Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना
12-19-2018, 01:36 AM,
#1
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ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगाना


फ्रेंड्स आपके लिए एक कहानी और शुरू करने जा रहा हूँ आशा करता हूँ आप पहले की तरह मेरा पूरा साथ देंगे 

ये कहानी है एक ऐसे व्यक्ति की जो बिना किसी की इच्च्छा के, बिना किसी उद्देश्य के, उसके माता-पिता के मध्यम से इस धरती पर लाया गया, या यूँ कहें कि भगवान ने उसे ज़बरदस्ती नीचे धकेल दिया धरती पर कि जा वे चूतिया प्राणी, तू यहाँ हमारे किसी काम का नही है, इसलिए नीचे जाके ऐसी-तैसी करा.

एनीवेस ! जब वो नीचे फैंक ही दिया तो देखते हैं कि यहाँ पृथ्विलोक में आकर क्या कर पाता है, या यौंही जीवल व्यर्थ जाएगा इसका.


शर्मा परिवार का परिचय….

1) सबसे बड़े भाई…. राम किशन: इनके चार बेटे और एक सबसे बड़ी बेटी थी, पत्नी का देहांत सबसे छोटे बेटे के जन्म से कुच्छ सालों बाद ही हो गया था. धृतराष्ट्र किस्म के पिता अपने बेटों का हमेशा आँख बंद करके पच्छ लेते थे जिसकी वजह से बिन माँ के बच्चे बिगड़ गये और मनमानी करने लगे, नतीजा परिवार में कलह होने लगी.

सबसे बड़ी बेटी जो इस पूरे परिवार में सभी भाई बहनों में सबसे बड़ी थी, जिसकी उम्र शायद अपने सबसे छोटे चाचा के बराबर रही होगी, अपने ससुराल में चैन से रह रही है.

बड़ा बेटा भूरे लाल, डबल एमए पास, गाओं से कुच्छ 25-30किमी दूर एक कॉलेज में पढ़ाता है. शादी-शुदा है, इसके भी चार बेटे हैं.

दूसरा बेटा जिमी पाल प्राइमरी टीचर था, लेकिन शादी के कुच्छ समय बाद ही उसी के साथियों ने उसकी हत्या कर दी थी, कारण बताने लायक नही है. अब उसकी बेवा है बस, कोई बच्चा नही हो पाया था.

तीसरा बेटा चेत राम, ये भी प्राइमरी टीचर है, बहुत ही कंजूस किस्म का इंसान, इसकी भी शादी हो चुकी है और चार बच्चे- 2 बेटे, और 2 बेटियाँ हैं.

चौथा बेटा अजय पाल - पोलीस में है, ये अपने दोनो भाइयों से एक दम भिन्न है इसकी भी शादी हो गयी है और 2 बेटे और 1 बेटी है. शहर में शिफ्ट हो चुका है.
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और भी पात्र आएँगे उनका परिचय समय समय पर देता रहूँगा
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12-19-2018, 01:37 AM,
#2
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
तुम्हारा जीवन एक पेंडुलम की तरह है, जो गतिमान तो रहता है, किंतु किसी मंज़िल पर नही पहुँच पाता. ये शब्द थे अरुण शर्मा के दूसरे नंबर के भाई प्रोफेसर ब.एल. शर्मा के, जो की भारत की सर्वश्रेष्ठ अग्रिकल्चर यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर थे. 24 वर्सिय अरुण जो इन चारों भाइयों और दो बहनों में सबसे छोटा है अभी-अभी बाहर से घूम फिरके गांजे की चिलम की चुस्की लगाके अपने आवारा नसेडी दोस्तों के साथ मटरगस्ति करके घर लौटा, इस घर में अरुण को सिर्फ़ उसकी माँ एकमात्र प्यार करनेवाली है .

माँ तुझे सलाम, तेरे बच्चे तुझको प्यारे रावण हो या राम….

तो बस इस घर में उसकी वृद्ध माँ जो तकरीबन 65-70 साल की शरीर से कमजोर जोड़ों के दर्द से पीड़ित रहतीं हैं और बहू बेटों के रहमो करम पे जी रही थी. पिता 3-4 साल पहले ही परमात्मा को प्यारे हो चुके थे.

मौके पे चौका मारते हुए, दूसरे भ्राता श्री श्याम बिहारी शर्मा, जो अरुण से 3-4 साल बड़े हैं और दो साल पहले ही उनकी शादी हुई थी, वो घर पर ही रहकर खेती-वाडी संभालते हैं जो कि उन्हें ये ज़िम्मेदारी पिता की मौत के बाद सभी भाइयों ने तय करके सौपी थी कि जब तक इनके बच्चे सेल्फ़-डिपेंड नही हो जाते खेती की पैदावार से एक पैसा भी कोई डिमॅंड नही करेगा, वैसे वो भी अग्रिकल्चर से ग्रॅजुयेट थे.

वो तो और ही बड़ा सा बाउन्सर मार देते हैं अरुण के उपर. “अरे ये अपने जीवन में कुच्छ नही कर सकता, बस देखना किसी दिन भीख माँगेगा सड़कों पे और हमारे बाप की इज़्ज़त को मिट्टी में मिला देगा.

ये तो साला कुच्छ ज़्यादा ही हो गया…. अरुण का दिमाग़ गांजे के नशे में भिन्ना गया, साला अच्छा-ख़ासा मूड बनाके आया था, आज उसे लगा कि दिन बड़ा अच्छा है क्योंकि जैसे अपने मित्र-मंडली के पास से चिलम में कस लगाके खातों की तरफ से चला ही था कि उसकी छम्मक छल्लो (उसका डीटेल आगे दूँगा) रास्ते में सरसों के खेत के पास ही मिल गयी, और वहीं उसने सरसों के खेत में डालके उसको आधा-पोना घंटे अच्छी तरह से अपने लंड से मालिश कराई थी, मस्ती-मस्ती में घर आया था यहाँ भाई लोगों ने घुसते ही लपक लिया.

5’ 10” लंबा खेतों में जमके पसीना बहा कर, जग भर दूध और घी खा-खा के अरुण एक बहुत ही अच्छे शरीर का मालिक था और केवल सबसे बड़े भाई (दादा) को छोड़ कर सबसे लंबा तगड़ा गबरू जवान, निडर था, हक़ीकत ये थी कि श्याम जी उसकी मेहनत का ही खाते थे और रौब गाँठते थे अपने बड़े होने का.

अरुण की आँखें नशे और ज़िल्लत भरी बातें सुनके गुस्से की वजह से जलने सी लगी, आख़िर थे तो भाई ही ना, कोई बाप तो थे नही, और ना ही उनमें से किसी ने उसके उपर कोई एहसान ही किया था, उल्टा उसकी मेहनत और उसकी दिलेरी की वजह से ही श्याम जी अपने पिता की इज़्ज़त और रुतवे को बरकरार रखे हुए थे समाज में, सुर्ख आँखें जैसे उनमें खून उतर आया हो.. बड़े ही सर्द लहजे में अरुण ने गुर्राते हुए कहा….

मिस्टर. प्रोफेसर…. क्या कहा था आपने..? पेंडुलम… हाँ… में पेंडुलम की तरह हूँ..?? हैं… चलो मान लिया, फिर ये तो पता ही होगा आपको कि पेंडुलम होता क्या है, और पेंडुलम का काम क्या होता है..? पता है ना… जबाब दो..

प्रोफ. – ये तुम अपने बड़े भाई से किस तरह बात कर रहे हो? नशे में तमीज़ ही भूल गये…

अरुण: जो मेने पूछा है पहले उसका जबाब दीजिए दादा… फिर में सम्मान पे आउन्गा.

प्रोफ.: पेंडुलम घड़ी का नीचे वाला घंटा होता है, जो इधर से उधर मूव्मेंट करता रहता है…

अरुण : फिर तो आपको ये भी ग्यात होगा, कि अगर वो घड़ी का घंटा अपना मूव्मेंट बंद कर्दे तो क्या होता है…

प्रोफ: घड़ी बंद पड़ जाएगी और क्या होगा..

अरुण : हूंम्म… तो इसका मतलव बिना पेंडुलम के घड़ी तो बेकार ही हुई ना…

प्रोफ : तुम कहना क्या चाहते हो…?

अरुण : गुस्से में फुफ्कार्ते हुए…. भाई साब्बबब… ये वो ही पेंडुलम है, जिसकी वजह से आज आप घड़ी बने फिरते हो, 
आप 10थ पास करते ही शहर में जाके पढ़ाई करने चले गये थे और बड़े दादा नौकरी में मस्त थे, उस टाइम हमारी क्या उम्र थी?? गान्ड धोना भी ढंग से नही आता था हमे, वृद्ध पिताजी, चचेरे भाइयों के बराबर काम नही कर सकते थे वैसे भी वो 3 लोग थे, 

तब हम दोनों छोटे भाइयों ने घर के कामों में उनका हाथ बँटाना शुरू किया और धीरे-2 अपनी क्षमता से ज़्यादा काम करके घर को संभालने में यथा संभव मदद की. 

अगर उस टाइम ये पेंडुलम नही चल रहे होते, तो चाचा कबके अलग हो जाते और हमें भूखों मरने पर विवश होना पड़ता, आपकी पढ़ाई की तो बात ही छोड़ दो.

अब आप पीएचडी करके प्रोफेसर बन गये, और हमे ही ज्ञान देने लगे. हमारी उस मेहनत में सम्मान नही दिखा आपको ??

इतनी बात सुनके श्याम भाई भी का भी सीना चौड़ा हो गया….

अरुण आपनी बात को आगे बढ़ाते हुए….
और रही बात मेरी आवारा गार्दी की तो में यहाँ घर पे रहके, खेतों में काम करके भी इंटर्मीडियेट तक साइन्स/ मथ से पास हुआ जबकि आप दोनों अग्रिकल्चर से, जो कि लोलीपोप टाइप सब्जेक्ट होते है मेरे सब्जेक्ट्स के कंपॅरिज़न में, सिर्फ़ 4 साल बाहर रहके मेकॅनिकल से इंजिनियरिंग करने गया, अब बताइए कॉन ज़्यादा लायक था और कॉन नालयक घर के लिए…??

प्रोफ: वोही तो हम तुम्हें समझाना चाहते हैं, कि क्यों दो-दो बार नौकरी छोड़ के घर भाग आया और यहाँ फालतू के लोगों के साथ आवारगार्दी में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहा है….

में तो कहता हूँ, कि वो हल्द्वणी वाला फॅक्टरी मालिक शाह अब भी तुझे नौकरी देने को तैयार है, और वो बरेली वाली लड़की की चचेरी बेहन से शादी करके तुम भी अपना घर बसा लो और चारों भाई एक जैसे हो जाओ.

अरुण : आपको पता है, वो नौकरी मेने क्यों छोड़ी, मुझे शादी के बंधन में नही बंधना है, शादी ही क्या किसी भी बंधन में नही रह सकता में, और सभी कान खोल के सुनलो, अगर किसी ने भी मुझे बाँधने की कोशिश की तो गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाउन्गा, किसी को पता भी नही चलेगा.

प्रोफ : भाड़ में जा, हमारा काम था समझाने का, नही समझता तो तुझे जो दिखे सो कर्र्र्र्र.. और जुंझलाकर वो घर से बाहर चले गये..

प्रोफेसर साब के जाते ही श्याम भाई बोले…
तुझे उनसे इस तरह से बात नही करनी चाहिए थी…

अरुण : क्यों ?? सच्चाई बताने में कोन्सि बेइज़्ज़ती होगयि..?? और क्या ये बातें आपको अच्छी नही लगी…??

स. भाई: फिर भी वो हमारे बड़े भाई हैं…

अरुण: तो क्या छोटों की कोई इज़्ज़त या सेल्फ़-रेस्पेक्ट नही होती..? क्या उन्होने इसका ख्याल रखा?? 

और क्या कहा था आपने भी…. में भीख मांगूगा, बाप की इज़्ज़त मिट्टी में मिला दूँगा…

स भाई : तो क्या ग़लत कहा मेने, तू काम ही ऐसे कर रहा है, तुझे पता है, लोग कैसी कैसी बातें करते हैं तेरे बारे में..??

अरुण : कैसी बातें करते हैं ??

स भाई: देखो पंडितजी (पिताजी का पेट नेम सिन्स व्हेन ही वाज़ टीचर) के तीनो बेटे कितने सज्जन और होनहार हैं और ये छोटा बेटा भांगड़ी, गंजड़ी है.. 

अरुण : अच्छा…. भूल गये, अपनी शादी के टाइम की बातें, यही तीनों सज्जन बेटे, घर की ज्वेल्लरि के बँटवारे को लेकर कैसे झगड़ रहे थे रिस्तेदारो के सामने.. और दोनो बड़े लायक बेटे सब चीज़े हड़प गये.. तब बहुत सम्मानजनक बातें की होंगी लोगों ने.. हैं ना..

और रही बात नशे की तो क्या लोग बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू नही खाते, वो ग़लत आदतें नही हैं…?

स भाई: कुच्छ भी हो अगर तुझे यहाँ गाओं में रहना है तो मेरी बातें माननी ही पड़ेगी… 

अरुण: मतलव इनडाइरेक्ट्ली मेरा अब इस घर पर कोई हक़ नही है… क्यों..? ठीक है.. जैसी आप लोगों की मर्ज़ी……..

और इतना बोलके अरुण वहाँ से चले जाता है और सीधा आपने खेतों पे पहुँचता है, जहाँ ट्यूब वेल चल रहा था और उसके एक खेत पड़ोसी के खेतो में पानी जा रहा था पेड…घंटे के हिसाब से, 
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12-19-2018, 01:37 AM,
#3
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
जिसके खेतों में पानी जा रहा था वो भी अरुण का एक लन्गोटिया यार, जिसका नाम नीरज था, जैसे ही अरुण वहाँ पहुँचता है, उसके चचेरे भाई जो वहाँ पहले से मौजूद थे वो बोले, कि चलो तू अच्छा आ गया, मुझे कहीं काम से जाना था तो तू यहाँ रुक, में चलता हूँ और 3-4 घंटे में आता हूँ.

यहाँ अभी ये इतना क्लियर कर देना बेहतर होगा कि अरुण और उसके चचेरे भाईओं की खेती शामिल ही होती थी, उनकी ज़मीन 3 जगहों पर थी और जिसमें दो जगह ट्यूब वेल थे और एक जगह बिल्कुल गाओं के पास वाली ज़मीन कम थी इस लिए वहाँ दूसरे के साधन से सिचाई होती थी.

बॅक ऑन टॉपिक: चचेरे भाई के जाने के बाद अरुण का दोस्त नीरज जो अपने खातों में पानी दे रहा था उसके ट्यूब वेल से उसकी बेहन –

एज ~18 साल, रंग एकदम गोरा इसलिए उसका नाम भूरी था, काली-काली हिरनी जैसी प्यारी आँखें लगता था जैसे अभी कुच्छ कहेंगी, पतले सुर्ख रसीले होंठ, सुतवा नाक, गोल गोल गाल, राउंड फेस, सीने पे दो कश्मीरी सेब के आकर के चूचे एकदम कड़क उठे हुए, सपाट पेट, पतली 22 की कमर, गोल-गोल लेकिन ज़्यादा उठी हुई नही यही कोई 28-30 की गान्ड कुल मिलाकर गाओं की नॅचुरल ब्यूटी क्वीन, जिसने कभी पाउडर भी यूज़ नही किया होगा, किया कहाँ से होगा बेचारी के पास था ही नही..

अपने भाई के लिए खाना लेके आती है और सीधी अपने खातों में भाई के पास जाके उसको खाना ख़िलाकर लौटती है, तभी उसका भाई नीरज उसको बोलता है…

नीरज : भूरी, घर जा रही है…

भूरी: हां भैया…

नीरज: एक काम कर, पानी की नाली को चेक करते हुए ट्यूब वेल तक जाना, ये देखते हुए कि पानी कहीं से निकल तो नही रहा… 

भूरी- ठीक है भैया और वहीं से सीधी घर चली जाउन्गि… 

वैसे यहाँ बता दूँ… कि जहाँ तक अरुण के खेतों की हद थी वहाँ तक की नाली लगभग सिमेंटेड ही थी, फिर भी कभी कभी दूसरे बंद रास्ते ना खुल जाए इतना तो चेक करना ही पड़ता था समय-समय पर.

नीरज के खेत जहाँ पानी जा रहा था वो लगभग 250-300 मीटर दूर थे और ट्यूबिवेल का जो रूम था जिसमें मोटर ऑर पंप थे उसके पीछे की साइड उसके खेत थे, माने कि अगर कोई रूम के गेट की तरफ है तो उसके खातों से नही दिखेगा,

अरुण टेब्वेल्ल के कमरे में एक चारपाई (कॉट) पे लेटा हुआ आँखें बंद किए अपनी ही सोच में गुम था जो बातें कुच्छ देर पहले भाईओं के बीच हुई थी उनको लेकर..

इधर जैसे ही भूरी दरवाजे पे पहुँची, और उसकी नज़र अरुण पे पड़ी, तो उसकी बाछे खिल उठी, 
अरुण का सर दरवाजे की तरफ था और अपने विचारों से जुझरहा था उसने भूरी के आने की आहट तक भी नही सुनी,

अचानक जब उसकी आँखों पर किसी ने हाथ रख के बंद किया तो वो चोंक गया, लेकिन जैसे ही महसूस हुआ कि ये तो किसी लड़की के हाथ हैं तो मन ही मन गुदगुदा उठा….

अरुण ने भूरी के मुलायम हाथों के उपर जैसे ही अपने हाथ रखे, उसे महसूस हुआ कि ये तो मेरी कोई दिलरुबा ही है, 

जैसे ही उसने भूरी के हाथ पकड़ के उसे घूमके सामने करने की कोशिश की, खिलखिलाती हुई भूरी भरभरा के उसके सीने से चिपक गई…

भूरी ने अधलेटे हुए अरुण के कंधे पर अपना सर रख दिया और उसके गले में अपनी पतली-2 कोमल बाहों का हार पहना दिया, जिससे उसके सख़्त और गोल-2 इलाहाबादी अमरूद जैसे उरोज अरुण की मेहनतकश चौड़ी छाती में दबने लगे…

स्वतः ही अरुण के दोनों हाथ भूरी के कड़क और गोल-मटोल चुतड़ों पे कस गये और उसने उन्हें एक बार ज़ोर्से मसल दिया….

ससिईईईईईईईईईईईय्ाआहह…. भैय्ाआआ…. क्या करते हो….. धीरे…

क्यों साली… इतनी ज़ोर से मेरे उपर क्यों कूदी तू…. ?? अरुण उसके चुतड़ों को मसल्ते हुए बोला…

पता नही.… आपको देखते ही मुझसे क्या हो जाता है, रहा ही नही जाता…, मेरा पूरा शरीर आपके नज़दीक आते ही काँपने सा लगता है.. कहते ही वो उसका पाजामा के उपर से ही लंड पकड़ लेती है और उसे ज़ोर-ज़ोर से मसल्ने लगती है, जिससे अरुण का 7.5” लंड जो भूरी के हाथ की मुट्ठी में भी नही समाता, एकदम खड़ा डंडे की तरह कडक हो जाता है…

भूरी उसके लंड को पकड़ के सलवार के उपर से ही अपनी चूत के उपर रगड़ने लगती है और सीसीयाने लगती है…. सीईईईयाहह.. उउंम्म….भूरी की चूत लंड की रगड़ से पनियाने लगती है…

हालाँकि भूरी के मादक शरीर के स्पर्श से ही अरुण का लंड फुफ्कारने तो लगा था फिर भी उसका मन चुदाई करने के लिए नही था इस समय, क्योंकि अभी-भी उसके अंतर्मन में द्वंद चल रहा था सुबह के बार्तालाप को लेकर, इसलिए वो बोला…

भूरी छोड़ ना…. ये क्या कर रही है, पता नही., तेरा भाई खातों में पानी लगा रहा है, और यहाँ कभी भी आ सकता है….. छोड़…मुझे.. अब..

उन्नहुऊऊ.. बस एक बार करदो ना… 15 मिनट की ही तो बात है, वो अभी नही आएँगे… में अभी तो नाली चेक करके आरहि हूँ… वैसे भी उन्हें ये पता नही कि आप यहाँ हो… वो तो समझ रहे है कि ट्यूबिवेल पर स्वामी दादा ही हैं…ये कहते हुए भूरी उसका पाजामा नीचे सरकाने लगी..

चल ठीक है फिर, गेट तो बंद कर्दे, और अपने कपड़े उतार के आजा… आज तुझे जन्नत की सैर कराता हूँ.. 

भूरी उठके गेट लॉक करती है और अपनी कमीज़ और सलवार उतार के सिरहाने रख देती है, अब वो मात्र एक छोटी सी पैंटी में थी जो उसके गान्ड पे चिपकी हुई सी थी..

इधर अरुण ने भी अपने कपड़े उतार दिए थे…और खड़े होकर भूरी के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लेकर उसके होठों पर अपने होठ रख दिए… एक छोटा सा किस किया… 

भूरी उसकी आँखों में आँखे डालके उसका लंड पकड़के मरोड़ देती है जिससे अरुण के मूह से एक आअहह सी निकल जाती है… और वो झपट के उसके होठों को फिरसे अपने मूह में भर लेता है और ज़ोर ज़ोर से उनका रस निकालने की कोशिश सी करता है…भूरी भी अपने होंठो को खोल देती है और अपनी जीभ को उसके मूह में पेवस्त कर देती है…

दोनों की ज़ुबाने एक दूसरे से कुस्ति करने लगती हैं… लगभग 4-5 मिनट के बाद अरुण उसके मूह को छोड़ भूरी के चुचकों को जकड लेता है और कड़क हाथों से उन्हें मसल देता है….

सस्सिईईईईईयाअहह…. भूरी की सिसकारी छ्छूट जाती है… 

चल अब इसे चूस…. साली… अरुण उसे दबा कर नीचे धकेलते हुए बोलता है, 

भूरी अपने पंजों के बल बैठ कर अरुण के जंग बहादुर को हाथों से मसल मसल कर उसे मुठियाने लगती है…. उसके रानीखेत के सेब जैसे सुपाडे के चीरे पर एक बूँद जैसी लगी थी जिसे भूरी बड़े अंदाज़ से अरुण की आँखों में देखती हुई अपनी जीभ के सिरे से चाट लेती है और चटकारे लेकर बोलती है, 

आआआअहह कितना मीठा है ये…..

चल अब ढंग से इसे मूह में लेके चूस पूरा…. कहते हुए अरुण उसकी चुचियों को दोनो हाथो में लेकेर मसलने लगता है..

इधर भूरी पूरी तन्मयता से अरुण के लंड को चूसने लगी…. मारे मज़े के ना चाहते हुए भी अरुण के मूह एक लंबब्बीईईईईईई सी आहह निकलती है…

ससुउुुुुुुउउ आआहह…….. भूरिया सालीइीईई, क्या मज़ा देती है तुउउउ... सच में तू लज़्बाब है… और उसके कंधों को पकड़ के उससे खड़ा करता है और फिर से उसके रसीले होठों पे टूट पड़ता है… कुच्छ देर होंठ चुसाई के बाद अरुण उसके अमरूदों का स्वाद लेने की गर्ज से उसकी गोल-गोल अमरूद के साइज़ की चुचि को मूह में पूरा भर के खिचता है और दूसरी को एक हाथ से भीचने लगता है, उसकी चुचियों की घुंडिया एकदम चिड़िया की चोंच की तरह खड़ी हो गयी थी..जिन्हें वो बड़ी बेदर्दी से अपने हाथों के अंगूठे और उंगली के बीच पकड़ कर मरोड़ देता है….

आआहह…..मुंम्म्ममिईीईईईईई…..सस्स्सिईईहहिि… ओह्ह्ह्ह… भैय्ाआ….मरररर जाउन्गी…. कुकचह करूऊ नाआआआअ प्लस्सस्स्स्सस्स….

तब अरुण उसकी चुचियों को अच्छे से सर्विस देने के बाद वो उसी चारपाई के उपर धकेल देता है और खुद उसके दोनो टाँगों के बीच आकर उसकी गान्ड से चिपकी हुई पैंटी को कमर के दोनो साइड उंगली फँसाकर निकाल देता है…. भूरी की हल्के बालों वाली “पिंकी” जो कब्से आँसू बहाए जारही थी बेचारी,, नुमाया हो जाती है, जिसे अरुण नज़र भर देखता है…. फिर अपने हाथ का जेंटल टच उसपे करता है….. भूरी मारे मज़े के आपनी टांगे भींचने की कोशिश करती है, जो अरुण के वहाँ बैठे होने की वजह से संभव नही हो पाता…

अरुण ने भूरी की टाँगों के बेंड को अपने कंधों पे सेट किया और धीरे से अपनी जीभ की नोक को उसकी पिंकी के होठों के चारों तरफ फिराया……. भूरी को लगा मानो वो आसमानों में उड़ रही है… मज़े की वजह से उसकी आँखे बंद हो जाती हैं और मूह से मीठी-मीठी सिसकारियाँ फूटने लगती है…

कुच्छ समय ऐसे ही अपनी जीभ का जेंटल टच उसकी चूत के होंठों पर देने के बाद अरुण अपनी जीभ को उसकेछेद में नीचे से भिड़ा देता है और फिर उसे मूह में भरके ज़ोर्से खींचने लगता है, साथ ही साथ अपनी मध्यमा उंगली को उसकी चूत के सुराख में ठेल कर अंदर बाहर करता है…. नतीज़ा सब जानते है…..
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12-19-2018, 01:37 AM,
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RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
कुच्छ समय ऐसे ही अपनी जीभ का जेंटल टच उसकी चूत के होंठों पर देने के बाद अरुण अपनी जीभ को उसकेछेद में नीचे से भिड़ा देता है और फिर उसे मूह में भरके ज़ोर्से खींचने लगता है, साथ ही साथ अपनी मध्यमा उंगली को उसकी चूत के सुराख में ठेल कर अंदर बाहर करता है…. नतीज़ा सब जानते है…..

भूरी की कमर आपने आप उपर को उठने लगती है और वो बिल्कुल धनुष की भाँति बेंड होकर एक लंबी सी चीख मारती हुई अपनी चूत का कुलाबा खोल देती है…. भरभराकर चूत रस निकल ने लगता है, जिसे अरुण पूरे कॉन्सेंट्रेशन के साथ पी जाता है… जैसे ही उसका ओरगैस्म पूरा होता है, उसकी कमर धीरे-धीरे चारपाई पे लॅंड कर्देति है और हाफने लगती है, जैसे की मीलों की यात्रा दौड़ लगा के की हो

जैसे ही अरुण अपना मूह उपर उठाके भूरी की तरफ देखता है, उसके मूह से हँसी फुट पड़ती है……..

आई.. भूरिया हंस क्यों रही है….? 

अरे भैया.. देखो ना आपका मूह तो ऐसा हो रहा है जैसे कोई छोटा बच्चा सिरेलॉक ख़ाके चुका हो…. ..

अच्छा …. तो ले इसे अपने जीभ से सॉफ कर…. 

भूरी उसके मूह पर टूट पड़ती है, और अपने ही चूतरस को जीभ से चाट-चाट कर स्वाद ले-लेकर सॉफ कर देती है… एक बार फिरसे उनके लब-लॉक हो जाते हैं…

भैय्ाआ…… हाँ…… अब असली वाला मज़ा दो ना…. भूरी उसके कान के पास अपना मूह रखके बहुत ही धीमी और नशीली आवाज़ में कहती है… मानो अपने किसी ईष्ट से कोई वरदान माँग रही हो…

अरुण भी तथास्तु कह कर उसकी टाँगो के बीच एक बार फिर सेट होता है और उसकी गान्ड के नीचे एक तकिया सेट करके उसकी चूत को उपर उठा लेता है….उसके बाद वो अपने जंग बहादुर को उसकी गीली पिंकी के मूह पर घिसने लगता है… जैसे कोई कसाई बकरे को हलाल करने से पहले अपने छुरे को धार दे रहा हो…

आअहह….. भैयाअ…… अब सबर नही होता….. जल्दी डालो ना इसे अंदर…. मेरी चूत में चींतियाँ सी काट रही हैं… जल्दी कुच्छ करो प्लस्सस्स… 

सालिी इतनी गरमा रही है तेरी चूत…. अरुण मज़े लेते हुए बोला…

अबीए भोसड़िइई के डालनाअ…. और भूरी ने अपनी कमर को जैसे ही उपर को झटके से लंड लेने के लिए किया उसी टाइम अरुण ने भी अपना मूसल उसकी चूत में खूँटे की तरह ठोक दिया… नतीज़ा … एक ही झटके में साडे-साती मोटा तगड़ा पूरा का पूरा लंड भूरी की चूत के अंदर जड़ तक घुस गया……. वो तो अच्छा था कि चूत गीली थी…. बावजूद इसके… भूरी की इतनी तगड़ी चीख मूह से निकली कि अगर वहाँ पंप चलने की आवाज़ नही हो रही होती… तो शर्तिया उसकी चीख सात दरवाजे तोड़ती हुई उसके भाई के कानों तक पहुच ही जाती….

कितनी ही देर तक दोनो दम साढे यूही पड़े रहे…. कुच्छ देर बाद अरुण ने पूछा…. भूरी क्या हुआ…. तू ठीक तो है ना…… 

भूरी…हूंम्म में ठीक हूँ, पर भैयाअ.. एक बार तो मुझे लगा जैसे मेरी दम ही निकल गयी, ऐसा क्यों किया आपने..?? 

अब मुझे क्या पता था कि तू भी अपनी गान्ड उपर उठाएगी… तू मिन्नतें कर रही थी लंड लेने की तो मेने नॉर्मली ही डाला था… 

हुउंम्म …. रहने दो ये बहाने…. अब शुरू करो…

ओके, तो चल फिर आसमानों की सैर करते हैं…. इतना कहके अरुण ने धीरे-धीरे अपना लंड अंदर बाहर करना शुरू कर दिया, मोटे खूँटे जैसा लंड चूत में घर्षण पैदा करने लगा, 2 मिनट बाद ही भूरी नीचे से अपनी गान्ड को उचकाने लगी, साथ ही साथ उसके मूह से मज़ेयूक्त सिसकियाँ फूटने लगी….

आअहह ….. उउउंम्म… हीईिइ…भैय्ाआआआअ….चोदो मुझे… और ज़ोर से करो.. प्लस्ससस्स….

इतना सुनते ही अरुण ने अपनी स्पीड बढ़ा दी और थोड़ी ही देर में उसकी स्पीड राजधानी एक्सप्रेस की तरह 120किमि घंटे की हो गयी, लंबा तगड़ा लंड किसी पिस्टन रोड की तरह भूरी के सेल्फ़-लूब्रिकेटेड सिलिंडर में चलने लगा… ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो जैसे उसके होल में कोई अमृत कुंड हो और उससे अरुण का ड्रिल मशीन निकालने के लिए बोर कर रहा हो…..

15-20 मिनट की धुँआधार चुदाई के बाद भूरी की संकरी गली जबाब देने लगी और वो चीख मारती हुई बुरी तरह से अरुण की पीठ पर अपने पैरों को कस्के लपेटी हुई झड़ने लगी… लेकिन अरुण के स्ट्रोक उसी स्टेप्स में बदस्तूर जारी रहे… जब भूरी की सहन शक्ति जबाब देगाई तो वो बोली…. प्लस्सस्स.. रूको थोड़ा, मुझे साँस तो लेने दो…

अरुण ने अपने पिस्टन के मूव्मेंट को रोक कर उसके होंठों पे कब्जा कर लिया…थोड़ी देर होठ चुसाइ के बाद उसने भूरी को चारपाई से नीचे खड़ा कर दिया और उसके हाथ चारपाई के किनारे की पाटी (फ्रेम का डंडा) पे रखवाके उसे झुकने को कहा…

भूरी अपनी 30 इंची गान्ड को चौड़ी करके नीचे खड़ी हो गयी, जिससे उसकी छोटी सी गान्ड का भूरे रंग का अठन्नी के साइज़ का छेद अरुण की आँखों के सामने नुमाया हो गया…

अरुण ने एक बार उसकी गान्ड के उपर किस किया और फिर हाथ फेरते हुए अपनी जीभ भूरी की चूत के उपरी दाने से शुरू होती हुई पूरी चूत की फांकों का स्वाद लेती हुई गान्ड के कत्थई छेद पे आके रेस्ट कर गई, और उससे धीरे धीरे नोक से कुरेदने लगी…

भूरी की चूत मज़े के मारे फिरसे ख़ुसी के आँसू बहाने लगी, कुच्छ तो थोड़ी देर पहले हुए ओरगैस्म की वजह से और फिर से मज़े के कारण उसकी चूत से बहता उसका रस उसकी टाँगों को भी लिसलिसा करने लगा…

अरुण ने लंड की पोज़िशन चूत के होल पे सेट की और फुल एफर्ट के साथ अपना लंड उसकी चूत में घुसा दिया और बिना सांस लिए धक्के मारना शुरू कर दिया…

भूरी की तो मानो लॉटरी ही लग गई आज…. अपने दोनो हाथों से चारपाई को कस के पकड़ अरुण के लंड के धक्कों का भरपूर मज़ा लेने लगी….

आअहह……सस्स्सिईईई….हहुउऊम्म्म्म…. हाईए…म्माआ…..सस्सिईईई.. बहुत मज़ा आ रहा है…. हीयययी भगवाानणन्न्… ईए क्य्ाआअ… सस्स्सिईईई … हूऊ…. रहाआ है … कही में मज़े के मारे मार ना जाआऊऊ…

हुउऊन्न्ं….लीयी सस्साालल्ल्लीइीइ और ले मेरा लंड… लीई और लीयी…स्साअल्ल्लीी कुतिया…बहुत आग है तेरी इससस्स.. चुउत्त्त में…

थप्प…थप्प..फॅच…फकच जैसी आवाज़ों से पूरा कमरा पंप की आवाज़ के साथ मिल कर एक संगीत जैसा पैदा हो रहा था… दोनो ही प्रेमी दीन-दुनिया से बेख़बर चुदाई की मस्ती में चूर लगे हुए थे… पसीने से दोनो के शरीर भीग गये थे… लेकिन कोई कम नही पड़ रहा था…

हालाँकि भूरी की टांगे कापने लगी थी और एक बार वो इस पोज़िशन में भी झड गई थी फिर भी वो अल्हड़, जवानी की दहलीज़ पे खड़ी चुदासी से भरपूर कमसिन बाला हार मानने को तयार नही थी… 
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12-19-2018, 01:38 AM,
#5
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
लेकिन कहते हैं ना कि हर काम का एक अंजाम ज़रूर होता है…. अब भूरी की चूत फिर से पानी छोड़ने को तैयार थी और इधर अरुण का लंड भी मस्ती में झूम रहा था और उसे भी भूरी की कसी हुई चूत के रस ने सराबोर कर दिया था, उसे लगने लगा जैसे उसके लंड को भूरी की चूत जकड लेना चाहती है और उसके धक्कों में अवरोध पैदा कर रही है, जिसके कारण उसके टट्टों से कोई चीज़ बहके लंड के रास्ते बाहर आना चाहती है…

अरुण के धक्के अप्रत्याशित रूप से बढ़ गये, जिसके कारण भूरी की चूत जबाब दे गई और वो भल्भल कर पानी छोड़ने लगी, अरुण ने भी 4 सुलेमानी धक्के मारे और हुंक्काआअरररर मारते हुए भूरी की गान्ड से चिपक गया, उसका लंड भूरी की चूत में फाइरिंग करने लगा… 1…2….3… लगातार 15-20 शॉट मारके वो भूरी के उपर पसर गया, उसके वजन को सहन ना कर पाने और थकान के कारण भूरी चारपाई पर पेट के बल पसर गई, अरुण उसकी गान्ड के उपर लंड अंदर डाले ही पड़ गया…

कितनी ही देर वो दोनो ऐसे ही पड़े रहे…. जब भूरी की साँसें थोड़ा संयत हुई तब उसे अरुण का वजन महसूस हुआ और उसने अपनी गान्ड हिला कर अरुण को उठने का संकेत दिया…

दोनों ने खड़े होकर अपने-अपने शरीर को गीले तौलिया से सॉफ किया जो कि पसीने और उन दोनो के रस से चिपचिपा गया था, अपने-अपने कपड़े पहने, और एक-दूसरे से सटके चारपाई पे बैठकर बातें करने लगे…

भूरी…!! कपड़े पहने के बाद अरुण बोला…

हुउंम.. भूरी अभी-अभी हुई चुदाई की खुमारी में ही बोली..

मज़ा आया…? अरुण ने पूछा..

बहुत !! सच कहूँ, इतना मज़ा तो आजतक कभी नही आया, पता नही आज आपके अंदर किस चोदु की आत्मा घुस गई, हँसते हुए भूरी बोली. एक बार तो लगा जैसे जान ही निकल जाएगी आज तो मज़े के मारे….

अरुण : ह्म… चल तू अब घर जा, कोई आगया तो हम लोग फँस जाएँगे, में भी कुच्छ देर के बाद आता हूँ, अभी तक साला सुबह से खाना भी नसीब नही हुआ.. पता नही आज साला सुबह-सुबह उठके किस गधे का सामना हुआ था..? बुदबुदाते हुए उसने गेट खोला और भूरी की गान्ड पे एक चपत मार के कमरे से बाहर भेज दिया, और खुद उसी चारपाई पे लेट गया…

पट-पाट-पट-पाट..मोटर और पंप के बीच लगे पट्टे के जायंट्स की लयबद्ध आवाज़ें उसके कानों में पड़ रही थी, और उन्ही आवाज़ों के बीच चारपाई पे लेटा-लेटा अरुण अपने परिवार में हुई अतीत की घटनों में डूबता चला गया… 
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12-19-2018, 01:38 AM,
#6
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
ये कहानी है पश्चिमी उत्तर परदेश के एक गाओं की जिसकी 60 के दसक में कुल अवादी होगी लगभग 2000-2500, जिसमें 1/3 ब्राह्मण, 1/4 ठाकुर, बाकी के लगभग सभी जातियाँ रहती थी.

कृषि के मामले में ये इलाक़ा पूरे देश में उत्तम था, गंगा-यमुना के दोआब के इस इलाक़े में ऐसी कोई फसल नही थी जो ना उगाई जाती हो, मुख्य रूप से यहाँ की सिंचाई का साधन गांग नहर थी, इस गाओं के पूर्व में लगभग 800 मीटर दूर एक बड़ी नहर थी और पश्चिम में भी लगभग 1 किमी दूर एक छोटी नहर थी, कुल मिलाकर इस इलाक़े में फसलों की सिचाई के लिए पर्याप्त मात्र में नहरों द्वारा गंगा का पानी उपलब्ध था, सभी को समान रूप से उनके ज़मीनों के माप के हिसाब से.

इसी गाओं में एक खुशहाल ब्राह्मण संयुक्त परिवार था, जिनके पास भरपूर मात्र में ज़मीन थी, इनकी ज़्यादातर ज़मीन छोटी वाली नहर से लगी हुई थी. 

अच्छा ख़ासा बहुत बड़ा सा एक घर था जिसमें चार भाइयों का भरपूरा परिवार संयुक्त रूप से रहता था. चारों भाइयों के हिसाब से ही घर चार हिस्सों में बना हुआ था.

घर के ठीक सामने लगा हुआ एक बड़ा सा लगभग 10 फीट उँची दीवार से घिरा हुआ कम-से-कम 2 एकड़ का एक घेर था, जिसमें लगभग 15-20 पशु (बैल, गई, भैंस और उनके बच्चे आदि) बाँधे जाते थे.

घर बिल्कुल गाओं के पश्चिमी छोर पे है, घर के ठीक पीछे से ही लगभग 8-10 एकर ज़मीन इसी परिवार की है.

जैसा कि पहले भी बताया जा चुका है, कि इस परिवार की खेती 3 मुख्य जगहों पर है, जिसमें से एक ये घर के पिच्छवाड़े वाली है. 



2) दूसरे भाई… जानकी लाल शर्मा : लंबे-चौड़े कद काठी के व्यक्ति, बड़े ही सज्जन और सरल प्रवृति के मालिक, परोपकारी इतने कि चाहे खुद के बच्चे अपनी ज़रूरतों के लिए रोते रहें, लेकिन अगर कोई गाओं का ग़रीब इनके दरवाजे पे आगया तो उसको खाली हाथ नही जाने देंगे.

ऐसा लगता था जैसे इन्हें इस युग में पैदा करके भगवान ने कोई ग़लती करदी हो. 

जानकी लाल शुरुआती 50 के दसक में, अपने गाओं के सबसे ज़्यादा पढ़े-लिखे व्यक्ति थे. पढ़ाई के तुरंत बाद ही इनको अध्यापक की नौकरी मिल गयी, इसलिए इनका पेट नाम ही पंडितजी पड़ गया था. सभी बूढ़े-बच्चे इनको इसी नाम से संबोधित करते थे, लेकिन कुच्छ ही समय बाद उन्होने वो नौकरी छोड़ दी और अन्य भाइयों के साथ खेती वाडी में लग गये.

उत्तम दिमाग़ के मालिक जानकी लाल इतने तेज थे की 10थ-12थ के मैथ के सवाल उंगलियों पे गड़ना करके ही हाल कर देते थे.

इनके भी चार बेटे और दो बेटियाँ हैं, 

दो बड़े बेटे- रोशन लाल, और ब्रिज लाल, उसके बाद दो बेटियाँ- मल्टी और फाल्गुनी, दोनो शादी-शुदा हैं और अपने-अपने परिवारों में सुखी और सम्पन जीवन व्यतीत कर रहीं हैं. उसके बाद दो छोटे बेटे- श्याम बिहारी और अरुण.

चूँकि इस कहानी का मुख्य पात्र अरुण है इसलिए उसी से संबंधित पात्रों पर चर्चा भी स्वाभाविक है ज़्यादा ही होगी.

दोनो बड़े भाई, रोशन लाल और ब्रिज लाल अपनी-अपनी शिक्षा पूर्ण करके अच्छे पदों पर हैं, अलग-अलग शहरों में बस चुके हैं. बड़े भाई गॉव कॉलेज में लेक्चरर हैं, तो दूसरे अग्रिकल्चर यूनिट में प्रोफेसर है.

बड़े भाई के 3 बेटे हैं, जिनमें सबसे बड़ा बेटा तो अरुण से मात्र 8 महीने ही छोटा है और सिविल इंजीनियरिंग से डिप्लोमा करके रेलवे में जॉब करता है.
वाकी दोनों भी अच्छे जॉब कर रहे हैं..

दूसरे भाई के दोनों बेटे भी सेट हैं, एक 5 स्तर होटल में मॅनेजर है, तो दूसरा देश की बहुत बड़ी एलेक्ट्रॉनिक को. में मॅनेजर है. दोनो शादी शुदा हैं.

अरुण के तीसरे भाई श्याम जी- इनके भी 3 बच्चे हैं, 2 बेटे और एक बेटी. आजकल दोनो बेटे जॉब कर रहे हैं, बेटी ग्रॅजुयेशन कर चुकी है, शादी किसी की नही हुई है अभीतक.

अरुण चूँकि इस कहानी का मुख्य पत्र है, इसलिए उसके आज के बारे में हम कहानी के उस पड़ाव तक पहुचने पर ही चर्चा करेंगे तो ही उचित होगा….
……………………………………………………………………………

3) अब नंबर आता है अरुण के चाचा नंबर 1 राम सिंग जी का, लंबे तगड़े राम सिंग जी अपने सभी भाइयों में तगड़े थे, नाम के मुतविक ये वास्तव में ही सिंग थे, अपनी जवानी में इनके डर से इनके साथियों की गान्ड फटती थी. अनपढ़ होते हुए भी कोर्ट-कचहरी और अन्य बाहरी व्यवस्थाओं के कामों में दक्ष थे.

जानकी लाल और राम सिंग जीवन परियन्त तक एक साथ मिलकर ही रहे, लेकिन इन दोनो भाइयों की म्र्टपेरेंट, इनके परिवार अलग-अलग हुए.

अरुण के लिए राम सिंग जी वाकई में चाचा नंबर.1 थे, क्योंकि उसको निडर और साहसी बनाने में इनका बहुत बड़ा योगदान रहा था.

इनके 3 बेटे और एक छोटी बेटी, बड़े दोनो भाई स्कूल टीचर और तीसरे भाई हरियाणा में अग्रिकल्चर ऑफीसर हैं. तीनों के परिवार अच्छे से सेट हैं. बेटी भी शादी शुदा है और अपने परिवार के साथ सुखी जीवन व्यतीत कर रही है.

4) इस परिवार के सबसे छोटे भाई और अरुण के चाचा नंबर.2 ..रमण लाल, बचपन से ही वॅंगाडू किस्म के थे, लेकिन किस्मत के धनी, 

इनकी शादी एक ऐसी लड़की से हुई, जिसके पिता को उसके अलावा और कोई औलाद नही थी, और लगभग 100 बीघा ज़मीन थी उनकी, फिर क्या था बन गये घर जमाई, 

हल्की फुल्की कद काठी के 55 किलो वजनी रमण चाचा अपनी कुन्तल भर की शिवप्यारी के साथ हो गये सेट अपनी ससुराल में, और अपने मुख्य परिवार से कट से गये. इसलिए आगे इनका कोई रोल इस कहानी में नही होगा. लगभग….

तो ये था इस भरे-पूरे परिवार का परिचय… बूआओं का इस कहानी में कोई ज़्यादा महत्व नही है..अगर कुच्छ आया भी तो समय और घटना के हिसाब से बुआ नंबर. 1,2,3 और 4 होंगी.

वाकी अन्य कहानी में समय समय पर जो नाम आएँगे… वो उनके महत्व के हिसाब से परिचित कराए जाएँगे…
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12-19-2018, 01:39 AM,
#7
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
यहाँ चाचा राम सिंग के परिवार का परिचय कराना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि उनके चारों बच्चों का अरुण के शुरुआती जीवन में बड़ा ही महत्वपूर्ण योगदान रहा…

इनके सबसे बड़े बेटे प्रेमचंद, स्कूल टीचर, ये अरुण के सबसे बड़े भाई रोशन लालजी से तकरीवान 4-5 साल और ताऊ के बड़े बेटे भूरे लाल से 3 साल छोटे हैं.

लंबे और इकहरे बदन के प्रेमचंद (मस्टेरज़ी) का विवाह अपने गाओं से करीब 20किमी दूर दूसरे गाओं के स्कूल टीचर की बेटी से हुआ…

लंबे कद की कामिनी भाभी, एक दम गोरी चिट्टी लेकिन भाई साब से थोड़ी भारी भरकम, शुरुआती समय में उनको मोटा तो नही कहा जा सकता था पर अपने पतिदेव से तगड़ी दिखती थी, स्वभाव की तेज, अपने घर में सबको कंट्रोल करने की इच्छा रखने वाली औरत थी, और अपनी सास के मृदुल और शांत स्वाभाव के कारण ये संभव भी हो गया, 

चूँकि, अपने घर के बड़े बेटे की बहू होने के कारण मालकिन बन बैठी, यहाँ तक कि उनकी सासू माँ, यानी कि अरुण की चाची भी उनसे डरने लगी..

चाचा के दूसरे बेटे: मेघ सिंग, मीडियम हाइट, लेकिन पहाड़ जैसा मजबूत शरीर, मेहनती इतने की कोई भी मजदूर खेती के कामों में इनकी कभी बराबरी नही कर पाया. रामायण, महाभारत, गीता, जैसे सभी ग्रंथों का अध्ययन नियमित रूप से करना इनका शौक था, इसी कारण इनका नाम स्वामी ही पड़ गया.

ये भी बगल के गाओं के स्कूल में टीचर थे, जिसकी वजह से दोनो ही काम अच्छे से संभाल लेते थे. सरल स्वाभाव लेकिन अगर गुस्सा आ जाए तो किसी बड़े-से-बड़े अधिकारी का इनकी दहाड़ से मूत निकल जाए. 

इनकी पत्नी कमला रानी, आहा..हहाअ…. क्या हुश्न था, हल्की सी सावली, इकहरे बदन की मालकिन, स्वाभाव…. किससे उपमा दें ? क्योंकि गाय (काउ) भी कभी-कभी मारने को आती है… उनको अपने जीवन में किसी ने कभी गुस्सा होते नही देखा, 

अपनी हिटलर जेठानी के सामने तो ये कभी भूल के भी नही पड़ती थी, सिर्फ़ अपनी सासू माँ के पास ही ज़्यादातर समय रहती. इनकी एक बड़ी बेटी, और छोटा बेटा, बेटे को जन्म देके 6 महीने के बाद ही भगवान को प्यारी हो गई, शायद उनकी अच्छाई भगवान को भी अच्छी लगी होगी.

चाचा के तीसरे बेटे और अरुण के संरक्षक कम सखा, यशपाल शर्मा जी, ये एमससी करके हरियाणा के एक छोटे से शहर में अग्रिकल्चर ऑफीसर हैं, हमेशा फील्ड वर्क रहता है इनका, यथासंभव किसानों की मदद करते रहते हैं, अच्छी ख़ासी सॅलरी है.

इनकी शादी, अपने गाओं के नज़दीक के टाउन से हुई, ये भाभी भी अपनी बड़ी जेठानी की तरह लंबी-चौड़ी हैं, लेकिन नेचर एक-दम ऑपोसिट, वो पूरव तो ये पश्चिम.

यशपाल जी के तीन बेटियों के बाद एक बेटा है, तो स्वाभाविक है, सबका लाड़ला ही होगा, लेकिन बिगदेल नही.

चाचा की बेटी नीणू अपने तीनों भाइयों से छोटी है, सभी उसको बहुत प्यार करते हैं, लंबा कद इकहरा शरीर, थोड़ी सी सावली लेकिन सुंदर दिखती है, उम्र में ये अरुण से 4 या 5 साल और श्याम भाई से 1 साल बड़ी है.

तो ये था अरुण के चाचा की फॅमिली का परिचय,…

दोस्तो…. ज़्यादा बोर तो नही हो रहे, सोच रहे होगे क्या ये पूरी बारात का बही ख़ाता लेके बैठ गया…

खैर में अब और ज़्यादा बोर नही करूँगा, यहाँ से कहानी अब अरुण शर्मा की ज़ुबानी चलेगी… 

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में भूरी को विदा करके, ट्यूबिवेल के कमरे में चारपाई पर लेटा हुआ काफ़ी देर तक सोचों में डूबा रहा, समय भी बहुत हो गया था, दोपहर के करीब 2 बज रहे थे, 

सुबह से कुच्छ खाया भी नही था, पेट में चूहे दौड़ लगा रहे थे, घर जाने का मूड नही था, मैने सोचा ऐसा ही कुच्छ ख़ाके काम चला लेता हूँ, 

बाहर जाके गन्ने के खेत से दो तगड़े से गन्ने तोड़े और खाने लगा, दो गन्ने ख़ाके कुच्छ आराम मिला, फिर सामने वाले खेत में सब्जियाँ लगी थी, तो चलो देखते हैं इसमें कुच्छ खाने लायक होगा ही.

सब्जियों के खेत में गोभी, टमाटर, भिंडी, गाजर ये सब थी, शुरू से ही कच्ची सब्जियाँ खाने की आदत थी, सो थोड़ा-थोड़ा सबमें से तोड़े-तोड़के वो खाली, मेरा पेट इतना तो भर ही गया कि मुझे अब घर जाने की ज़रूरत नही लगी.

2-3 घंटे, जो काम पड़ा था वो निपटाया, तब तक शाम के 5 बज गये, सर्दियों के दिन थे, तो शाम जल्दी भी हो जाती है. पॉवर भी चली गई थी तो पंप के चलने का कोई सवाल ही नही था, मेने कमरे को लॉक किया और घर की तरफ चल दिया.

घर पहुँचा तो और किसी को तो मेरी परवाह ही नही थी, लेकिन माँ का दिल, चिल्लाने लगी जोरे-जोरे से…

कहाँ था सारे दिन…. खाना खाने भी नही आया,

मेने कहा में ट्यूबिवेल पर ही था, और किसी को अगर मेरी परवाह होती तो खबर लेता मेरी, कुच्छ नही तो खाना ही भिजवादेते, 

माँ बोली… यहाँ तेरी कोई फिकर करने वाला नही है, सब को अपना-अपना दिखता है, तुझे अपनी खुद फिकर करनी चाहिए, अब खाना खले भूखा होगा, सुबह से कुच्छ नही खाया.

मेने कहा… नही मेने खातों से थोड़ा-थोड़ा कुच्छ खा लिया है, में अभी आता हूँ 1-2 घंटे में तब खा लूँगा, इतना बोल के बाहर निकल गया और पहुँच गया अपने अड्डे पे मंदिर के पिछे वाले रूम में.

यहाँ तो महफ़िल जमी हुई थी, उनमें कोई शहर से चरस लेके आया था, चिलम में डालके सुट्टे लग रहे थे, मेने भी 2-3 सुट्टे कस के लगाए, दिमाग़ एक दम झंड हो गया….बोले तो मज़ा आगेया. इस तरह दो-तीन राउंड और चले, सबकी आँखें नशे की वजह से सुर्ख हो रही थी. 

एक -डेढ़ घंटे बाद घर आया और चुप-चाप मा से खाना लिया, खाया, डिब्बे में 1 लिटेर दूध और 50ग्राम घी, बूरे के साथ डाला और चल दिया अपने खातों की ओर लटकाए डिब्बे को. आज एक देसी अंडा लेना भूल गया था, ये मेरा रोज़ का रुटीन था इतना…..

घी वाला हल्का गरमा-गरम दूध फेंटा मारा, चढ़ा लिया और तान के चादर लेट गया चारपाई पर, और कोशिश करने लगा सोने की, लेकिन नीद आँखों से कोसों दूर थी…. आज ना जाने रह-रह कर सुवह भाइयों के साथ हुए वार्तालाप को लेकर मेरा मन कुच्छ अशांत सा था…
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12-19-2018, 01:39 AM,
#8
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
देर रात तक पड़ा-पड़ा सोचता रहा अपनी बीती जिंदगी के बारे में, जिसे उसके सगे पिता और भाइयों ने तो कभी समझा ही नही, लेकिन दूसरों ने कभी भुलाया नही उसकी अच्छाइयों को…

दिमाग़ में उसके जन्म से संबंधित बातें, जो उसकी माँ और अन्य घरवालों से पता चली थी, घूमने लगी कि किन विषम परिस्थितियों में उसका जनम हुआ था….? और क्यों…?

रोशन जब 12थ स्टॅंडर्ड में थे तभी उनकी शादी कर दी गयी, उस वक्त श्याम की उम्र करीब 1 साल थी, 

बेटे की शादी के 2 साल बाद माँ फिर से गर्भवती हो गयी, ये बात जब उन्होने अपने पति को बताई तो संस्कारी जानकी लाल दुखी हो गये….

ये ठीक नही हुआ पद्मा… बहू क्या सोचेगी हमारे बारे में, लोग कहेंगे कि बुढ़ापे में भी इनको चैन नही है….

अभी तो बहू के बच्चे होने वाले हैं और सास अभी-भी बच्चे पैदा कर रही है…

तो अब क्या करें जी…. पद्मावती पति की बात से सहमत होते हुए बोली…

एक काम करो, तुम गरम चीज़े खाना शुरू करदो, अभी ज़्यादा समय नही हुआ है, हो सकता है गर्भ-पात हो जाए…

ठीक है कोशिश करते है… 

गाओं से 35-40 किमी से पहले कोई बड़ा शहर ही नही था जहाँ उचित डॉक्टर की सलाह ली जा सके, सभी लोग देहाती नुस्खे या वैद-हकीम के पास ही इलाज कराते थे ज़्यादातर, और गाओं के वैद जी भी जानकी लाल के गाओं के रिश्ते के बड़े भाई लगते थे, लेकिन शर्म की वजह से उन्होने उन्हें भी पुछ्ना उचित नही समझा और जो उचित लगा वो सलाह दे दी…

उधर माँ अपने पातिदेव की सलाह ध्यान में रख कर उल्टी-सीधी गरम चीगें कूट-कूट के खाने लगी, हालाँकि उन्हें उसका दुष्प्रभाव भी हुआ, लेकिन क्या कर सकती थी वो.

दिन निकलते गये कोई नतीजा नही निकला, अब तो ये भी संभावना नही थी कि बच्चा जिंदा भी है या नही ? लेकिन गर्भ-पात तो नही हुआ. लिहाजा उन्होने वो सब चीगें खाना बंद कर दिया, लेकिन उसका दुष्प्रभाव तो हो चुका था..

सासू जी के गर्भधान के लगभग 4 महीने बाद ही बहू के पाव भी भारी हो गये, जैसे ही ये बात सास-ससुर को पता लगी, वो दोनो बैचैन हो गये, लेकिन दिखाने के लिए खुशियाँ माननी भी ज़रूरी थी, 

अंततोगत्वा अपने गर्भ की बात भी माँ को उजागर करनी ही पड़ी, और ना चाहते हुए भी सभी लोगों को स्वीकार भी कर लेना पड़ा… 

ख़ासकर उनके दोनों बड़े बेटों को बड़ा बुरा लग रहा था…

अंततः वो समय आ ही गया जब उस अन-चाहे जीव को इस धरती पर आना था..

ज्येष्ठ (मे-जून) का महीना था सुबह के पोने तीन या चार बजे बच्चे का जन्म हुआ, बहुत देर तक बच्चे के मूह से कोई आवाज़ नही निकली, बस थोड़ी सी शरीर में हलचल हुई, और फिर बंद हो गई….

शरीर क्या? बस एक पोना-एक किलो का हल्के पीले कत्थई रंग का बहुत ही पतला सा जैसे कि कोई खिलोना हो और उसपे शरीर के अंग स्केच कर दिए हों बस…

थोड़ी देर टटोल-टटाल ने के बाद दाई को जब कोई प्रतिक्रिया बच्चे की तरफ से नही दिखी, तो उसने उसे मृत घोसित कर दिया…
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12-19-2018, 01:39 AM,
#9
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
शरीर क्या? बस एक पोना-एक किलो का हल्के पीले कत्थई रंग का बहुत ही पतला सा जैसे कि कोई खिलोना हो और उसपे शरीर के अंग स्केच कर दिए हों बस…

थोड़ी देर टटोल-टटाल ने के बाद दाई को जब कोई प्रतिक्रिया बच्चे की तरफ से नही दिखी, तो उसने उसे मृत घोसित कर दिया…

कितना ही अन-चाहा गर्भ क्यों ना हो, जब एक माँ उसे 9 महीने गर्भ में रख चुकी हो और फिर उसे पता लगे कि बच्चा तो मरा पैदा हुआ है, तब उस माँ को कितना दुख होता होगा ये हम कोई भी इमॅजिन नही कर सकते, ये तो वो माँ ही बता सकती है या उसका दिल…

पद्मावती जी ये सुन कर सन्न्न.. रह गयी, हाल ही मे प्रसूति की पीड़ा झेलचुकी वो माँ अपने बच्चे को मृत हुआ सुन कर एक दर्दनाक चीख के साथ बेहोश हो गई…

उधर ये बात बाहर घर के दूसरे लोगों को पता चली, तो सभी दुखी हो गये…., 

होनी को कों टाल सकता है.., जो होना था सो तो हो गया, भगवान को शायद यही मंजूर था, और वैसे भी आदमी अपनी करनी को छिपाने के लिए भी यही बोलता है,,

ये सोचके उस बच्चे को ज़मीन में गाढ़ने के लिए मरघाट स्थल की ओर ले चले उसे एक सफेद कपड़े में लपेट कर..

गाओं से करीब 500 मीटर दूर एक छोटे से तालाब के किनारे 12 साल से छोटे बच्चों को ज़मीन में दफ़नाने की प्रथा है, सो वहाँ जाके एक छोटा सा गड्ढा करीब 5 फीट गहरा तैयार कर लिया बच्चे के लिए….

वैसे तो जानकी लाल, श्याम के जन्म के बाद से ही नही चाहते थे कि आगे उनके और कोई भी संतान पैदा हो, और उसी सोच के कारण उन्होने अपनी पत्नी को गर्भ गिराने के उपाय कराए थे… लेकिन फिर भी वो एक पिता थे और जब बच्चा धरती पर आ ही गया था तो मरा ही क्यों…??

यही बातें सोचते-सोचते, अश्रुपूर्ण आँखों से वो अपने बच्चे को लपेटे हुए कपड़े के साथ ही उस गड्ढे में रखने के लिए झुके ही थे कि बुरी तरह से चोंक पड़े और उनके रोंगटे खड़े हो गये…………….

चित्रगुप्त अपने आसान पे विराजमान थे, सफेद दूधिया वस्त्र, एकदम फक्क-सफेद लंबी दाढ़ी, जो उनके सीने को आधा ढके हुए थी, वो उस समय ब्रह्मांड व्यवस्था निर्धारण पद्यति का अध्ययन कर रहे थे जिसमें ब्रह्मांड में उपस्थित सभी जीवात्माओं का लेखा जोखा था.

एक पुष्प लाड़ित आसान पर विराजमान उनका शरीर एक ऐसे अनूठे प्रकाश से प्रकाशमान था, जिसे कोई आम इंसान अपनी साधारण आँखों से देख नही सकता. 

उनके आसान के दाई तरफ सफेद चमकीले वस्त्रों में देवदूत एक लाइन में खड़े थे, और बाई तरफ एक लाइन में काले वस्त्रों में यमदूत.

पूरा वातावर्ण, हल्के नीले सफेद पारदर्शी धुए जैसी चादर से ढका हुआ था, वाबजूद इसके सब कुच्छ साफ-साफ दिखाई दे रहा था वहाँ जो भी कुच्छ था.

अचानक चित्रगुप्त ने अपनी नज़रें उपर की, जैसे ही उनकी नज़र एक यमदूत के साथ खड़ी एक जीवात्मा पर पड़ी तो वो चोंक पड़े, और उस यमदूत से बोले..

अरे भाई ! ये जीवात्मा यहाँ क्या कर रहा है ? इसे तो हमने कुच्छ समय पुर्व मृत्यलोक में एक स्त्री के गर्भ द्वारा मानव शरीर में भेजा था…

यमदूत: श्रीमान, मुझे आदेश मिला था कि मृत्यलोक से एक जीव को लाना है, में जब उस जगह पर पहुँचा, तो वही पर वातावरण में बिचरते हुए ये मुझे वही मिल गया और में इसे पकड़ लाया… सोचा यही होगा…

अरे मूर्ख…. चित्रगुप्त गुस्से में बोले.., इसे अति शीघ्रा वापस भेजो, और फिर उस जीवात्मा से मुखातिव हुए… 

क्यों भाई, तुम्हें तो गर्भ से मानव शरीर में प्रवेश करना था, तो तुम बाहर क्यों विचरण कर रहे थे,

जीवात्मा: श्रीमान वो शरीर इतना कमजोर था कि प्रवेश करते ही मुझे उसमें घुटन सी होने लगी और में बाहर आगया…

चित्रगुप्त – अरे वाह ! अब ये तुम निर्णय करोगे ? कि किसको कैसा शरीर मिलना चाहिए…! 

देवदूत...! इसे अति शीघ्रा लेकर जाओ और उस शरीर में प्रवेश करा कर ही लौटना…! 

जल्दी करो वरना वो शरीर भी नष्ट हो जाएगा और फिर इसे लंबे वक्त तक ऐसे ही भटकना पड़ेगा.

फटाफट, देवदूत उसे लेकर प्रकाश की गति से भी तेज उड़के उस जगह पहुच गया जहाँ उसके निर्जीव शरीर को दफ़नाया जा रहा था…. 

गड्ढा खुद के तैयार था, जानकी लाल दुखी मन से रुन्धि हुई आँखों से उसके शरीर को कपड़े में लपेटे हुए गड्ढे में उतार चुके थे…

देवदूत … जीवात्मा से… ये प्राणी…, जल्दी से इस शरीर में प्रवेश कर..

जीवात्मा: आप ही देखिए श्रीमान इस शरीर को…, क्या आपको लगता है कि ये जीवन जीने लायक है..?

अरे भाई जल्दी कर वरना ये लोग इसे मिट्टी में दफ़ना देंगे और मेरी नौकरी ख़तरे में पड़ जाएगी, इतना बोलकर उस देवदूत ने अपनी कर्म-दांडिका जीवात्मा के दाहिने वक्ष के नीचे रखके एक धक्का दिया और उस शरीर में प्रवेश करा दिया…!

ये वोही समय था जब जानकी लाल अपने बेटे के निर्जीव शरीर को आख़िरी बार अपने सीने से चिपकाए उस गड्ढे में रखने के लिए झुके…

जैसे ही जीवात्मा उस शरीर में प्रवेश हुई, शरीर में मानो 440वाट का झटका लगा, बच्चे के पैर एक साथ जानकी लाल जी के कनपटी पर लगे, वो एकदम से चोंक गये, इतने में बच्चे के रोने की आवाज़ भी सुनाई दी….

मारे खुशी के उनका शरीर उत्तेजना से काँपने लगा, उन्होने जल्दी से बच्चे को बाहर खड़े अपने भतीजे यशपाल को दिया और बोले…

बेटा ये जिंदा है… जल्दी से इसका मूह बाहर निकाल…, उनकी आवाज़ खुशी से काँप रही थी, होंठ थरथरा रहे थे, 

यशपाल ने लपक के बच्चे को पकड़ा और उसका मूह कपड़े से बाहर निकाल कर सीने से चिपका लिया..बच्चा बेजार रोए जा रहा था.

लगभग भागते हुए यशपाल बच्चे को चिपकाए, घर पहुँचा और उसे अपनी ताई की गोद में डाल दिया जो इस समय अर्धमुर्छित अवस्था में पड़ी थी…

बच्चे के रुदन ने उन्हें पूरी तरह होश में ला दिया…

फिर सारी विधियाँ जो एक नवजात शिशु के होने पर होती हैं हुई..

जब बच्चे के शरीर को नहलाने के लिए उसे बड़ी सावधानी पूर्वक कपड़े से मुक्त किया, वहाँ मौजूद सभी औरतें चोंक गयी…
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12-19-2018, 01:39 AM,
#10
RE: Antarvasna kahani ज़िन्दगी एक सफ़र है बेगा...
चाची: अरे दीदी ये देखो, ये निशान कैसा है, पैदा हुआ था तब तो नही था.., सबने देखा कि बच्चे के दाए वक्ष के नीचे एकदम गोल आकार में, उस समय के 1 रुपये के सिक्के के बराबर का काला निशान था जो उस देवदूत की छड़ी के कारण बन गया था..

पारखी जानकी लाल समझ गये कि इसकी वापसी असाधारण है, और कुच्छ विशिष्ट तो ज़रूर हुआ है इसके साथ.

गर्भधान के समय, पद्मावती ने जो गर्भ-पात करने के उद्देश्य से उपाय किए थे उनके दुष्प्रभाव के कारण बच्चे को गर्भ में ही पांडु रोग (जानडीश) हो गया, नतीजा उसका शरीर ज़रूरत से ज़्यादा कमजोर और पीला पड़ गया था.

बड़ा परिवार, औरतों की कमी नही थी घर में बच्चे की देखभाल के लिए, लेकिन इस बीमारी का क्या किया जाए.., दिखाया वैद-हकीमों को. 

एक तो वैद उनके अपने ही मोहल्ले के भाई, जो उम्र में जानकी लाल के बड़े भाई के बराबर थे, ज्योतिष् के विद्वान, लग गये ग्रह नक्षर्तों की गडना करने में, उन्होने दोनो समय के हिसाब से देखा, .. पहले का जब उसका जन्म हुआ, और बाद का जब उसमें दुबारा प्राण आए…

जानकी लाल…! तुम्हारा बच्चा बहुत कठिन काल में पैदा हुआ है, अगर इसके जन्म के समय से देखा जाए तो ये 6 साल तक ऐसा ही अस्वस्थ रहेगा, 

लेकिन अगर बाद के समय के हिसाब से सब कुच्छ हुआ तो 6 महीने के बाद ये एकदम स्वस्थ हो जाएगा, तब तक तुम कितने ही जतन कर्लो ये ठीक नही हो पाएगा.., वैसे और कोई चिंता का विषय नही है.

वैद जी आगे बोले…, और एक खास बात है, कुच्छ ही सालों के बाद तुम में से किसी को भी इसकी परवाह करने की ज़रूरत नही पड़ेगी, उल्टा ये सब के लिए लाभकारी सिद्ध होगा..

घर में खुशिया वापस आचुकी थी, सभी खुश थे, बच्चे का नामकरण बड़ी धूम-धाम से हुआ, पंडितजी ने उसका नाम अरुण रखा….

इधर सारा परिवार नवजात शिशु के नामकरण की खुशियाँ मना रहा था उधर चाचा रामसिंघ अपनी सेट्टिंग प्रेमा के साथ अपने घर की खुशियाँ शेयर कर रहे थे…


लंबे कद की 5’6” प्रेमा गोरी चिट्टि इकहरे बदन की मालकिन, बड़ी ही सुंदर थी, कहीं भी एक कतरा मास का एक्सट्रा नही था उनके मादक शरीर में सिवाय जहाँ होना चाहिए..

उठे हुए एकदम सीधे कड़क 32 के चुचे, नीचे एकदम सपाट पेट, पतली 24 की कमर, थोड़ी सी पीछे को उठी हुई 30 की गान्ड एकदम ठोस गोल-गोल, हल्की सी चल में थिरकन लिए हुए, कुलमिलाकर विशुद्ध देहाती कड़क माल…

वैसे तो वे रिस्ते में रामसिंघ की चाची लगती थी लेकिन उनसे भी 4 साल छोटी ही थी, पर कहते हैं ना कि, उपर-उपर चाची, नीचे गैल खुदा की. 

रामचंद काका का व्यः उनकी अधेड़ उम्र में जाके हुआ था, और प्रेमा शादी के समय 18 की भी नही थी, अब ऐसे जोड़े का जो अंजाम होना था वही हुआ..

6-8 महीने तो वो काका के लंड से काम चलती रही, वैसे तो रामचंद काका लंड-धरी थे 8” का मोटा तगड़ा लंड था उनका, जिसने काकी की चूत की दीवारे रगड़ रगड़ के खोल दी थी..

लेकिन जैसे-2 उनकी चूत रवाँ हुई, अब उनको दिन रत लंड दिखाई देने लगा, इधर काका का मामला ठंडा पड़ने लगा और वो मुश्किल से 1 या 2 बार ही चोद पाते थे, कभी-कभी तो वो प्यासी ही रह जाती थी.

रामचंद काका के खेत, रामसिंघ जी की ज़मीन से लगे हुए ही थे, काका ने अपने खेतो पर ही एक घर बना रखा था, ज़्यादातर वो वहीं रहते थे..

कुछ दिनो बाद काकी का भी खेतों पर आना-जाना शुरू हो गया था.., 

शायद आप में से कुछ लोगों को पता हो, पुराने समय में गाओं के लोग धोती पहनते थे वो भी बिना अंडरवेर के…

अगर लंबा कुर्ता ना पहना हो तो आधा खड़ा लंड भी इधर से उधर पेंडुलम की तरह झूलता दिखाई देता था..

6’3” लंबे, 48-50” चौड़ी छाती, ज़्यादा गोरे तो नही लेकिन साफ गेहुआ रंग रामसिंघ एक पूर्ण मर्द थे, 

वैसे रामसिंघ खेती के कामों में ज़्यादा भाग नही लेते थे, उनका काम सिर्फ़ घर-बाहर की ज़रूरतों की व्यवस्था करना ही होता था, फिर भी यदा-कदा वो खेतों पर चक्कर मारने आते थे, 

एक और संयोग ये था कि उनकी दूसरी ज़मीन जो मैं चक से करीब 1 किमी दूर थी उसका रास्ता भी रामचंद काका के खेतों वाले घर के आगे से होकर ही था, 

सो अक्सर आते-जाते, प्रेमा काकी बड़ी कामुक नज़रों से रामसिंघ को देखती रहती, लेकिन वो अपने रिस्ते की मर्यादा में उन्हें हमेशा इज़्ज़त से देखते थे..
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