैना, मेरी भी घरवाली है! उसको भी खुश रखना होता है न!”

“तेरी शादी हो गई? अरे!”

“हाँ! एक साल हो गया भैना।“

“अरे तू खुद इतना छोटा लग रहा है.. तेरी ब्वारी की उम्र क्या है?”

“यही कोई पंद्रह की, भैना!”

“अरे! बच्ची से..!?”

“बरबरि है भैना वो.. बच्ची नहीं..” कहते हुए वो मुस्कुराया! “मुझे एक बार अपना ब्वारू देखने देंगे? .. मैं वैद्य भी हूँ...”

कह कर वो मेरे लिंग को पकड़ कर, खींच कर, दबा कर जांच करने लगा। न तो उसने मेरी सहमति की परवाह करी और न ही किसी हील हुज्जत की। जब वो अपनी जांच से संतुष्ट हो गया तो बोला, “बहुत गुंट अंग है भैना आपका... थोड़ा सा बांग है.. लेकिन उससे कोई दिक्कत नहीं होगी। आप चाहें तो उसके लिए एक अर्क दे सकता हूँ.. उससे मालिश कर के थोड़ा सा सीधा हो जायेगा.. वैसे उसकी कोई ख़ास जरूरत नहीं है.. आप बस यह जड़ी खाया करें। आप तो ज़रूर लीजिए.. अच्छा स्वास्थ्य है, असर अधिक आएगा..”

“अच्छी बात है.. अब अपनी दीदी की भी जांच कर के बता।“

“जी..” कह कर वो लड़का रश्मि की जांच करने लगा।
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12-17-2018, 02:26 AM,
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“अरे... ये... कक्या..” अचानक से हुए इस घटनाक्रम से रश्मि भी अचकचा गई। लेकिन मुझे इस बात पर आश्चर्य हुआ, और एक तरह से बढ़िया भी लगा कि रश्मि एक पल को तो हिचकी, लेकिन उसके बाद उसने कोई विरोध नहीं किया, और उस वैद्य/लड़के को अपनी जांच करने दी। लड़के ने रश्मि के भिन्न भिन्न स्थानों पर दबा कर न जाने किस बात का जायजा लिया, उसके सीने पर कान लगा कर कुछ देर धडकनों को सुना, पेट और कमर को दबा कर जाँचा, और अंत में कहा,

“दीदी भी आपकी ही तरह एकदम गुंट है, भैना। आपको बस थोड़ा पूरक की जरूरत है। मेरा मतलब ज़रुरत तो नहीं है, लेकिन अगर लेंगे तो अच्छा रहेगा। यह जड़ी न केवल वीर्य वर्द्धक है, बल्कि आरोग्य और लम्बी आयु के लिए भी ठीक है..“

“ह्म्म्म.. अच्छा.. अगर मैं इसको अभी खरीद लूं, तो बाद में क्या होगा? मतलब एक पुडिया से तो कुछ नहीं होने वाला न?”

“बाद के लिए या तो मैं आपको इसको बनाने की विधि बता दूंगा, या फिर आप मुझे कोई पता बता दीजिए, जिस पर मैं आपको डाक से भेज दूंगा..”

“अच्छी बात है..” कह कर मैंने उसको हमारे साथ होटल आने के लिए बोला। 

हमने अपने कपडे पहने, और साथ में होटल चल दिए, जहाँ पर मैंने उससे जड़ी ली, उसको पैसे दिए और सो गए।

'Heading Back home... with huge huge surprise. Love You!' 

सुमन अपने फ़ोन के स्क्रीन पर रूद्र के इस मैसेज को बार बार पढ़ रही थी. ऐसा नहीं है कि रूद्र सिलसिले में कभी बाहर नहीं गए - लेकिन ऐसा विचित्र व्यवहार उन्होंने पहले कभी नहीं किया। वो बिना किसी चूक के उससे हर दिन कम से कम बार बात अवश्य करते थे। लेकिन इस बार तो बात ही नहीं हो पाई। बस कभी कभी कोई sms भेज देते थे। और तो और, उसका भी फ़ोन एक बार भी नहीं उठाया! क्या हो गया? क्या सरप्राइज है! उसके मन में कई सारे सवाल थे, लेकिन उनके जवाब रूद्र ही दे सकते थे। तब तक तो इंतज़ार करना ही होगा। अच्छी बात यह थी कि वो बस कुछ ही देर में आने वाले थे। 

चार दिन हो चले थे - जैसे चार महीने बीत गए हों! उनके बिना तो मन लगता ही नहीं! इस बार बोलूँगी कि जब वो बाहर जाया करें, तो मुझे भी साथ ले जाया करें! उनका अनवरत साथ उसके लिए शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक - उसके तीनों ही प्रकार के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक था। 

अगले sms में फ्लाइट नंबर लिखा हुआ था। रूद्र हमेशा ही उसको अपनी फ्लाइट का नंबर लिख कर भेजते थे। एक दिन मज़ाक मज़ाक में उन्होंने कहा था कि अगर कभी मेरी फ्लाइट क्रैश हो जाय तो कम से कम तुमको मालूम तो रहे कि पूछ-ताछ कहाँ करनी है! उनकी इस बात पर सुमन खूब रोई थी; पूरा दिन खाना भी नहीं खा सकी। रूद्र की लाखों मनुहार के बाद ही उसके गले से खाने का एक निवाला उतर सका। 


उसने फिर से फ़ोन की स्क्रीन पर sms पढ़ा। रूद्र का सन्देश, मनो खुद ही रूद्र खड़े हों, और वो उन्हें देख रही हो। शादी सचमुच ही जीवन बदल देती है। रूद्र और सुमन की शादी वैसी नहीं थी, जैसी उसने कभी कल्पना करी थी। न जाने कैसे कैसे सपने संजोती हैं लड़कियाँ अपनी शादी को ले कर... लेकिन यहाँ तो.. सब कुछ एक तरफ़ा मामला ही था; रूद्र ने जैसे बस उसकी इच्छा रख भर ली। उन्होंने इस मामले में न कभी अपनी तरफ से कोई पहल करी और न ही कभी इस प्रकार की गर्मी ही दिखाई, जो अक्सर मंगेतर जोड़े दिखाते और महसूस करते हैं। संभव है कि उनके मन में किसी तरह का अपराध-बोध रहा हो। यह शंका उन्होंने सुहागरात में जाहिर भी कर दी थी। सुमन समझ सकती है - दीदी के जाने के बाद, उन्ही की छोटी बहन के साथ... पहले उसको भी यह अपराध-बोध था। कैसे अपने ही जीजा से प्रेम! सोचने वाली बात यह कि उनको वो पहले दाजू कह कर बुलाती थी...! दाजू और अब..! और ऊपर से पड़ोसियों की कुरेदती हुई निगाहें! फिर उसने निर्णय कर लिया कि बस, बहुत हुआ। यदि प्रेम करना गुनाह है, तो होता रहे। रूद्र को वो अवश्य ही अपने मन की बात कहेगी। आगे जो होना होगा, प्रभु की इच्छा!

उन दोनों के सम्बन्ध की ऊष्णता विवाह के बाद ही तो हुई। यह संभवतः उनके अंदर जगा हुआ एक अधिकार भाव और एक संलिप्त भाव था। दोनों ही बातें, जो विवाह के बंधन में बंध कर होती हैं। विवाह सचमुच एक मायावी सम्बन्ध है - और उसके परिणाम रहस्यमय! आर्थिक और सामाजित स्तर पर देखा जाय, तो उसके पिता की प्रतिष्ठा एक मामूली व्यक्ति की ही थी। मामूली रहन-सहन, मामूली समाज में उठना बैठना, और मामूली आशाएँ और उद्देश्य। पर ऐसे मामूली परिवेश में भी उसने जीवन का एक अहम् रहस्य सीखा था – और वह यह कि अपने जीवन से संतुष्ट रहे, और सुखी रहे। रूद्र में उसको जीवन के रहस्य को साकार करने का यन्त्र मिल गया था। और यह सब कुछ उनकी संपत्ति के कारण नहीं था – संपत्ति न भी होती, तो भी कुछ ख़ास प्रभाव नहीं होना था। प्रभाव था उनके स्नेह का, और उनके प्रेम का! वो संतुष्ट थी, सुखी थी। विवाह के बाद उसको अपने ही अन्दर छुपे हुए कितने ही सारे रहस्य पता चले थे! उन रहस्यों के उजागर होने पर उसको रोमांच भी होता, आश्चर्य भी होता, और लज्जा भी आती। लेकिन फिर भी मन नहीं भरता। रूद्र भी हर संभव तरीके से उसको सुखी रखते थे! ऐसे में कोई आश्चर्य नहीं, कि विवाह के उपरान्त उसके देह भी भरने लगी है! पुरुष के रसायनों का कैसा अद्भुद प्रभाव होता है!

वो लज्जा से मुस्कुरा दी। 

‘पुरुष के रसायन... हा हा’ सुमन मन ही मन हंस दी। 

ये भी तो अपने रसायन उसके अन्दर डालने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते हैं! यह बात तो है, दोनों चाहे कितने भी थके हुए हों, बिना सहवास किए रह नहीं पाते! सहवास करने के बाद की ऊर्जा और ताजगी! रूद्र के साथ की बात याद कर के सुमन के शरीर का पोर-पोर दुखने लगता है। उसका मन करता है कि जल्दी से रूद्र आ जाएँ, और उसे अपने आलिंगन में भींच लें; इतनी जोर से कि उसकी एक एक हड्डी चटक जाए।

हवाई-अड्डे से निकल कर मैंने और रश्मि ने टैक्सी करी और घर की ओर चल दिए। घर की तरफ जाते हुए – 

“सुमन है घर पर?” रश्मि ने पूछा।

मैंने सिर्फ सर हिला कर हामी भर दी.

“उसकी पढ़ाई लिखाई कैसी चल रही है?”

“अच्छी चल रही है..” अब मैं उसको क्या बताऊँ कि पढ़ाई लिखाई के साथ साथ और भी बहुत कुछ चल रहा है, और वो भी बहुत ही अच्छे से!

“उसको कैसा लगेगा!” यह प्रश्न जैसे रश्मि ने खुद से ही किया था।

“कैसा लगेगा? ये क्या बात हुई जानू! वो बहुत खुश हो जाएगी.. और कैसा लगेगा! मैं आपको बता नहीं सकता कि वो कितनी दुखी रही है!”

“हाँ.. आप सही कह रहे हैं! हम दोनों सिर्फ सगी बहनें ही नहीं है.. हमारा रिश्ता बहुत ही गहरा है..”

“इस बात में कोई शक नहीं..” 

‘रिश्ता तो गहरा ही है!’

“क्या हुआ जानू.. आप ऐसे सूखा सूखा क्यों बोल रहे हैं?”

“नहीं कुछ नहीं.. थक गया हूँ बस! और कुछ भी नहीं..” अब अपनी सफाई में और क्या ही बोल सकता था?

“ओह अच्छा! कोई बात नहीं.. घर चल कर आपको अच्छी सी चाय पिलाती हूँ, और फिर बढ़िया स्वादिष्ट खाना.. ओके?”

मैं सिर्फ मुस्कुराया! सच में! अगर घर जा कर सचमुच ऐसा ही हो, तो फिर समझो कि मेरी लाइफ सेट हो गई!
घर की तरफ बढ़ते हुए मेरे दिल की धडकनें बहुत तेज हो गईं, गला सूखने सा लगा और बहुत घबराहट हो गई. लगभग कांपती उँगलियों से मैंने कॉल-बेल का बटन दबाया।

कोई बीस सेकंड (जो की मुझे घंटे भर लम्बे लगे) के बाद दरवाज़ा खुला।

“आ गए आ... दीदी? दीदी..??? दीदी!!!! दीदी!!!! तुम जिंदा हो?!!!!!”

सुमन के समक्ष जो परिदृश्य था, वह उसकी समझ से परे था। किसी की भी समझ से परे हो सकता है; लेकिन इस बात के लिए सुमन तैयार ही नहीं थी।

“ओह भगवान्! तुम जिंदा हो! ओह! ओह भगवान्!” 

ऐसा कह कर सुमन रश्मि को कस कर अपने आलिंगन में भर लेती है। रश्मि भी खुश हो कर और भावविभोर हो कर सुमन को अपनी बाहों में भर कर उसका चुम्बन लेने लगती है।

“तुम जिंदा हो दीदी! तुम जिंदा हो।“ रश्मि के आलिंगन में बंधी हुई सुमन सुबकने लगी थी। उसकी आँखों से ख़ुशी के आंसू बन्हने लगे थे। “तुम जिंदा हो।“ 

“हाँ मेरी बच्ची! मैं जिंदा हूँ!” रश्मि भी रोए बिना नहीं रह सकी। “मैं जिंदा हूँ!”

इस समय दोनों ही बहने वर्तमान में नहीं थीं। वो दोनों ही उस भयावह अतीत को याद कर रही थीं, जिसको उन्होंने साथ में झेला था। वह अतीत जिसने उनके माँ बाप को लील लिया था। वह अतीत जिसने उन दोनों को अलग कर दिया था। और वह अतीत, जिसने अनजाने में ही दोनों के वर्तमान को भी बदल दिया था। उस भयंकर अतीत को याद कर दोनों ही फूट फूट कर रोने लगीं; एस समय उन दोनों के लिए ही इस बात से बढ़ कर कुछ नहीं था कि वो दोनों ही जीवित थीं, और एक बार फिर से एक दूसरे के साथ थीं। न जाने कितनी ही देर दोनों बहने एक दूसरे को अपनी बाहों में लिए खड़ी रहीं, और फिर आखिरकार दोनों ने अपना आलिंगन छोड़ा।

“बस कर मेरी बच्ची... बस कर! ... कैसी है तू?” रश्मि ने बड़े लाड से पूछा, और बड़े प्यार से सुमन के चेहरे को अपने दोनों हाथ में लिए निहारने लगी।

“अरे! तेरी शादी हो गई?” रश्मि ने सुमन की मांग का सिन्दूर देख लिया।

“वाआह्ह्ह! कब?” रश्मि ने लगभग चहकते हुए कहा। यह प्रश्न जैसे वज्र की तरह गिरा – सुमन पर भी, और मुझ पर भी। इस प्रश्न पर सुमन के पूरे शरीर को मानो लकवा मार गया। 

“आपने बताया क्यों नहीं?” रश्मि ने शिकायती लहजे में मुझ पर प्रश्न दागा।

“वो मैं.. मैं..” 

“हाँ हाँ ठीक है.. बहाने मत बनाइए। अब आ गई हूँ, तो सब कुछ डिटेल में सुन लूंगी! कहाँ हैं तेरे हस्बैंड?”

स्वतः प्रेरणा से सुमन ने इस प्रश्न पर मेरी तरफ देखा, और मैंने उसकी तरफ। मैंने ‘न’ में सर हिला कर एक दबा छुपा इशारा किया।

“व्व्वो वो दीदी.. तुम आओ तो सही। बैठो, फिर बताती हूँ सब।“

“हा हा.. ठीक है।“ कह कर हँसते हुए रश्मि अन्दर आ गई और सोफे पर बैठ गई। “कहाँ तो मैं सोच रही थी कि मैं तुझे सरप्राइज दूँगी, और कहाँ तूने मुझे ही इतना बढ़िया सरप्राइज दे दिया...!”

“म्म्ममैं चाय बनाती हूँ!” सुमन अपना बचाव करते हुए बोली।

“अरे नहीं! नीलू, तू बैठ। चाय मैं बनाऊँगी।“

कह कर रश्मि ने सुमन का हाथ पकड़ कर सोफे पर बैठाया, और खुद रसोई में चली गई।

रश्मि ने जाते ही सुमन भी उठ खड़ी हुई।

“कहाँ जा रही हो, सुमन?” मैंने पूछा। 

“'अपने' कमरे में...” उसने थोड़े से उदास और रुआँसे स्वर में कहा। उसकी आवाज़ में मुझे शिकायत की भी एक झलक सी महसूस हुई। 

“अपने कमरे में? अपने?” मुझे समझ आ गया कि सुमन दूसरे कमरे में जाने वाली है। “नीलू.. इधर आओ.. प्लीज!” कह कर मैंने उसको अपनी बाँहों में भर लिया।

सुमन उदास सी मेरे बाहों में आ गई। तो मैंने कहना जारी रखा।

“हमने शादी करी है.. वो भी विधिवत। तुम मेरी बीवी हो। ठीक रश्मि की ही तरह। इसलिए इस कमरे पर, इस घर पर, मुझ पर और मेरी हर चीज़ पर तुम्हारा उतना ही अधिकार है, जितना की रश्मि का है!” 

“आप समझ नहीं रहे हैं... बहन से सौतन तो बना जा सकता है, लेकिन सौतन से बहन नहीं। आपको मुझे पहले ही बता देना चाहिए था।“ सुमन ने बुझे हुए स्वर में कहा। “आपने सोचा भी है, कि सच्चाई जानने के बाद दीदी क्या सोचेगी? क्या करेगी?”
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12-17-2018, 02:26 AM,
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“नीलू, मैं कैसे बताऊँ कि क्या हुआ! मैं तुमको बताना चाहता था, लेकिन मैं खुद ही श्योर नहीं था। इसलिए पहले नहीं बता सका। अगर रश्मि न मिलती तो तुम्हारे मन पर क्या बीतती? मैं तो अभी यह भी बताने की हालत में नहीं हूँ की रश्मि को ढूँढने के लिए मैंने क्या क्या पापड़ बेल दिए। यह तो बस भोलेनाथ की ही कृपा है कि वो मुझे मिल सकी। ... और... और कहाँ तक रश्मि के सोचने का सवाल है.. तो रश्मि के सोचने का क्या? मैं उसको सब कुछ सच सच बताऊंगा। जो सच्चाई है, वो उसे स्वीकारना ही होगा। उसको... रश्मि को तुम्हें इसी रूप में, इसी रिश्ते में स्वीकारना ही होगा..।“

“क्या स्वीकारना होगा, जानू?” रश्मि के ‘जानू’ कहने पर सुमन और मैं दोनों ही चौंक कर उसकी तरफ देखने लगे। न जाने क्यों, मुझे पुनः अपराध बोध हो गया। 

“सब स्वीकार है.. फिलहाल आप दोनों यह चाय स्वीकार कीजिए। वहां मुरुक्कु रखे हुए थे, वो भी मैं ले आई। नीलू, आज डिनर के लिए क्या सोचा है?”

“वो दीदी..”

“रश्मि.. जानू..,” मैंने झिझकते हुए यह कहा, “अभी चाय पी लो, डिनर का देख लेंगे। ओके?”

हमने चुपचाप चाय पीनी शुरू करी। मुझे यह तो मालूम था कि सुमन और मेरी कहानी मुझे ही रश्मि को सुनानी पड़ेगी, लेकिन यह कितना कठिन होगा, यह मुझे नहीं मालूम था। 

“जानू,” मैंने दुनिया भर की हिम्मत इकठ्ठा कर के बोलना शुरू किया, “आपको एक बात बतानी है.. बहुत ज़रूरी..”

“हाँ, बोलिए न! मैं भी तो मरी जा रही हूँ सब कुछ सुनने के लिए! कितना कुछ है सुनने के लिए! तीन साल यूँ ही उड़ गए! मुझे तो कुछ याद भी नहीं। अब आप दोनों को ही तो बताना है सब कुछ।“ रश्मि ने मुस्कुराते हुए कहा। “.. और इसकी शादी के बारे में भी.. किस से शादी कर ली?”

“तो ठीक है.. सबसे पहले सुमन की शादी से ही शुरू करते हैं..”

हिम्मत बटोरी, लेकिन फिर भी ठिठक नहीं गई। ऐसी बातें सहजता से कैसे कही जा सकती हैं।

“जानू... सुमन से... शादी... मेरा मतलब हैं, सुमन से मैंने शादी कर ली..”

रश्मि को लगा जैसे उसके पैरों तले की ज़मीन ही निकल गई हो। ‘शादी कर ली है..! यह कैसे मुमकिन है?’ रश्मि की शकल देख कर साफ़ दिख रहा था कि उसको यकीन ही नहीं हुआ है। 

“शादी कर ली है..?”

मैंने हामी में सर हिलाया।

“सुमन से?”

मैंने फिर से सर हिलाया।

रश्मि ने अविश्वास के साथ सुमन की तरफ देखा। वो सर झुकाए, किसी मुजरिम की भांति बैठी हुई थी, और खामोशी के साथ आंसू टपका रही थी। आज सच में हम सभी का जीवन बदल गया था।

“क्या सच में? आप और सुमन?”

“हाँ जानू.. हम दोनों ने शादी कर ली.. लेकिन इस बात को पूरा समझने के लिए आपको सब कुछ बहुत पेशेंटली सुनना पड़ेगा..”

मुझे दिख रहा था कि मेरे इस खुलासे के बाद रश्मि बहुत ही व्यथित हो गई थी, लेकिन जितनी ही जल्दी यह सारी बात सामने आ जाय, उतना ही अच्छा था। 

मैंने रश्मि को सब कुछ बताना शुरू किया – शुरू से – जब मैं त्रासदी के बाद, उनकी तलाश में उत्तराँचल गया था। मैंने बताया की कैसे दर दर भटकने के बाद एक दिन अनायास ही सुमन मिली। उसकी कैसी बुरी हालत थी। एकाध दिन और न मिलती, तो कभी न मिलती। सुमन से ही मुझे बाकी जानकारी मिली कि कैसे मम्मी, पापा और रश्मि तीनो ही नहीं रहे। 

मैं सुमन को ले कर वापस आ तो गया, लेकिन जीने की सारी इच्छा अब समाप्त हो गई थी। यंत्रवत हो गया था। अब जीवन में न कोई उद्देश्य नहीं दिख रहा था, और न ही कोई औचित्य। आत्महत्या का भी ख़याल आया, लेकिन कायर की तरह मरने में क्या रखा था। इन सब के बीच में हर बात पर से ध्यान हटने लगा – न स्वास्थय पर नज़र, और न ही परिवार पर। सुमन घर पर थी, लेकिन फिर भी उससे न बराबर ही बात होती थी – उस पूरे समय तक मैं उसका पूरी तरह से प्रमाद करता रहा था। एक तरह से मन में यह ख़याल आता ही रहा कि रश्मि के स्थान पर वो क्यों न रही! सुमन का चेहरा मुझे उत्तराखंड की त्रासदी की ही याद दिलाती थी।

और फिर मेरा एक्सीडेंट हो गया। ऐसा एक्सीडेंट जिसने मुझे मृत्यु के मुहाने तक पहुंचा दिया। मैं बोल रहा था, लेकिन एक्सीडेंट की बात सुन कर रश्मि के दिलोदिमाग में एक झंझावात चलने लगा।

‘रूद्र का एक्सीडेंट! मेरे रूद्र का एक्सीडेंट!! हे भगवान्! यह क्या क्या हो गया मेरे पीछे!’

मैं बोल रहा था – मुझे नहीं मालूम की क्या क्या बीता नीलू पर, लेकिन जब अंततः मेरी चेतना वापस आई, तब मैंने उसको अपने बगल, अपने साथ पाया। डॉक्टर और नर्स सभी लोगों ने कहा की उन्होंने मेरे बचने की कोई उम्मीद ही बाकी नहीं रखी थी। लेकिन सुमन, जैसे सावित्री के समान ही मुझे यमराज के पाश से छुड़ा लाई। ये वही सुमन थी, जिसकी मैंने इतने समय तक उपेक्षा करी। ये वही सुमन थी, जिसको मैंने बात बात में दुत्कार दिया, ये वही सुमन थी जिसने मेरी हर कमी को मेरी हर उपेक्षा को नज़रंदाज़ कर के सिर्फ मेरा साथ दिया। सुमन ने जिस तरह से मुझे सहारा दिया, मेरी टूटी हुई ज़िन्दगी को वापस पटरी पर लाया, मेरे पास और कोई विकल्प ही नहीं था। मैं सच में तुम्हारा कोई विकल्प नहीं चाहता था – कभी भी नहीं। मेरा तो सब कुछ ही तुम्हारे साथ साथ ही चला गया था। मैंने तो एक अँधेरे में डूबता जा रहा था, और न जाने कब तक डूबता रहता, अगर सुमन ने आ कर मुझे सम्हाल न लिया होता। 

ये जो तुम मुझे इस हाल में देख रही हो, वो मेरा पुनर्जन्म है, और उसका सारा श्रेय सिर्फ सुमन को जाता है। तुम्हारे बाद यदि मेरा कोई विकल्प हो सकता था – एक नेचुरल विकल्प, तो वो सिर्फ और सिर्फ सुमन ही हो सकती थी। यह कहते कहते मुझे फरहत की याद हो आई.. वो भी एक विकल्प थी। लेकिन नेचुरल नहीं!

“सच में?” रश्मि मंत्रमुग्ध सी हो कर बोली। उसने सुमन की तरफ देखते हुए बहुत मद्धम आवाज़ में कहा, "मेरी प्यारी नीलू... तू कब से इतनी सयानी हो गई?"

इतना कह कर वो उठ खड़ी हुई और हमारे (?) शयन कक्ष की ओर जाने लगी।

“मैं कुछ देर आराम करना चाहती हूँ.. और शायद सोचना भी.. आप लोग मुझे कुछ देर डिस्टर्ब मत करिए.. प्लीज!” उसने बिना किसी की भी तरफ देखे कहा और अन्दर चली गई। बस इतनी गनीमत थी कि उसने अन्दर से दरवाज़ा बंद नहीं किया।

सोने का तो सवाल ही नहीं था। बिस्तर पर पड़े पड़े रश्मि कुछ परिचित की तलाश कर रही थी। उसका शयन कक्ष बिलकुल बदल गया था। हाँ, वो कमरा, वो अलमारी, ये बिस्तर आदि तो वही थे, लेकिन इस समय कितने अलग से लग रहे थे। अपरिचित। बिलकुल अपरिचित। उसको ऐसा लग रहा था, कि जैसे किसी और के कमरे में लेटी हुई हो! अलमारी खोल कर अन्दर देखने की हिम्मत ही नहीं हुई – पति ही अपना नहीं रहा तो किस हक़ से किसी और की अलमारी खोले? किस हक़ से? 

हाँ, किस हक़ से वो रूद्र और सुमन के बिस्तर पर लेटी हुई है? उसको समझ ही नहीं आ रहा था कि इस पूरे घटनाक्रम पर वो क्या प्रतिक्रिया दे! उसको लगा कि शायद उसको गुस्सा आएगा, लेकिन वो भी नहीं आ रहा था। रूद्र - उसका पति जिस पर उसे हमेशा ही गर्व रहा है। वह खुद को कितना सुहागिन मान कर इतराती रही है, गर्व से फूली हुई फिरती रही है। वह पति अब किसी और का है! 

किसी और का? किसी और का कैसे है? सुमन तो भी अपनी है। उसकी खुद की बच्ची! खुद की बच्ची – हुँह! इतनी ही बच्ची रहती तो उसके पति पर डोरे डालती? उसके पति को ले उडती? अचानक ही रश्मि को इतना गुसा आया कि उसका मन हुआ कि उस डायन को अभी के अभी अपने पति के सामने झाड़ू से पीट डाले! 

उसके मस्तिष्क में सुमन और रूद्र की छवि जाग गई – एक दूसरे से गुत्थम गुत्था! एक दूसरे से गुत्थम गुत्था और नग्न! पूर्ण नग्न! रूद्र सुमन के ऊपर चढ़े हुए! उसको उस छवि की कल्पना से उबकाई आ गई! शर्म नहीं आती... किसी और के साथ! फिर उसको एक दूसरा विचार आया। किसी और के साथ कहाँ? सुमन तो अब रूद्र की पत्नी है। उनकी विवाहिता! तो कल जो उसके साथ हुआ? कल रात क्या था? अब रश्मि तो उनकी विवाहिता नहीं रही! तो क्या था वह सब? रेप? ओह! नहीं नहीं! कल तो उसके खुद के आमंत्रण पर ही तो रूद्र ने उसको भोगा था! तो अब उसका और रूद्र का क्या रिश्ता है? और कैसे रश्मि उनकी विवाहिता नहीं है?

यह विचार आते ही रश्मि की कुछ व्यावहारिक बुद्धि जागी। 

रूद्र ‘उसका पति’ कैसे है! वो तो सभी के अनुसार मर चुकी थी। व्यावहारिकता के हिसाब से मर चुकी है, विधि के हिसाब से मर चुकी है.. मर चुकी है, मतलब रूद्र भी उसके वैवाहिक बंधन से मुक्त हो चुके थे। और फिर सुमन ने उनको तब सम्हाला जब वो नितांत अकेले थे। वो भी तो नहीं थी। जब उनका एक्सीडेंट हुआ, तो वो कहाँ थी? उनको किसके भरोसे छोड़ गई थी? ऐसे में सुमन ने ही तो सम्हाला! उससे ज्यादा किया। कहीं ज्यादा! पता नहीं अगर वो खुद वहां होती, तो क्या कर पाती! डाक्टरों ने सुमन को सावित्री का रूप बताया – सावित्री का! सती सावित्री! सती – वो स्त्री, जो पूरी तरह पवित्र हो। सुमन पवित्र है। पूरी तरह। गन्दगी खुद उसके अपने दिमाग में है, जो ऐसी फूल जैसी, ऐसी गुड़िया जैसी बच्ची को तकलीफ देने की सोची भी। दोनों ही रीति रिवाजों के बंधनों में बंधे हुए पति-पत्नी हैं। उनके बारे में वो ऐसा बुरा सोच भी कैसे सकती है? 

पल भर में ही उसका सारा क्रोध शांत हो गया। कितना कष्ट हुआ होगा उन दोनों को ही, जब खुद उसने उन दोनों का साथ छोड़ दिया। रूद्र पूरी तरह से उसके लिए ही सपर्पित थे; सुमन उनके लिए समर्पित है; और रूद्र भी सुमन के प्रति समर्पित हैं। उनका विवाह झूठा तो नहीं है। भले ही भाग्य ने दोनों को इतने दुःख दिए, लेकिन एक दूसरे के संग से दोनों सुखी हैं! मन का बंधन क्या टूटता है कभी? 

किस तरह से, किस मुश्किल से दोनों ने एक दूसरे से शादी करने का निर्णय लिया होगा। कितना कठिन रहा होगा उन दोनों के लिए ही। आज वो जो अचानक ही उनके हँसते खेलते जीवन में आ गई, तो ये दोनों अब कैसे खुश रहेंगे? उसके रहने से कितनी पीड़ा होगी मन में उनके? 

वो प्यारी सी बच्ची! कैसे उसने उसके ही सुहाग की रक्षा करी थी! और एक वह है कि उसको ही अभियुक्त बना कर अपने कुंठित न्यायलय के कठघरे में खड़ा करने चली थी! छि:! कितना ओछापन! 

संयोग से ही सही, सुमन को रूद्र मिल गया। भले ही पहले रूद्र उसका पति था, लेकिन अब वह उस का नहीं, सुमन का पति है। सच तो यह है कि सुमन ने उसके इस छोटे से परिवार की रक्षा की, उसको सजाया, और सँवारा। और वह उस पर ही आक्रोश में भर कर इस सजे सजाए गृहस्थी में आग लगाने जा रही थी! कितना छोटा मन है उस का! 

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